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Dr. Laxman Yadav

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Author of the Best-Selling books 'Professor ki Diary' & 'Jaati Janaganana', Socialist, Constitutionalist, Political Analyst, Intercessor of Social Justice.

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पत्रकार ने पूछा - अखिलेश जी कह रहे हैं कि इस बार हम आएँगे। जवाब मिला - “अखिलेश अहीर… मट्ठा, दही, दूध निकाले!” यही कुछ शब्द बता देते हैं कि जाति इस समाज में कितनी गहरी बैठी है। जिस व्यक्ति ने मुख्यमंत्री रहते हुए एक्सप्रेसवे, मेट्रो, अस्पताल, शिक्षा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अनेक काम किए, उसकी योग्यता और राजनीतिक सफ़र पर बहस करने के बजाय उसे उसकी जाति से जोड़कर बनाए गए रूढ़िगत पेशों तक सीमित कर दिया जाता है। यह किसी एक महिला या एक व्यक्ति को निशाना बनाने की बात नहीं है। यह उस वर्चस्ववादी मानसिकता की एक बानगी है, जो आज भी इंसान की योग्यता से पहले उसकी जाति देखती है। इसीलिए जाति अभी गई नहीं है। और जब तक जाति पीछा नहीं छोड़ती, सामाजिक न्याय की लड़ाई भी पीछा नहीं छोड़ेगी। Akhilesh Yadav

पत्रकार ने पूछा - अखिलेश जी कह रहे हैं कि इस बार हम आएँगे। जवाब मिला - “अखिलेश अहीर… मट्ठा, दही, दूध निकाले!” यही कुछ शब्द बता देते हैं कि जाति इस समाज में कितनी गहरी बैठी है। जिस व्यक्ति ने मुख्यमंत्री रहते हुए एक्सप्रेसवे, मेट्रो, अस्पताल, शिक्षा और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अनेक काम किए, उसकी योग्यता और राजनीतिक सफ़र पर बहस करने के बजाय उसे उसकी जाति से जोड़कर बनाए गए रूढ़िगत पेशों तक सीमित कर दिया जाता है। यह किसी एक महिला या एक व्यक्ति को निशाना बनाने की बात नहीं है। यह उस वर्चस्ववादी मानसिकता की एक बानगी है, जो आज भी इंसान की योग्यता से पहले उसकी जाति देखती है। इसीलिए जाति अभी गई नहीं है। और जब तक जाति पीछा नहीं छोड़ती, सामाजिक न्याय की लड़ाई भी पीछा नहीं छोड़ेगी। Akhilesh Yadav

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मध्य प्रदेश के भोपाल के ये दृश्य देखिए। ये बच्चे स्कूल से नहीं भाग रहे, स्कूल को भागने से रोक रहे हैं!

मध्य प्रदेश के भोपाल के ये दृश्य देखिए। ये बच्चे स्कूल से नहीं भाग रहे, स्कूल को भागने से रोक रहे हैं!

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विश्वगुरु बनने का रास्ता शायद स्कूल की सड़क से होकर नहीं जाता!

विश्वगुरु बनने का रास्ता शायद स्कूल की सड़क से होकर नहीं जाता!

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NDA सरकार में भी इस्तीफ़े होते हैं.

NDA सरकार में भी इस्तीफ़े होते हैं.

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अविनाश पांडेय जी ख़ुद को ‘सिंघम’ समझ बैठे थे! शायद लगा - बंद कमरा है, कैमरा नहीं है, मारो और बाद में पीड़ित को ही झूठा बता दो। लेकिन साहब, आपका पुराना ‘सिंघम अवतार’ कैमरे में क़ैद है - प्रदर्शनकारियों पर थप्पड़ बरसाते और पुलिस वैन में युवक को लात-घूंसों से पीटते हुए। तो बंद कमरे में क्या हुआ होगा, इस पर जनता सवाल क्यों न करे? दिग्विजय भाटी के शरीर के घाव भी सवाल कर रहे हैं। योगी सरकार बताए - यूपी में पुलिस कानून से चलेगी या ‘गुंडाराज’ से?

