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Shambhu Patwa Dighwara wala

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सबसे बड़ा विद्रोह सड़कों पर नहीं हुआ... सबसे बड़ा विद्रोह Gen Z ने अपने दिमाग़ के अंदर किया है। उन्होंने "लोग क्या कहेंगे?" की जगह सिर्फ़ एक सवाल पूछना शुरू कर दिया— "मुझे इस इंसान के साथ रहकर शांति मिल रही है या नहीं?" यहीं से पूरी कहानी बदल गई। हमारी पीढ़ी को बचपन से एक ही मंत्र दिया गया— "सहो..." "बड़े हैं, इसलिए सही हैं।" "रिश्ता है, इसलिए निभाओ।" "समाज क्या कहेगा?" यानी अपनी खुशी, अपनी मानसिक शांति और अपनी पहचान... सबसे आख़िर में रखो। हमें कभी यह नहीं सिखाया गया कि... हर बड़ा इंसान सही नहीं होता। हर रिश्ता पवित्र नहीं होता। हर सलाह आपके भले के लिए नहीं होती। और हर त्याग महान नहीं होता। यही कारण है कि लाखों लोग पूरी ज़िंदगी ऐसे लोगों के साथ गुज़ार देते हैं... जो रोज़ उनका आत्मसम्मान तोड़ते हैं। फिर उसी दर्द को छुपाने के लिए... कोई सिगरेट पकड़ लेता है... कोई शराब... कोई नींद की गोली... और कोई नकली मुस्कान। Gen Z की सबसे बड़ी ताक़त शायद यही है... वो पहले अपने मन की सुनते हैं। अगर कोई रिश्ता, नौकरी, संगठन, नेता या माहौल उनकी मानसिक शांति छीनता है... तो वे बिना अपराधबोध के दूरी बना लेते हैं। उन्हें इसे "बदतमीज़ी" नहीं... Self Respect लगता है। यही वजह है कि पुरानी पीढ़ियाँ अक्सर उन्हें... "ज़िद्दी" "संस्कारहीन" "स्वार्थी" या "ओवर रिएक्ट करने वाला" कह देती हैं। लेकिन शायद पहली बार कोई पीढ़ी यह कह रही है— "मैं किसी की उम्मीदों के लिए अपनी मानसिक शांति नहीं खोऊँगा।" इसका मतलब यह नहीं कि हर असहमति पर रिश्ते तोड़ दो। बल्कि यह कि... सम्मान के बिना रिश्ता सिर्फ़ बोझ होता है। और डर के कारण निभाया गया रिश्ता... रिश्ता नहीं, कैद होता है। सबसे दुखद बात यह है... हमारी पीढ़ी को इस्तेमाल किया गया— परिवार ने... रिश्तेदारों ने... दफ़्तरों ने... नेताओं ने... धर्म के ठेकेदारों ने... और कई बार उन लोगों ने भी... जो "त्याग" और "संस्कार" के नाम पर सिर्फ़ आज्ञाकारिता चाहते थे। हर पीढ़ी की अपनी कमियाँ हैं। Gen Z भी परफेक्ट नहीं है। लेकिन उन्होंने एक सवाल पूछने की हिम्मत तो की— "अगर कोई रिश्ता मुझे रोज़ तोड़ रहा है... तो मैं उसे सिर्फ़ समाज के डर से क्यों ढोऊँ?" शायद यही सवाल आने वाले भारत की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति साबित होगा। अगर आपको लगता है कि मानसिक शांति भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी रोटी, कपड़ा और मकान... तो इसको रीपोस्ट कीजिए। #GenZ #MentalHealth #SelfRespect #Boundaries #IndianFamily #LifeLessons #Youth #Psychology #Mindset #SocialChange

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218,668 просмотров • 1 месяц назад

