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तृप्त ...🖤

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मुझे अपनी दुनिया.अपनी कायनात को,एक लफ्ज़ में बयाँ करनी हो..तो वो लफ्ज़ हे माँ-पिता ,(जय श्री राधे कृष्णा.)girls plz no dm blocked

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“औरत सेक्स में बहुत अधिक रुचि नहीं रखती। वह गर्माहट, गले लगाने, मित्रता और प्रेम में ज़्यादा रुचि रखती है। पुरुष अधिकतर सेक्स में रुचि रखता है। ये गलतफ़हमियाँ बताती हैं कि भगवान ने दुनिया नहीं बनाई होगी — क्योंकि यहाँ कुछ भी मेल नहीं खाता। ऐसा लगता ही नहीं कि उसे पता था 1/2

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“औरत सेक्स में बहुत अधिक रुचि नहीं रखती। वह गर्माहट, गले लगाने, मित्रता और प्रेम में ज़्यादा रुचि रखती है। पुरुष अधिकतर सेक्स में रुचि रखता है। ये गलतफ़हमियाँ बताती हैं कि भगवान ने दुनिया नहीं बनाई होगी — क्योंकि यहाँ कुछ भी मेल नहीं खाता। ऐसा लगता ही नहीं कि उसे पता था 1/2

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तलाक के बाद भी स्त्री अपना ली गई किसी का छोड़ा पुरुष अधूरा ही रहा l💔🩶 ये रहा तलाक ली हुई का स्त्री का 18 वर्ष का नवयुवक अब यही हों रहा है एक हम 26 साल का सिंगल पड़े थे 27 हों गया कोई मिली हीं नहीं कोई विधवा भी मीलती तो उम्र की अंतिम पराव तक जीवनसाथी चुनते साथ रहते खैर नसीब #तृप्त ✍🏻

तलाक के बाद भी स्त्री अपना ली गई किसी का छोड़ा पुरुष अधूरा ही रहा l💔🩶 ये रहा तलाक ली हुई का स्त्री का 18 वर्ष का नवयुवक अब यही हों रहा है एक हम 26 साल का सिंगल पड़े थे 27 हों गया कोई मिली हीं नहीं कोई विधवा भी मीलती तो उम्र की अंतिम पराव तक जीवनसाथी चुनते साथ रहते खैर नसीब #तृप्त ✍🏻

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वो जो आपके पीरियड्स के डेट तक याद रखे..वो जो पीएमएस के तकलीफों को समझ सके और झेल सके आपकी चीड़ चिड़ाहट और झुंझलाहट..... वो जो पेट की ऐंठन से लेकर पैर के दर्द में दवा की तरह काम करे...Bf इतनी परवाह करने वाला हो... बाकी लड़कियों नखरे उठाने वाले तो बहुत मिल जाते है..!! जो दर्द बांट लें साथी ऐसा हो बस!! #तृप्त.. ✍🏻

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वो जो आपके पीरियड्स के डेट तक याद रखे..वो जो पीएमएस के तकलीफों को समझ सके और झेल सके आपकी चीड़ चिड़ाहट और झुंझलाहट..... वो जो पेट की ऐंठन से लेकर पैर के दर्द में दवा की तरह काम करे...Bf इतनी परवाह करने वाला हो... बाकी लड़कियों नखरे उठाने वाले तो बहुत मिल जाते है..!! जो दर्द बांट लें साथी ऐसा हो बस!! #तृप्त.. ✍🏻

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निःसंतान दम्पति...संतान को तरस रहें....😥 विज्ञापनों मे ऐसे अस्पताल छाए हैंं जो...आंगन में किलकारी गूंजाने का और नया मेहमान लाने का दावा करते हैं....😇 कूड़े के ढेर और पॉलीथिन मे नवजात मिल रहे हैंं...😥 सामाजिक ढांचा ऐसा है कि शादी के साल. दो साल यदि बच्चा पैदा नहीं होता तो पुरुषों की मर्दानिगी पर उंगली उठती है और स्त्री को बांझ तक का ताना सुनना पड़ता है।😥 सलाह के तौर पर नव दम्पति को कहा जाता है कि एक बच्चा कर लो...फिर भले देर मे दूसरा करना...।🌷 फिर बाज़ार मे ऐसी दवाओं की खपत हो कहाँ रही हैंं.... और ऐसी दवाओं के दुस्प्रभाव से गर्भाशय पर असर पड़ेगा और किसी एक की गलती या नासमझी का परिणाम पूरा परिवार झेलेगा...।। ......... ...... ......... ...... ......... ...... ..... ..... ..... अपने बेटे की शादी करने से पहले, लड़की को अच्छी तरह से जान समझ लें, I-pill और unwanted 72 के मरीज को घर में लाकर अपने घर को दवाखाना ना बनाएं 😥 खुद को झूठे मुकदमों से भी बचाएं ☝️ लड़की का गर्भपात कराकर, कन्यादान करने वाले ससुरों के दामाद ही अक्सर झूठे मुकदमे में फैमिली कोर्ट में खड़े मिलते हैं या फिर अवसाद में फंदे पर झूल जाते हैं (कृपया पोस्ट पर आपत्ति जताने से पहले अपने मित्रो/सखियों की भी राय लेकर ही कमेंट करें) #तृप्त ✍🏻

निःसंतान दम्पति...संतान को तरस रहें....😥 विज्ञापनों मे ऐसे अस्पताल छाए हैंं जो...आंगन में किलकारी गूंजाने का और नया मेहमान लाने का दावा करते हैं....😇 कूड़े के ढेर और पॉलीथिन मे नवजात मिल रहे हैंं...😥 सामाजिक ढांचा ऐसा है कि शादी के साल. दो साल यदि बच्चा पैदा नहीं होता तो पुरुषों की मर्दानिगी पर उंगली उठती है और स्त्री को बांझ तक का ताना सुनना पड़ता है।😥 सलाह के तौर पर नव दम्पति को कहा जाता है कि एक बच्चा कर लो...फिर भले देर मे दूसरा करना...।🌷 फिर बाज़ार मे ऐसी दवाओं की खपत हो कहाँ रही हैंं.... और ऐसी दवाओं के दुस्प्रभाव से गर्भाशय पर असर पड़ेगा और किसी एक की गलती या नासमझी का परिणाम पूरा परिवार झेलेगा...।। ......... ...... ......... ...... ......... ...... ..... ..... ..... अपने बेटे की शादी करने से पहले, लड़की को अच्छी तरह से जान समझ लें, I-pill और unwanted 72 के मरीज को घर में लाकर अपने घर को दवाखाना ना बनाएं 😥 खुद को झूठे मुकदमों से भी बचाएं ☝️ लड़की का गर्भपात कराकर, कन्यादान करने वाले ससुरों के दामाद ही अक्सर झूठे मुकदमे में फैमिली कोर्ट में खड़े मिलते हैं या फिर अवसाद में फंदे पर झूल जाते हैं (कृपया पोस्ट पर आपत्ति जताने से पहले अपने मित्रो/सखियों की भी राय लेकर ही कमेंट करें) #तृप्त ✍🏻

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पति को रोमांटिक करने के लिए क्या करें? 1- पति के बाहर से आने पर सज संवर कर तैयार रहें। कोई आकर्षक ड्रेस पहन कर रेडी रहें। जैसे- मैक्सी, बैकलैश, आफ शोल्डर, स्कर्ट कुर्ती, घुटने तक के कपड़े, मैक्सी साइड से स्लिट वाली, या सलवार सूट 2- बालों की स्टाइल बदलते रहें अधिकतर पुरुषों को खुले बाल अच्छे लगते हैं। हाथों और पैरों में मेंहदी लगाये रहें। 3- बेडरूम को सजाकर रखें, परफ्यूम की महक बदन से आती रहनी चाहिए। 4- पति के बाहर से आने पर घर का काम ना करिये पहले ही सारे काम निपटा लिजीए। 5- पहली रात की याद दिलाने के लिए अच्छी सी साड़ी पहन कर रेडी रहिये पति के आते ही कंधे पकड़ कर हग कीजिये। 6- धनिया पुदीना घर में नहीं है ऐसी बातें ना करिये। 7- अपने कालेज की बात बताइये कि मेरी फ्रेंड का फोन आया था , मैं अपने कालेज में सबसे क्यूट लड़की थी इससे उनका ध्यान आपकी तरफ होगा। 8- पति का मूड रोमांटिक करने के लिए उनके सामने कपड़े चेंज कर सकती हैं। 9- लव यू मिस यू के मैसेज घर आने से पहले भेजते रहिये। 10 - सुंदर चेहरा हमेशा पतियों को पराजित करता रहा है इसलिए बाल, आइब्रो, गाल, नेल पेंट, लिपिस्टिक, परफ्यूम, कंगन चूड़ी का खास ध्यान रखें। देखिये आपके पति आपमें खो जायेगा..! #तृप्त ✍🏻

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पति को रोमांटिक करने के लिए क्या करें? 1- पति के बाहर से आने पर सज संवर कर तैयार रहें। कोई आकर्षक ड्रेस पहन कर रेडी रहें। जैसे- मैक्सी, बैकलैश, आफ शोल्डर, स्कर्ट कुर्ती, घुटने तक के कपड़े, मैक्सी साइड से स्लिट वाली, या सलवार सूट 2- बालों की स्टाइल बदलते रहें अधिकतर पुरुषों को खुले बाल अच्छे लगते हैं। हाथों और पैरों में मेंहदी लगाये रहें। 3- बेडरूम को सजाकर रखें, परफ्यूम की महक बदन से आती रहनी चाहिए। 4- पति के बाहर से आने पर घर का काम ना करिये पहले ही सारे काम निपटा लिजीए। 5- पहली रात की याद दिलाने के लिए अच्छी सी साड़ी पहन कर रेडी रहिये पति के आते ही कंधे पकड़ कर हग कीजिये। 6- धनिया पुदीना घर में नहीं है ऐसी बातें ना करिये। 7- अपने कालेज की बात बताइये कि मेरी फ्रेंड का फोन आया था , मैं अपने कालेज में सबसे क्यूट लड़की थी इससे उनका ध्यान आपकी तरफ होगा। 8- पति का मूड रोमांटिक करने के लिए उनके सामने कपड़े चेंज कर सकती हैं। 9- लव यू मिस यू के मैसेज घर आने से पहले भेजते रहिये। 10 - सुंदर चेहरा हमेशा पतियों को पराजित करता रहा है इसलिए बाल, आइब्रो, गाल, नेल पेंट, लिपिस्टिक, परफ्यूम, कंगन चूड़ी का खास ध्यान रखें। देखिये आपके पति आपमें खो जायेगा..! #तृप्त ✍🏻

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■ विज्ञान कहता हैं कि एक नवयुवक स्वस्थ पुरुष यदि सम्भोग करता हैं तो, उस समय जितने परिमाण में वीर्य निर्गत होता है उसमें चालीस से नब्बे करोड़ शुक्राणु होतें हैं। यदि इन्हें स्थान मिलता, तो लगभग इतने ही संख्या में बच्चे जन्म ले लेते ! वीर्य निकलते ही ये अस्सी निब्बे करोड़ शुक्राणु पागलों की तरह गर्भाशय की ओर दौड़ पड़ते है...भागते भागते लगभग तीन सौ से पाँच सौ शुक्राणु पहुँच पाता हैं उस स्थान तक। बाकी सभी भागने के कारण थक जाते है बीमार पड़ जाते है और मर जातें हैं। और यह जो जितने डिम्बाणु तक पहुंच पाया, उनमे सें केवल मात्र एक महाशक्तिशाली पराक्रमी वीर शुक्राणु ही डिम्बाणु को फर्टिलाइज करता है यानी कि अपना आसन ग्रहण करता हैं। और यही परम वीर शक्तिशाली शुक्राणु ही आप हो, मैं हूँ , हम सब हैं !! कभी सोचा है इस महान घमासान के विषय में ? इस महान युद्ध के विषय में ? आप उस समय भाग रहे थे...तब जब आपकी आँखें नहीं थी, हाथ पैर सर दिमाग कुछ भी नही था...फिर भी आप विजय हुए थे !! आप तब दौड़े थे जब आप के पास कोई सर्टिफिकेट नही था। किसी नामी दामी कॉलेज का नाम नही था।आप का कोई पहचान ही नही था। फिर भी आप जीत गए थे !!! आप तब दौड़े थे जब आप न हिन्दू थे न मुसलमान न भक्त न भगवान फिर भी आप जीत गए !! बिना किसी से मदद लिए बिना किसी के सहारे खुद अपने बलबूते पर विजय को प्राप्त हुए थे ! उस समय आप भागे थे दौड़े थे जब आप का एक निर्दिष्ट गन्तव्य स्थल था...उसी की ओर लक्ष्य था...आप का संकल्प बस उस तक पहुंचना था...थके बिना एकाग्र चित्त से आप भागे दौड़े और उद्देश्य पूरा किये, गन्तव्य तक पहुंच गए ! अस्सी निब्बे करोड़ शुक्राणुओं को आप ने हरा दिए थे ! हैं न ? और आज देखो ? थोड़ा बहुत भी तकलीफ या परेशानी आई, और आप घबरा जाते हैं...निराश हो जातें है...हाल छोड़ बैठ जातें हैं... क्यो आप अपना उस आत्मविश्वास को गँवा बैठते हैं ?? अभी तो सब हैं आप के पास हाथ पैर से मष्तिष्क दिमाग से लेकर परिवार भाई बहन सब हैं ! मेहनत करने के लिए हाथ पैर हैं प्लानिंग के लिए दिमाग हैं बुद्धि हैं शिक्षा हैं...सहायता के लिए लोग हैं ! फिर भी आप निराश हो जीवन को नरक बना बैठे हैं !! जब आप जीवन की प्रथम दिन प्रथम युद्ध नही हारे तो आज भी हार मत मानिये ! आप पहले भी जीतें थे...आज भी और कल भी जीतेंगे... ऐसा मुझे विश्वास हैं आप पर

