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आचार्य प्रशांत | दर्शन | वेदांत | अस्तित्ववाद | अध्यात्म | शुद्ध शाकाहार | जलवायु परिवर्तन | प्रोफाइल प्रशांतअद्वैत संस्था द्वारा मात्र ब्रॉडकास्ट हेतु संचालित

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गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है। ~ आचार्य प्रशांत

गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है। ~ आचार्य प्रशांत

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कमज़ोर के साथ नरम रहो और अत्याचारी के साथ एकदम गरम

कमज़ोर के साथ नरम रहो और अत्याचारी के साथ एकदम गरम

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तुम्हें लड़ना पड़ेगा !

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क्यों उठे हो आज सुबह?

क्यों उठे हो आज सुबह?

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यह दुनिया के अधिकांश शहरों का भविष्य है। ये कोई घटना नहीं है। ये एक कंटिन्यूटी है। यह कोई एक बिंदु नहीं है। एक दिन नहीं है। यह लगातार कुछ चल रहा है। पर हम स्वार्थवश उस ओर देखना नहीं चाहते। पता नहीं किस नशे में खोए हुए हैं। ये पूरा क्लाइमेट कैटास्ट्रोफी का फ़िनोमिना रहा है। और आगे भी यही रहने वाला है। दुनिया के बहुत सारे शहरों का भविष्य है। पूरा ही छोड़ देना पड़ेगा। कोई बहुत गर्म हो जाएगा, कोई बहुत ठंडा हो जाएगा, कोई बर्फ़ के नीचे दब जाएगा, कोई पानी के नीचे आ जाएगा। कहीं हर समय तूफ़ान चल रहे होंगे। कहीं इतना सूखा पड़ रहा होगा कि वहाँ पीने का पानी नहीं मिलेगा, तो वहाँ रहेगा कौन?

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नेपाल बाढ़: एक चेतावनी एक तारीख़ नोट कर लीजिए: 2050। उस साल हिमालय की नदियों के साथ कुछ ऐसा होगा जो पिछले 10,000 सालों में नहीं हुआ और उसके बाद जो होगा, वो आपके बच्चों की पूरी ज़िंदगी तय करेगा। वैज्ञानिक इसे कहते हैं पीक वॉटर। समझिए। गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र - इन नदियों में पानी दो जगह से आता है। एक, मॉनसून की बारिश। दो, हिमालय की बर्फ़ का पिघलना। बारिश मौसमी है। दो-चार महीने, पर बर्फ़ साल भर पिघलती है। यही वह चुपचाप बहती धारा है जो गर्मियों में भी नदी को ज़िंदा रखती है। इसीलिए गंगा सदानीरा है, हमेशा जल देने वाली। अब खेल समझिए। गर्मी बढ़ रही है तो ग्लेशियर तेज़ पिघल रहे हैं। तेज़ पिघलेंगे तो नदियों में पानी बढ़ेगा और यही हो रहा है। अभी नदियाँ उफान पर हैं। बाढ़ें बढ़ रही हैं। पर ग्लेशियर कोई अनंत भंडार नहीं है। एक दिन वो इतना सिकुड़ जाएगा कि तेज़ पिघलने पर भी उससे कम पानी निकलेगा। वही मोड़ है पीक वॉटर। उसके पहले हर साल पानी बढ़ता है। उसके बाद हर साल घटता है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र के लिए वो मोड़ आएगा 2050 के आसपास, 25 साल दूर। यानी आज जो बाढ़ें दिख रही हैं, वह समृद्धि का नहीं, अंतिम उफान का संकेत है। दिया बुझने से पहले सबसे तेज़ जलता है और 2050 के बाद का दृश्य - बारिश तब भी होगी, बल्कि और उग्र होगी, पर वह 4 महीने की है। बाकी 8 महीने जो बर्फ़ संभालती थी, वो बर्फ़ घट चुकी होगी तो नई सच्चाई होगी: जुलाई में प्रलय, मार्च में प्रयास, बाढ़ और सूखा एक ही साल में, एक ही नदी में। सोचिए उस खेती का क्या होगा जो हजार साल से नदी की समय पाबंदी पर खड़ी है। उन शहरों का, उन उद्योगों का, उन 2 अरब लोगों का, जिनका जीवन इसी भरोसे पर टिका है कि नदी कल भी वैसी बहेगी जैसी आज बही। अब गहरा प्रश्न। हमें 25 साल पहले बताया जा रहा है। तारीख़ तक बताई जा रही है। फिर भी हम नहीं रुक रहे। क्यों? क्योंकि भोग का स्वभाव ही यही है। वह भविष्य को देखने नहीं देता। जिसे अभी एक और चीज़ चाहिए, वो 2050 की क्या सोचेगा? मन कहता है, अभी तो पानी खूब है। और यही मूर्छा है। जेब से पूँजी जा रही हो और आदमी नक़दी देखकर खुश हो। इससे बड़ा अंधापन क्या होगा? नदी पलटने में 25 साल बचे हैं। मन पलटने में कितने लगेंगे? यह आप तय करेंगे।

