
Dr. Laxman Yadav
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Author of the Best-Selling books 'Professor ki Diary' & 'Jaati Janaganana', Socialist, Constitutionalist, Political Analyst, Intercessor of Social Justice.
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“तुम हमारे गिलास में पानी कैसे पी लिए?” बस यह एक सवाल सुनिए और फिर उन तमाम दावों को याद कीजिए कि अब जाति कहाँ बची है, भेदभाव तो कब का खत्म हो चुका है, अब तो सब बराबर हैं! जिस पानी पर किसी जाति का अधिकार नहीं, जिस प्यास में कोई ऊँच-नीच नहीं, उसी पानी का एक गिलास आज भी किसी इंसान को उसकी जाति याद दिला देता है। सोचिए, उस व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी जिसे केवल पानी पी लेने भर से उसकी सामाजिक हैसियत बताने की कोशिश की जाए। जातिवाद केवल किताबों में दर्ज इतिहास नहीं है। वह आज भी भाषा, व्यवहार, अपमान और रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देता है। इसलिए सवाल आरक्षण कब खत्म होगा का नहीं, सवाल यह है - जाति के नाम पर यह अपमान कब खत्म होगा?
Dr. Laxman Yadav37,495 просмотров • 3 дней назад

आज़मगढ़ में प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही युवाओं को कथित तौर पर चेतावनी दी गई - "ज़्यादा देर तक दिखे तो मुक़दमे हो जाएँगे, बुद्धि ठिकाने आ जाएगी।" लेकिन सवाल यह है कि बुद्धि ठिकाने किसकी आने की ज़रूरत है? उन युवाओं की, जो शिक्षा, रोज़गार और अपने भविष्य की बात कर रहे हैं, या उस सत्ता की, जिसे जनता ने उनकी आवाज़ सुनने और समस्याओं का समाधान करने के लिए चुना था? लोकतंत्र में सवालों का जवाब धमकियों से नहीं, संवाद से दिया जाता है।
Dr. Laxman Yadav472,433 просмотров • 1 месяц назад

“आरक्षण सिर्फ़ 10 साल के लिए था।” “आरक्षण योग्यता का हनन करता है।” “एक ही परिवार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण मिल रहा है।” आरक्षण के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा दोहराए जाने वाले तर्क यही हैं। विडंबना यह है कि इन्हें दोहराने वाले बहुत से लोगों को आरक्षण के संवैधानिक आधार, उसके उद्देश्य और उसकी वास्तविक स्थिति के बुनियादी तथ्य तक नहीं मालूम। जिस देश में बहुसंख्यक आबादी को सामाजिक न्याय और आरक्षण के बारे में व्यवस्थित रूप से शिक्षित ही नहीं किया गया, वहाँ वर्चस्वशाली मानसिकता कभी सीधे आरक्षण का विरोध करती है और कभी ‘सुधार’ और ‘रिफॉर्म’ की आड़ में उसके मूल उद्देश्य को ही कमज़ोर करने की कोशिश करती है। टीवी की बहसों में बैठे अधिकांश लोग या तो इन बुनियादी तथ्यों से वाक़िफ़ नहीं होते, या फिर अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना नहीं चाहते। लेकिन अब समय बदल रहा है। सामाजिक न्याय, समाजवाद और संविधान के ख़िलाफ़ होने वाली ऐसी कोशिशों को OBC-SC-ST समाज पहले से कहीं बेहतर समझ रहा है, पहचान रहा है और उनका जवाब भी दे रहा है। जाति जनगणना की माँग वर्षों के संघर्ष के बाद स्वीकार हुई, लेकिन अब उसकी प्रक्रिया को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं कि कहीं उसे ही औचित्यहीन बनाने की कोशिश तो नहीं हो रही। दूसरी तरफ़ आरक्षण को लेकर दशकों बाद भी सवाल यही है कि क्या उसका ईमानदारी और संवैधानिक भावना के अनुरूप पूरा क्रियान्वयन हुआ भी है? प्रतिनिधित्व का वास्तविक डेटा सामने आए बिना ‘आरक्षण सुधार’ की बहस आखिर किस आधार पर होगी? दिलचस्प यह भी है कि कई बार टीवी की शोरभरी बहसों से कहीं अधिक तथ्यपूर्ण और सार्थक चर्चा सोशल मीडिया पर दिखाई देती है। फिर भी हर मंच पर अपनी बात रखनी होगी—तथ्यों, तर्कों और संविधान के साथ। आप भी देखिए, सुनिए और विचार कीजिए। क्योंकि आने वाले दिनों में बहस केवल आरक्षण की नहीं होगी; असली सवाल प्रतिनिधित्व, हिस्सेदारी और सामाजिक न्याय की दिशा का होगा। देखना है कि आरक्षण वाला यह विवाद अब किस करवट बदलता है।
Dr. Laxman Yadav45,480 просмотров • 4 дней назад