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■ विज्ञान कहता हैं कि एक नवयुवक स्वस्थ पुरुष यदि सम्भोग करता हैं तो, उस समय जितने परिमाण में वीर्य निर्गत होता है उसमें चालीस से नब्बे करोड़ शुक्राणु होतें हैं। यदि इन्हें स्थान मिलता, तो लगभग इतने ही संख्या में बच्चे जन्म ले लेते ! वीर्य निकलते ही ये अस्सी निब्बे करोड़ शुक्राणु पागलों की तरह गर्भाशय की ओर दौड़ पड़ते है...भागते भागते लगभग तीन सौ से पाँच सौ शुक्राणु पहुँच पाता हैं उस स्थान तक। बाकी सभी भागने के कारण थक जाते है बीमार पड़ जाते है और मर जातें हैं। और यह जो जितने डिम्बाणु तक पहुंच पाया, उनमे सें केवल मात्र एक महाशक्तिशाली पराक्रमी वीर शुक्राणु ही डिम्बाणु को फर्टिलाइज करता है यानी कि अपना आसन ग्रहण करता हैं। और यही परम वीर शक्तिशाली शुक्राणु ही आप हो, मैं हूँ , हम सब हैं !! कभी सोचा है इस महान घमासान के विषय में ? इस महान युद्ध के विषय में ? आप उस समय भाग रहे थे...तब जब आपकी आँखें नहीं थी, हाथ पैर सर दिमाग कुछ भी नही था...फिर भी आप विजय हुए थे !! आप तब दौड़े थे जब आप के पास कोई सर्टिफिकेट नही था। किसी नामी दामी कॉलेज का नाम नही था।आप का कोई पहचान ही नही था। फिर भी आप जीत गए थे !!! आप तब दौड़े थे जब आप न हिन्दू थे न मुसलमान न भक्त न भगवान फिर भी आप जीत गए !! बिना किसी से मदद लिए बिना किसी के सहारे खुद अपने बलबूते पर विजय को प्राप्त हुए थे ! उस समय आप भागे थे दौड़े थे जब आप का एक निर्दिष्ट गन्तव्य स्थल था...उसी की ओर लक्ष्य था...आप का संकल्प बस उस तक पहुंचना था...थके बिना एकाग्र चित्त से आप भागे दौड़े और उद्देश्य पूरा किये, गन्तव्य तक पहुंच गए ! अस्सी निब्बे करोड़ शुक्राणुओं को आप ने हरा दिए थे ! हैं न ? और आज देखो ? थोड़ा बहुत भी तकलीफ या परेशानी आई, और आप घबरा जाते हैं...निराश हो जातें है...हाल छोड़ बैठ जातें हैं... क्यो आप अपना उस आत्मविश्वास को गँवा बैठते हैं ?? अभी तो सब हैं आप के पास हाथ पैर से मष्तिष्क दिमाग से लेकर परिवार भाई बहन सब हैं ! मेहनत करने के लिए हाथ पैर हैं प्लानिंग के लिए दिमाग हैं बुद्धि हैं शिक्षा हैं...सहायता के लिए लोग हैं ! फिर भी आप निराश हो जीवन को नरक बना बैठे हैं !! जब आप जीवन की प्रथम दिन प्रथम युद्ध नही हारे तो आज भी हार मत मानिये ! आप पहले भी जीतें थे...आज भी और कल भी जीतेंगे... ऐसा मुझे विश्वास हैं आप पर

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अगर तुमने बंदरों को संभोग करते देखा हो तो देखा होगा कि संभोग के बाद वे तुरंत एक—दूसरे से अलग हो जाते हैं। उनके चेहरों को देखो, उनमें प्रसन्नता जरा भी नहीं है, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा धक्के देती है, जब वह अतिशय होती है तो वे उसे बस फेंक देते हैं। साधारण काम—कृत्य ऐसा ही है। लेकिन नीतिवादी ठीक उलटी बात कहते आ रहे हैं। वे कहते हैं : भोग मत करो, सुख मत लो। वे कहते हैं. यह तो पशुओं जैसा कृत्य है। लेकिन यह बात गलत है। पशु कभी सुख नहीं लेते हैं, केवल मनुष्य सुख ले सकता है। और तुम जितना गहरा सुख लोगे उतनी ही श्रेष्ठु मनुष्यता का उदय होगा। और अगर तुम्हारा संभोग ध्यानपूर्ण हो जाए, समाधि पूर्ण हो जाए तो परम उपलब्ध हो जाए। लेकिन तंत्र की बात स्मरण रखो. यह घाटी— अनुभव है। यह शिखर—अनुभव नहीं है, घाटी— अनुभव है। पश्चिम में अब्राहम मैसलो ने शिखर—अनुभव की बहुत बात की है। तुम उत्तेजना के शिखर पर पहुंचकर नीचे गिरते हो। यही कारण है कि प्रत्येक संभोग के बाद तुम दीन—हीन अनुभव करते हो। और यह स्वाभाविक है, तुम शिखर से नीचे गिरते हो। लेकिन तांत्रिक संभोग के बाद तुम्हें यह गिरावट कभी अनुभव नहीं होगी। उसमें तुम और नीचे नहीं गिर सकते, क्योंकि तुम घाटी में ही हो। वरन तुम ऊपर उठते हुए अनुभव करोगे। तांत्रिक संभोग से लौटने पर तुम गिरते नहीं, ऊपर उठते हो। तुम ऊर्जा से आपूरित होकर ज्यादा शक्तिवान, ज्यादा जीवंत और तेजोमय हो जाते हो। और वह आनंद घंटों बना रह सकता है, दिनों बना रह सकता है। यह इस पर निर्भर है कि तुम कितनी गहराई से उसमें उतरे थे। तांत्रिक संभोग में उतरने पर देर— अबेर तुम्हें पता चलेगा कि स्खलन ऊर्जा का अपव्यय है, उसकी कोई जरूरत नहीं है। अगर बच्चा नहीं पैदा करना है तो स्खलन बिलकुल जरूरी नहीं है। और इस तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम पूरे दिन विश्राम अनुभव करोगे। एक तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम कई दिनों तक विश्रांत, शात, अहिंसक, अक्रोधी और सुखी रह सकते हो। और इस तरह का व्यक्ति कभी दूसरों के लिए उपद्रव नहीं खडा करेगा, मुसीबत नहीं पैदा करेगा। हो सकेगा तो वह दूसरों को सुखी बनाने में सहयोग देगा, अन्यथा वह दूसरों को दुख तो कभी नहीं देगा। केवल तंत्र नए मनुष्य का निर्माण कर सकता है। और यह नया मनुष्य—समयातीत और निरहंकार को, अस्तित्व के साथ गहन अद्वैत को जानने वाला मनुष्य—अवश्य विकासमान होगा। एक नया आयाम खुल गया है। वह बहुत दूर नहीं है, वह दिन बहुत दूर नहीं है, जब काम या सेक्स विलीन हो जाएगा। जब काम अनजाने विदा हो जाता है, जब एक दिन अचानक तुम्हें पता चलता है कि काम बिलकुल विदा हो गया, उसकी कोई वासना न रही, तो ब्रह्मचर्य का जन्म होता है। लेकिन यह कठिन है। यह कठिन मालूम पड़ता है, क्योंकि तुम्हें बहुत गलत शिक्षा दी गई है। और तुम इससे भयभीत हो, क्योंकि तुम्हारा मन संस्कारित है। हम दो चीजों से बहुत डरते हैं, हम कामवासना और मृत्यु से बहुत डरते हैं। और वे दोनों ही बुनियादी हैं। धर्म का सच्चा साधक दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम को जानने के लिए काम का अनुभव लेगा। क्योंकि काम को जानना जीवन को जानना है। और वह मृत्यु को भी जानना चाहेगा। क्योंकि जब तक तुम मृत्यु को नहीं जानते हो तब तक तुम शाश्वत जीवन को भी नहीं जान सकते। अगर तुम काम में उसके मर्म तक प्रवेश कर सको तो तुम जीवन को जान लोगे। और वैसे ही अगर तुम स्वेच्छा से मृत्यु में उसके केंद्र तक प्रवेश कर जाओ तो तुम अमृत को उपलब्ध हो जाओगे। तब तुम अमर हो, क्योंकि मृत्यु तो केवल परिधि पर घटित होती है। काम और मृत्यु, दोनों एक सच्चे साधक के लिए बुनियादी हैं। लेकिन सामान्य मनुष्यता के लिए दोनों घबड़ाने वाले है। कोई उनकी चर्चा नहीं करता है। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों गहन रूप से एक—दूसरे से संबंधित हैं। वे इतने जुड़े हुए हैं कि तुम कामवासना में प्रवेश करो और तुरंत तुम एक प्रकार की मृत्यु में प्रवेश करने लगते हो। क्योंकि काम—अनुभव में तुम मरते हो, तुम्हारा अहंकार विलीन होता है। काम— अनुभव में समय विलीन हो जाता है, तुम्हारा व्यक्तित्व विदा हो जाता है। तब तुम ही मरने लगते हो। संभोग सूक्ष्म मृत्यु है। और अगर तुम्हें बोध हो जाए कि काम सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु तुम्हारे लिए बड़ी काम—समाधि का अनुभव बन जाएगी। कोई सुकरात मृत्यु में निर्भय प्रवेश करता है। बल्कि वह मृत्यु को जानने के लिए उत्साह से भरा है, उल्लास और उत्तेजना से भरा है। उसके हृदय में मृत्यु के लिए गहन स्वागत का भाव है। क्यों? क्योंकि अगर तुम संभोग की छोटी मृत्यु को जानते हो, अगर तुमने उससे प्राप्त होने वाला आनंद जाना है, तो तुम बड़ी मृत्यु को भी जानना चाहोगे। तुम उसके पीछे छिपे आनंद को भी भोगना चाहोगे। #तृप्त

अगर तुमने बंदरों को संभोग करते देखा हो तो देखा होगा कि संभोग के बाद वे तुरंत एक—दूसरे से अलग हो जाते हैं। उनके चेहरों को देखो, उनमें प्रसन्नता जरा भी नहीं है, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा धक्के देती है, जब वह अतिशय होती है तो वे उसे बस फेंक देते हैं। साधारण काम—कृत्य ऐसा ही है। लेकिन नीतिवादी ठीक उलटी बात कहते आ रहे हैं। वे कहते हैं : भोग मत करो, सुख मत लो। वे कहते हैं. यह तो पशुओं जैसा कृत्य है। लेकिन यह बात गलत है। पशु कभी सुख नहीं लेते हैं, केवल मनुष्य सुख ले सकता है। और तुम जितना गहरा सुख लोगे उतनी ही श्रेष्ठु मनुष्यता का उदय होगा। और अगर तुम्हारा संभोग ध्यानपूर्ण हो जाए, समाधि पूर्ण हो जाए तो परम उपलब्ध हो जाए। लेकिन तंत्र की बात स्मरण रखो. यह घाटी— अनुभव है। यह शिखर—अनुभव नहीं है, घाटी— अनुभव है। पश्चिम में अब्राहम मैसलो ने शिखर—अनुभव की बहुत बात की है। तुम उत्तेजना के शिखर पर पहुंचकर नीचे गिरते हो। यही कारण है कि प्रत्येक संभोग के बाद तुम दीन—हीन अनुभव करते हो। और यह स्वाभाविक है, तुम शिखर से नीचे गिरते हो। लेकिन तांत्रिक संभोग के बाद तुम्हें यह गिरावट कभी अनुभव नहीं होगी। उसमें तुम और नीचे नहीं गिर सकते, क्योंकि तुम घाटी में ही हो। वरन तुम ऊपर उठते हुए अनुभव करोगे। तांत्रिक संभोग से लौटने पर तुम गिरते नहीं, ऊपर उठते हो। तुम ऊर्जा से आपूरित होकर ज्यादा शक्तिवान, ज्यादा जीवंत और तेजोमय हो जाते हो। और वह आनंद घंटों बना रह सकता है, दिनों बना रह सकता है। यह इस पर निर्भर है कि तुम कितनी गहराई से उसमें उतरे थे। तांत्रिक संभोग में उतरने पर देर— अबेर तुम्हें पता चलेगा कि स्खलन ऊर्जा का अपव्यय है, उसकी कोई जरूरत नहीं है। अगर बच्चा नहीं पैदा करना है तो स्खलन बिलकुल जरूरी नहीं है। और इस तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम पूरे दिन विश्राम अनुभव करोगे। एक तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम कई दिनों तक विश्रांत, शात, अहिंसक, अक्रोधी और सुखी रह सकते हो। और इस तरह का व्यक्ति कभी दूसरों के लिए उपद्रव नहीं खडा करेगा, मुसीबत नहीं पैदा करेगा। हो सकेगा तो वह दूसरों को सुखी बनाने में सहयोग देगा, अन्यथा वह दूसरों को दुख तो कभी नहीं देगा। केवल तंत्र नए मनुष्य का निर्माण कर सकता है। और यह नया मनुष्य—समयातीत और निरहंकार को, अस्तित्व के साथ गहन अद्वैत को जानने वाला मनुष्य—अवश्य विकासमान होगा। एक नया आयाम खुल गया है। वह बहुत दूर नहीं है, वह दिन बहुत दूर नहीं है, जब काम या सेक्स विलीन हो जाएगा। जब काम अनजाने विदा हो जाता है, जब एक दिन अचानक तुम्हें पता चलता है कि काम बिलकुल विदा हो गया, उसकी कोई वासना न रही, तो ब्रह्मचर्य का जन्म होता है। लेकिन यह कठिन है। यह कठिन मालूम पड़ता है, क्योंकि तुम्हें बहुत गलत शिक्षा दी गई है। और तुम इससे भयभीत हो, क्योंकि तुम्हारा मन संस्कारित है। हम दो चीजों से बहुत डरते हैं, हम कामवासना और मृत्यु से बहुत डरते हैं। और वे दोनों ही बुनियादी हैं। धर्म का सच्चा साधक दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम को जानने के लिए काम का अनुभव लेगा। क्योंकि काम को जानना जीवन को जानना है। और वह मृत्यु को भी जानना चाहेगा। क्योंकि जब तक तुम मृत्यु को नहीं जानते हो तब तक तुम शाश्वत जीवन को भी नहीं जान सकते। अगर तुम काम में उसके मर्म तक प्रवेश कर सको तो तुम जीवन को जान लोगे। और वैसे ही अगर तुम स्वेच्छा से मृत्यु में उसके केंद्र तक प्रवेश कर जाओ तो तुम अमृत को उपलब्ध हो जाओगे। तब तुम अमर हो, क्योंकि मृत्यु तो केवल परिधि पर घटित होती है। काम और मृत्यु, दोनों एक सच्चे साधक के लिए बुनियादी हैं। लेकिन सामान्य मनुष्यता के लिए दोनों घबड़ाने वाले है। कोई उनकी चर्चा नहीं करता है। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों गहन रूप से एक—दूसरे से संबंधित हैं। वे इतने जुड़े हुए हैं कि तुम कामवासना में प्रवेश करो और तुरंत तुम एक प्रकार की मृत्यु में प्रवेश करने लगते हो। क्योंकि काम—अनुभव में तुम मरते हो, तुम्हारा अहंकार विलीन होता है। काम— अनुभव में समय विलीन हो जाता है, तुम्हारा व्यक्तित्व विदा हो जाता है। तब तुम ही मरने लगते हो। संभोग सूक्ष्म मृत्यु है। और अगर तुम्हें बोध हो जाए कि काम सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु तुम्हारे लिए बड़ी काम—समाधि का अनुभव बन जाएगी। कोई सुकरात मृत्यु में निर्भय प्रवेश करता है। बल्कि वह मृत्यु को जानने के लिए उत्साह से भरा है, उल्लास और उत्तेजना से भरा है। उसके हृदय में मृत्यु के लिए गहन स्वागत का भाव है। क्यों? क्योंकि अगर तुम संभोग की छोटी मृत्यु को जानते हो, अगर तुमने उससे प्राप्त होने वाला आनंद जाना है, तो तुम बड़ी मृत्यु को भी जानना चाहोगे। तुम उसके पीछे छिपे आनंद को भी भोगना चाहोगे। #तृप्त