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नेपाल की बाढ़ का असली कारण क्या है? 26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसोआ जिले में एक ग्लेशियर से बर्फ और चट्टान का विशाल हिमस्खलन टूट कर गिरा। उसने लिंडे खोला नदी का रास्ता रोक दिया। बर्फ का बहुत बड़ा टुकड़ा ऊपर ग्लेशियर से टूट कर गिरा, नदी के रास्ते में गिरा, उसने नदी का रास्ता रोक दिया। पानी रुका, पानी ठहरा, इकट्ठा हुआ और इतना पानी जब इकट्ठा होगा, तो फिर वो अपने किनारों को, बाँध को तोड़ेगा। और उसने तोड़ा। और फिर एक साथ इतने पानी का बहाव आया कि वो सब कुछ बहा ले गया - गाँव के गाँव, पुल, सड़कें, छह बड़ी जल विद्युत परियोजनाएँ। सब कुछ। मीडिया में और आम जनमानस में इस पूरी त्रासदी को बाढ़ की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। छप भी यही रहा है - नेपाल की बाढ़, नेपाल की बाढ़ में इतने लोग बह गए, इतना नुकसान हुआ, इतनी दुखद मौतें हो गईं। उसको बाढ़ की तरह दिखाया जा रहा है और इसलिए मुझे जरूरी लगा कि मैं आपके सामने आकर के एक बात का खुलासा करूँ, जो कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है। आम जनता को बात पता होनी चाहिए थी, लेकिन वो बात उतनी सफाई के साथ सामने नहीं आ रही है। तो इसलिए मुझे बोलना पड़ा। बाढ़ इसको मत कहिए, जैसे हम आमतौर पर बाढ़ को देखते हैं। बारिश नहीं हुई थी उस दिन। अगर यह बाढ़ है भी, तो यह बाढ़ असामान्य है, क्योंकि यह बारिश का परिणाम नहीं थी। बारिश हुई ही नहीं थी उस दिन। बादल नहीं फटा था। यह आपदा आसमान से पानी के रूप में नहीं उतरी थी। यह आपदा पहाड़ से उतरी थी। यह आपदा ग्लेशियर से आई है। बादल से नहीं आई है। ग्लेशियर टूटा था और ग्लेशियर का बड़ा टुकड़ा जाकर के नदी के रास्ते में पड़ गया था, अवरोध की तरह। और ग्लेशियर क्यों टूटा? क्योंकि हिमालय तप रहा है। यह है वो कोण जो आम जनता को पता होना चाहिए। हिमालय गर्म हो रहा है और आप जानते हैं, बर्फ का बहुत बड़ा टुकड़ा हो, उसको आप गर्म करेंगे तो बर्फ टूटने लगेगी। यह हम जानते हैं। ग्लेशियर इसलिए टूटा क्योंकि हिमालय तप रहा है।