अविनाश पांडेय जी ख़ुद को ‘सिंघम’ समझ बैठे थे! शायद लगा - बंद कमरा है, कैमरा नहीं है, मारो और बाद में पीड़ित को ही झूठा बता दो। लेकिन साहब, आपका पुराना ‘सिंघम अवतार’ कैमरे में क़ैद है - प्रदर्शनकारियों पर थप्पड़ बरसाते और पुलिस वैन में युवक को लात-घूंसों से पीटते हुए। तो बंद कमरे में क्या हुआ होगा, इस पर जनता सवाल क्यों न करे? दिग्विजय भाटी के शरीर के घाव भी सवाल कर रहे हैं। योगी सरकार बताए - यूपी में पुलिस कानून से चलेगी या ‘गुंडाराज’ से?

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अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी गांवों में, लोग जब भी अपना फोन चालू करते हैं, तो उन्हें एक चीनी मोबाइल नेटवर्क से मैसेज मिलता है। इसकी जांच हो. क्या ये आरोप सही है? यह सिर्फ नेटवर्क का मामला नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा लीक का बड़ा खतरा है! देश के सीमावर्ती नागरिकों की लोकेशन, कॉल और पर्सनल डेटा सीधे चीनी सर्वर तक पहुँचने का जोखिम है। 56 इंच की बात करने वाली सरकार का आईटी मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय आख़िर इस गंभीर डिजिटल घुसपैठ पर खामोश क्यों हैं? भारत सरकार को ऐसे गंभीर सवालों पर तत्काल जवाब देकर नागरिकों की शंका का समाधान करना चाहिए.

अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी गांवों में, लोग जब भी अपना फोन चालू करते हैं, तो उन्हें एक चीनी मोबाइल नेटवर्क से मैसेज मिलता है। इसकी जांच हो. क्या ये आरोप सही है? यह सिर्फ नेटवर्क का मामला नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा लीक का बड़ा खतरा है! देश के सीमावर्ती नागरिकों की लोकेशन, कॉल और पर्सनल डेटा सीधे चीनी सर्वर तक पहुँचने का जोखिम है। 56 इंच की बात करने वाली सरकार का आईटी मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय आख़िर इस गंभीर डिजिटल घुसपैठ पर खामोश क्यों हैं? भारत सरकार को ऐसे गंभीर सवालों पर तत्काल जवाब देकर नागरिकों की शंका का समाधान करना चाहिए.

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उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में एक युवक मोटर साइकिल पर अपनी मां को बैठाकर बाजार जा रहा था. कि बीच रास्ते में ही तीन मोटर साइकिलों पर सवार आधा दर्जन से अधिक युवकों ने रोक लिया। मारपीट कर तमंचे के बल पर अगवा कर लिया और फिर उसको बेरहमी से पीटा. लेकिन किसी टीवी चैनल में इतनी हिम्मत नहीं हो रही कि इसे जंगलराज बोल दे.

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में एक युवक मोटर साइकिल पर अपनी मां को बैठाकर बाजार जा रहा था. कि बीच रास्ते में ही तीन मोटर साइकिलों पर सवार आधा दर्जन से अधिक युवकों ने रोक लिया। मारपीट कर तमंचे के बल पर अगवा कर लिया और फिर उसको बेरहमी से पीटा. लेकिन किसी टीवी चैनल में इतनी हिम्मत नहीं हो रही कि इसे जंगलराज बोल दे.

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देखिए, नया भारत तैयार हो रहा है!

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अपने विवेक को सबसे बड़ा मार्गदर्शक बनाइए।

अपने विवेक को सबसे बड़ा मार्गदर्शक बनाइए।

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अब दलित-पिछड़ा-आदिवासी समाज तय करे!