जाति कहाँ है? शायद सारी ऊँची कुर्सियों पर बैठी है! कहा जाता है - जाति अब सिर्फ़ राजनीति में बची है, योग्यता के सामने जाति कहाँ टिकती है! लेकिन सरकारी संस्थानों की ऊँची कुर्सियाँ कुछ और कहानी कहती हैं। 2018–22 में IAS-IPS बने अधिकारियों में करीब 24% SC-ST थे, लेकिन डायरेक्टर और उससे ऊपर के 928 पदों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 12.93% और सचिव स्तर पर महज़ 4.6% रह गई। कमाल है - आरक्षण से दलित दरवाज़े तक पहुँचे तो “मेरिट खतरे में”, लेकिन ऊँची कुर्सियों तक पहुँचते-पहुँचते गायब हो जाएँ तो जाति भी गायब! ये तथ्य और अनुभव BBC हिंदी की रिपोर्ट - “पुलिस विभाग और अफ़सरशाही में जातिगत भेदभाव कितना गहरा?” से हैं।
Dr. Laxman Yadav24,076 просмотров • 2 дней назад

'मनुस्मृति ज़ेहन में है जिनके, वे समय-समय पर उसका सबूत देते रहे हैं' इटावा की यह घटना पुरानी है, मगर हमेशा याद रखी जाएगी कि कैसे जातिवादी-मनुवादी मानसिकता से ग्रस्त दबंगों ने कथा वाचक मुकुट मणि यादव को अपमानित किया, उनके बाल-चोटी काटी और वाद्ययंत्र तोड़े। समय बीत जाता है, लेकिन ऐसी घटनाएँ इतिहास में उस मानसिकता के सबूत के तौर पर दर्ज रहती हैं, जो इंसान की योग्यता और गरिमा से पहले उसकी जाति देखती है। संविधान के भारत को यह याद रखना होगा कि मनुवाद केवल किताबों में नहीं, व्यवहार में भी चुनौती है। मनुवाद को हराकर ही संविधान का भारत बनाया जा सकता है।
Dr. Laxman Yadav26,287 просмотров • 3 дней назад

अविनाश पांडेय जी ख़ुद को ‘सिंघम’ समझ बैठे थे! शायद लगा - बंद कमरा है, कैमरा नहीं है, मारो और बाद में पीड़ित को ही झूठा बता दो। लेकिन साहब, आपका पुराना ‘सिंघम अवतार’ कैमरे में क़ैद है - प्रदर्शनकारियों पर थप्पड़ बरसाते और पुलिस वैन में युवक को लात-घूंसों से पीटते हुए। तो बंद कमरे में क्या हुआ होगा, इस पर जनता सवाल क्यों न करे? दिग्विजय भाटी के शरीर के घाव भी सवाल कर रहे हैं। योगी सरकार बताए - यूपी में पुलिस कानून से चलेगी या ‘गुंडाराज’ से?
Dr. Laxman Yadav65,431 просмотров • 11 дней назад

देश का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ युवाओं के भविष्य पर नहीं, मंत्रियों की कुर्सियों पर मातम मनाया जाता है।
Dr. Laxman Yadav186,897 просмотров • 1 месяц назад

BJP-RSS बताए - दलित-पिछड़ों से इतनी नफ़रत आखिर क्यों? कन्नौज में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मंदिर जाने के बाद परिसर धोया गया और अब हल्द्वानी में संसद के उच्च सदन राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम स्थल के कथित ‘शुद्धिकरण’ का मामला सामने आया है। यह कैसी राजनीति है? #BJPDalitVirodhi #BJPPichhdaVirodhi
Dr. Laxman Yadav95,129 просмотров • 20 дней назад

RSS का असली चेहरा फिर सामने आ गया। RSS के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये ने अपने अधिकार, शिक्षा और रोज़गार की माँग करने वाली Gen Z को ही 'देशद्रोही' और 'संविधान-विरोधी' बता दिया। अब साफ़ है कि उन्हें जागरूक युवा नहीं, सिर्फ़ चुप रहने वाली पीढ़ी चाहिए। मुखौटा एक बार फिर उतर गया।
Dr. Laxman Yadav124,246 просмотров • 28 дней назад

"सत्ता से सवाल करना अब आसान नहीं रहा..." News24 छोड़ने के बाद वरिष्ठ पत्रकार गरिमा सिंह ने टीवी मीडिया का ऐसा सच सामने रखा है, जिसे हर नागरिक को सुनना चाहिए। अगर किसी सरकार के दौर में पत्रकारों को सवाल पूछने से पहले दबाव, ट्रोलिंग और स्टूडियो तक पहुँचने वाली भीड़ का डर सताने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। जब पत्रकार निर्भीक नहीं रहेंगे, तो जनता भी सच से वंचित होती जाएगी। इसलिए यह मुद्दा किसी एक पत्रकार या एक चैनल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का है। बाक़ी, आपकी समझदारी पर छोड़ता हूँ।
Dr. Laxman Yadav110,243 просмотров • 29 дней назад