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एक और धमाकेदार और सवाल दागते हुए गाना आ गया है दोस्तों.. "स्कूल ठीक करों" सुनों गांव वालों..... सुनो देश वालों....... एक नई मुहिम शुरू हुई है #स्कूल_ठीक_करों..... #School_Thik_karo.... आजादी के 80 साल भी आज स्कूलों का स्थिति बहुत खस्ताहाल और बदहाल है। क्या आप जानते हैं कि देश का एजुकेशन बजट 1.39 लाख करोड़ . देश में एजुकेशन इंडस्ट्रीज 19 से 20 लाख करोड़ रुपए का है और 2030 तक 27 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा। इसमें सबसे ज्यादा प्राइवेट स्कूलों का बिजनेस है, प्राइवेट स्कूलों का बिजनेस 5 लाख करोड़ रुपए सालाना का है। मतलब देश के एजुकेशन बजट से चार गुना ज्यादा। कोचिंग इंडस्ट्रीज मात्र 58 हजार करोड़ रुपए का है। सरकार कहती हैं कि कोचिंग फ्री करेंगे। कोचिंग फ्री करने से कुछ नहीं होगा, अगर कुछ करना है तो देश के सारे सरकारी स्कूलों को ठीक किजिए, ताकि बच्चों को फ्री एज्युकेशन मिले विथ क्वालिटी। देश का सरकारी स्कूल अगर ठीक हो गया ना तो बच्चों कोचिंग जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। दोस्तों क्या आप नहीं चाहते हैं कि आपके गांव कस्बे गलियों मोहल्ले का बदहाल खस्ताहाल स्कूलों का फोटो खिंचे और अपने सांसद, विधायक और सरकार को टैग करें तथा उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करें. ये मुहिम किसी एक इंसान का नही बल्कि सबका है, अगर प्राइवेट स्कूलों के लूट से बचना है तो इस मुहिम को हमें तेज रफ्तार धार देना होगा। "स्कूल ठीक करों" आंदोलन में आप भी शामिल हों और इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा रिपोस्ट कर के जन जन तक पहुंचाए।

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51,628 просмотров • 12 дней назад

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"दिमागी नक्सल"???.. “ये Gen G दिमागी नक्सल नहीं साहब, ये स्वतंत्र सोच वाला है, शायद इन Gen G के बेबाक सोच ही आपको परेशान कर रही है।” “ये Gen G दिमागी नक्सल नहीं साहब, ये अपनी सोच रखने वाला है हर बात पर हाँ में हाँ मिलाना इन Gen G की आदत नहीं।” “ये Gen G दिमागी नक्सल नहीं साहब, सवाल पूछने वाले है और शायद सवाल ही आपको सबसे ज्यादा चुभते हैं।” “ये Gen G दिमागी नक्सल नहीं साहब, स्वतंत्र विचार वाले है , आपकी सोच से अलग होना अपराध नहीं।” कभी आंदोलनजीवी, कभी अर्बन नक्सल , तो कभी खालिस्तानी, तो कभी देशद्रोही, तो कभी टुकड़े टुकड़े गैंग और अब दिमागी नक्सल.. का नया नेरेटिव, जेन-जी प्रोटेस्ट से आतंकित ये सरकार..अपने दक्षिणपंथी अंधभक्तों को भड़काकर गृहयुद्ध कराना चाहता है क्या?? इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा रिपोस्ट करें और आप अपना राय कमेंट बाक्स में जरुर दें।

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34,158 просмотров • 12 дней назад

