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निर्मोही

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ना सरकार मेरी है, ना रौब मेरा है और ना ही बड़ा सा नाम मेरा है मुझें तो बस एक छोटी सी बात का घमंड है,मैं भारत का और भारत मेरा हैं। 🇮🇳✌🏼

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गुजरात से आई एक खबर ने भरोसे का गिलास ही हिला दिया है...!!😲 रिपोर्ट्स के मुताबिक, साबरकांठा ज़िले में एक ऐसी नकली डेयरी यूनिट का भंडाफोड़ हुआ है जो कथित तौर पर वर्षों से यूरिया, डिटर्जेंट और अन्य रसायनों से दूध तैयार कर बाज़ार में सप्लाई कर रही थी। सोचिए… जिसे हम बच्चों के पोषण का आधार मानते हैं, वही अगर रसायनों का मिश्रण निकले तो ? कहा जा रहा है कि यह खेल करीब पिछले पाँच सालों से चल रहा था। तो सवाल उठना स्वाभाविक है निगरानी तंत्र कहाँ था ? नियमित जांच किस स्तर पर हो रही थी ? क्या खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था केवल कागज़ों में सख्त है ? कार्रवाई होना अच्छी बात है। लेकिन कार्रवाई से पहले की चुप्पी का हिसाब भी उतना ही जरूरी है। दूध सिर्फ एक उत्पाद नहीं है यह भरोसा है,यह घर की रसोई का विश्वास है,यह बच्चों और बुजुर्गों की सेहत से जुड़ा मामला है। अगर उसमें मिलावट होती है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं यह जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। अब जरूरत है: ✔️ सख्त और पारदर्शी जांच की। ✔️ जिम्मेदारी तय करने की। ✔️ और ऐसे रैकेट्स पर स्थायी रोक लगाने की। क्योंकि जनता का भरोसा किसी प्रयोगशाला में नहीं बनता वह व्यवस्था की ईमानदारी से बनता है।

गुजरात से आई एक खबर ने भरोसे का गिलास ही हिला दिया है...!!😲 रिपोर्ट्स के मुताबिक, साबरकांठा ज़िले में एक ऐसी नकली डेयरी यूनिट का भंडाफोड़ हुआ है जो कथित तौर पर वर्षों से यूरिया, डिटर्जेंट और अन्य रसायनों से दूध तैयार कर बाज़ार में सप्लाई कर रही थी। सोचिए… जिसे हम बच्चों के पोषण का आधार मानते हैं, वही अगर रसायनों का मिश्रण निकले तो ? कहा जा रहा है कि यह खेल करीब पिछले पाँच सालों से चल रहा था। तो सवाल उठना स्वाभाविक है निगरानी तंत्र कहाँ था ? नियमित जांच किस स्तर पर हो रही थी ? क्या खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था केवल कागज़ों में सख्त है ? कार्रवाई होना अच्छी बात है। लेकिन कार्रवाई से पहले की चुप्पी का हिसाब भी उतना ही जरूरी है। दूध सिर्फ एक उत्पाद नहीं है यह भरोसा है,यह घर की रसोई का विश्वास है,यह बच्चों और बुजुर्गों की सेहत से जुड़ा मामला है। अगर उसमें मिलावट होती है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं यह जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। अब जरूरत है: ✔️ सख्त और पारदर्शी जांच की। ✔️ जिम्मेदारी तय करने की। ✔️ और ऐसे रैकेट्स पर स्थायी रोक लगाने की। क्योंकि जनता का भरोसा किसी प्रयोगशाला में नहीं बनता वह व्यवस्था की ईमानदारी से बनता है।

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जंगल का क्रूर सच मौत के मुंह से जिंदगी खींचती शेरनी...!!😳 वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर चाडे गेल्डरमैन का यह वीडियो दिल दहला देने वाला है। यह प्रकृति के उस आदिम नियम को दिखाता है जहाँ जीवित रहने की कीमत सिर्फ मौत होती है। अपनी ताकत के गुरूर में डूबी एक शेरनी, जमीन के अंधेरे बिल में छिपे वॉर्थोग पर काल बनकर टूटती है। बंद गुफा नुमा बिल से बाहर खींचे जाने की तड़प और वॉर्थोग की चीखें रोंगटे खड़े कर देती हैं। वह अपने नुकीले दांतों से आखिरी सांस तक मौत को टालने की कोशिश करता है, लेकिन भूखी शेरनी के फौलादी इरादों के आगे घुटने टेकने पड़ते हैं। यह वीडियो शिकार की कला और जंगल के अंतहीन संघर्ष का सबसे वीभत्स और अद्भुत दस्तावेज है।

निर्मोही

356,077 просмотров • 26 дней назад

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असम को 5 साल दीजिए, बाढ़-मुक्त बना देंगे...!!😢 2021 में गृह मंत्री अमित शाह का यह वादा आज 2026 में असम की डूबती हकीकत पर सबसे बड़ा सवाल है। तारीखें बदल गईं, पर असम का दर्द नहीं बदला। आखिर कब तक खोखले वादों की कीमत जनता अपनी जान देकर चुकाएगी?🤔 असम में बाढ़ से हाहाकार मचा है। चराइदेव और शिवसागर समेत कई जिलों में 4.45 लाख से अधिक लोग संकट में हैं और इस सीजन में 68 मौतें हो चुकी हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक बात यह है कि खुद मुख्यमंत्री के अनुसार 20% से 25% प्रभावित इलाके आज भी प्रशासनिक पहुँच से पूरी तरह बाहर हैं। करीब 80,000 लोग सुदूर गाँवों में छतों पर भूखे-प्यासे मदद का इंतज़ार कर रहे हैं। कटे हुए इलाकों में खाना गिराने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रोन्स फेल साबित हुए। आपदा प्रबंधन के बड़े-बड़े दावे ज़मीनी स्तर पर दम तोड़ रहे हैं। सरकार हर साल इसे 'प्राकृतिक और भौगोलिक चुनौती' बताकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन सच यह है कि यह वार्षिक प्रशासनिक विफलता है। फरवरी 2026 की चुनावी रैलियों में इस वादे को अगले 5 साल के लिए फिर आगे बढ़ा दिया गया। असम को अब 'तारीख पर तारीख' वाले चुनावी भाषण नहीं, बल्कि स्थाई समाधान और जवाबदेही चाहिए!

निर्मोही

130,664 просмотров • 1 месяц назад

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