ज़ुल्म की उम्र लंबी नहीं होती; समय अंततः हर तानाशाही से हिसाब लेता है।
Dr. Laxman Yadav144,157 просмотров • 1 месяц назад

RSS द्वारा देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर क़ब्ज़े की कहानी : भाग 2 आजकल शिक्षा जगत पर RSS के बढ़ते प्रभाव और विश्वविद्यालयों के भगवाकरण को लेकर देशभर में गंभीर चर्चा चल रही है। ऐसे समय में मैं आपके लिए कुछ ऐसे सबूत साझा करने की यह श्रृंखला लेकर आया हूँ, जिन्हें हमने पिछले कई वर्षों से लगातार आपके सामने रखा था, ताकि समय रहते आपको आगाह किया जा सके। आज वही सवाल राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुके हैं। यह वीडियो भी कुछ महीने पुराना है, जिसे मैंने अपने सोशल मीडिया संग्रहालय से आपके लिए निकाला है। इस वीडियो को स्वतंत्र पत्रकार Harsh Yadav ने बनाया था। आज इसे दोबारा साझा करने का उद्देश्य केवल इतना है कि लोग देखें—जो बातें तब कही जा रही थीं, वे आज किस तरह वास्तविकता के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में "युवा कुंभ" जैसे आयोजनों के नाम पर RSS से जुड़े कार्यक्रम खुलेआम आयोजित किए जा रहे थे। कई जगह कॉलेज प्रशासन अलग-अलग नामों से अनुमति देकर इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनता दिखाई दिया। ऐसे आयोजनों को लेकर छात्र संगठनों और शिक्षकों के एक वर्ग ने विश्वविद्यालय की संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल उठाए और विरोध भी दर्ज कराया। विश्वविद्यालय विचार, बहस, शोध और आलोचनात्मक चिंतन के केंद्र होने चाहिए। लेकिन जब सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग किसी एक वैचारिक एजेंडे के प्रचार के लिए होने लगे, तो यह केवल एक कार्यक्रम का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक चरित्र का प्रश्न बन जाता है। छात्र विरोध में उतर चुके हैं, जनता सवाल पूछ रही है और कैंपस का माहौल बिगाड़ने की यह कोशिश अब सबके सामने है। सरकारी संस्थानों को किसी भी वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव का माध्यम बनाने की प्रवृत्ति पर गंभीर बहस और जवाबदेही दोनों आवश्यक हैं। यह श्रृंखला आगे भी जारी रहेगी। दस्तावेज़ों, वीडियो और तथ्यों के साथ हम उन घटनाओं को सामने लाते रहेंगे, जिन्हें उस समय नज़रअंदाज़ किया गया, लेकिन जिनके परिणाम आज पूरे देश के सामने दिखाई दे रहे हैं।
Dr. Laxman Yadav113,451 просмотров • 1 месяц назад

दलितों के लिए पेपर कप और कथित ऊँची जातियों के लिए काँच का गिलास! अब जातिवाद के बचाव में नया तर्क सुनिए - “देश की बड़ी आबादी पेपर कप में चाय पीती है, यह तो आज की जरूरत है।” बिल्कुल! पेपर कप में चाय पीना अपने आप में भेदभाव नहीं है। भेदभाव तब है, जब एक ही दुकान पर कप का चुनाव ग्राहक की सुविधा से नहीं, उसकी जाति देखकर किया जाए। अगर सबको पेपर कप मिल रहा है तो कोई सवाल ही नहीं। सवाल तब उठेगा, जब एक जाति के लिए पेपर कप और दूसरी के लिए काँच का गिलास तय हो। मुद्दा कप नहीं, कप तय करने वाली जातिवादी मानसिकता है। और जो लोग हर जातिगत भेदभाव के सामने कोई नया बहाना खोज लेते हैं, वे बताएं - अगर जाति खत्म हो चुकी है तो बर्तन तय करते समय जाति बीच में क्यों आ रही है?
Dr. Laxman Yadav12,214 просмотров • 3 дней назад

“पासी समाज से हूँ, इसलिए पूजा में बैठने नहीं दिया…” ये आरोप किसी विपक्षी के नहीं, भाजपा की अपनी विधायक जय देवी कौशल के हैं। जिस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए करीब ₹1 करोड़ का सरकारी बजट दिलाया, वहीं कथित तौर पर जाति के कारण अपमानित हुईं। यही BJP-RSS की कथित ‘सामाजिक समरसता’ की हकीकत है। दलित-पिछड़ों का भाजपा में सम्मान नहीं, इस्तेमाल होता है। वे कुल्हाड़ी में लगी उस लकड़ी की तरह रखे जाते हैं, जिसके सहारे पूरा जंगल काटा जाता है।
Dr. Laxman Yadav42,346 просмотров • 13 дней назад