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ब्रेकिंग न्यूज़: दिमागी नक्सल जनता पार्टी भी आ गया मैदान में धमाकेदार गाने के साथ , अब तेरा क्या होगा स्वघोषित विश्वगुरु... पता है दिमागी नक्सल कैसे होते हैं.. किताब हटा दोगे PDF आ जाएगी। अख़बार दबा दोगे मोबाइल खुल जाएगा। पोस्ट हटवा दोगे स्क्रीनशॉट बच जाएगा। सवाल पूछने वाले को चुप कराओगे अगला आदमी वही सवाल पूछ देगा। क्योंकि एक चीज़ पर आपका कंट्रोल नहीं है इंसान के दिमाग पर। उसे जेल में डाल सकते हो, उसकी पोस्ट हटवा सकते हो, उसे ट्रोल कर सकते हो, उस पर तमगे चिपका सकते हो… लेकिन एक विचार को गिरफ्तार नहीं कर सकते। और सवाल पूछने की आदत तो और भी खतरनाक है। कल कोई नाली की गैस पूछेगा, कोई ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ होने का मतलब पूछेगा, कोई बादलों में रडार ढूंढेगा, कोई आलू से सोना बनाने की तकनीक पूछ बैठेगा… अब समस्या ये नहीं कि सवाल क्या है। समस्या ये है कि सवाल पूछ कौन रहा है! फिर वही पुराना खेल शुरू होगा— ‘राष्ट्र-विरोधी!’ ‘भारत-विरोधी!’ ‘अराजक!’ ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग!’ ‘इसे कुछ पता ही नहीं!’ और अंत में ट्रोल आर्मी मैदान में। लेकिन भाई साहब… ये 2026 है। स्क्रीनशॉट का ज़माना है। PDF का ज़माना है। इंटरनेट का ज़माना है। और सबसे बढ़कर सोचने वाले नागरिकों का ज़माना है। सत्ता चाहे तो सवाल से नाराज़ हो सकती है, लेकिन सवाल पैदा करने वाले दिमाग को बंद नहीं कर सकती। याद रखिए सोचना व्यक्ति को मजबूत बनाता है, और जागरूक नागरिक लोकतंत्र को। इसलिए डरिए मत। सवाल पूछिए। जवाब मांगिए। दावों को परखिए। असहमति रखिए। और सबसे जरूरी अपना दिमाग इस्तेमाल कीजिए। क्योंकि… दिमाग की सबसे बड़ी बीमारी ‘सोचना’ नहीं, सोचना बंद कर देना है। अगर आप भी मानते हैं कि सवाल पूछना देश-विरोध नहीं, लोकतंत्र की ताकत है, तो इसे आगे बढ़ाइए। आपका एक रिपोस्ट किसी और के दिमाग में एक सवाल पैदा कर सकता है। दबाकर रिपोस्ट करें और सवाल पुछते रहें।

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14,183 просмотров • 10 дней назад

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हमें हिसाब दिजिए पार्ट -3 आ गया है मेरे दोस्तों सुनिए इस सच्चाई से भरे हुए सवाल पुछते हुए गाने को जो आपके रोंगटे खड़ा कर देगा. एक सवाल है दोस्तों, जबाब जरूर दिजिएगा हम तो तिरंगा आसमान में लहराएगा… मगर क्या ज़मीन पर भी आज़ादी उतरी है? आज 15 अगस्त है। हवाओं में जश्न की तैयारी है, हर तरफ़ तिरंगे की शान है… लेकिन दिल में एक सवाल आज भी ज़िंदा है— क्या हमें वही भारत मिला, जिसका सपना भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल ने देखा था? हम आसमान में तिरंगा पूरी शान से लहराएँगे। राष्ट्रगान गाएँगे। देशभक्ति के नारे लगाएंगे। लेकिन ज़मीन की इस कड़वी हकीकत को कैसे झुठलाएँगे? गोरे अंग्रेज़ चले गए… लेकिन क्या हर भारतीय सचमुच आज़ाद हो गया? आज भी आम आदमी महंगाई, बेरोज़गारी और असुरक्षा के बीच अपने सपनों को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है। मिडिल क्लास टैक्स देता है, ईमानदारी से मेहनत करता है, बच्चों की पढ़ाई और घर के भविष्य के लिए बचत करता है फिर भी हर साल उसके सपनों की कीमत बढ़ती जाती है और उसकी क्रय शक्ति घटती जाती है। किसान सवाल लेकर खड़ा है। युवा नौकरी के इंतज़ार में है। मजदूर अपनी मेहनत की सही कीमत चाहता है। मिडिल क्लास अपने हिस्से की राहत तलाश रहा है। और लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है जिस आज़ादी के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, क्या उस आज़ादी का मतलब सिर्फ़ सत्ता बदलना था? भगत सिंह का सपना सिर्फ़ अंग्रेज़ों को भगाना नहीं था। आज़ाद का सपना सिर्फ़ विदेशी हुकूमत हटाना नहीं था। बिस्मिल की कुर्बानी सिर्फ़ सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं थी। उनका सपना था.. एक ऐसा भारत जहाँ इंसान की कीमत उसकी जाति, धर्म, हैसियत या जेब से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और अधिकारों से तय हो। इसलिए आज तिरंगे को सलाम करते हुए हमें सिर्फ़ जश्न नहीं मनाना चाहिए खुद से सवाल भी करना चाहिए। क्योंकि देश से सवाल करना देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है। हमें अपने शहीदों से सिर्फ़ उनकी तस्वीरों पर फूल चढ़ाकर नहीं, बल्कि उनके सपनों को ज़िंदा रखकर श्रद्धांजलि देनी होगी। गोरे अंग्रेज़ चले गए अब उस व्यवस्था के काले सच का हिसाब कौन देगा? अधूरे वादों का हिसाब कौन देगा? युवा के टूटते सपनों का हिसाब कौन देगा? मिडिल क्लास की घटती क्रय शक्ति का हिसाब कौन देगा? किसान और मजदूर की बेचैनी का हिसाब कौन देगा? और सबसे बड़ा सवाल.... क्या 15 अगस्त सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख़ है, या हर भारतीय के जीवन में बराबरी, सम्मान, न्याय और अवसर की आज़ादी का नाम भी है? तिरंगा आसमान में लहरता रहे.... और उसके साथ भारत के हर नागरिक का सिर भी ऊँचा रहे। 🇮🇳 यही उन शहीदों के सपनों वाले भारत की असली आज़ादी होगी। जय हिंद। 🇮🇳 इंकलाब ज़िंदाबाद। पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा रिपोस्ट करें और उन नेताओं तथा नौकरशाह से सवाल जरूर पुछे। #स्वतंत्रता_दिवस #15अगस्त #IndependenceDay #जय_हिंद #भारत #आज़ादी #भगतसिंह #चंद्रशेखरआजाद #रामप्रसादबिस्मिल #इंकलाब_जिंदाबाद #Democracy #Freedom #India

