
ravish kumar
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24 जून 2024, धर्मेंद्र प्रधान जब लोकसभा में शपथ लेने आए तब नारा लगा था, नीट, नीट, शेम, शेम...अगर धर्मेंद्र प्रधान में तब भी जज़्बा होता तो पेपर लीक को जड़ से ख़त्म कर देते। दो साल बाद आज 24 जुलाई 2026 है। यह वीडियो इसलिए देखिए ताकि उन लोगों को आप जवाब दे सकें जो कह रहे हैं कि प्रधान के इस्तीफे से क्या होगा। क्योंकि प्रधान फेल रहे हैं। नीट की चोरी को लेकर विपक्ष ने ठीक एक साल एक महीना पहले याद दिला दिया था। कम से कम इन दो सालों में वे नहीं कर पाए। यह तो साबित होता है। कई दिन हो गए, कोई विपक्षी दल नहीं तोड़ा गया है ताकि देश में दहशत पसर जाए कि अब क्या होगा, कोई बचेगा या नहीं। सरकार अगर युवाओं से संवाद करना चाहती है तो राघव चड्ढा को उनके बीच भेज दे, वे जेन ज़ी स्कूल ऑफ नायकत्व के प्रोडक्ट हैं। उन्हें मालूम होगा या उन 20 सांसदों की परेड करा दे जो जनता की नब्ज़ को सुपर फास्ट गति से समझते हुए तृणमूल छोड़ कर NCPI में शामिल हो गए। जिसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बनाया न अटल बिहारी वाजपेयी न संघ ने सुरेंद्र नाथ बनर्जी, मुलायम सिंह यादव या नीतीश कुमार ने। NCPI के संस्थापक का कम से कम एक इंटरव्यू तो छपना ही चाहिए कि अगर विपक्ष ने ज़ुबान बंद नहीं की तो 24 घंटे के भीतर राहुल गांधी और अखिलेश यादव को छोड़ कर उनसे सारे सांसद NCPI में होंगे। यह मान लीजिए कि इस देश में दो चार कालेज यूनिवर्सिटी को छोड़ कर सब के सब इस तरह काम कर रहे हैं जैसे युवाओं को किसी लायक नहीं बनने देना है। किसी लायक बन जाएंगे तो वे धर्म की राजनीति को ठीक से समझ जाएंगे। विपक्ष से भी सवाल करने लग जाएंगे।
ravish kumar770,245 görüntüleme • 3 ay önce

