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Acharya Anand Kumar

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कोसी क्षेत्र में जब नदी बढ़ना शुरू करती थी, तब बाढ़ का स्वागत होता था। महिलाएँ नदियों की प्रशंसा में मंगल गान गाती थीं। नदी अगर फिर भी बढ़ती रहती, तो उसकी पूजा शुरू होती थी कि, "माँ! अब जाओ।" और कोसी अगर फिर भी न माने, तो उसे सिंदूर दिखाकर डराया जाता कि, "...अब चली जाओ, नहीं तो तुम्हारी शादी कर देंगे।" कोसी, जो कि एक चंचल और कुमारी नदी है, ब्याह के डर से भाग जाती। पारंपरिक मान्यता है कि जिन नदियों की धारा स्थिर होती है, उन्हें विवाहिता स्त्री की तरह धीर-गंभीर माना जाता है। जो नदियाँ अपनी धारा बदलती रहती हैं, उन्हें कुमारी कन्या की तरह चंचल रूप में देखा जाता है। कोसी की धारा स्थिर नहीं है, अतः उसे कुमारी माना जाता है। नदियों के साथ लोगों का बराबरी का रिश्ता था। यही कारण था कि अधिकांश नदियों को लोगों ने माता के रूप में देखा। महर्षि विश्वामित्र कोसी को अपनी बड़ी बहन कहते थे। ब्रह्मपुत्र को स्थानीय लोग बाबा कहते हैं। गंगा, राजा शांतनु की पत्नी तथा प्रत्येक भारतीय की माँ के रूप में प्रख्यात हैं। नर्मदा, मान्धाता की पुत्रवधू और पुरुकुत्स की पत्नी हैं। नदियों में आसक्ति रखने वाले प्रख्यात समाजसेवी काका कालेलकर अपने गाँव के बगल में बहने वाली मारकंडी नदी को अपने बचपन की सहेली मानते थे। असम में जब ब्रह्मपुत्र और दिबांग में एक साथ बाढ़ आती है और उनका पानी एकाकार होने लगता है, तब लोगों की मान्यता है कि दोनों का विवाह संपन्न होता है। इसके पहले कि लोग बाढ़ से अपनी रक्षा करें, नवविवाहितों को भेंट-उपहार देना नहीं भूलते। उत्तर प्रदेश में घाघरा तथा तरैना के बारे में भी इसी तरह की किंवदंती मशहूर है। बाहर कहीं से आए फिरंगियों को यह भारतीय व्यवस्था हजम नहीं हुई। उनका ध्यान रेवेन्यू यानी "दुगुना लगान" वसूलने पर था। तो उन्होंने तटबंधों के बीच नदियों को बाँधकर कृषि से अधिक से अधिक लगान वसूलने की कोशिश की और जल्दी ही उन्हें इसकी निरर्थकता समझ में आ गई। फिरंगियों ने दामोदर पर तटबंध बनाने के बाद ईडन कैनाल भी बना डाली। रेल लाइन तो अपने आप में एक बाँध थी ही। उधर से गुजरने वाली ग्रैंड ट्रंक रोड को भी ऊँचा और मजबूत किया गया। ये सारी संरचनाएँ एक-दूसरे के समानांतर (पैरेलल) थीं। वे जमीन के ढाल को सीधा काटती थीं और पानी की राह में रुकावट बनकर रह गई थीं। एक अंग्रेज इंजीनियर, विलियम विलकॉक्स ने इन बाँधों जैसी संरचनाओं के बारे में लिखा था, "इन पाँच राक्षसी दीवारों ने दामोदर को कैद कर लिया और (बर्धमान से) हुगली के बीच के मस्त और खुशहाल इलाके को मलेरिया और गरीबी के गड्ढे में ढकेल दिया।" दामोदर पर तटबंध बन जाने की आड़ में बाहर के प्राकृतिक तालाब और पोखरे बेमौत मरने लगे; क्योंकि वे पानी में उगने वाले खरपतवार से भर गए, जमीन की उर्वरता समाप्त होने लगी और सूखा तथा अकाल अपना बदनुमा चेहरा दिखाने लगे। रेल लाइन के 1860 में पूरा होने के सिर्फ एक साल के अंदर बर्धमान में 1861 में मलेरिया फैला। आखिरकार दामोदर पर बने दाहिने तटबंध को 1859 में 32 किलोमीटर की लंबाई में सरकार द्वारा तोड़ा गया। इस तरह जमीन की उर्वरा शक्ति वापस लौटी और 1863 तक हालात पर काबू पा लिया गया। (इन्टरनेट से साभार लिया गया वीडियो झंझारपुर में कमला-बलान का है)

