खैर!व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए प्रबल संघर्ष आज भी जारी है__😷
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पुरुषों के पास मायका नहीं होता, ना कोई ऐसा आँगन, जहाँ वे निःसंकोच लौट सकें, जहाँ कोई माथा चूमकर कहे- "थक गए हो न? थोड़ा आराम कर लो..." वे चलते रहते हैं निरंतर, एक पुत्र, एक पति, एक पिता बनकर, अपने कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए, पर कभी खुद के लिए ठहर नहीं पाते..!