यह जंतर-मंतर का वीडियो है। आज दिल्ली की उमस भरी गर्मी जान ले रही है। उस हाल में वहाँ लोग ठसा-ठस भरे हैं। हाथ का पंखा लेकर नौजवान एक दूसरे को हवा का मरहम लगा रहे हैं। घर में पंखे के नीचे राहत नहीं है, वहाँ तो क्या ही हालत होगी। इस गर्मी में वहां मौजूद लोगों की हालत भी ख़राब हो रही होगी। सोनम वांगचुक को जबरन हटाने के बाद भी धरना कमज़ोर नही हुआ है। लोगों ने आगे आकर इस धरने को थाम लिया है। कौन नेता है, कैसा नेता है, यह सब सवाल पीछे चला गया है। आज पूरे दिन जंतर-मंतर पर भारी भीड़ रही। धरना स्थल तक जाने के लिए लोग कतार में बिना शिकायत खड़े हैं। वहाँ से लौटने वाले लोगों की लाइन राजीव चौक मेट्रो में भी बढ़ती जा रही है। सोमवार को सरकार का इम्तहान है। कल वह मार्च में बाधा डालेगी या मार्च होने देगी। आप नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, ग़ाज़ियाबाद इन महानगरों, महाज़िलों में रहने वाले जेन ज़ी, जेन बी जेन एक्स, जेन जो भी, किसी से पूछ लीजिए। क्या यहाँ एक भी सरकारी शैक्षणिक संस्थान है, जिसकी दुनिया छोड़िए, भारत में पहचान हो। जिसकी गुणवत्ता की तारीफ होती हो। जिसमें पढ़ने का सपना देखा जाता हो। एक भी नहीं है। सोचिए लाखों करोड़ों की आबादी के बीच एक ढंग का कॉलेज नहीं है। जहाँ भारत का एस्पिरेशनल क्लास रहता है। वह 12 साल से व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में डूबा रह गया। बच्चों के लिए अमेरिका का वीज़ा बनवाता रहा लेकिन मुड़ कर नहीं देखा कि उसके शहर में एक भी कॉलेज काम का क्यों नहीं है। इसके कारण मिडिल क्लास के साथ साथ नियो मिडिल क्लास के बच्चे भी घिस रहे हैं, पिस रहे हैं, मिट रहे हैं। जो मेहनत मज़दूरी करने वाला तबका है, जिसे लग रहा है कि पढ़ाई से उसके परिवार का भविष्य बदल सकता है, वह कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों को किसी तरह स्कूल और कालेज भेज रहा है। उसे पता ही नहीं है कि वह अपने बच्चों को जिन सपनों के लिए तैयार कर रहा है, वह कब का रौंदा जा चुका है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ग़ाज़ियाबाद और गुरुग्राम के घरों में काम करने वाली महिलाओं से पूछ लीजिए। हाड़ तोड़ मेहनत कर रही हैं और अपने बेटी की पढ़ाई के लिए फीस भर रही हैं। उनके बच्चे भी ख़ूब मेहनत करते हैं लेकिन सामाजिक पूंजी नहीं होने के कारण उन्हें गाइड नहीं मिल पाता। हर दिन लाखों सपनों की हत्या हो रही है। समाज के इस तबके को अभी शिक्षा से जुड़े मुद्दे की समझ नहीं है, कभी तो उन्हें भी पता चलेगा कि सारा सिस्टम इसी तरह डिज़ाइन किया गया है कि उनके बाद उनकी बेटियाँ भी घरों में काम करती रहेंगी । शिक्षा को बर्बाद किया गया ताकि लाखों लोगों का भविष्य बर्बाद हो सके और वे कम से कम पैसे में काम करने के लिए हमेशा मजबूर रहें। भारत के भविष्य के साथ लंबे समय तक यह धोखा हुआ है। हो सकता है भारत का युवा धर्म की राजनीति में फिर से सनक जाएगा, वह गौरव और पहचान राजनीति में धर्म से पाने लगेगा, यह सब हो सकता है, हो ही रहा है, लेकिन अगले तीस साल में भी वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर के शैक्षणिक संस्थानों को नहीं पा सकता है। यह लड़ाई आज की नहीं है, अगले पचास साल की है।
ravish kumar526,031 görüntüleme • 3 ay önce

सर्वेश को कौन नहीं जानता है। फोटो पत्रकारिता के लंबे दौर में सर्वेश ने कितने ही चुनाव कवर किए होंगे। उनका नाम भी SIR से कट गया है। दिल्ली में ही पैदा हुईँ। दिल्ली में पढ़ी हैं। सर्वेश चुप रहने वालीं पत्रकार नहीं हैं लेकिन उनके जीवन में फॉर्म भरने का एक काम चुनाव आयोग की वजह से आया। उनका सही कहना है कि फार्म 6 क्यों भरें जबकि वे इसी दिल्ली की मतदाता रही हैं।
ravish kumar210,082 görüntüleme • 1 ay önce

ग़ाज़ीपुर से दिल्ली आने के रास्ते में सड़क की मरम्मत चल रही है। उसके कारण लोग जाम लगा है। सरकार के भीतर लोग इतने कम हैं वरना दो लोग पहले से खड़े होते, साइन बोर्ड लगा होता और एक फ़ास्ट लेन बना दिया जाता। लेकिन इस जाम से कोई परेशान नहीं है। सबके जीवन का हिस्सा है और वे इसे नियति का प्रसाद मान कर रेंगते जा रहे हैं।
ravish kumar698,693 görüntüleme • 5 ay önce