Shambhu Patwa Dighwara wala

15,798 просмотров • 13 дней назад

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एक और जबरदस्त दहाड़ता हुआ और सरकार से सवाल पुछता हुआ बेमिसाल गाना..... सुनो......... जनता उठेगी, कुर्सी हिलेगी… अब सवाल दबेगा नहीं! सच की आवाज़ को जितना दबाओगे, वो उतनी ही ताकत से वापस लौटेगी। क्योंकि इस बार मुद्दा किसी एक नेता का नहीं है। इस बार मुद्दा है रोटी, नौकरी और सवाल। ये आवाज़ उस नौजवान की है. जिसका सपना सरकारी फाइलों के नीचे दबा दिया गया, जिसकी मेहनत को सिस्टम की लापरवाही ने कुचल दिया, जिसका हक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, और जिसका भविष्य वादों और जुमलों के बीच कहीं खो गया। जिस युवा के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। जिसके पास हुनर है, लेकिन अवसर नहीं। जो सालों मेहनत करके परीक्षा देता है, फिर पेपर लीक की खबर सुनता है। जो रोज़गार मांगता है, तो उसे आंकड़ों और भाषणों की दुनिया दिखा दी जाती है। लेकिन अब सवाल बदल गया है. कब तक? कब तक नौजवान इंतज़ार करेगा? कब तक गरीब महंगाई सहेगा? कब तक मेहनतकश अपने हक के लिए दर-दर भटकेगा? कब तक सवाल पूछने वालों को चुप कराने की कोशिश होगी? याद रखिए कुर्सियां जनता के वोट से बनती हैं, और जनता के सवालों से हिलती भी हैं। आज शायद कुर्सी न हिले… लेकिन अगर जनता जाग गई, तो ज़मीर जरूर हिलेगा। जनता उठेगी। कुर्सी हिलेगी। सवाल पूछे जाएंगे। और सच की आवाज़ अब दबेगी नहीं। हर युवाओं और Gen G की आवाज बनिए.. इस पोस्ट को रिपोस्ट करें और हर युवाओं तक पहुंचाए। क्योंकि सवाल अब हमारे आने वाले जनरेशन के भविष्य का है। जागो भारत जागो जागो युवाओं जागो

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13,213 просмотров • 11 дней назад