अब दलित-पिछड़ा-आदिवासी समाज तय करे!

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कावँड यात्रा के रास्ते पर बैरिकेडिंग बांधते मुसलमान।

कावँड यात्रा के रास्ते पर बैरिकेडिंग बांधते मुसलमान।

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ये खेल भावना का सम्मान है. #OlimpiadasParis2024

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ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है देश के लिए!

ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है देश के लिए!

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बिहार में भी अमृतकाल आ गया है... भरोसा न हो तो ये बानगी देख लीजिए!

बिहार में भी अमृतकाल आ गया है... भरोसा न हो तो ये बानगी देख लीजिए!

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ये वीडिओ रुड़की का बताया जा रहा है. ख़बरों के मुताबिक कांवड़ियों से ई-रिक्शा साइड से 'टच' हो गया था. और कांवड़ियों ने ई-रिक्शा का ये हाल कर दिया। इन्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि सरकार और प्रशासन का ज़रा भी भय नहीं है इनके अंदर। ये ऐसा क्यों कर पा रहे हैं, इसका जवाब कौन देगा?

ये वीडिओ रुड़की का बताया जा रहा है. ख़बरों के मुताबिक कांवड़ियों से ई-रिक्शा साइड से 'टच' हो गया था. और कांवड़ियों ने ई-रिक्शा का ये हाल कर दिया। इन्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि सरकार और प्रशासन का ज़रा भी भय नहीं है इनके अंदर। ये ऐसा क्यों कर पा रहे हैं, इसका जवाब कौन देगा?

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कल कानपुर देहात में अंजली कुमारी नाम की एक युवती ने अखिलेश यादव से कहा - “भइया, मेरे कान की बाली चंदे में ले लो, लेकिन सरकार बनाओ।” अंजली का दलित समाज से होना इस प्रसंग को एक व्यापक राजनीतिक अर्थ देता है। यह उस भरोसे की झलक है, जो PDA के सामाजिक आधार में धीरे-धीरे गहरा होता दिखाई दे रहा है। राजनीति में वोट माँगे जा सकते हैं, भीड़ जुटाई जा सकती है, लेकिन ऐसा विश्वास प्रचार से पैदा नहीं होता। यह तब बनता है, जब लोगों को किसी राजनीति में अपनी आवाज़, सम्मान और हिस्सेदारी दिखाई देने लगे। अंजली की बाली की कीमत रुपयों में नहीं आँकी जा सकती। यह PDA के ‘D’ के बढ़ते विश्वास का प्रतीक है - और Akhilesh Yadav के लिए उपलब्धि से अधिक एक बड़ी जिम्मेदारी भी।

कल कानपुर देहात में अंजली कुमारी नाम की एक युवती ने अखिलेश यादव से कहा - “भइया, मेरे कान की बाली चंदे में ले लो, लेकिन सरकार बनाओ।” अंजली का दलित समाज से होना इस प्रसंग को एक व्यापक राजनीतिक अर्थ देता है। यह उस भरोसे की झलक है, जो PDA के सामाजिक आधार में धीरे-धीरे गहरा होता दिखाई दे रहा है। राजनीति में वोट माँगे जा सकते हैं, भीड़ जुटाई जा सकती है, लेकिन ऐसा विश्वास प्रचार से पैदा नहीं होता। यह तब बनता है, जब लोगों को किसी राजनीति में अपनी आवाज़, सम्मान और हिस्सेदारी दिखाई देने लगे। अंजली की बाली की कीमत रुपयों में नहीं आँकी जा सकती। यह PDA के ‘D’ के बढ़ते विश्वास का प्रतीक है - और Akhilesh Yadav के लिए उपलब्धि से अधिक एक बड़ी जिम्मेदारी भी।

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सबूत तो चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में लाइव मिल चुका था, हुआ क्या? सबूत तो Samajwadi Party के नेता Akhilesh Yadav जी ने 18,000 सबूत Election Commission of India को भिजवाए थे कि धांधली हुई है. मगर हुआ क्या? इस बार एटम बम तो फूटा है, देखना दिलचस्प है कि क्या होता है.