अंत तक देखिए। सड़क पर गड्ढा और गड्ढे में पानी भरा। किसी के घर सामान लेकर जा रहा डिलिवरी ब्वॉय इसमें गिरता है। फिर क्या होता है… बाक़ी कितनी बार कहें कि आम लोगों की ज़िंदगी का क्या मोल है । राज्य जानकर क्या करेंगे? यही अखिल भारतीय चरित्र है। वायरल होता आया है । मूल वीडियोग्राफ़र का नाम नहीं मालूम।
ravish kumar1,490,652 görüntüleme • 2 yıl önce

It’s Bisan from Gaza, I am still alive इसकी घोषणा होते ही दिल धड़क गया और आँखें छलक गईं। ग़ज़ा की इस साहसी पत्रकार को देखकर भारत की हत्यारी मीडिया को शर्म आनी चाहिए। भारत के पत्रकार और उनके चैनलों के मालिक अर्जित लोकतंत्र की हत्या करने में लगे हैं, बिसान अपनी जान पर खेल कर हिंसा का क्रूर चेहरा उजागर कर रही है। बिसान का वीडियो संदेश सुनकर ही झुरझुरी हो गई। Peabody में ग़ज़ा से लेकर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की नीतियों के ख़िलाफ़ बनी डॉक्यूमेंट्री थीं जिन्हें सम्मानित किया गया। बिसान को उनकी पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत किया गया। कमाल की शाम थी। बिसान के लिए ताली बजाते वक्त लगा कि जीवन सार्थक हुआ। आप भी बिसान के लिए दुआएँ कीजिये और ताली बजाइये। ग़ज़ा के लिए बोलिए।
ravish kumar1,177,810 görüntüleme • 2 yıl önce

AQI की हालत भी संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव जैसी हो गई है।युद्ध की विभीषिका को लेकर चेतावनी दी जाती है, निंदा होती है मगर बम बरसते रहते हैं। वैसे ही आप लाख फेफड़ों का बुरा हाल बताएँगे, लोग पटाखे फोड़ेंगे ही। सुप्रीम कोर्ट को अब अपना नाम बदल कर ‘टिप्पणी कोर्ट’ रख लेना चाहिए और पटाखे फोड़ने की पूरी छूट दे देनी चाहिए। वक्त की मांग है कि पटाखे छोड़ने के बाद की हवा को ‘पवित्र पवन’ घोषित किया जाए। हर नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह खुले मैदान में जाकर इस ‘पवित्र पवन’ का सेवन करे। भविष्यवाणी- दिल्ली के अगले चुनाव में एयर प्युरिफ़ायर बाँटने की होड़ शुरू हो सकती है या इस पर सब्सिडी दी जा सकती है। नेता हर मोहल्ले में टावर लगाने का वादा कर सकते हैं जिस पर चढ़ कर जनता पटाखे भी फोड़ सकती है। हम विश्व गुरू हैं। इसे कम से कम सौ बार दोहराएँ। बाक़ी सब ठीक हो जाएगा।
ravish kumar1,338,386 görüntüleme • 2 yıl önce

सारी सरकार मालिकों को धमकाने में लगी है क्या? मंत्री जी मालिक के नाम पर एक पत्रकार को धमकी देती हैं, मंत्री जी जिस मोदी सरकार में काम करती हैं, वो ट्विटर के मालिक को धमकी देती हैं कि पत्रकारों के अकाउंट बंद करें। इनका झगड़ा मुग़लों से नहीं है, उन मालिकों से है जिनके पत्रकार से या प्लेटफ़ार्म पर इनकी पोल खुलती है । एक दिन जनता से भी कह देंगे कि आप हमारे मालिक नहीं हैं। हम सारे मुमालिक में आपकी नाक कटवा चुके हैं।
ravish kumar1,498,963 görüntüleme • 3 yıl önce

यह वीडियो आज का है। भारतीय रिज़र्व बैंक, दिल्ली के बाहर लोग घंटों क़तार में खड़े हैं। तीन-तीन घंटे। दिल्ली के बाहर से भी लोग आए हैं। दो हज़ार का नोट बदलवाने। यहाँ से रोज़ पत्रकार गुजरते होंगे फिर भी दो हज़ार के नोट की लाइन मीडिया से ग़ायब है। तब भी ग़ायब कर दी गई और अब भी ग़ायब है।
ravish kumar1,196,840 görüntüleme • 3 yıl önce