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पुरुष संभोग के लिए प्रेम का सहारा लेता है स्त्री प्रेम के लिए संभोग का सहारा लेती है

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पुरुष संभोग के लिए प्रेम का सहारा लेता है स्त्री प्रेम के लिए संभोग का सहारा लेती है

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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

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अब इसे भाभी बोलोगे या आंटी 🤣🤣पर है बहुत सुंदर इंसान इंसानियत तो कूट कूट भरा है..

अब इसे भाभी बोलोगे या आंटी 🤣🤣पर है बहुत सुंदर इंसान इंसानियत तो कूट कूट भरा है..

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बिस्तर पर औरत को मर्द की बायी और लेटना चाहिए,, हम सभी काम अपने दाएं हाथ से करते हैं,,, मर्द का दाहिना हाथ खुला रहना चाहिए,,,,, सोते समय औरत की आदत होती है वह मर्द का कंधा बाजू या छाती पर सर रख कर सोती है। बाएं बाजू या कंधे पर और अपने सर रखा हो तो आदमी का दायां हाथ फ्री होता है जिससे मर्द को औरत को सहलाने उसके बालों में उंगलियां चलाने मैं कोई मुश्किल नहीं आती है। औरत भी यही चाहती है कि मर्द उसे सहलाए उसकी सारी थकान उतार दे,, मर्द औरत की और बायी करवट लेता है। तब मर्द की दाई नास ऊपर की तरफ होती है। इससे श्वास आने जाने में दाया स्वर चलता है इसे सूर्य स्वर कहते है। इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है। जो मर्द के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। औरत जैसे ही पति की तरफ मुख करती है। उसका बाया स्वर चलता है। बाया स्वर चंद्र स्वर है।इससे औरत अंदर शीतलता बढ़ती है। जो औरत के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। स्वस्थ जीवन ही जिंदगी का आधार है,,, इसलिए औरत को मर्द की बायी और सोना चाहिए।🙏🙏💐💐🌈 सनातन धर्म में महिला को पुरुष की बाम अंगी बताया गया है। बाम अंगी होने का मतलब होता है कि महिला पुरुष की बाएं भाग का हिस्सा होती है। और यही कारण है कि धार्मिक चित्रों में शिव के बाएं पार्वती खड़ी रहती हैं,राम के बाएं सीधा खड़ी रहती हैं, विष्णु के बाएं लक्ष्मी खड़ी रहती हैं। आता है या पूर्व में ही निर्धारित है कि महिला को पुरुष के लेफ्ट में स्थापित होना चाहीये। सोने के नियम के अनुसार भी हमारा जो बायां हिस्सा है शरीर का वह हमेशा नीचे होना चाहिए दाहिना हिस्सा शरीर का ऊपर की तरफ होना चाहिए यानी कि हमको बाएं करवट ले करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक कारण भी है जो हृदय होता है वह हमारे बाएं भाग में स्थित होता है बाएं भाग में स्थित होने के कारण रक्त का संचरण जब हम बाएं हो करके सोते हैं तो पूरे शरीर में बराबर होता है। इसी प्रकार जब हम बाएं करवट तो करके सोते हैं तो महिला को भी अपने साथ जब सुला है तो बाएं साइड में ही सुनाएं यह महिला पुरुष के लिए सबसे अच्छा पोजीशन है चाहे उनमें प्रेमालाप करने का हो चाहे साथ में सोने का । यह वैज्ञानिक रूप से भी अच्छा होगा और उनके आपसी रिश्ते को मजबूत करने के भी लिए भी अच्छा होगा आपस में प्रेम संबंध स्थापित करने में भी आसानी होगी।

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बिस्तर पर औरत को मर्द की बायी और लेटना चाहिए,, हम सभी काम अपने दाएं हाथ से करते हैं,,, मर्द का दाहिना हाथ खुला रहना चाहिए,,,,, सोते समय औरत की आदत होती है वह मर्द का कंधा बाजू या छाती पर सर रख कर सोती है। बाएं बाजू या कंधे पर और अपने सर रखा हो तो आदमी का दायां हाथ फ्री होता है जिससे मर्द को औरत को सहलाने उसके बालों में उंगलियां चलाने मैं कोई मुश्किल नहीं आती है। औरत भी यही चाहती है कि मर्द उसे सहलाए उसकी सारी थकान उतार दे,, मर्द औरत की और बायी करवट लेता है। तब मर्द की दाई नास ऊपर की तरफ होती है। इससे श्वास आने जाने में दाया स्वर चलता है इसे सूर्य स्वर कहते है। इससे शरीर में गर्मी बढ़ती है। जो मर्द के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। औरत जैसे ही पति की तरफ मुख करती है। उसका बाया स्वर चलता है। बाया स्वर चंद्र स्वर है।इससे औरत अंदर शीतलता बढ़ती है। जो औरत के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। स्वस्थ जीवन ही जिंदगी का आधार है,,, इसलिए औरत को मर्द की बायी और सोना चाहिए।🙏🙏💐💐🌈 सनातन धर्म में महिला को पुरुष की बाम अंगी बताया गया है। बाम अंगी होने का मतलब होता है कि महिला पुरुष की बाएं भाग का हिस्सा होती है। और यही कारण है कि धार्मिक चित्रों में शिव के बाएं पार्वती खड़ी रहती हैं,राम के बाएं सीधा खड़ी रहती हैं, विष्णु के बाएं लक्ष्मी खड़ी रहती हैं। आता है या पूर्व में ही निर्धारित है कि महिला को पुरुष के लेफ्ट में स्थापित होना चाहीये। सोने के नियम के अनुसार भी हमारा जो बायां हिस्सा है शरीर का वह हमेशा नीचे होना चाहिए दाहिना हिस्सा शरीर का ऊपर की तरफ होना चाहिए यानी कि हमको बाएं करवट ले करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक कारण भी है जो हृदय होता है वह हमारे बाएं भाग में स्थित होता है बाएं भाग में स्थित होने के कारण रक्त का संचरण जब हम बाएं हो करके सोते हैं तो पूरे शरीर में बराबर होता है। इसी प्रकार जब हम बाएं करवट तो करके सोते हैं तो महिला को भी अपने साथ जब सुला है तो बाएं साइड में ही सुनाएं यह महिला पुरुष के लिए सबसे अच्छा पोजीशन है चाहे उनमें प्रेमालाप करने का हो चाहे साथ में सोने का । यह वैज्ञानिक रूप से भी अच्छा होगा और उनके आपसी रिश्ते को मजबूत करने के भी लिए भी अच्छा होगा आपस में प्रेम संबंध स्थापित करने में भी आसानी होगी।

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"अगर कोई पुरुष सिर्फ रात की ज़रूरत पूरी करने के लिए तुम्हारे पास आता है— जब तुम बीमार होती हो, कमजोर होती हो, तब भी वह तुम्हारे शरीर पर टूट पड़ता है जैसे कोई दरिंदा— तो समझ लो, उसके लिए तुम सिर्फ एक व्यापार हो, या फिर एक वेश्या। तुम उसकी पत्नी कभी नहीं थीं। १/२

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"अगर कोई पुरुष सिर्फ रात की ज़रूरत पूरी करने के लिए तुम्हारे पास आता है— जब तुम बीमार होती हो, कमजोर होती हो, तब भी वह तुम्हारे शरीर पर टूट पड़ता है जैसे कोई दरिंदा— तो समझ लो, उसके लिए तुम सिर्फ एक व्यापार हो, या फिर एक वेश्या। तुम उसकी पत्नी कभी नहीं थीं। १/२

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प्रेम और संभोग एक दूसरे के पूरक है। दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनो जरूरी है। जिंदगी में ऐसा कोई जोड़ा नही है जो जंदगी भर प्रेम करे संभोग न करे। न ही ऐसा कोई है जो जिंदगी भर संभोग करे प्रेम न करे। केवल एक से ही जिंदगी भर नही जिया जा सकता है। १/२

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प्रेम और संभोग एक दूसरे के पूरक है। दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनो जरूरी है। जिंदगी में ऐसा कोई जोड़ा नही है जो जंदगी भर प्रेम करे संभोग न करे। न ही ऐसा कोई है जो जिंदगी भर संभोग करे प्रेम न करे। केवल एक से ही जिंदगी भर नही जिया जा सकता है। १/२

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स्त्रियों का प्रेम परिस्थितियों पर निर्भर करता है , जबकि पुरुष का प्रेम केवल स्त्री पर...❤️

स्त्रियों का प्रेम परिस्थितियों पर निर्भर करता है , जबकि पुरुष का प्रेम केवल स्त्री पर...❤️

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😍 यह भविष्यवाणी करता हूँ, पचास साल में घूंघट वापस लौट आएगा। क्योंकि स्त्री-पुरुष इतनी अनाकर्षक हालत में जी न सकेंगे। वे आकर्षण फिर पैदा करना चाहेंगे। आने वाले पचास वर्षों में स्त्रियों के वस्त्र फिर बड़े होंगे, फिर उनका शरीर ढकेगा। बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि जब वह बच्चा था, तो विक्टोरियन युग समाप्त हो रहा था। और स्त्रियों के पैर का अंगूठा भी देखना मुश्किल था। घाघरा ऐसा होता था, जो जमीन छूता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि अगर किसी स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिख जाता था, तो चित्त में बिजली कौंध जाती थी। और उसने लिखा है कि अब कल्पना करने को भी कुछ नहीं बचा है। स्त्री पूरी दिखाई पड़ जाती है और चित्त में कोई बिजली नहीं कौंधती। नग्न स्त्री उतनी आकर्षक नहीं है, नग्न पुरुष उतना आकर्षक नहीं है। और स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा होशियार हैं, इसलिए कोई स्त्री नग्न पुरुष में कभी उत्सुकता नहीं लेती। गहरे से गहरे प्रेम के क्षण में स्त्रियां आंख बंद कर लेती हैं कि पुरुष दिखाई ही न पड़े। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैं, शायद इंसटिंक्टिवली वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं और राजों से परिचित हैं। कृष्ण कहते हैं, क्रोध से मोह पैदा होता है। क्योंकि क्रोध से बाधा पैदा होती है। जहां भी बाधा है, वहां आकर्षण खड़ा हो जाता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि जिन लोगों ने बाधाएं खड़ी की हैं, वे ही आकर्षण के लिए जिम्मेदार हैं। ईसाइयत ने पाप को इतना आकर्षक बना दिया, क्योंकि पाप के लिए इतनी बाधाएं खड़ी कीं। धर्मों ने सेक्स को बहुत आकर्षक बना दिया, क्योंकि उसके लिए बहुत बाधाएं खड़ी कीं। आमतौर से लोग समझते हैं कि फिल्में हैं, नग्न-चित्र हैं, नग्न-अश्लील तस्वीरें हैं--ये लोगों को कामुक बना रही हैं। कृष्ण यह नहीं कह सकते कि कामुक बना रही हैं। कृष्ण कहेंगे कि यह लोगों का तो सारा मोह खराब कर देंगी। क्योंकि लोगों के लिए अनाकर्षक हो जाएगी, जो चीज परिचित हो जाती है। जिसमें बाधा नहीं है, वह अनाकर्षक हो जाती है...🌹

