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Atul Kumar Rai

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Novelist | Screenwriter | Lyricist | B.Mus. & MPA ( Music ) BHU | Yuva Sahitya Akademi Award winner for debut Hindi Novel चाँदपुर की चंदा |

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पिछली बार कब किसी कलाकार को इस तरह विदाई दी गई थी, या हर कलाकार को ऐसी विदाई नसीब क्यों नहीं हो पाती ? इन सब सवालों के जबाब में कलाकार का व्यक्तित्व औऱ कृतित्व सामने आता है। उसकी नम्रता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव समझ आता है। असम की धरती को नमन.आप लोगो ने अपने लाडले कलाकार के साथ क्या खूब संगति की है। 🙏

पिछली बार कब किसी कलाकार को इस तरह विदाई दी गई थी, या हर कलाकार को ऐसी विदाई नसीब क्यों नहीं हो पाती ? इन सब सवालों के जबाब में कलाकार का व्यक्तित्व औऱ कृतित्व सामने आता है। उसकी नम्रता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव समझ आता है। असम की धरती को नमन.आप लोगो ने अपने लाडले कलाकार के साथ क्या खूब संगति की है। 🙏

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वो जानते थे कोयल और मोर किस स्वर में बात करते हैं। उन्हें बात करना आता था चकवा, चकई और चकोर से। वो जब गाते थे, तब जेठ की झुलसाती धूप में फागुन का चटक रंग समा जाता। चैत खिल जाता हमारे रोम-रोम में और पता चलता कि पेड़ पर बोल रही कोयल भी किसी विरहन की दुश्मन हो सकती है। बाबा विश्वनाथ और तुलसीदास को जीवन का केंद्रीय स्वर बनाकर प्रेम का आलाप लेने वाले पंडित जी को वो साधारण श्रोता भी सुन सकता था, जो नहीं जानता दादरा, कहरवा, बड़ा ख्याल और छोटा ख्याल का अंतर। लेकिन मेरा ख्याल ये है कि आज बनारस के तानपुरे का वो तार टूट गया, जिसके गूंजने से पूरी दुनिया के मंचो पर बनारस शान से गूंजता था। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि पंडित जी। आपके बिना तो अब चैत भी रोएगा, फागुन में काशी का मसान भी। रोएगी आज कोयल, सेजिया पर लेटकर विरहन। दिगम्बर आपको अपने चरणों में जगह दे... सादर नमन..🙏

Atul Kumar Rai

16,796 просмотров • 10 месяцев назад

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लोकगीतों की सुंदर कल्पनाएँ मन को मुग्ध करती हैं। छठ में कोसी भरने की परंपरा है। शिव जी और पार्वती जी दोनों कोसी भरने जा रहें हैं। छठ पूजा की तैयारी हो चुकी है। लेकिन भक्त बस यही मना रहा है कि पूजा के दौरान शंकर जी की धोती भीग रही है तो भीग जाए लेकिन पार्वती जी की सवा लाख की साड़ी नहीं भीगनी चाहिए। अब पता नहीं सवा लाख की साड़ी की कल्पना कहाँ से आई होगी.. ? किसनें देखा होगा पार्वती जी को सवा लाख की साड़ी खरीदते हुए। लेकिन वो लोकगीतों ही क्या जिसमें देवता आदमी के भाई, बहन, सखा न बन जाएं। कई बार ये भी लगता है लोकगीत देवता और मनुष्य के द्वैत को खत्म करने का एक मंत्र है। जिसे हम सैकड़ों सालों से गाए जा रहें हैं। इसलिए लोकगीत हमारी आत्मा की शाश्वत अभिव्यक्ति है। इनके साथ जब भी प्रयोग होता है तो खटकता तो है। बाकी प्रयोग आदमी एक बार बर्दाश्त भी कर लेता है। लेकिन छठ गीतों के साथ प्रयोग एकदम बर्दाश्त नही होता। छठ गीत का सारा सौंदर्य इसकी यही सादगी है। आयुषी और उनकी सहेलियों ने ये सुंदर गीत गाया है। युवा पीढ़ी को ये गीत गाते देख अच्छा लगता है। ❤️ #chhathpuja2024

Atul Kumar Rai

12,847 просмотров • 1 год назад

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