कोसी क्षेत्र में जब नदी बढ़ना शुरू करती थी, तब बाढ़ का स्वागत होता था। महिलाएँ नदियों की प्रशंसा में मंगल गान गाती थीं। नदी अगर फिर भी बढ़ती रहती, तो उसकी पूजा शुरू होती थी कि, "माँ! अब जाओ।" और कोसी अगर फिर भी न माने, तो उसे सिंदूर दिखाकर डराया जाता कि, "...अब चली जाओ, नहीं तो तुम्हारी शादी कर देंगे।" कोसी, जो कि एक चंचल और कुमारी नदी है, ब्याह के डर से भाग जाती। पारंपरिक मान्यता है कि जिन नदियों की धारा स्थिर होती है, उन्हें विवाहिता स्त्री की तरह धीर-गंभीर माना जाता है। जो नदियाँ अपनी धारा बदलती रहती हैं, उन्हें कुमारी कन्या की तरह चंचल रूप में देखा जाता है। कोसी की धारा स्थिर नहीं है, अतः उसे कुमारी माना जाता है। नदियों के साथ लोगों का बराबरी का रिश्ता था। यही कारण था कि अधिकांश नदियों को लोगों ने माता के रूप में देखा। महर्षि विश्वामित्र कोसी को अपनी बड़ी बहन कहते थे। ब्रह्मपुत्र को स्थानीय लोग बाबा कहते हैं। गंगा, राजा शांतनु की पत्नी तथा प्रत्येक भारतीय की माँ के रूप में प्रख्यात हैं। नर्मदा, मान्धाता की पुत्रवधू और पुरुकुत्स की पत्नी हैं। नदियों में आसक्ति रखने वाले प्रख्यात समाजसेवी काका कालेलकर अपने गाँव के बगल में बहने वाली मारकंडी नदी को अपने बचपन की सहेली मानते थे। असम में जब ब्रह्मपुत्र और दिबांग में एक साथ बाढ़ आती है और उनका पानी एकाकार होने लगता है, तब लोगों की मान्यता है कि दोनों का विवाह संपन्न होता है। इसके पहले कि लोग बाढ़ से अपनी रक्षा करें, नवविवाहितों को भेंट-उपहार देना नहीं भूलते। उत्तर प्रदेश में घाघरा तथा तरैना के बारे में भी इसी तरह की किंवदंती मशहूर है। बाहर कहीं से आए फिरंगियों को यह भारतीय व्यवस्था हजम नहीं हुई। उनका ध्यान रेवेन्यू यानी "दुगुना लगान" वसूलने पर था। तो उन्होंने तटबंधों के बीच नदियों को बाँधकर कृषि से अधिक से अधिक लगान वसूलने की कोशिश की और जल्दी ही उन्हें इसकी निरर्थकता समझ में आ गई। फिरंगियों ने दामोदर पर तटबंध बनाने के बाद ईडन कैनाल भी बना डाली। रेल लाइन तो अपने आप में एक बाँध थी ही। उधर से गुजरने वाली ग्रैंड ट्रंक रोड को भी ऊँचा और मजबूत किया गया। ये सारी संरचनाएँ एक-दूसरे के समानांतर (पैरेलल) थीं। वे जमीन के ढाल को सीधा काटती थीं और पानी की राह में रुकावट बनकर रह गई थीं। एक अंग्रेज इंजीनियर, विलियम विलकॉक्स ने इन बाँधों जैसी संरचनाओं के बारे में लिखा था, "इन पाँच राक्षसी दीवारों ने दामोदर को कैद कर लिया और (बर्धमान से) हुगली के बीच के मस्त और खुशहाल इलाके को मलेरिया और गरीबी के गड्ढे में ढकेल दिया।" दामोदर पर तटबंध बन जाने की आड़ में बाहर के प्राकृतिक तालाब और पोखरे बेमौत मरने लगे; क्योंकि वे पानी में उगने वाले खरपतवार से भर गए, जमीन की उर्वरता समाप्त होने लगी और सूखा तथा अकाल अपना बदनुमा चेहरा दिखाने लगे। रेल लाइन के 1860 में पूरा होने के सिर्फ एक साल के अंदर बर्धमान में 1861 में मलेरिया फैला। आखिरकार दामोदर पर बने दाहिने तटबंध को 1859 में 32 किलोमीटर की लंबाई में सरकार द्वारा तोड़ा गया। इस तरह जमीन की उर्वरा शक्ति वापस लौटी और 1863 तक हालात पर काबू पा लिया गया। (इन्टरनेट से साभार लिया गया वीडियो झंझारपुर में कमला-बलान का है)

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आमतौर पर पानी काला सा दिखता है। जब रंग बदलने लगे तो धीरे-धीरे नदी लाल से रंग में आने लगती है और जब #कोसी का रंग ऐसे लाल होना शुरू होता है तो हमलोग उसे कोसी दाई/दाय (दाय मतलब बड़ी बहन) की आँखे लाल होना - बाढ़ की पूर्व चेतावनी मानते हैं। जी हाँ, नदी हमारे लिए जीवित प्राणी की ही तरह है, वो बड़ी बहन हो सकती है और उसकी आँखे भी लाल हो सकती हैं। भारत का जो हिस्सा इंडिया कहलाता है, उन्हें ये बात थोड़ी मुश्किल से हजम होगी। बहनें घर आयें तो खाली हाथ तो नहीं जाएँगी इसलिए चिंता होती है, लेकिन इससे उनके आने-जाने पर न रोक लगाईं जाती है, न उसे सरकारी भाषा में #बिहार_का_शोक घोषित किया जाता है। #बिहार का शोक एक बीमार फिरंगी सोच है जिससे हमें अभी स्वतंत्र होना है। जब नदियों को जीवित मान लेंगे, बिलकुल वैसे ही जैसे कानूनी तौर पर मंदिर में स्थापित देवी-देवता को मुकदमा लड़ने के लिए #लिविंग_एंटिटी मानते हैं, उस दिन बाढ़ भी समस्या नहीं रहेगी। तबतक अनुमान लगाइए कि #मुंगेर में दिख रही ये माता #गंगा कितनी चौड़ाई में बह रही होंगी? #TheLivingRiver #IsARiverAlive

Acharya Anand Kumar

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