रेलवे की हक़ीक़त अब टीवी पर नहीं आती। दस साल में त्योहारों के समय की भीड़ में कोई सुधार नहीं हुआ। दस साल पहले कम से कम इन बातों को कवर किया जाता था, अब इन्हें ग़ायब कर दिया जाता है। सूरत की यह तस्वीर देख कर याद कुछ नहीं आया क्योंकि भूला ही नहीं था। जो भूल चुके हैं वो याद कर सकते हैं। क्या रेल मंत्री इस तरह से बोगी में घुस कर दिखा सकते हैं? यह किसी को न दिखे इसीलिए वंदे भारत दनादन लाँच की जा रही है ताकि ग़रीब और आम लोग भी पास से गुज़रती वंदे भारत को देख कर चकित हो जाएँ। वो तकलीफ़ भूल कर सपना देखने लग जाएँ। मगर राजधानी से लेकर वंदे भारत तक इन लोगों के लिए कुछ नहीं बदला है।
ravish kumar1,122,521 görüntüleme • 3 yıl önce

NEET UG के रिज़ल्ट को लेकर हंगामा मचा है। हम इस विषय के कम जानकार हैं । नंबर कैसे दिए जाते हैं, रैंक कैसे बनती है, अगर कोई समझता है तो आगे आकर छात्रों को सुनना चाहिए। परीक्षा एजेंसी को छात्रों के सवालों का जवाब विस्तार से देना चाहिए। उन्हें संतुष्ट करना चाहिए। पेपर लीक ने वैसे ही इसकी विश्वसनीयता कमजोर कर दी है । छात्र बहुत परेशान हैं ।
ravish kumar630,298 görüntüleme • 2 yıl önce

भारत की शिक्षा, उस शिक्षा में हतोत्साहित करने और कल्पना न करने की हालत और उससे बग़ावत पर यह गाना कितना सुंदर है। जब बात शिक्षा की हो रही है तो जम कर होनी चाहिए। कुछ तो नया निकलेगा। यह बहस बेकार तो नहीं जाएगी। सौम्यदीप ने लिखा है, गाया, संगीत दिया है, बस एडिट AI भाई ने मदद की है।
ravish kumar85,954 görüntüleme • 3 ay önce

मतदान के दिन सपा उम्मीदवार लालजी वर्मा के घर पुलिस छापा मार रही है। यूपी के जानकार कहते हैं कि लालजी वर्मा जी बड़े नेता हैं। अपनी बिरादरी के ही नहीं यूपी के भी। उनके घर छापा पड़ा है। इससे बेहतर होता कि विपक्ष के सभी उम्मीदवारों को जेल में डाल देते। उनके वोटर को भी जेल में डाल देते फिर बीजेपी को चुनाव जीतने से कौन रोक लेता।हर दिन लोकतंत्र की दीवार की खुरचन उतर रही है। लालजी वर्मा जी का बयान देख रहा था। कितने शांत और शालीन तरीक़े से बयान दे रहे थे। आज के दिन छापा मारने के बाद भी उनका संयम देखने लायक़ है। दूसरी तरफ़ आज प्रधानमंत्री का इंटरव्यू चल रहा है। चौथी बार मेगा एक्सक्लूसिव! चौथी बार? वो भी एक्सक्लूसिव? उसी चैनल को? टेम्पो वाले को? पीएम को अब एक चैनल खोल लेना चाहिए। रिकार्डिंग का सामान तो है ही। शीशे के सामने बैठकर घंटों बात करनी चाहिए और उसका सीधा प्रसारण करना चाहिए। क़ानून बने कि जब पीएम का प्रसारण होगा तब सबको देखना होगा। चुनाव आयुक्त से लेकर गन्ना आयुक्त को भी देखना होगा। इससे होगा यह कि इंटरव्यू के नीचे पाँच हज़ार पचास हज़ार व्यूज़ लिखा नहीं आएगा। हर इंटरव्यू का व्यूज़ वन बिलियन जाएगा।
ravish kumar605,415 görüntüleme • 2 yıl önce