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😍 यह भविष्यवाणी करता हूँ, पचास साल में घूंघट वापस लौट आएगा। क्योंकि स्त्री-पुरुष इतनी अनाकर्षक हालत में जी न सकेंगे। वे आकर्षण फिर पैदा करना चाहेंगे। आने वाले पचास वर्षों में स्त्रियों के वस्त्र फिर बड़े होंगे, फिर उनका शरीर ढकेगा। बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि जब वह बच्चा था, तो विक्टोरियन युग समाप्त हो रहा था। और स्त्रियों के पैर का अंगूठा भी देखना मुश्किल था। घाघरा ऐसा होता था, जो जमीन छूता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि अगर किसी स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिख जाता था, तो चित्त में बिजली कौंध जाती थी। और उसने लिखा है कि अब कल्पना करने को भी कुछ नहीं बचा है। स्त्री पूरी दिखाई पड़ जाती है और चित्त में कोई बिजली नहीं कौंधती। नग्न स्त्री उतनी आकर्षक नहीं है, नग्न पुरुष उतना आकर्षक नहीं है। और स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा होशियार हैं, इसलिए कोई स्त्री नग्न पुरुष में कभी उत्सुकता नहीं लेती। गहरे से गहरे प्रेम के क्षण में स्त्रियां आंख बंद कर लेती हैं कि पुरुष दिखाई ही न पड़े। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैं, शायद इंसटिंक्टिवली वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं और राजों से परिचित हैं। कृष्ण कहते हैं, क्रोध से मोह पैदा होता है। क्योंकि क्रोध से बाधा पैदा होती है। जहां भी बाधा है, वहां आकर्षण खड़ा हो जाता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि जिन लोगों ने बाधाएं खड़ी की हैं, वे ही आकर्षण के लिए जिम्मेदार हैं। ईसाइयत ने पाप को इतना आकर्षक बना दिया, क्योंकि पाप के लिए इतनी बाधाएं खड़ी कीं। धर्मों ने सेक्स को बहुत आकर्षक बना दिया, क्योंकि उसके लिए बहुत बाधाएं खड़ी कीं। आमतौर से लोग समझते हैं कि फिल्में हैं, नग्न-चित्र हैं, नग्न-अश्लील तस्वीरें हैं--ये लोगों को कामुक बना रही हैं। कृष्ण यह नहीं कह सकते कि कामुक बना रही हैं। कृष्ण कहेंगे कि यह लोगों का तो सारा मोह खराब कर देंगी। क्योंकि लोगों के लिए अनाकर्षक हो जाएगी, जो चीज परिचित हो जाती है। जिसमें बाधा नहीं है, वह अनाकर्षक हो जाती है...🌹

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आपके पति द्वारा आपको महत्व न देने के संकेत: ✅ वह आपके साथ असम्मानजनक तरीके से बात करता है। यह आपके पति द्वारा आपको महत्व न देने का एक बड़ा संकेत है। अगर वह नाम call करता है, चिल्लाता है, या आपको असम्मानजनक तरीके से पेश आता है, तो वह आपको महत्व नहीं देता। किसी ऐसे व्यक्ति से इस तरह बात नहीं करते, जिसे आप पसंद करते हैं। ✅ वह अब आपको कोई स्नेह नहीं दिखाता। स्नेह देना रिश्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, और यह सबसे पहले गायब होता है। प्यारे नाम, मीम्स, और गिफ्स से अलविदा ले लें। यहां तक कि इमोजी भी रिश्ते से बाहर हो सकते हैं। स्नेह की सभी प्रकार की अभिव्यक्तियां कम हो जाती हैं, और आप सोचने लगते हैं कि सब कुछ कहां चला गया। ✅ वह माइक्रो-चीटिंग करता है। माइक्रो-चीटिंग तब होती है जब कोई व्यक्ति रिश्ते में होते हुए भी किसी और को फ्लर्टी या अनुपयुक्त संदेश भेजता है। अगर आपके पति के पास आकर्षक सोशल मीडिया दोस्त हैं, तो वह ठीक है। लेकिन अगर वह अपने मुद्दों पर बात करने के लिए उनसे संपर्क करता है, तो यह माइक्रो-चीटिंग है। स्पष्ट रूप से कहें तो, माइक्रो-चीटिंग में कोई 'माइक्रो' नहीं है। यह गलत है। ✅ वह आपके लिए समय नहीं निकालता। क्या वह सबके लिए समय निकालता है, लेकिन आपके लिए नहीं? यह तब आम होता है जब वह आपको अब महत्व नहीं देता। वह वही करता है जो उसे पसंद है, लेकिन आपके लिए समय नहीं निकालता। यदि वह आपके साथ समय बिताने या बात करने के लिए समय नहीं निकालता है, तो इसका मतलब है कि वह आपको महत्व नहीं दे रहा है। ✅ वह आपके बिना योजना बनाता है। वह ऐसी चीजों की योजना बनाता है जिनमें आपको शामिल नहीं किया जाता। बड़े मैच के लिए टिकटें जो उसने खरीदीं - उसने आपके लिए एक भी नहीं खरीदी। वह जिस संगीत कार्यक्रम में जाना चाहता है - उसके पास एक बहाना होता है कि आप क्यों नहीं जा सकते। ✅ वह अपने फोन पर अधिक ध्यान देता है, न कि आप पर। अगर वह अपने फोन पर आपसे ज्यादा ध्यान देता है, तो वह यह नहीं दिखा रहा कि वह आपके साथ बातचीत को महत्व देता है। यह अशिष्ट और असम्मानजनक है। अगर वह अपने फोन से शादी करना चाहता है, तो उसे पहले आपको तलाक देना होगा। अन्यथा, उसे अपनी तकनीकी दुनिया से बाहर आकर अपने रिश्ते पर ध्यान केंद्रित करना सीखना होगा। ✅ वह आपके जाने पर आपको मिस नहीं करता। जब आप काम के लिए या परिवार से मिलने जाते हैं, तो वह आपको मिस नहीं करता। न तो वह यह कहता है, न ही ऐसा महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप वहां हैं या नहीं। कठोर सच्चाई यह है कि वह आपको महत्व नहीं देता। वह आपको मिस नहीं करता जब आप जाते हैं। आपको वह समय याद होगा जब वह करता था, लेकिन वह समय अब लम्बे समय से चला गया है। ✅ वह हमेशा आपके दोष निकालता है। आप कुछ भी सही नहीं कर पातीं। वह लगातार आपके हर शब्द और काम की आलोचना करता है। कोई भी कोशिश कभी पर्याप्त नहीं होती। आपको हमेशा ऐसा महसूस होता है कि आप उसे निराश कर रही हैं। ऐसा लगता है जैसे आप अब पर्याप्त नहीं हो, और आपको यह समझ नहीं आता कि कैसे बेहतर बनें। आप जो भी कर रही हैं, वह कभी उसकी उच्च मानकों पर नहीं उतर पाती। वह आपको महत्व नहीं देता, इसलिए वह आपको उन अवास्तविक मानकों पर खड़ा कर रहा है। ✅ वह अपने वादे तोड़ता है। जो आदमी आपको अब महत्व नहीं देता, वह अपने वादे तोड़ता है। प्यार करने, सम्मान करने और देखभाल करने के जो वादे किए थे, अब वे टूट चुके हैं। बीमारियों में और अच्छे समय में? वे भी टूट गए हैं। आप सोचने लगती हैं कि अगर वह उन वादों को निभाने वाला नहीं था, तो वह वादे क्यों किए गए थे। टूटे हुए वादे रिश्ते में विश्वास को तोड़ देते हैं। समय के साथ, रिश्ते का अस्तित्व खत्म हो जाता है - बस एक कानूनी समझौता बचता है, जिसे आप खत्म करने के बारे में सोच सकती हैं। आप इसके लायक हैं कि आपको प्यार किया जाए, सराहा जाए और महत्व दिया जाए 🤍। साभार 🙏

आपके पति द्वारा आपको महत्व न देने के संकेत: ✅ वह आपके साथ असम्मानजनक तरीके से बात करता है। यह आपके पति द्वारा आपको महत्व न देने का एक बड़ा संकेत है। अगर वह नाम call करता है, चिल्लाता है, या आपको असम्मानजनक तरीके से पेश आता है, तो वह आपको महत्व नहीं देता। किसी ऐसे व्यक्ति से इस तरह बात नहीं करते, जिसे आप पसंद करते हैं। ✅ वह अब आपको कोई स्नेह नहीं दिखाता। स्नेह देना रिश्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, और यह सबसे पहले गायब होता है। प्यारे नाम, मीम्स, और गिफ्स से अलविदा ले लें। यहां तक कि इमोजी भी रिश्ते से बाहर हो सकते हैं। स्नेह की सभी प्रकार की अभिव्यक्तियां कम हो जाती हैं, और आप सोचने लगते हैं कि सब कुछ कहां चला गया। ✅ वह माइक्रो-चीटिंग करता है। माइक्रो-चीटिंग तब होती है जब कोई व्यक्ति रिश्ते में होते हुए भी किसी और को फ्लर्टी या अनुपयुक्त संदेश भेजता है। अगर आपके पति के पास आकर्षक सोशल मीडिया दोस्त हैं, तो वह ठीक है। लेकिन अगर वह अपने मुद्दों पर बात करने के लिए उनसे संपर्क करता है, तो यह माइक्रो-चीटिंग है। स्पष्ट रूप से कहें तो, माइक्रो-चीटिंग में कोई 'माइक्रो' नहीं है। यह गलत है। ✅ वह आपके लिए समय नहीं निकालता। क्या वह सबके लिए समय निकालता है, लेकिन आपके लिए नहीं? यह तब आम होता है जब वह आपको अब महत्व नहीं देता। वह वही करता है जो उसे पसंद है, लेकिन आपके लिए समय नहीं निकालता। यदि वह आपके साथ समय बिताने या बात करने के लिए समय नहीं निकालता है, तो इसका मतलब है कि वह आपको महत्व नहीं दे रहा है। ✅ वह आपके बिना योजना बनाता है। वह ऐसी चीजों की योजना बनाता है जिनमें आपको शामिल नहीं किया जाता। बड़े मैच के लिए टिकटें जो उसने खरीदीं - उसने आपके लिए एक भी नहीं खरीदी। वह जिस संगीत कार्यक्रम में जाना चाहता है - उसके पास एक बहाना होता है कि आप क्यों नहीं जा सकते। ✅ वह अपने फोन पर अधिक ध्यान देता है, न कि आप पर। अगर वह अपने फोन पर आपसे ज्यादा ध्यान देता है, तो वह यह नहीं दिखा रहा कि वह आपके साथ बातचीत को महत्व देता है। यह अशिष्ट और असम्मानजनक है। अगर वह अपने फोन से शादी करना चाहता है, तो उसे पहले आपको तलाक देना होगा। अन्यथा, उसे अपनी तकनीकी दुनिया से बाहर आकर अपने रिश्ते पर ध्यान केंद्रित करना सीखना होगा। ✅ वह आपके जाने पर आपको मिस नहीं करता। जब आप काम के लिए या परिवार से मिलने जाते हैं, तो वह आपको मिस नहीं करता। न तो वह यह कहता है, न ही ऐसा महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप वहां हैं या नहीं। कठोर सच्चाई यह है कि वह आपको महत्व नहीं देता। वह आपको मिस नहीं करता जब आप जाते हैं। आपको वह समय याद होगा जब वह करता था, लेकिन वह समय अब लम्बे समय से चला गया है। ✅ वह हमेशा आपके दोष निकालता है। आप कुछ भी सही नहीं कर पातीं। वह लगातार आपके हर शब्द और काम की आलोचना करता है। कोई भी कोशिश कभी पर्याप्त नहीं होती। आपको हमेशा ऐसा महसूस होता है कि आप उसे निराश कर रही हैं। ऐसा लगता है जैसे आप अब पर्याप्त नहीं हो, और आपको यह समझ नहीं आता कि कैसे बेहतर बनें। आप जो भी कर रही हैं, वह कभी उसकी उच्च मानकों पर नहीं उतर पाती। वह आपको महत्व नहीं देता, इसलिए वह आपको उन अवास्तविक मानकों पर खड़ा कर रहा है। ✅ वह अपने वादे तोड़ता है। जो आदमी आपको अब महत्व नहीं देता, वह अपने वादे तोड़ता है। प्यार करने, सम्मान करने और देखभाल करने के जो वादे किए थे, अब वे टूट चुके हैं। बीमारियों में और अच्छे समय में? वे भी टूट गए हैं। आप सोचने लगती हैं कि अगर वह उन वादों को निभाने वाला नहीं था, तो वह वादे क्यों किए गए थे। टूटे हुए वादे रिश्ते में विश्वास को तोड़ देते हैं। समय के साथ, रिश्ते का अस्तित्व खत्म हो जाता है - बस एक कानूनी समझौता बचता है, जिसे आप खत्म करने के बारे में सोच सकती हैं। आप इसके लायक हैं कि आपको प्यार किया जाए, सराहा जाए और महत्व दिया जाए 🤍। साभार 🙏

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स्त्री की खूबसूरती पुरुष की कामुकता पर निर्भर करती है | जितना अधिक पुरुष कामुक होगा उतना ही अधिक स्त्री सुन्दर लगेगी |

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स्त्री सुहागन होती है परंतु संतुष्ट नहीं होती ! पुरुष अपना वीर्य नाली में बहा रहे हैं जिस कारण स्त्रियों का भरण पोषण पूर्ण रूप से नहीं होता क्योंकि भरण पोषण में केवल अन्न ही नहीं आता एक सुखपूर्वक संतुष्ट संभोग भी आता है ! जिससे स्त्री के सौंदर्य और स्वभाव में चरम निखार आता है🔥🫦❤️

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स्त्री सुहागन होती है परंतु संतुष्ट नहीं होती ! पुरुष अपना वीर्य नाली में बहा रहे हैं जिस कारण स्त्रियों का भरण पोषण पूर्ण रूप से नहीं होता क्योंकि भरण पोषण में केवल अन्न ही नहीं आता एक सुखपूर्वक संतुष्ट संभोग भी आता है ! जिससे स्त्री के सौंदर्य और स्वभाव में चरम निखार आता है🔥🫦❤️

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"एक दिन एक स्त्री आएगी और तुम्हारे भीतर की स्त्री को जगा देगी फिर वह गुम हो जाएगी और जीवनपर्यंत तुम उस स्त्री की तलाश में प्यासे भटकोगे यही इस पुरुष देह का अभिशाप है।"

"एक दिन एक स्त्री आएगी और तुम्हारे भीतर की स्त्री को जगा देगी फिर वह गुम हो जाएगी और जीवनपर्यंत तुम उस स्त्री की तलाश में प्यासे भटकोगे यही इस पुरुष देह का अभिशाप है।"

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पती पत्नी कि लड़ाई हो तो गुस्से में बर्तन, तोड़ देते है और सुलह हो तो पलंग तोड़ देते है...