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🚨 BREAKING: देश में एक नया नारा गूंज रहा है—"हिसाब दीजिए!" अब सिर्फ़ वादे नहीं… अब सिर्फ़ भाषण नहीं… अब सिर्फ़ नारों से काम नहीं चलेगा… अब सवालों का जवाब चाहिए। अब काम का हिसाब चाहिए। "हिसाब दीजिए" किसी एक व्यक्ति, दल या विचारधारा का नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग का संदेश है। लोकतंत्र में जनता का सबसे बड़ा अधिकार है—सवाल पूछना। और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है—जवाब देना। क्या आपको लगता है कि "हिसाब दीजिए" आने वाले समय का सबसे बड़ा जननारा बन सकता है? अपनी राय कमेंट में लिखिए और अगर आप मानते हैं कि लोकतंत्र में जवाबदेही ज़रूरी है, तो इस पोस्ट को रीपोस्ट कीजिए। #हिसाब_दीजिए #HisaabDo #Accountability #Democracy #India #YouthVoice #Trending #Viral

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26,378 просмотров • 27 дней назад

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🚨 3I/ATLAS Update: The Interstellar ‘Comet’ That Won’t Act Like a Comet If you thought 3I/ATLAS was just another space rock passing through… yeah, that theory is falling apart fast. The deeper astronomers look, the weirder this thing gets — and the latest observations have pushed it even further outside the “normal comet” category. Here’s what’s new — and why researchers are quietly losing their minds over it: 1. The Shape Is Still Wrong Hubble’s new high-res images don’t show a round nucleus like most comets — instead, ATLAS appears elongated and possibly “ship-like,” wrapped in a glowing dust cocoon. That has triggered two competing theories: ✅ It’s unusually symmetrical for something natural. ✅ Its surface may have been reshaped by billions of years of cosmic radiation or something else entirely. 2. The Activity Doesn’t Match the Distance When Hubble first imaged it in July 2025, ATLAS was 277 million miles from Earth — way too far from the Sun to be this active. Yet it was venting material so intensely that it looked like something powered, almost like an engine running in space. That is not normal comet behavior. At that distance, most comets are basically frozen rock. 3. The Tail Is Growing Fast — and Wrong The tail now stretches far beyond early size estimates, reacting violently to sunlight. Astronomers are calling the outflow “prematurely aggressive” — meaning the comet is overactive for where it is in its orbit. That either means: ✅ It contains exotic ices that react differently than Solar System comets or ✅ Something is happening beneath the surface that we don’t understand yet 4. The Chemistry Doesn’t Match Anything We Know JWST readings show the object is rich in CO₂, far more than water-ice, which is flipped compared to most comets here. In fact, the ratio is 8× higher than expected, meaning it was likely formed in a completely different kind of planetary system — or rearranged over billions of years drifting through interstellar space. Some scientists now believe its outer layer may be 15–20 meters deep in radiation-baked crust, hiding whatever is underneath. 5. It’s Extremely Old — and Possibly Altered Estimated age? Around 7 billion years. That’s older than our Sun. Meaning: • It could be a broken fragment from a dead star system • It has been bombarded by cosmic rays for longer than the Earth has existed • What we’re seeing may not be its original form at all 6. And Yes — The “Alien Mothership” Jokes Are Back Because of: • The shape • The early activity • The weird tail behavior • The non-Solar-System chemistry • The fact that it’s only the 3rd interstellar object we’ve ever seen …people online are already calling it “the real alien mothership of 2025.” NASA obviously isn’t saying that, but they are saying this object has “rewritten what we thought we knew about interstellar visitors.” Translation: scientists are confused, intrigued, and watching it obsessively before it slingshots back into deep space forever. Why This Matters We’re not just watching another comet, we’re looking at raw material from another solar system, possibly older than ours, behaving in ways we can’t yet explain. New instruments are now tracking: whether it keeps brightening unnaturally whether its shape changes again near perihelion whether the tail reveals deeper composition whether it fragments the way ʻOumuamua did This is a once-in-a-civilization chance to examine something not from here. And the more we learn, the stranger it gets. #DeepUniverse #fblifestyle #3IATLAS #InterstellarObject #AlienPossibility #SpaceFootage #AstronomyNews

