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Mohd Ansar

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Social Media Incharge — AIMIM Uttar Pradesh Political Communication | Digital Campaigns | Public Affairs | Tweets are personal

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लटकन अपने यहूदी पापा को भगवान मान के झुक गया लेकिन दूसरे यहूदी ने लटकन की गांवऽ में लात मारके बताया की हम भी एक ही खुदा को मानने वाले है । 😁 वैसे लटकन के लटके अंडे सूझ गए होंगे 🍒 😂

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लटकन अपने यहूदी पापा को भगवान मान के झुक गया लेकिन दूसरे यहूदी ने लटकन की गांवऽ में लात मारके बताया की हम भी एक ही खुदा को मानने वाले है । 😁 वैसे लटकन के लटके अंडे सूझ गए होंगे 🍒 😂

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लटकन का दूसरा वीडियो आगया है । गांवऽ में कई मर्तबा लात मारी है लटकन के छोटे पापा ने । वाक़ई में कितनी सूजी होगी यार 🥲😔

लटकन का दूसरा वीडियो आगया है । गांवऽ में कई मर्तबा लात मारी है लटकन के छोटे पापा ने । वाक़ई में कितनी सूजी होगी यार 🥲😔

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AIMIM से विधायक बने फिर RJD मे गए, अब RJD ने टिकट नहीं दिया तो समर्थकों के सामने रोने लगे अंजार नईमी, ध्यान से देखिए बगल में हाफिज जी भी रो रहे हैं 🤔

AIMIM से विधायक बने फिर RJD मे गए, अब RJD ने टिकट नहीं दिया तो समर्थकों के सामने रोने लगे अंजार नईमी, ध्यान से देखिए बगल में हाफिज जी भी रो रहे हैं 🤔

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ना कलमा आता, ना फातिहा सीधी... और खुद को मुसलमान कहती है?" नाम शायद Shabnam है — हां वही, जो दिन में मंदिरों के चक्कर लगाती है, कभी चढ़ावा चढ़ाती है, कभी खुद को सनातनी बताती है... और फिर कहती है "मैं भी मुसलमान हूं।" अब ज़रा इस ड्रामे पर ध्यान दीजिए — वीडियो में एक लड़का कहता है: "जो लोग मानते हैं कि तुम मुस्लिम नहीं हो, उन्हें आज तुम कलमा पढ़कर सुना दो।" तो मैडम कलमे की जगह सूरह फातिहा पढ़ने लगती हैं — और वो भी ऐसी पढ़ी कि जैसे पहली बार देख रही हों। न लफ़्ज़ ठीक, न तर्ज़ — सीधा मतलब: ना कलमा याद, ना कुरआन की सबसे पहली सूरह ही ढंग से आती है। और फिर दावा: "हम तो मुस्लिम ही पैदा हुए थे..." वाह! पैदा हुए थे शायद, मगर अब क्या हो — ये खुद नहीं जानतीं। अब तुम ही बताओ — ये मज़हब है या सोशल मीडिया की नौटंकी? वीडियो नीचे है — देखिए, और अपनी राय ज़रूर दीजिए

ना कलमा आता, ना फातिहा सीधी... और खुद को मुसलमान कहती है?" नाम शायद Shabnam है — हां वही, जो दिन में मंदिरों के चक्कर लगाती है, कभी चढ़ावा चढ़ाती है, कभी खुद को सनातनी बताती है... और फिर कहती है "मैं भी मुसलमान हूं।" अब ज़रा इस ड्रामे पर ध्यान दीजिए — वीडियो में एक लड़का कहता है: "जो लोग मानते हैं कि तुम मुस्लिम नहीं हो, उन्हें आज तुम कलमा पढ़कर सुना दो।" तो मैडम कलमे की जगह सूरह फातिहा पढ़ने लगती हैं — और वो भी ऐसी पढ़ी कि जैसे पहली बार देख रही हों। न लफ़्ज़ ठीक, न तर्ज़ — सीधा मतलब: ना कलमा याद, ना कुरआन की सबसे पहली सूरह ही ढंग से आती है। और फिर दावा: "हम तो मुस्लिम ही पैदा हुए थे..." वाह! पैदा हुए थे शायद, मगर अब क्या हो — ये खुद नहीं जानतीं। अब तुम ही बताओ — ये मज़हब है या सोशल मीडिया की नौटंकी? वीडियो नीचे है — देखिए, और अपनी राय ज़रूर दीजिए

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लेबनान के इलाके हबूश (अल-कूरा) में एक ऐसा दिल छू लेने वाला मंज़र देखा गया, जिसने नबी ए अकरम ﷺ के उस फ़रमान-ए-मुबारक़ को हक़ीक़त का रूप दे दिया — “मोमिनों की आपसी मोहब्बत, रहमदिली और हमदर्दी की मिसाल एक जिस्म जैसी है — जब उसका एक हिस्सा दर्द महसूस करता है, तो पूरा जिस्म बेचैन हो उठता है..

लेबनान के इलाके हबूश (अल-कूरा) में एक ऐसा दिल छू लेने वाला मंज़र देखा गया, जिसने नबी ए अकरम ﷺ के उस फ़रमान-ए-मुबारक़ को हक़ीक़त का रूप दे दिया — “मोमिनों की आपसी मोहब्बत, रहमदिली और हमदर्दी की मिसाल एक जिस्म जैसी है — जब उसका एक हिस्सा दर्द महसूस करता है, तो पूरा जिस्म बेचैन हो उठता है..

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गुस्ताख़ ए नबी की एक सज़ा क़ानून से मिले फांसी की सज़ा #ArrestSharmishta

गुस्ताख़ ए नबी की एक सज़ा क़ानून से मिले फांसी की सज़ा #ArrestSharmishta

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जब मजार ,500 साल बाद भी "अवैध" हो सकती है… बहराइच (यूपी) में लक्कड़ शाह बाबा की दरगाह, जो 16वीं सदी से वजूद में थी, उसे 2025 में बुलडोज़र से मिटा दिया गया। कहा गया — "अवैध निर्माण" था। अब हम एक सवाल पूछना चाहते हैं — क्या ये पैमाना सब पर लागू होगा? हमारे हिंदू भाई अक्सर पीपल, नीम, या बरगद के पेड़ के नीचे धागा बांधकर, छोटी मूर्ति रखकर पूजा शुरू करते हैं — वक़्त के साथ वो जगह "धार्मिक स्थल" बन जाती है। तो क्या कभी सरकार ने कहा कि वो “अवैध” है? क्या कभी बुलडोज़र उन स्थानों तक पहुंचा? या ये बुलडोज़र सिर्फ़ मुसलमानों की आस्था के लिए तैयार खड़ा रहता है? हम अपने हिंदू भाइयों की आस्था का सम्मान करते हैं, क्योंकि आस्था इंसान का निजी और पवित्र अधिकार है। लेकिन क्या मुसलमानों की आस्था की कोई क़ीमत नहीं? क्या उनके मज़ार, कब्रें, मस्जिदें — सिर्फ "फाइलों का बोझ" हैं? हम कोर्ट का इंतज़ार करते हैं। हम कानून का सम्मान करते हैं। लेकिन क्या कानून सब पर बराबर लागू होता है — या आस्था की क़ीमत सिर्फ़ मज़हब देखकर तय होती है? अगर आज 700 साल पुरानी मजार "अवैध" है तो कल क्या होगा?

Mohd Ansar

48,103 Aufrufe • vor 1 Jahr