पती पत्नी कि लड़ाई हो तो गुस्से में बर्तन, तोड़ देते है और सुलह हो तो पलंग तोड़ देते है...

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महिला एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती है, इसी आधार पर दुनिया के वेश्याघर चलते हैं। जबकि नर के लिए दो संभोगों के बीच एक अंतराल होता ही होता है। पहली बार के बाद वह झटके से मादा से अलग हो जाएगा और सोना चाहेगा—यह उसकी प्रकृति है। मगर मादा की प्रकृति बिल्कुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद नर के मुँह से ऐसे शब्द सुनना चाहती है, जो उसे गुदगुदा दें, उसे संतुष्ट करें। वह यह नहीं समझती कि नर प्रेम के तुरंत बाद फिर से प्रेम नहीं कर सकता। वो युद्ध के बाद प्रेम की लालसा रखता है। नर की मूल प्रवृत्ति शिकारी की तरह होती है। सभ्य समाज में उसकी इस प्रवृत्ति को ज़रूर सुंदर लिबास में ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। दुनिया के सबसे क्रूर तानाशाहों में से एक, हिटलर, रोज़ाना सैकड़ों लोगों को मरवाने के बाद अपनी प्रेमिका की गोद में सिर रखकर प्रेमगीत लिखता था। उसके आँसू उन लम्हों की याद में बहते थे जो उसने अपनी प्रेमिका से जुदाई में बिताए थे। अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भयंकर मारकाट देखी, प्रेम के लिए तड़प उठा था। उसी तड़प ने उसे बौद्ध धर्म की ओर खींचा और आज अशोक और बौद्ध धर्म को अलग करना नामुमकिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी युद्ध के कवच को उतार कर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूबता था। युद्ध के मैदान में जितना वह योद्धा होता, उतना ही प्रेम में समर्पित भी होता। सामान्य पुरुष न तो इतनी गहराई से प्रेम कर सकता है और न ही इतनी घृणा से युद्ध। वह अक्सर संभोग को महज कुछ मिनटों का खेल समझता है, जिससे उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं मिलती। इस असंतोष के चलते वह साथी बदलने की तरफ झुक सकता है। जहाँ सामाजिक बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव छह महीने के अंदर हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो परिस्थितियाँ बदलती हैं और न ही उसकी मानसिक स्थिति। नर तब तक प्रेम में सफल नहीं हो सकता जब तक वह अपनी जंगली प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। यही वजह है कि मादा अक्सर सामाजिक रूप से सभ्य पुरुष की बजाय उद्दंड, बागी पुरुष की तरफ आकर्षित होती है। इसी कारण बिगड़े हुए लड़कों को अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं, जबकि सभ्य दिखने वाले लड़के पीछे रह जाते हैं। यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। हर इंसान की अपनी पसंद और प्रेम करने का अपना तरीका होता है। कुल मिलाकर, बात यही है कि आपने पुरुष और महिला दोनों के संभोग से जुड़े पहलुओं को परिभाषित किया है, लेकिन हर व्यक्ति की अपनी विचारधारा और मूल्य होते हैं। ✨
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महिला एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती है, इसी आधार पर दुनिया के वेश्याघर चलते हैं। जबकि नर के लिए दो संभोगों के बीच एक अंतराल होता ही होता है। पहली बार के बाद वह झटके से मादा से अलग हो जाएगा और सोना चाहेगा—यह उसकी प्रकृति है। मगर मादा की प्रकृति बिल्कुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद नर के मुँह से ऐसे शब्द सुनना चाहती है, जो उसे गुदगुदा दें, उसे संतुष्ट करें। वह यह नहीं समझती कि नर प्रेम के तुरंत बाद फिर से प्रेम नहीं कर सकता। वो युद्ध के बाद प्रेम की लालसा रखता है। नर की मूल प्रवृत्ति शिकारी की तरह होती है। सभ्य समाज में उसकी इस प्रवृत्ति को ज़रूर सुंदर लिबास में ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। दुनिया के सबसे क्रूर तानाशाहों में से एक, हिटलर, रोज़ाना सैकड़ों लोगों को मरवाने के बाद अपनी प्रेमिका की गोद में सिर रखकर प्रेमगीत लिखता था। उसके आँसू उन लम्हों की याद में बहते थे जो उसने अपनी प्रेमिका से जुदाई में बिताए थे। अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भयंकर मारकाट देखी, प्रेम के लिए तड़प उठा था। उसी तड़प ने उसे बौद्ध धर्म की ओर खींचा और आज अशोक और बौद्ध धर्म को अलग करना नामुमकिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी युद्ध के कवच को उतार कर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूबता था। युद्ध के मैदान में जितना वह योद्धा होता, उतना ही प्रेम में समर्पित भी होता। सामान्य पुरुष न तो इतनी गहराई से प्रेम कर सकता है और न ही इतनी घृणा से युद्ध। वह अक्सर संभोग को महज कुछ मिनटों का खेल समझता है, जिससे उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं मिलती। इस असंतोष के चलते वह साथी बदलने की तरफ झुक सकता है। जहाँ सामाजिक बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव छह महीने के अंदर हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो परिस्थितियाँ बदलती हैं और न ही उसकी मानसिक स्थिति। नर तब तक प्रेम में सफल नहीं हो सकता जब तक वह अपनी जंगली प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। यही वजह है कि मादा अक्सर सामाजिक रूप से सभ्य पुरुष की बजाय उद्दंड, बागी पुरुष की तरफ आकर्षित होती है। इसी कारण बिगड़े हुए लड़कों को अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं, जबकि सभ्य दिखने वाले लड़के पीछे रह जाते हैं। यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। हर इंसान की अपनी पसंद और प्रेम करने का अपना तरीका होता है। कुल मिलाकर, बात यही है कि आपने पुरुष और महिला दोनों के संभोग से जुड़े पहलुओं को परिभाषित किया है, लेकिन हर व्यक्ति की अपनी विचारधारा और मूल्य होते हैं। ✨

तृप्त ...🖤

904,620 Aufrufe • vor 1 Jahr

"सेक्स अब पहले से कहीं सस्ता हो चुका है, लेकिन पुरुष सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।" आजकल सेक्स हासिल करना कभी भी आसान नहीं रहा है। कोई मेहनत नहीं, कोई प्रतिबद्धता नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। कुछ संदेश, एक स्वाइप या एक रात का समय और वो आपका है। प्रेम की कोई आवश्यकता नहीं, रिश्तों की कोई आवश्यकता नहीं—बस तुरंत सुख। आधुनिक पुरुष के लिए, यह स्वर्ग जैसा लगता है। लेकिन यहाँ कड़वा सच है: आसान सुख की एक छिपी हुई कीमत है। और पुरुष इसका मूल्य अपनी महत्वाकांक्षा, ध्यान, और भविष्य के साथ चुका रहे हैं। 1. जीत का भ्रम आजकल के पुरुष सोचते हैं कि वे “विकल्प” होने के कारण जीत रहे हैं। वे सोचते हैं कि बेडफेलो बदलने से वे ताकतवर हो रहे हैं। वे सोचते हैं कि महिलाओं का पीछा करने से वे प्रभुत्व प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन असल में, वे कमजोर हो रहे हैं। उन महिलाओं के साथ समय बर्बाद कर रहे हैं जो कोई मूल्य नहीं जोड़तीं। सतत आनंद में ऊर्जा खो रहे हैं। अंतहीन व्याकुलताओं से ध्यान खो रहे हैं। सच्चे विजेता वे नहीं हैं जो बहुत महिलाओं के साथ सोते हैं। सच्चे विजेता वे हैं जो अपना समय, ऊर्जा और प्रयास किसी महान चीज़ के निर्माण में लगाते हैं। 2. हुकअप संस्कृति की छिपी हुई कीमत समाज पुरुषों से कहता है: “अपनी जवानी का आनंद लो।” “अपना जीवन जीओ।” “जितना हो सके मज़ा करो।” लेकिन वे यह नहीं बताते कि इसके बाद क्या होता है: काबू की कमी। बर्बाद समय। भावनात्मक सुस्ती। सुख की आदत बन जाती है, उद्देश्य नहीं। जो पुरुष हमेशा महिलाओं का पीछा करते हैं, वे अपने लक्ष्यों का उतना ही पीछा नहीं कर सकते। 3. आपकी ऊर्जा ही आपकी शक्ति है हर बार जब आप सस्ते सुख का आनंद लेते हैं, आप अपनी शक्ति खो देते हैं। आपकी प्रेरणा कमजोर हो जाती है। आपकी महत्वाकांक्षा मिटने लगती है। सफलता की भूख गायब हो जाती है। सक्स केवल शारीरिक क्रिया नहीं है—यह ऊर्जा का आदान-प्रदान है। और जब आप अपनी ऊर्जा बेमानी मुठभेड़ों पर खर्च करते हैं, तो आप अपनी क्षमता को कमजोर करते हैं, जो आपको विजय, सृजन और नेतृत्व में सक्षम बनाती है। शक्तिशाली पुरुष अपनी ऊर्जा ऐसी चीजों पर खर्च नहीं करते जो उनके लिए सेवा नहीं करतीं। 4. एक गुलाम का मन बनाम एक राजा का मन सुख के गुलाम को नियंत्रित किया जा सकता है। वह महिलाओं को प्रभावित करने के लिए अपना पैसा बर्बाद करेगा। वह ध्यान के लिए भीख मांगेगा, बजाय इसके कि सम्मान की मांग करे। वह दूसरों को प्रभावित करने के प्रयास में खुद को नष्ट कर देगा। लेकिन अनुशासन वाला पुरुष? वह महिलाओं को उसका पीछा करने देता है। वह धन अर्जित करता है, न कि उसे बर्बाद करता है। वह खुद को नियंत्रित करता है, ताकि कोई और उसे नियंत्रित न कर सके। आप इनमें से कौन सा हैं? 5. झूठ जो उन्होंने आपको बताया उन्होंने आपको कहा था "सक्स सिर्फ सेक्स है।" उन्होंने आपको कहा था "इसका कोई मतलब नहीं है।" उन्होंने आपको कहा था "यह सिर्फ मज़े के लिए है।" लेकिन अगर ऐसा सच है, तो इतने सारे पुरुष क्यों खाली महसूस करते हैं? क्योंकि अंदर से वे जानते हैं कि वे खुद को बर्बाद कर रहे हैं। वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। वे अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं। वे अपनी क्षमता बर्बाद कर रहे हैं। पहले सेक्स कुछ मूल्यवान था। अब, यह मुफ्त में फेंक दिया जाने वाला कुछ बन गया है। लेकिन जब किसी चीज़ का मूल्य घटता है, तो जो लोग उसमें शामिल होते हैं, उनका मूल्य भी घटता है। 6. वे पुरुष जो महिलाओं का पीछा करते हैं, हमेशा पीछे रह जाते हैं इतिहास में सबसे शक्तिशाली पुरुषों को देखें। वे अपने सर्वश्रेष्ठ वर्षों में अस्थायी सुख का पीछा नहीं कर रहे थे। वे अपने सर्वश्रेष्ठ वर्षों में कुछ बड़ा बना रहे थे। लेकिन जो पुरुष महिलाओं का पीछा करते थे? वे अपना उद्देश्य खो बैठते थे। वे भटक जाते थे। वे मिट जाते थे। अगर आप अपनी 20s में महिलाओं का पीछा करेंगे, तो आप अपनी 30s और 40s में इसका पछतावा करेंगे। 7. समाधान? नियंत्रण। अगर आप शक्तिशाली बनना चाहते हैं, तो आपको अगली उच्चता के लिए जीना बंद करना होगा। संतोष को विलंबित करें। ना कहना सीखें। अपनी ऊर्जा बचाएं। इसे अपने मिशन के लिए इस्तेमाल करें। जीत पर ध्यान केंद्रित करें। महिलाएं शक्ति का सम्मान करती हैं, न कि ध्यान का। जो पुरुष खुद को नियंत्रित करता है, वह अपनी किस्मत नियंत्रित करता है। 8. अंतिम सत्य: शक्ति या सुख—आप दोनों नहीं पा सकते हर महान पुरुष को एक चुनाव करना पड़ा था। आसान रास्ता: सुख और व्याकुलता। या कठिन रास्ता: अनुशासन और सफलता। अधिकतर पुरुष आसान रास्ता चुनते हैं—और असफल होते हैं। कुछ चुनिंदा पुरुष कठिन रास्ता चुनते हैं—और जीतते हैं। आप कौन सा रास्ता चुनेंगे?
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"सेक्स अब पहले से कहीं सस्ता हो चुका है, लेकिन पुरुष सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।" आजकल सेक्स हासिल करना कभी भी आसान नहीं रहा है। कोई मेहनत नहीं, कोई प्रतिबद्धता नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। कुछ संदेश, एक स्वाइप या एक रात का समय और वो आपका है। प्रेम की कोई आवश्यकता नहीं, रिश्तों की कोई आवश्यकता नहीं—बस तुरंत सुख। आधुनिक पुरुष के लिए, यह स्वर्ग जैसा लगता है। लेकिन यहाँ कड़वा सच है: आसान सुख की एक छिपी हुई कीमत है। और पुरुष इसका मूल्य अपनी महत्वाकांक्षा, ध्यान, और भविष्य के साथ चुका रहे हैं। 1. जीत का भ्रम आजकल के पुरुष सोचते हैं कि वे “विकल्प” होने के कारण जीत रहे हैं। वे सोचते हैं कि बेडफेलो बदलने से वे ताकतवर हो रहे हैं। वे सोचते हैं कि महिलाओं का पीछा करने से वे प्रभुत्व प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन असल में, वे कमजोर हो रहे हैं। उन महिलाओं के साथ समय बर्बाद कर रहे हैं जो कोई मूल्य नहीं जोड़तीं। सतत आनंद में ऊर्जा खो रहे हैं। अंतहीन व्याकुलताओं से ध्यान खो रहे हैं। सच्चे विजेता वे नहीं हैं जो बहुत महिलाओं के साथ सोते हैं। सच्चे विजेता वे हैं जो अपना समय, ऊर्जा और प्रयास किसी महान चीज़ के निर्माण में लगाते हैं। 2. हुकअप संस्कृति की छिपी हुई कीमत समाज पुरुषों से कहता है: “अपनी जवानी का आनंद लो।” “अपना जीवन जीओ।” “जितना हो सके मज़ा करो।” लेकिन वे यह नहीं बताते कि इसके बाद क्या होता है: काबू की कमी। बर्बाद समय। भावनात्मक सुस्ती। सुख की आदत बन जाती है, उद्देश्य नहीं। जो पुरुष हमेशा महिलाओं का पीछा करते हैं, वे अपने लक्ष्यों का उतना ही पीछा नहीं कर सकते। 3. आपकी ऊर्जा ही आपकी शक्ति है हर बार जब आप सस्ते सुख का आनंद लेते हैं, आप अपनी शक्ति खो देते हैं। आपकी प्रेरणा कमजोर हो जाती है। आपकी महत्वाकांक्षा मिटने लगती है। सफलता की भूख गायब हो जाती है। सक्स केवल शारीरिक क्रिया नहीं है—यह ऊर्जा का आदान-प्रदान है। और जब आप अपनी ऊर्जा बेमानी मुठभेड़ों पर खर्च करते हैं, तो आप अपनी क्षमता को कमजोर करते हैं, जो आपको विजय, सृजन और नेतृत्व में सक्षम बनाती है। शक्तिशाली पुरुष अपनी ऊर्जा ऐसी चीजों पर खर्च नहीं करते जो उनके लिए सेवा नहीं करतीं। 4. एक गुलाम का मन बनाम एक राजा का मन सुख के गुलाम को नियंत्रित किया जा सकता है। वह महिलाओं को प्रभावित करने के लिए अपना पैसा बर्बाद करेगा। वह ध्यान के लिए भीख मांगेगा, बजाय इसके कि सम्मान की मांग करे। वह दूसरों को प्रभावित करने के प्रयास में खुद को नष्ट कर देगा। लेकिन अनुशासन वाला पुरुष? वह महिलाओं को उसका पीछा करने देता है। वह धन अर्जित करता है, न कि उसे बर्बाद करता है। वह खुद को नियंत्रित करता है, ताकि कोई और उसे नियंत्रित न कर सके। आप इनमें से कौन सा हैं? 5. झूठ जो उन्होंने आपको बताया उन्होंने आपको कहा था "सक्स सिर्फ सेक्स है।" उन्होंने आपको कहा था "इसका कोई मतलब नहीं है।" उन्होंने आपको कहा था "यह सिर्फ मज़े के लिए है।" लेकिन अगर ऐसा सच है, तो इतने सारे पुरुष क्यों खाली महसूस करते हैं? क्योंकि अंदर से वे जानते हैं कि वे खुद को बर्बाद कर रहे हैं। वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। वे अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं। वे अपनी क्षमता बर्बाद कर रहे हैं। पहले सेक्स कुछ मूल्यवान था। अब, यह मुफ्त में फेंक दिया जाने वाला कुछ बन गया है। लेकिन जब किसी चीज़ का मूल्य घटता है, तो जो लोग उसमें शामिल होते हैं, उनका मूल्य भी घटता है। 6. वे पुरुष जो महिलाओं का पीछा करते हैं, हमेशा पीछे रह जाते हैं इतिहास में सबसे शक्तिशाली पुरुषों को देखें। वे अपने सर्वश्रेष्ठ वर्षों में अस्थायी सुख का पीछा नहीं कर रहे थे। वे अपने सर्वश्रेष्ठ वर्षों में कुछ बड़ा बना रहे थे। लेकिन जो पुरुष महिलाओं का पीछा करते थे? वे अपना उद्देश्य खो बैठते थे। वे भटक जाते थे। वे मिट जाते थे। अगर आप अपनी 20s में महिलाओं का पीछा करेंगे, तो आप अपनी 30s और 40s में इसका पछतावा करेंगे। 7. समाधान? नियंत्रण। अगर आप शक्तिशाली बनना चाहते हैं, तो आपको अगली उच्चता के लिए जीना बंद करना होगा। संतोष को विलंबित करें। ना कहना सीखें। अपनी ऊर्जा बचाएं। इसे अपने मिशन के लिए इस्तेमाल करें। जीत पर ध्यान केंद्रित करें। महिलाएं शक्ति का सम्मान करती हैं, न कि ध्यान का। जो पुरुष खुद को नियंत्रित करता है, वह अपनी किस्मत नियंत्रित करता है। 8. अंतिम सत्य: शक्ति या सुख—आप दोनों नहीं पा सकते हर महान पुरुष को एक चुनाव करना पड़ा था। आसान रास्ता: सुख और व्याकुलता। या कठिन रास्ता: अनुशासन और सफलता। अधिकतर पुरुष आसान रास्ता चुनते हैं—और असफल होते हैं। कुछ चुनिंदा पुरुष कठिन रास्ता चुनते हैं—और जीतते हैं। आप कौन सा रास्ता चुनेंगे?