Shambhu Patwa Dighwara wala

79,873 просмотров • 9 месяцев назад

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पुणे में कल सड़े हुवे समाज ने बहादुर शाह जफ़र की तस्वीर पर जूतों की माला पहनाई और जूते मारे,, वो बहादुर शाह जफ़र जिसकी क़्यादत में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति की पहली जंग लड़ी गईं राजपुत.मराठा.मुग़ल, पठान,हिंदू,मुस्लिम,सिख़ सभी इनको अपना सरदार चुनकर इनके झंडे नीचे देश के लिए लड़े थे,, आज 1857 के गदर के दौरान हडसन की शायरी और शहंशाह ए हिंद का उसका करारा जवाब याद आ रहा है ... "दमदमे में दम नहीं अब खैर मांगो जान की,ए जफर अब छोड़ दो ज़िद हिंदुस्तान की" शहंशाह का जवाब था "गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की , तख्त लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की" अपने देश की इस पीढ़ी को माफ कीजियेगा जफर साहब , ये लोग उस पीढ़ी के हैं जिन्होंने किताबों की जगह वायरल मैसेज पढ़े हैं, हम तबाही की तरफ बढ़ रहे हैं, आने वाली पीढ़ी और इतिहास हमलोगों को कभी माफ नहीं करेंगे आज किसी के अंदर इतनी हिम्मत ना है जो अपने दो बेटों के कटे सर को देखकर भी ज़ालिम को ललकार सके ...

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भारत में ✅ 800 साल मुग़ल शासक लेकिन भारत के हिंदू सुरक्षित रहे ✅ 200 साल ब्रिटिश शासक लेकिन भारत के हिन्दू सुरक्षित थे ✅ 10 साल सिख प्रधानमंत्री थे भारत का हिंदू सुरक्षित था . ✅ 05 साल मुसलमान राष्ट्रपति लेकिन भारत में हिंदू सुरक्षित थे ✅ पिछले 11 साल से राष्ट्रपति हिंदू,प्रधानमंत्री हिंदू 95% देश के मुख्यमंत्री हिंदू और सत्ता भी हिंदूवादी RSS की फिर भी काहा जाता हिंदू ख़तरे में..?? 🥊ऐसा इसलिए - क्यूकी भाई भाई में फुट, घर घर में फुट डालने वाले नफ़रती , झूठ लोग और संगठन सत्ता में बैठा है. और अपने सत्ता फ़ायदे के लिए धर्म की राजनीति कर रहे है। हिन्दू ख़तरे में है ये लोग वही कर रहे है जो पाकिस्तान में एक जमाने में जुल्फिकार अली भुट्टो ने करते थे "इस्लाम खतरे में है" का नरा लगाकर असली बातों से आम आदमी का ध्यान हटाना ताकि जनता का ध्यान इंडिया पर चला जाये और वो आराम से सत्ते में बने रहे, आज देख लो पाकिस्तान का क्या हाल है।

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बेंगलुरु, कर्नाटकः एक शादी समारोह में बारात को वापस लौटना पड़ा जब दूल्हे और उसके दोस्तों ने शराब के नशे में हदें पार कर दीं। नशे में चूर दूल्हे और बारातियों ने न केवल हंगामा किया, बल्कि आरती की थाली को फिल्मी अंदाज में उछाल दिया, जिससे माहौल बिगड़ गया। इस स्थिति को देखते हुए, दुल्हन की मां ने साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने बारातियों से निवेदन कर कहा, "अगर अभी से यह हाल है, तो मेरी बेटी का भविष्य क्या होगा?" उनकी सख्ती ने सभी को स्तब्ध कर दिया, और बारात को बिना फेरे वापस लौटना पड़ा। यह घटना विवाह में संस्कार और सम्मान के महत्व को बखूबी रेखांकित करती है।

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प्रत्यक्ष उदाहरण है यह...... हमारे देश में यह आम बात हो गई है कि पुलिसकर्मी महिलाओं से यौन संबंध बनाने की मांग करते हैं, खासकर जब वे अपने पति या बॉयफ्रेंड के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने थाने जाती हैं। अधिकांश पुलिस स्टेशन महिलाओं के लिए वेश्यालय और पुरुषों के लिए कत्लगाह जैसे बन गए हैं। मधुगिरी डीएसपी रामचंद्रप्पा के पांवगनडा कार्यालय में एक महिला जमीन विवाद की शिकायत दर्ज कराने गई।आरोप है कि डीएसपी ने उसे कार्यालय के अंदर स्थित बाथरूम में ले जाकर उसके साथ यौन शोषण किया और विवाद में मदद में मदद करने का झांसा दिया। इस घटना का वीडियो किसी ने खिड़की से रिकॉर्ड किया.

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