सबूत तो चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में लाइव मिल चुका था, हुआ क्या? सबूत तो Samajwadi Party के नेता Akhilesh Yadav जी ने 18,000 सबूत Election Commission of India को भिजवाए थे कि धांधली हुई है. मगर हुआ क्या? इस बार एटम बम तो फूटा है, देखना दिलचस्प है कि क्या होता है.

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देश में बेरोज़गारी, महंगाई और भर्ती घोटालों की चर्चा है, लेकिन प्रधानमंत्री जी फिर विदेश दौरे पर हैं - शायद भारत की समस्याएँ अब फ्रांस और स्लोवाकिया से ही हल होंगी।

देश में बेरोज़गारी, महंगाई और भर्ती घोटालों की चर्चा है, लेकिन प्रधानमंत्री जी फिर विदेश दौरे पर हैं - शायद भारत की समस्याएँ अब फ्रांस और स्लोवाकिया से ही हल होंगी।

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"गुलामों को गुलामी का एहसास करा दो, वह अपनी जंजीरें खुद तोड़ देगा." :- महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले #Bangladesh

"गुलामों को गुलामी का एहसास करा दो, वह अपनी जंजीरें खुद तोड़ देगा." :- महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले #Bangladesh

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जंतर-मंतर पर संघर्षरत युवाओं से मिलने पहुँचे Samajwadi Party के सांसद Dharmendra Yadav जी को मोदी सरकार की दिल्ली पुलिस ने रोकने की पूरी कोशिश की। एक निर्वाचित सांसद का हाथ पकड़कर सत्ता ने लोकतंत्र नहीं, बल्कि अपना अहंकार दिखाया। लेकिन तमाम रोक-टोक और दमन के बावजूद धर्मेंद्र यादव जी युवाओं के समर्थन में मजबूती से खड़े रहे और सत्ता को साफ़ संदेश दे दिया - जनता की आवाज़ को न पुलिस रोक सकती है, न बैरिकेड और न ही सत्ता का अहंकार।

जंतर-मंतर पर संघर्षरत युवाओं से मिलने पहुँचे Samajwadi Party के सांसद Dharmendra Yadav जी को मोदी सरकार की दिल्ली पुलिस ने रोकने की पूरी कोशिश की। एक निर्वाचित सांसद का हाथ पकड़कर सत्ता ने लोकतंत्र नहीं, बल्कि अपना अहंकार दिखाया। लेकिन तमाम रोक-टोक और दमन के बावजूद धर्मेंद्र यादव जी युवाओं के समर्थन में मजबूती से खड़े रहे और सत्ता को साफ़ संदेश दे दिया - जनता की आवाज़ को न पुलिस रोक सकती है, न बैरिकेड और न ही सत्ता का अहंकार।

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“तुम हमारे गिलास में पानी कैसे पी लिए?” बस यह एक सवाल सुनिए और फिर उन तमाम दावों को याद कीजिए कि अब जाति कहाँ बची है, भेदभाव तो कब का खत्म हो चुका है, अब तो सब बराबर हैं! जिस पानी पर किसी जाति का अधिकार नहीं, जिस प्यास में कोई ऊँच-नीच नहीं, उसी पानी का एक गिलास आज भी किसी इंसान को उसकी जाति याद दिला देता है। सोचिए, उस व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी जिसे केवल पानी पी लेने भर से उसकी सामाजिक हैसियत बताने की कोशिश की जाए। जातिवाद केवल किताबों में दर्ज इतिहास नहीं है। वह आज भी भाषा, व्यवहार, अपमान और रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देता है। इसलिए सवाल आरक्षण कब खत्म होगा का नहीं, सवाल यह है - जाति के नाम पर यह अपमान कब खत्म होगा?