तृप्त ...🖤

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महिलाएं एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती हैं, इसी कारण वेश्यावृत्ति जैसी प्रथाएँ सदियों से अस्तित्व में हैं। वहीं पुरुष के लिए दो संभोगों के बीच एक निश्चित अंतराल आवश्यक होता है। पहली बार के बाद वह तुरंत महिला से अलग हो जाता है और अक्सर सोने की इच्छा करता है — यह उसकी प्रकृति है। 😴 महिला की प्रवृत्ति इससे बिलकुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद साथी से ऐसी बातें सुनना चाहती है जो उसे संतुष्टि और आनंद दें। 💖 अक्सर महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि पुरुष प्रेम के तुरंत बाद फिर से वही जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता। पुरुष युद्ध की समाप्ति के बाद प्रेम की इच्छा रखता है। उसका मूल स्वभाव शिकारी जैसा होता है। 🏹 सभ्यता की चादर में उसकी इस प्रवृत्ति को ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। इतिहास में क्रूर माने जाने वाले तानाशाहों की जीवन शैली भी कुछ ऐसी ही थी। उदाहरण के लिए, हिटलर, जिसने हजारों लोगों की जान ली, अपने प्रेमिका के पास आकर कोमल और प्रेमपूर्ण हो जाता था। उसकी प्रेमिका के साथ बिताए हुए पलों की याद में उसके आँसू बहते थे। 😢 अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भारी विनाश देखा, बाद में प्रेम और करुणा की ओर मुड़ गया। यही प्रेम और पश्चाताप उसे बौद्ध धर्म की ओर खींच ले गया, और आज अशोक और बौद्ध धर्म को एक-दूसरे से अलग करना कठिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने युद्ध के कवच को उतारकर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूब जाता था। युद्ध में जितना वह योद्धा था, उतना ही प्रेम में समर्पित। 🛡️❤️ सामान्य पुरुष, इतनी गहराई से प्रेम या इतनी घृणा के साथ युद्ध नहीं कर सकता। उसके लिए संभोग कुछ मिनटों का खेल मात्र है, जो उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं दे पाता। 😕 असंतोष की यह भावना कभी-कभी उसे नए साथी की तलाश में ले जाती है। ऐसे समाज में जहाँ बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव जल्दी हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो मानसिक संतोष मिलता है और न ही परिस्थिति में कोई बदलाव। पुरुष तब तक सच्चे प्रेम में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। इसी कारण, महिलाएं अक्सर उन पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो बागी और स्वतंत्र होते हैं। 😏 यही कारण है कि बिंदास और बिगड़े हुए लड़के अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ पा लेते हैं, जबकि सभ्य और संजीदा पुरुष पीछे रह जाते हैं। हालाँकि, यह केवल एक दृष्टिकोण है। हर व्यक्ति की प्रेम और आकर्षण की अपनी परिभाषा होती है, और सभी की अपनी पसंद होती है। 🌸💖 आखिर में, यह कहना उचित है कि पुरुष और महिला दोनों के संभोग और प्रेम की अपनी विशेषताएं होती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के अपने विचार और मूल्य भी होते हैं। ✨
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महिलाएं एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती हैं, इसी कारण वेश्यावृत्ति जैसी प्रथाएँ सदियों से अस्तित्व में हैं। वहीं पुरुष के लिए दो संभोगों के बीच एक निश्चित अंतराल आवश्यक होता है। पहली बार के बाद वह तुरंत महिला से अलग हो जाता है और अक्सर सोने की इच्छा करता है — यह उसकी प्रकृति है। 😴 महिला की प्रवृत्ति इससे बिलकुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद साथी से ऐसी बातें सुनना चाहती है जो उसे संतुष्टि और आनंद दें। 💖 अक्सर महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि पुरुष प्रेम के तुरंत बाद फिर से वही जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता। पुरुष युद्ध की समाप्ति के बाद प्रेम की इच्छा रखता है। उसका मूल स्वभाव शिकारी जैसा होता है। 🏹 सभ्यता की चादर में उसकी इस प्रवृत्ति को ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। इतिहास में क्रूर माने जाने वाले तानाशाहों की जीवन शैली भी कुछ ऐसी ही थी। उदाहरण के लिए, हिटलर, जिसने हजारों लोगों की जान ली, अपने प्रेमिका के पास आकर कोमल और प्रेमपूर्ण हो जाता था। उसकी प्रेमिका के साथ बिताए हुए पलों की याद में उसके आँसू बहते थे। 😢 अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भारी विनाश देखा, बाद में प्रेम और करुणा की ओर मुड़ गया। यही प्रेम और पश्चाताप उसे बौद्ध धर्म की ओर खींच ले गया, और आज अशोक और बौद्ध धर्म को एक-दूसरे से अलग करना कठिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने युद्ध के कवच को उतारकर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूब जाता था। युद्ध में जितना वह योद्धा था, उतना ही प्रेम में समर्पित। 🛡️❤️ सामान्य पुरुष, इतनी गहराई से प्रेम या इतनी घृणा के साथ युद्ध नहीं कर सकता। उसके लिए संभोग कुछ मिनटों का खेल मात्र है, जो उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं दे पाता। 😕 असंतोष की यह भावना कभी-कभी उसे नए साथी की तलाश में ले जाती है। ऐसे समाज में जहाँ बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव जल्दी हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो मानसिक संतोष मिलता है और न ही परिस्थिति में कोई बदलाव। पुरुष तब तक सच्चे प्रेम में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। इसी कारण, महिलाएं अक्सर उन पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो बागी और स्वतंत्र होते हैं। 😏 यही कारण है कि बिंदास और बिगड़े हुए लड़के अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ पा लेते हैं, जबकि सभ्य और संजीदा पुरुष पीछे रह जाते हैं। हालाँकि, यह केवल एक दृष्टिकोण है। हर व्यक्ति की प्रेम और आकर्षण की अपनी परिभाषा होती है, और सभी की अपनी पसंद होती है। 🌸💖 आखिर में, यह कहना उचित है कि पुरुष और महिला दोनों के संभोग और प्रेम की अपनी विशेषताएं होती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के अपने विचार और मूल्य भी होते हैं। ✨

