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rituraj singh

@riturajsingh11 • 2,109 subscribers

सांप पालता था दातों समेत..और दिल के आंगन बबुल खिलाता था...कोई शिव का भक्त रहा होगा,, जहरीला वक्त रहा होगा.......raj

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♨️लोग..औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं,,रूह भी होती है उस में..ये कहाँ सोचते हैं...रूह क्या होती है..इस से उन्हें मतलब हीं नहीं,,वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं... ...रूह मर जाती है तो जिस्म है चलती हुई लाश,,इस हक़ीक़त को समझते हैं..न पहचानते हैं... ...कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है,, कितनी सदियों से है क़ाएम..ये गुनाहों का रिवाज... मैं न ज़िंदा हूँ..कि मरने का सहारा ढूँडूँ,, और न मुर्दा हूँ कि..जीने के ग़मों से छूटूँ... कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ,, ज़िंदगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक... कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर,, ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक.......
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♨️लोग..औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं,,रूह भी होती है उस में..ये कहाँ सोचते हैं...रूह क्या होती है..इस से उन्हें मतलब हीं नहीं,,वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं... ...रूह मर जाती है तो जिस्म है चलती हुई लाश,,इस हक़ीक़त को समझते हैं..न पहचानते हैं... ...कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है,, कितनी सदियों से है क़ाएम..ये गुनाहों का रिवाज... मैं न ज़िंदा हूँ..कि मरने का सहारा ढूँडूँ,, और न मुर्दा हूँ कि..जीने के ग़मों से छूटूँ... कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ,, ज़िंदगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक... कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर,, ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक.......

rituraj singh

92,567 görüntüleme • 14 gün önce

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