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“आरक्षण सिर्फ़ 10 साल के लिए था।” “आरक्षण योग्यता का हनन करता है।” “एक ही परिवार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण मिल रहा है।” आरक्षण के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा दोहराए जाने वाले तर्क यही हैं। विडंबना यह है कि इन्हें दोहराने वाले बहुत से लोगों को आरक्षण के संवैधानिक आधार, उसके उद्देश्य और उसकी वास्तविक स्थिति के बुनियादी तथ्य तक नहीं मालूम। जिस देश में बहुसंख्यक आबादी को सामाजिक न्याय और आरक्षण के बारे में व्यवस्थित रूप से शिक्षित ही नहीं किया गया, वहाँ वर्चस्वशाली मानसिकता कभी सीधे आरक्षण का विरोध करती है और कभी ‘सुधार’ और ‘रिफॉर्म’ की आड़ में उसके मूल उद्देश्य को ही कमज़ोर करने की कोशिश करती है। टीवी की बहसों में बैठे अधिकांश लोग या तो इन बुनियादी तथ्यों से वाक़िफ़ नहीं होते, या फिर अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना नहीं चाहते। लेकिन अब समय बदल रहा है। सामाजिक न्याय, समाजवाद और संविधान के ख़िलाफ़ होने वाली ऐसी कोशिशों को OBC-SC-ST समाज पहले से कहीं बेहतर समझ रहा है, पहचान रहा है और उनका जवाब भी दे रहा है। जाति जनगणना की माँग वर्षों के संघर्ष के बाद स्वीकार हुई, लेकिन अब उसकी प्रक्रिया को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं कि कहीं उसे ही औचित्यहीन बनाने की कोशिश तो नहीं हो रही। दूसरी तरफ़ आरक्षण को लेकर दशकों बाद भी सवाल यही है कि क्या उसका ईमानदारी और संवैधानिक भावना के अनुरूप पूरा क्रियान्वयन हुआ भी है? प्रतिनिधित्व का वास्तविक डेटा सामने आए बिना ‘आरक्षण सुधार’ की बहस आखिर किस आधार पर होगी? दिलचस्प यह भी है कि कई बार टीवी की शोरभरी बहसों से कहीं अधिक तथ्यपूर्ण और सार्थक चर्चा सोशल मीडिया पर दिखाई देती है। फिर भी हर मंच पर अपनी बात रखनी होगी—तथ्यों, तर्कों और संविधान के साथ। आप भी देखिए, सुनिए और विचार कीजिए। क्योंकि आने वाले दिनों में बहस केवल आरक्षण की नहीं होगी; असली सवाल प्रतिनिधित्व, हिस्सेदारी और सामाजिक न्याय की दिशा का होगा। देखना है कि आरक्षण वाला यह विवाद अब किस करवट बदलता है।

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45,480 次观看 • 4 天前

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जाति कहाँ है? शायद सारी ऊँची कुर्सियों पर बैठी है! कहा जाता है - जाति अब सिर्फ़ राजनीति में बची है, योग्यता के सामने जाति कहाँ टिकती है! लेकिन सरकारी संस्थानों की ऊँची कुर्सियाँ कुछ और कहानी कहती हैं। 2018–22 में IAS-IPS बने अधिकारियों में करीब 24% SC-ST थे, लेकिन डायरेक्टर और उससे ऊपर के 928 पदों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 12.93% और सचिव स्तर पर महज़ 4.6% रह गई। कमाल है - आरक्षण से दलित दरवाज़े तक पहुँचे तो “मेरिट खतरे में”, लेकिन ऊँची कुर्सियों तक पहुँचते-पहुँचते गायब हो जाएँ तो जाति भी गायब! ये तथ्य और अनुभव BBC हिंदी की रिपोर्ट - “पुलिस विभाग और अफ़सरशाही में जातिगत भेदभाव कितना गहरा?” से हैं।