तृप्त ...🖤

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मादा एक संभोग के बाद दूसरे को तैयार है इसी नियम पर तो दुनिया के वेश्याघर चलते हैं। जबकि नर के दो संभोग के बीच अंतराल होना ही होना है। वो पहले संभोग के बाद ही झटके से मादा अलग हटेगा और सो जाना चाहेगा। ये ही उसकी प्रकृति है। जबकि मादा की प्रकृति इसके बिल्कुल ही विपरीत है। वो संभोग के तुरंत बाद उसके मुँह से वो शब्द सुनने को आतुर होती हैं जो उसे अंदर से गुदगुदा दें। वो ये नहीं जानती है कि नर प्रेम के बाद प्रेम नहीं कर सकता। वो युद्ध के बाद प्रेम को लालायित हो सकता हैं, वो मूल रूप से शिकारी की भूमिका ही अदा करता है। हाँ, भले ही सभ्य समाज में उसकी इस प्रवृत्ति को बड़े ही खुबसूरत लिबासों में ढका जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह "हिटलर" रोजाना पाँच सौ आदमियों को कटवा कर अपनी प्रेमिका की गोद में सर रख कर प्रेमगीत लिखता था... उससे जुदाई के बीते लम्हों का वर्णन करते उसके गाल भीगते थे। इधर अशोक कलिंग युद्ध में हुई मारकाट से दग्ध होकर प्रेमालिंगन को तड़प उठा था। उसने बौद्ध दर्शन को अपने अंदर यूँ समाहित किया। आज अशोक और बौद्ध दर्शन को अलग किया ही नहीं जा सकता। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने बख़्तरबंद कवच को उतार प्रेम रस में डूबता था। इतना रोमांटिक या प्रेयसी को समर्पित होता था, इस समय जितना कोई कवि शायर या मासूम दिल का नर भी समर्पित नही हो सकता। सामान्य नर इस प्रकार के न युद्ध कर सकता हैं ना ही प्रेमातुर हो सकता है। वो न घृणा के चरम पर जाएगा और न ही प्रेम तल की गहराई में आएगा। वो कुछ दस मिनट का ही खेल करेगा, जो उसे किसी रूप में संतुष्ट नहीं करेगा। इसी संतुष्टि प्राप्ति हेतु वो साथी को बदलने को उत्सुक हो सकता है। जहाँ जहाँ सामाजिक बंधन कमजोर ये बदलाव लगभग छह महीने के अंदर हो जाता है, पर इन बदलावों से न परिस्थिति बदलती है न ही उसकी मनोरचना । यानि वो प्रेम पाने में प्रेम करने में असफल रहता है। यदि नर के जंगली पन को निकलने का रास्ता बन जाएँ तो वो प्रेम कर सकता हैं, पा सकता है और दे सकता है। यही एक कारण है मादा हमेशा समाजिक रूप सभ्य की अपेक्षा उद्दंड नर की तरफ झुकती है। इसलिए बिगड़े हुए लड़कों को समर्पित प्रेमिकाएँ मिलती है, बजाएं सामाजिक दृष्टि से सभ्य का टैग पाएँ लड़कों को। ये गहरा मनौवैज्ञानिक है हमने जितना सरल कर सकते थे, किया है..... जो कमी रह गई है जो आगे लिखेंगे। धन्यवाद
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मादा एक संभोग के बाद दूसरे को तैयार है इसी नियम पर तो दुनिया के वेश्याघर चलते हैं। जबकि नर के दो संभोग के बीच अंतराल होना ही होना है। वो पहले संभोग के बाद ही झटके से मादा अलग हटेगा और सो जाना चाहेगा। ये ही उसकी प्रकृति है। जबकि मादा की प्रकृति इसके बिल्कुल ही विपरीत है। वो संभोग के तुरंत बाद उसके मुँह से वो शब्द सुनने को आतुर होती हैं जो उसे अंदर से गुदगुदा दें। वो ये नहीं जानती है कि नर प्रेम के बाद प्रेम नहीं कर सकता। वो युद्ध के बाद प्रेम को लालायित हो सकता हैं, वो मूल रूप से शिकारी की भूमिका ही अदा करता है। हाँ, भले ही सभ्य समाज में उसकी इस प्रवृत्ति को बड़े ही खुबसूरत लिबासों में ढका जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह "हिटलर" रोजाना पाँच सौ आदमियों को कटवा कर अपनी प्रेमिका की गोद में सर रख कर प्रेमगीत लिखता था... उससे जुदाई के बीते लम्हों का वर्णन करते उसके गाल भीगते थे। इधर अशोक कलिंग युद्ध में हुई मारकाट से दग्ध होकर प्रेमालिंगन को तड़प उठा था। उसने बौद्ध दर्शन को अपने अंदर यूँ समाहित किया। आज अशोक और बौद्ध दर्शन को अलग किया ही नहीं जा सकता। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने बख़्तरबंद कवच को उतार प्रेम रस में डूबता था। इतना रोमांटिक या प्रेयसी को समर्पित होता था, इस समय जितना कोई कवि शायर या मासूम दिल का नर भी समर्पित नही हो सकता। सामान्य नर इस प्रकार के न युद्ध कर सकता हैं ना ही प्रेमातुर हो सकता है। वो न घृणा के चरम पर जाएगा और न ही प्रेम तल की गहराई में आएगा। वो कुछ दस मिनट का ही खेल करेगा, जो उसे किसी रूप में संतुष्ट नहीं करेगा। इसी संतुष्टि प्राप्ति हेतु वो साथी को बदलने को उत्सुक हो सकता है। जहाँ जहाँ सामाजिक बंधन कमजोर ये बदलाव लगभग छह महीने के अंदर हो जाता है, पर इन बदलावों से न परिस्थिति बदलती है न ही उसकी मनोरचना । यानि वो प्रेम पाने में प्रेम करने में असफल रहता है। यदि नर के जंगली पन को निकलने का रास्ता बन जाएँ तो वो प्रेम कर सकता हैं, पा सकता है और दे सकता है। यही एक कारण है मादा हमेशा समाजिक रूप सभ्य की अपेक्षा उद्दंड नर की तरफ झुकती है। इसलिए बिगड़े हुए लड़कों को समर्पित प्रेमिकाएँ मिलती है, बजाएं सामाजिक दृष्टि से सभ्य का टैग पाएँ लड़कों को। ये गहरा मनौवैज्ञानिक है हमने जितना सरल कर सकते थे, किया है..... जो कमी रह गई है जो आगे लिखेंगे। धन्यवाद

तृप्त ...🖤

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एक पुरुष यह कैसे जान सकता है कि एक महिला पुरुष के प्रति सेक्सुअल आकर्षण महसूस कर रही है?.. यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है। यह महिला की शारीरिक भाषा है। इसमें सभी महिलाएं शामिल होंगी, यह शरीर की भाषा के मनोवैज्ञानिक कहते हैं। पहले, एक पुरुष की तरह, एक महिला अपनी सेक्सुअल भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करती, वह इन्हें अपनी गहरी मन में दबाकर रखती है।लेकिन, अगर वह महिला अपनी सेक्सुअल भावनाओं को छुपा भी ले, तो उसके शरीर के अंग उन्हें उजागर कर देंगे। जैसे, जब एक पुरुष सेक्सुअल उत्तेजना महसूस करता है या उत्तेजक दृश्य देखता है, तब उसके शारीरिक अंगों में बदलाव आते हैं, और वह खुद भी इसे रोक नहीं सकता। ठीक वैसे ही, जब एक महिला एक पुरुष के प्रति आकर्षित होती है, तो उसके शरीर में कुछ बदलाव होते हैं, लेकिन एक पुरुष को इसके कारणों की तलाश करने की जरूरत नहीं है, अगर वह महिला उसे सुंदर लगता है, तो यह काफी है। महिला का सेक्सुअल आकर्षण तुरंत नहीं होता, यह एक फूल की तरह है, जो धीरे-धीरे खिलता है। महिला का एक पुरुष के प्रति आकर्षण भी धीरे-धीरे होता है, यह प्रकृति का महिला का स्वभाव है, जिसे महिला खुद भी सोचकर बदल नहीं सकती। एक महिला को एक पुरुष के प्रति आकर्षित होने के लिए, उसके गहरे मन में उस पुरुष की जगह होनी चाहिए। जब एक महिला सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो पहले उसकी होंठों में बदलाव आता है। जब एक महिला उस पुरुष को देखती है, जिसे वह आकर्षक पाती है, उसके मस्तिष्क में "लव हॉर्मोन" स्रावित होते हैं, और उसके होंठों में रक्त प्रवाह बढ़ जाता है। तब उसके होंठ सूजे हुए होते हैं, और वह अपने होंठों को दांतों से काट लेती है, या होंठों को एक साथ घुमाती है, या अपनी जीभ से होंठों को नम करती है। ये सारी चीजें वह बिना जाने करती है, लेकिन शारीरिक भाषा के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह निश्चित रूप से होता है। वह अपने होंठों के माध्यम से ध्यान आकर्षित करती है, लेकिन यह सब सेक्सुअल आकर्षण का संकेत है। लेकिन वह खुद नहीं जानती कि यह सब अवचेतन स्तर पर हो रहा है। यह घटना महिला खुद रोक नहीं सकती, अगर वह इसे रोकने की कोशिश करती है, तो इसका मतलब है कि वह सेक्सुअल आकर्षण महसूस नहीं कर रही है। इसलिए, जब वह अपने प्रेमी से मिलने जाती है, तो वह पास में मौजूद बच्चों को चुम ले सकती है; ये उसके होंठों की आदतें हैं। दूसरी बात, शारीरिक भाषा विशेषज्ञ महिला की कमर की बात करते हैं, महिला की कमर हजारों वर्षों से कवियों द्वारा एक अविस्मरणीय प्रतीक के रूप में वर्णित की जाती रही है। महिला की कमर प्रजनन का एक प्रतीक मानी जाती है। जब महिला सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो उसकी कमर स्वाभाविक रूप से झूलने लगती है, यह शारीरिक भाषा के विशेषज्ञ कहते हैं। महिला सामान्य रूप से चलती है और जब वह एक पुरुष के प्रति सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो उसकी कमर एक नृत्य की तरह मोड़ खाती है, और इसे महिला के स्वभाव के रूप में माना जाता है। तीसरी बात, महिला की आंखें प्रेम और सेक्सुअल आकर्षण के मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब महिला सेक्सुअल आकर्षण या प्रेम के विचारों में होती है, तो उसकी आंखें फैल जाती हैं और वह पुरुष को और भी अधिक आकर्षक तरीके से देखती है। इस पर भी महिला का कोई नियंत्रण नहीं होता। अगर आप अपनी प्रेमिका या पत्नी में ऐसे बदलावों को देखेंगे, तो इसका मतलब है कि आपको अगले रोमांस की दिशा में बढ़ना चाहिए।
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एक पुरुष यह कैसे जान सकता है कि एक महिला पुरुष के प्रति सेक्सुअल आकर्षण महसूस कर रही है?.. यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है। यह महिला की शारीरिक भाषा है। इसमें सभी महिलाएं शामिल होंगी, यह शरीर की भाषा के मनोवैज्ञानिक कहते हैं। पहले, एक पुरुष की तरह, एक महिला अपनी सेक्सुअल भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करती, वह इन्हें अपनी गहरी मन में दबाकर रखती है।लेकिन, अगर वह महिला अपनी सेक्सुअल भावनाओं को छुपा भी ले, तो उसके शरीर के अंग उन्हें उजागर कर देंगे। जैसे, जब एक पुरुष सेक्सुअल उत्तेजना महसूस करता है या उत्तेजक दृश्य देखता है, तब उसके शारीरिक अंगों में बदलाव आते हैं, और वह खुद भी इसे रोक नहीं सकता। ठीक वैसे ही, जब एक महिला एक पुरुष के प्रति आकर्षित होती है, तो उसके शरीर में कुछ बदलाव होते हैं, लेकिन एक पुरुष को इसके कारणों की तलाश करने की जरूरत नहीं है, अगर वह महिला उसे सुंदर लगता है, तो यह काफी है। महिला का सेक्सुअल आकर्षण तुरंत नहीं होता, यह एक फूल की तरह है, जो धीरे-धीरे खिलता है। महिला का एक पुरुष के प्रति आकर्षण भी धीरे-धीरे होता है, यह प्रकृति का महिला का स्वभाव है, जिसे महिला खुद भी सोचकर बदल नहीं सकती। एक महिला को एक पुरुष के प्रति आकर्षित होने के लिए, उसके गहरे मन में उस पुरुष की जगह होनी चाहिए। जब एक महिला सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो पहले उसकी होंठों में बदलाव आता है। जब एक महिला उस पुरुष को देखती है, जिसे वह आकर्षक पाती है, उसके मस्तिष्क में "लव हॉर्मोन" स्रावित होते हैं, और उसके होंठों में रक्त प्रवाह बढ़ जाता है। तब उसके होंठ सूजे हुए होते हैं, और वह अपने होंठों को दांतों से काट लेती है, या होंठों को एक साथ घुमाती है, या अपनी जीभ से होंठों को नम करती है। ये सारी चीजें वह बिना जाने करती है, लेकिन शारीरिक भाषा के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह निश्चित रूप से होता है। वह अपने होंठों के माध्यम से ध्यान आकर्षित करती है, लेकिन यह सब सेक्सुअल आकर्षण का संकेत है। लेकिन वह खुद नहीं जानती कि यह सब अवचेतन स्तर पर हो रहा है। यह घटना महिला खुद रोक नहीं सकती, अगर वह इसे रोकने की कोशिश करती है, तो इसका मतलब है कि वह सेक्सुअल आकर्षण महसूस नहीं कर रही है। इसलिए, जब वह अपने प्रेमी से मिलने जाती है, तो वह पास में मौजूद बच्चों को चुम ले सकती है; ये उसके होंठों की आदतें हैं। दूसरी बात, शारीरिक भाषा विशेषज्ञ महिला की कमर की बात करते हैं, महिला की कमर हजारों वर्षों से कवियों द्वारा एक अविस्मरणीय प्रतीक के रूप में वर्णित की जाती रही है। महिला की कमर प्रजनन का एक प्रतीक मानी जाती है। जब महिला सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो उसकी कमर स्वाभाविक रूप से झूलने लगती है, यह शारीरिक भाषा के विशेषज्ञ कहते हैं। महिला सामान्य रूप से चलती है और जब वह एक पुरुष के प्रति सेक्सुअल आकर्षण महसूस करती है, तो उसकी कमर एक नृत्य की तरह मोड़ खाती है, और इसे महिला के स्वभाव के रूप में माना जाता है। तीसरी बात, महिला की आंखें प्रेम और सेक्सुअल आकर्षण के मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब महिला सेक्सुअल आकर्षण या प्रेम के विचारों में होती है, तो उसकी आंखें फैल जाती हैं और वह पुरुष को और भी अधिक आकर्षक तरीके से देखती है। इस पर भी महिला का कोई नियंत्रण नहीं होता। अगर आप अपनी प्रेमिका या पत्नी में ऐसे बदलावों को देखेंगे, तो इसका मतलब है कि आपको अगले रोमांस की दिशा में बढ़ना चाहिए।

