
Aarya Tiwari
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एक यादव परिवार ने भाजपा का झंडा घर पे लगाया तो सपा समर्थकों को नहीं हो रहा बर्दाश्त! यह वीडियो उत्तर प्रदेश जौनपुर जिले के थाना सुरेरी अंतर्गत हरिहरपुर गाँव का है। घर का वीडियो बना रहा व्यक्ति इसी गांव का अशोक यादव उर्फ डॉन बाबा है, जो समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता है। जिस घर का वह वीडियो बना रहा है, वह घर विजय यादव का है। अशोक का कष्ट यह है कि, यादव के घर पर भाजपा का झंडा क्यों लगा है? इस तरह से वीडियो बनाकर घर की रेकी की जा रही है। बता दें कि, जिसका घर है वह लोग फिलहाल गांव से बाहर हैं। CCTV की मदद से ये दृश्य देखने के बाद परिवार में भय है। सपा की सरकार भले ही नहीं हो, लेकिन इनकी गुंडागर्दी आज भी पहले जैसे ही है। क्या अखिलेश यादव ऐसे दबंगों की गुंडई पर मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं? SP Jajpur UP POLICE
Aarya Tiwari53,985 次观看 • 1 个月前

बात अब बहुत आगे निकल चुकी है। जिस भरत तिवारी को बिहार में कुछ लोग उसकी जाति के आधार पर समर्थन या विरोध करने की कोशिश कर रहे हैं, वह अब जाति, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से कहीं आगे निकल चुका है। आज महाराष्ट्र में बैठा युवक मराठी में वीडियो बनाकर भरत तिवारी के लिए आवाज़ उठा रहा है ... "जब सुनीता नाम की एक माओवादी महिला ने आत्मसमर्पण किया, तो उसे 39 लाख का इनाम और नौकरी मिली। लेकिन एक समाजसेवी, जिसका अपना गांव गंगा में समा गया था, जिसने अपने गांव और लोगों के हित के लिए हथियार उठाए और बाद में आत्मसमर्पण किया, उसे इनाम नहीं, बल्कि गोली मिली।" भरत तिवारी को मिलने वाला समर्थन पूरी तरह स्वाभाविक और जनभावनाओं से प्रेरित है। यह किसी राजनीतिक अभियान, जातीय समीकरण या क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा नहीं है। जो भी व्यक्ति उसके बारे में पढ़ रहा है, उसकी कहानी जान रहा है, उसके संघर्ष को समझ रहा है, वह उसके साथ खड़ा होता दिखाई दे रहा है। आज भरत तिवारी सिर्फ एक नाम नहीं रह गया है। वह उन लोगों के मन आवाज़ बन चुका है जो व्यवस्था से न्याय की उम्मीद रखते हैं। उसकी कहानी ने लोगों को जाति, भाषा और प्रदेश की दीवारों से ऊपर उठकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। यही कारण है आनेवाले दिनों में भरत तिवारी के लिए उठ रही आवाज़ें सिर्फ यूपी बिहार से नहीं, बल्कि पूरे देश से सुनाई देंगी।
Aarya Tiwari20,017 次观看 • 1 个月前

"अपने घर की महिलाओं को नचवा दे" "पड़ोसी की औलाद" खान सर तो बच्चों के गजब हितैशी हैं, बच्चों के हितों के लिए उनकी मां बहनों पर चले जाते हैं। संस्कार, परिवार और माता-पिता की सेवा पर उपदेश देने वाले लोग जब खुद अपने आचरण की परीक्षा में असफल हो जाते हैं, तब उनके उपदेशों का खोखलापन सबके सामने आ जाता है। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ है विनम्रता, संयम, मर्यादा और दूसरों के सम्मान का भाव। यदि शब्दों में कटुता, व्यवहार में अहंकार और महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव हो, तो फिर चाहे कितनी भी किताबें पढ़ ली जाएँ, शिक्षा आत्मसात नहीं हुई है। इनकी इस हरकत को सही ठहराने के लिए भी कुछ लोग आ जायेंगे,"अरे, क्या हुआ सर ने अगर गाली दे दी? सर इतने सस्ते में पढ़ाते हैं" .... तो क्या सस्ती फीस किसी को किसी की माँ-बहन का अपमान करने का लाइसेंस दे देती है? सस्ती फीस बदले में ये बच्चों को क्या दे रहे हैं ... सस्ता चरित्र? ऐसे लोगों को विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया जाता है, उनकी वाहवाही की जाती है, लेकिन महिला सम्मान की बात करने वाले व्यक्ति,आयोग और संस्थाओ को ये सब दिखाई क्यों नहीं देता। क्या महिलाओं के सम्मान का पैमाना व्यक्ति विशेष देखकर तय किया जाएगा?
Aarya Tiwari19,993 次观看 • 1 个月前
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