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24,076 次观看 • 3 天前

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RSS द्वारा देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर क़ब्ज़े की कहानी : भाग 2 आजकल शिक्षा जगत पर RSS के बढ़ते प्रभाव और विश्वविद्यालयों के भगवाकरण को लेकर देशभर में गंभीर चर्चा चल रही है। ऐसे समय में मैं आपके लिए कुछ ऐसे सबूत साझा करने की यह श्रृंखला लेकर आया हूँ, जिन्हें हमने पिछले कई वर्षों से लगातार आपके सामने रखा था, ताकि समय रहते आपको आगाह किया जा सके। आज वही सवाल राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुके हैं। यह वीडियो भी कुछ महीने पुराना है, जिसे मैंने अपने सोशल मीडिया संग्रहालय से आपके लिए निकाला है। इस वीडियो को स्वतंत्र पत्रकार Harsh Yadav ने बनाया था। आज इसे दोबारा साझा करने का उद्देश्य केवल इतना है कि लोग देखें—जो बातें तब कही जा रही थीं, वे आज किस तरह वास्तविकता के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में "युवा कुंभ" जैसे आयोजनों के नाम पर RSS से जुड़े कार्यक्रम खुलेआम आयोजित किए जा रहे थे। कई जगह कॉलेज प्रशासन अलग-अलग नामों से अनुमति देकर इन कार्यक्रमों का हिस्सा बनता दिखाई दिया। ऐसे आयोजनों को लेकर छात्र संगठनों और शिक्षकों के एक वर्ग ने विश्वविद्यालय की संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल उठाए और विरोध भी दर्ज कराया। विश्वविद्यालय विचार, बहस, शोध और आलोचनात्मक चिंतन के केंद्र होने चाहिए। लेकिन जब सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों का उपयोग किसी एक वैचारिक एजेंडे के प्रचार के लिए होने लगे, तो यह केवल एक कार्यक्रम का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक चरित्र का प्रश्न बन जाता है। छात्र विरोध में उतर चुके हैं, जनता सवाल पूछ रही है और कैंपस का माहौल बिगाड़ने की यह कोशिश अब सबके सामने है। सरकारी संस्थानों को किसी भी वैचारिक या राजनीतिक प्रभाव का माध्यम बनाने की प्रवृत्ति पर गंभीर बहस और जवाबदेही दोनों आवश्यक हैं। यह श्रृंखला आगे भी जारी रहेगी। दस्तावेज़ों, वीडियो और तथ्यों के साथ हम उन घटनाओं को सामने लाते रहेंगे, जिन्हें उस समय नज़रअंदाज़ किया गया, लेकिन जिनके परिणाम आज पूरे देश के सामने दिखाई दे रहे हैं।

Dr. Laxman Yadav

113,451 次观看 • 1 个月前

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दलितों के लिए पेपर कप और कथित ऊँची जातियों के लिए काँच का गिलास! अब जातिवाद के बचाव में नया तर्क सुनिए - “देश की बड़ी आबादी पेपर कप में चाय पीती है, यह तो आज की जरूरत है।” बिल्कुल! पेपर कप में चाय पीना अपने आप में भेदभाव नहीं है। भेदभाव तब है, जब एक ही दुकान पर कप का चुनाव ग्राहक की सुविधा से नहीं, उसकी जाति देखकर किया जाए। अगर सबको पेपर कप मिल रहा है तो कोई सवाल ही नहीं। सवाल तब उठेगा, जब एक जाति के लिए पेपर कप और दूसरी के लिए काँच का गिलास तय हो। मुद्दा कप नहीं, कप तय करने वाली जातिवादी मानसिकता है। और जो लोग हर जातिगत भेदभाव के सामने कोई नया बहाना खोज लेते हैं, वे बताएं - अगर जाति खत्म हो चुकी है तो बर्तन तय करते समय जाति बीच में क्यों आ रही है?

Dr. Laxman Yadav

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