
Lost Temples™
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जब बड़े से बड़ा इंसान भी श्रद्धा से झुक जाता है… वो पल अलग ही होता है। कल गौतम अदाणी परिवार संग पवित्र महुडी जैन तीर्थ पहुंचे। प्रीति, करण और परिधि के साथ। पर्युषण से ठीक पहले। महुडी… प्राचीन काल में जिसे मधुपुरी कहा जाता था। लगभग 2000 साल पुरानी जैन धरती। यहां मुख्य रूप से छठे तीर्थंकर पद्मप्रभु भगवान विराजमान हैं। लेकिन इस तीर्थ की असली पहचान है घंटाकर्ण महावीर। कहानी बड़ी गहरी है। पूर्व जन्म में वे महabal नाम के राजा थे। तीर्थयात्रियों और निर्दोषों की रक्षा करते हुए डाकुओं से लड़ते हुए प्राण न्योछावर कर दिए। उसी पुण्य से वे घंटाकर्ण महावीर के रूप में प्रकट हुए 52 वीरों में से एक, रक्षक देवता। घंटी जैसे कान होने से नाम पड़ा घंटाकर्ण। 20वीं सदी में आचार्य बुद्धिसagar सूरी को उनका साक्षात्कार हुआ। उन्होंने यहां उनकी मूर्ति स्थापित की। तब से लाखों लोग यहां आकर शक्ति मांगते हैं। मुश्किल समय में रक्षक। सुखड़ी चढ़ाते हैं… और उसी परिसर में खाते हैं। यही तीर्थ गौतम अदाणी को खींच लाया। उन्होंने लिखा “सच्ची शक्ति भीतर से आती है।” आस्था के लिए कृतज्ञ। हर परीक्षा में मिली शक्ति के लिए कृतज्ञ। अहिंसा, आत्म-अनुशासन और करुणा का संदेश दोहराया। ये सिर्फ दर्शन नहीं था। ये “सेवा ही साधना है” वाले जीवन का जीवंत रूप था। परिवार के साथ झुकना, कृतज्ञ होना, और याद दिलाना कि असली बल बाहर नहीं… अंदर होता है। पर्युषण आने वाला है। क्षमा, संयम और अंदर की सफाई का पर्व। ऐसे समय में महुडी का ये दर्शन सिर्फ अदाणी परिवार का नहीं… हर श्रद्धालु के लिए एक याद है। सच्ची शक्ति भीतर से आती है। जय घंटाकर्ण महावीर। 🙏
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