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हिमालय की बर्बादी हर हिमालयन डिजास्टर के बाद एक ही कहानी चलती है - जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, सायरन लगाने का वादा होता है, बजट घोषित होता है। और ठीक उसी समय उसी पहाड़ पर सड़कें चौड़ी की जाती हैं, हेलीपैड बनते हैं, रेलवे ऊपर चढ़ाई जाती है। एक हाथ से हम पहाड़ का इलाज लिखते हैं और दूसरे हाथ से उसी के घाव को रेतते हैं। समझिए कि हिमालय है क्या। यह दुनिया के सबसे युवा पहाड़ हैं। भूगर्भ की दृष्टि से अभी बच्चे हैं - कमजोर, कच्चे, अनगढ़े। इन्हें जोड़कर रखती है बर्फ, ग्लेशियर और परमाफ्रॉस्ट (यानी जमी हुई जमीन), जो ढलानों पर सीमेंट का काम करती है। अब उस सीमेंट को गर्मी पिघला रही है, यानी पहाड़ पहले से ही कमजोर है। और ऐसे में हम क्या कर रहे हैं? पर्यटन का मेला, चौड़े हाईवे ताकि SUV सीधी चोटी तक चढ़े, चार्टर्ड बसें और जैसे इतने से भी ना हो, उनके लिए पहाड़ काटकर हेलीपैड! तीर्थ यात्री पहले पैदल चलता था, उसकी बात अलग है। पर यह वो व्यवस्था है जो बिना चले, बिना श्रम के, बिना श्रद्धा के, भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में लाकर भर रही है। और इस सब का नाम रखा है 'विकास'। पिघलते पहाड़ में बनाई गई हर एक नई सड़क पहले से घायल शरीर पर एक और घाव है। और हम उसी को न्योता दे रहे हैं - आओ आओ, अपनी गाड़ियों पर। नदी है, बर्फ है, मैगी है, मौज है! तो पहला ईमानदार कदम क्या होगा? टोल गेट पर सच बोलना। हिमालय सस्ते पर्यटन की जगह नहीं है। जो ऊपर जाएगा वो चढ़ाई की पूरी कीमत चुकाएगा, और पूरी कीमत में वह कीमत भी शामिल है जो पहाड़ चुकाता है। हर चढ़ती सड़क पर भारी एंट्री फी हो, हर चढ़ते वाहन पर भारी टोल टैक्स हो। यह दंड नहीं, न्याय है। कोई कहेगा - यह तो तीर्थ को अमीरों तक सीमित करना हो गया? नहीं, यह तीर्थ को तीर्थ रहने देना हुआ। देवभूमि कहते हैं ना इन पहाड़ों को, देवताओं का घर। तो सोचिए, घर में घुसने की मशीन बनाना भक्ति है या घर को गिरने से बचाना? आज का असली धर्म हिमालय पर चढ़ना नहीं है, उसे बचाना है। यह समय पहाड़ चढ़कर शेखी बघारने का नहीं है, नम्र होकर उसे बचाने का समय है। वरना यह पहाड़ बंजर चट्टानों के विशाल स्मारक बन जाएंगे - गिरते हुए स्मारक, क्योंकि जो बर्फ इन्हें जोड़े रखी थी वही नहीं रहेगी। आओ आओ, यही विकास है? नहीं, यह मृत्यु है। यह ऐसी व्यवस्था है जो बिना किसी मेहनत, विचार या समझ के भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में ला-लाकर भर रही है।

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चित्रकूट में बाढ़ ये कोई घटना नहीं है, ये एक कंटिन्यूटी है। ये कोई एक बिंदु नहीं है, एक दिन नहीं है। यह लगातार कुछ चल रहा है, पर हम स्वार्थवश उस ओर देखना नहीं चाहते। मजबूर होकर सिर्फ तब देखते हैं, जब इतनी सारी गिर जाती हैं। उससे पहले हम पता नहीं किस नशे में खोए हुए हैं। यह पूरा क्लाइमेट कैटस्टोफी का फिनोमिना रहा है और आगे भी यही रहने वाला है। दुनिया के बहुत सारे शहरों का भविष्य है। पूरा ही छोड़ देना पड़ेगा। कोई बहुत गर्म हो जाएगा, कोई बहुत ठंडा हो जाएगा, कोई बर्फ के नीचे दब जाएगा, कोई पानी के नीचे आ जाएगा। कहीं हर समय तूफान चल रहे होंगे। कहीं इतना सूखा पड़ रहा होगा कि वहां पीने का पानी नहीं मिलेगा, तो वहां रहेगा कौन? यह दुनिया के अधिकांश शहरों का भविष्य है।

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