
Chaste Monk
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है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए - गोपाल दास नीरज-
Chaste Monk49,979 просмотров • 11 месяцев назад

सभी से इन दिनों रूठा हुआ सा लगता हूँ मैं अपने आप को अब बेवफ़ा सा लगता हूँ तमाम रात मैं गिरती हुई हवेली में दिलों से निकली हुई बद-दुआ' सा लगता हूँ मैं वो ख़ज़ाना हूँ हक़दार जिस की दुनिया है हज़ार हिस्सों में बाँटा हुआ सा लगता हूँ मिरी तलाश ब-दस्तूर अब भी जारी है वो मिल गया है मैं खोया हुआ सा लगता हूँ मिरी हँसी से उदासी के फूल खिलते हैं मैं सब के साथ हूँ लेकिन जुदा सा लगता हूँ चमक रहा था ये चेहरा किसी की आँखों में मैं आइने में कोई दूसरा सा लगता हूँ तमाम रात बरसती है रेत पर शबनम मैं अपने चाँद से जब भी ख़फ़ा सा लगता हूँ - बशीर बद्र
Chaste Monk28,415 просмотров • 11 месяцев назад
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