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लंकेश

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स्वतंत्र सामाजिक टिप्पणीकार | हिंदू समाज की सुरक्षा के पक्षधर न कोई पार्टी, न अंधभक्ति। जो गलत लगे, वो बिना झिझक बोलता हूँ। सच्चाई की तलाश में।

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वाह क्या सीन है, नयन तृप्त हो गए। मन प्रसन्न हो गया। वाह क्या सीन है।🙄

वाह क्या सीन है, नयन तृप्त हो गए। मन प्रसन्न हो गया। वाह क्या सीन है।🙄

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गाँव तो बारूद के ढ़ेर पर बैठे हुए हैं। बस कहीं चिंगारी जलती है, आग लग जाता है। सक्षम लोग तो कब के गाँव से पलायन कर चुके हैं। जिनके पास अर्थ की कमी है वे पूर्वजों के जर जमीन को औने पौने दाम में बेच शहर भाग रहें हैं। बीघा के बीघा बेच कठा खरीदने को मजबूर हैं। जेल जाने से बचे तो कम से कम। गावों में बड़े बड़े मकान खाली वीरान पड़े हैं। गावों में बस अब वहीं लोग बाग नया घर बार बना रहें हैं जिनपर SC ST एक्ट लागू नहीं होता। वरना चाहकर भी कोई अब पैसा गाँव में इन्वेस्ट नहीं करता है, गाँव में कोई व्यापार शुरू नहीं करता है। गाँव में 24 घंटा प्रपंच हीं प्रपंच है। किसका जमीन ज्यादा है, किसने किसको खेती के लिए दिया है, किसका किसके साथ उठना बैठना है, किसका हड़पा जाए, किसको फसाया जाए, कौन छाप रहा है, किसका पैसा रोका जाए, किसकी शादी तोड़ी जाए, किसको बदनाम किया जाए, किसके लड़के को बिगाड़ा जाए, किसका लुग्गा लुटा जाए,, कैसे योजनाओं को लूट लिया जाए, कैसे किसी और को योजना का फायदा होने से रोका जाए.. ब्लाँ ब्लॉ,,बस यहीं रह गया है। सरकार मौन मजे ले रही है, सरकारों को समाज से कोई सरोकार नहीं है. समाज अपनी कराये ऐसी तैसी हमें तो एक वर्ग को एक वर्ग से लड़ाना है, नफ़रत फैलाना है और वोट कैश करना है। सवर्ण अब सच पूछिए तो गावों में, गली का पिलपिलाया, खजूवाला कुकुर जैसी हो गयी है.

लंकेश

26,573 просмотров • 2 месяцев назад

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