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सेक्स में पुरुष कमजोर होता है। अक्सर आप देखते हैं कि मर्द किसी स्त्री को देखता है कि सेक्स करने, उस स्त्री का जिस्म पाने के लिए उत्तेजित हो जाता है । उत्तेजना मन मे , दिमाग में, और तन में भी आ जाता है पुरुष का लिंग उत्तेजित होकर खड़ा हो जाता है कई बार तो कुछ के साथ ऐसा भी है कि जेब मे हाथ रखकर लिंग को पकड़ना पड़ता है इस तरह की कहीं लिंग शरीर से उखड़कर भाग न जाय । कई पुरुषों का तो ऐसा हाल हो जाता कि वीर्य कपड़े में ही स्खलित हो जाता है । ठीक इसके विपरीत आप स्त्री में ऐसा नही देखेंगे जितना पुरुष में देखेंगे। स्त्री को जब तक प्यार से छुआ न जाये, चूमा न जाये, स्तन दबाया न जाय उसकी योनि गीली नही होती है। बहुत कम स्त्री होती हैं जिनका योनि किसी पुरुष को देखकर गीली हो जाय । बाबा कामपुरुष इस दोनों का मतलब समझिए ! जो वस्तु हल्का ,कमजोर होता है वो जल्दी हिल जाएगा,उखड़ जाएगा और जो मजबूत, भारी होता है वो लम्बा समय तक टिकता है, उखड़ता नहीं । कमजोर पुरुष जल्दी उत्तेजित हो जाता है पर स्त्री जल्दी सेक्स के लिए उत्तेजित नही होती है ,स्त्री को उत्तेजित करने के लिए मुहब्ब्त करना पड़ता है ,प्यार का स्पर्श देना पड़ता है ये सब करने के लिए पुरुष का मजबूत होना जरूरी है तभी स्त्री की योनि गीली होती है और सम्भोग में आनन्द आता है
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सेक्स में पुरुष कमजोर होता है। अक्सर आप देखते हैं कि मर्द किसी स्त्री को देखता है कि सेक्स करने, उस स्त्री का जिस्म पाने के लिए उत्तेजित हो जाता है । उत्तेजना मन मे , दिमाग में, और तन में भी आ जाता है पुरुष का लिंग उत्तेजित होकर खड़ा हो जाता है कई बार तो कुछ के साथ ऐसा भी है कि जेब मे हाथ रखकर लिंग को पकड़ना पड़ता है इस तरह की कहीं लिंग शरीर से उखड़कर भाग न जाय । कई पुरुषों का तो ऐसा हाल हो जाता कि वीर्य कपड़े में ही स्खलित हो जाता है । ठीक इसके विपरीत आप स्त्री में ऐसा नही देखेंगे जितना पुरुष में देखेंगे। स्त्री को जब तक प्यार से छुआ न जाये, चूमा न जाये, स्तन दबाया न जाय उसकी योनि गीली नही होती है। बहुत कम स्त्री होती हैं जिनका योनि किसी पुरुष को देखकर गीली हो जाय । बाबा कामपुरुष इस दोनों का मतलब समझिए ! जो वस्तु हल्का ,कमजोर होता है वो जल्दी हिल जाएगा,उखड़ जाएगा और जो मजबूत, भारी होता है वो लम्बा समय तक टिकता है, उखड़ता नहीं । कमजोर पुरुष जल्दी उत्तेजित हो जाता है पर स्त्री जल्दी सेक्स के लिए उत्तेजित नही होती है ,स्त्री को उत्तेजित करने के लिए मुहब्ब्त करना पड़ता है ,प्यार का स्पर्श देना पड़ता है ये सब करने के लिए पुरुष का मजबूत होना जरूरी है तभी स्त्री की योनि गीली होती है और सम्भोग में आनन्द आता है

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एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तो आपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है--एक तो वीर्य-कण की देह--दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है--न दिखाई पड़ने वाली। संभोग में वीर्य-कण जैसे ही स्त्री योनि में प्रवेश करते हैं, दो घंटे तक जीवित रहते हैं। अगर इस दो घंटे के बीच में उन्होंने स्त्री अंडे को उपलब्ध कर लिया, पा लिया, तो जो वीर्य-कण स्त्री अंडे के निकट पहुंचकर स्त्री अंडे में प्रवेश कर जाएगा, जन्म हो गया--एक नए व्यक्तित्व का। लेकिन लंबी यात्रा है वीर्य-कणों के लिए। एक संभोग में लाखों वीर्य-कण छूटते हैं और उनमें से एक पहुंच पाता है। लाखों नष्ट हो जाते हैं। और एक भी सदा नहीं पहुंच पाता, कभी-कभी पहुँच पाता है। शेष समय तो सभी नष्ट हो जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वीर्य-कण जीवित भी होते हैं और मुर्दा भी होते हैं। वीर्य के दो अंग हैं। जब तक वीर्य जीवित है, तब तक उसमें दो चीजें हैं--उसकी देह भी है, और उसकी ऊर्जा, आत्मा भी है। दो घंटे में ऊर्जा मुक्त हो जाएगी, वीर्य कण मुर्दा पड़ा रह जाएगा। अगर इस ऊर्जा-कण के रहते ही स्त्री-कण से मिलन हो गया, तो ही जीवन का जन्म होगा। अगर इस ऊर्जा के हट जाने पर मिलन हुआ, तो जीवन का जन्म नहीं होगा। इसलिए वीर्य-कण तो केवल देह है, वाहन है। वह जो ऊर्जा है, जो उसे जीवित बनाती है, वही असली वीर्य है। वीर्य-कण की देह तो उत्थान को उपलब्ध नहीं हो सकती, उसका तो पतन ही होगा। लेकिन उस छोटे से न दिखाई पड़ने वाले वीर्य-कण में जो जीवन की ऊर्जा है, वह ऊपर की तरफ भाग रही है। उसके लिए मार्ग की कोई जरूरत नहीं है। वह अदृश्य है। अगर यही जीवन-ऊर्जा स्त्री-कण से मिल जाएगी, तो एक व्यक्ति का जन्म हो जाएगा। अगर यही ऊर्जा योग और तंत्र की प्रणाली से मुक्त कर ली जाए वीर्य-कण से, तो आपके सहस्रार तक पहुंच सकती है। और जब सहस्रार तक पहुंचती है यह वीर्य-ऊर्जा, तो आपके लिए नए लोक का जन्म होता है। आप का पुनर्जन्म हो जाता है। इस वीर्य-ऊर्जा के जाने के लिए कोई स्थूल, भौतिक मार्ग आवश्यक नहीं है। यह बिना भौतिक मार्ग के यात्रा कर लेती है। इसलिए जिन सप्त चक्रों की हम बातें करते हैं, वे सात चक्र दृश्य नहीं हैं। उन अदृश्य चक्रों से ही यह ऊर्जा ऊपर की तरफ उठती है। इस ऊर्जा का नाम "वीर्य" है। वीर्य बीज है, जैसे पौधों का बीज है, ऐसे आदमी का बीज है। उस बीज को तोड़कर भीतर की ऊर्जा का पता नहीं चलता। क्योंकि तोड़ते ही वह ऊर्जा आकाश में लीन हो जाती है। आपका वीर्य-कण दो तरह की आकांक्षाएं रखता है। एक आकांक्षा तो रखता है बाहर की स्त्री से मिलकर, फिर एक नए जीवन की पूर्णता पैदा करने की। एक और गहन आकांक्षा है, जिसको हम अध्यात्म कहते हैं, वह आकांक्षा है, स्वयं के भीतर की छिपी स्त्री या स्वयं के भीतर छिपे पुरुष से मिलने की। अगर बाहर की स्त्री से मिलना होता है, तो संभोग घटित होता है। वह भी सुखद है, क्षण भर के लिए। अगर भीतर की स्त्री से मिलना होता है, तो समाधि घटित होती है। वह महासुख है, और सदा के लिए। क्योंकि बाहर की स्त्री से कितनी देर मिलिएगा ? भीतर की स्त्री से मिलना शाश्वत हो सकता है। उस शाश्वत से मिलने के कारण ही समाधि फलित होती है।
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एक वीर्य-कण दो चीजों से बना है। तभी तो आपका पूरा शरीर भी दो चीजों से बन पाता है--एक तो वीर्य-कण की देह--दिखाई पड़ने वाली और एक वीर्य-कण की आत्मा है, ऊर्जा है--न दिखाई पड़ने वाली। संभोग में वीर्य-कण जैसे ही स्त्री योनि में प्रवेश करते हैं, दो घंटे तक जीवित रहते हैं। अगर इस दो घंटे के बीच में उन्होंने स्त्री अंडे को उपलब्ध कर लिया, पा लिया, तो जो वीर्य-कण स्त्री अंडे के निकट पहुंचकर स्त्री अंडे में प्रवेश कर जाएगा, जन्म हो गया--एक नए व्यक्तित्व का। लेकिन लंबी यात्रा है वीर्य-कणों के लिए। एक संभोग में लाखों वीर्य-कण छूटते हैं और उनमें से एक पहुंच पाता है। लाखों नष्ट हो जाते हैं। और एक भी सदा नहीं पहुंच पाता, कभी-कभी पहुँच पाता है। शेष समय तो सभी नष्ट हो जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वीर्य-कण जीवित भी होते हैं और मुर्दा भी होते हैं। वीर्य के दो अंग हैं। जब तक वीर्य जीवित है, तब तक उसमें दो चीजें हैं--उसकी देह भी है, और उसकी ऊर्जा, आत्मा भी है। दो घंटे में ऊर्जा मुक्त हो जाएगी, वीर्य कण मुर्दा पड़ा रह जाएगा। अगर इस ऊर्जा-कण के रहते ही स्त्री-कण से मिलन हो गया, तो ही जीवन का जन्म होगा। अगर इस ऊर्जा के हट जाने पर मिलन हुआ, तो जीवन का जन्म नहीं होगा। इसलिए वीर्य-कण तो केवल देह है, वाहन है। वह जो ऊर्जा है, जो उसे जीवित बनाती है, वही असली वीर्य है। वीर्य-कण की देह तो उत्थान को उपलब्ध नहीं हो सकती, उसका तो पतन ही होगा। लेकिन उस छोटे से न दिखाई पड़ने वाले वीर्य-कण में जो जीवन की ऊर्जा है, वह ऊपर की तरफ भाग रही है। उसके लिए मार्ग की कोई जरूरत नहीं है। वह अदृश्य है। अगर यही जीवन-ऊर्जा स्त्री-कण से मिल जाएगी, तो एक व्यक्ति का जन्म हो जाएगा। अगर यही ऊर्जा योग और तंत्र की प्रणाली से मुक्त कर ली जाए वीर्य-कण से, तो आपके सहस्रार तक पहुंच सकती है। और जब सहस्रार तक पहुंचती है यह वीर्य-ऊर्जा, तो आपके लिए नए लोक का जन्म होता है। आप का पुनर्जन्म हो जाता है। इस वीर्य-ऊर्जा के जाने के लिए कोई स्थूल, भौतिक मार्ग आवश्यक नहीं है। यह बिना भौतिक मार्ग के यात्रा कर लेती है। इसलिए जिन सप्त चक्रों की हम बातें करते हैं, वे सात चक्र दृश्य नहीं हैं। उन अदृश्य चक्रों से ही यह ऊर्जा ऊपर की तरफ उठती है। इस ऊर्जा का नाम "वीर्य" है। वीर्य बीज है, जैसे पौधों का बीज है, ऐसे आदमी का बीज है। उस बीज को तोड़कर भीतर की ऊर्जा का पता नहीं चलता। क्योंकि तोड़ते ही वह ऊर्जा आकाश में लीन हो जाती है। आपका वीर्य-कण दो तरह की आकांक्षाएं रखता है। एक आकांक्षा तो रखता है बाहर की स्त्री से मिलकर, फिर एक नए जीवन की पूर्णता पैदा करने की। एक और गहन आकांक्षा है, जिसको हम अध्यात्म कहते हैं, वह आकांक्षा है, स्वयं के भीतर की छिपी स्त्री या स्वयं के भीतर छिपे पुरुष से मिलने की। अगर बाहर की स्त्री से मिलना होता है, तो संभोग घटित होता है। वह भी सुखद है, क्षण भर के लिए। अगर भीतर की स्त्री से मिलना होता है, तो समाधि घटित होती है। वह महासुख है, और सदा के लिए। क्योंकि बाहर की स्त्री से कितनी देर मिलिएगा ? भीतर की स्त्री से मिलना शाश्वत हो सकता है। उस शाश्वत से मिलने के कारण ही समाधि फलित होती है।

तृप्त ...🖤

434,571 Aufrufe • vor 1 Jahr

सभी स्त्री को समर्पित 🙏🙏 आखिरकार महिलाएं सेक्स क्यों चाहती हैं.. अक्सर से,क्स से जुड़ी बातें हम यानी महिलाएं खुलकर नहीं करती हैं। सामाज के हिसाब से ऐसी बाते करना एक महिला को शोभा नहीं देता है। से,क्स एक महिला और पुरुष दोनों की ही बेसिक बॉडी नीड होती है। हो सकता है कई लोगों को इसमें इंटरेस्ट जरा कम हो लेकिन जिन्हे से,क्स पसंद होता है वो एक टाइम पर इसके आदी भी हो जाते हैं। जब बात आती है महिलाओं में से,क्स की तो वो अपनी बातें खुल कर नहीं रख पाती हैं। बता दें, से,क्स महिलाओं को स्वस्थ रखने में काफी मदद कर सकता है। से,क्स के दौरान शरीर और मन दोनों को फायदा पहुंचता है। यह शरीर को एक्सरसाइज की तरह काम करने में मदद करता है जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बना रहता है। यह दिल की सेहत, शरीर की ऊर्जा को बढ़ाने में, नींद को बेहतर बनाने में, तनाव को कम करने में और सतही तौर पर आनंद के अनुभव करने में मदद करता है। इसके अलावा, से,क्स उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है जो संभोग की समस्याओं से पीड़ित हैं जैसे कि से,क्स ड्राइव में कमी या तनाव संबंधी मुद्दों से ग्रस्त हैं। इसलिए, महिलाओं के लिए से,क्स जरूरी होता है, ताकि उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। इसलिए, से,क्स के बारे में सोचने से पहले, यह जानना जरूरी होता है कि आपके शारीर और मन के लिए इससे क्या फायदा हो सकता है और आप इसे कैसे संभव तरीके से कर सकती हैं। यह पोस्ट जागरूकता के लिये है अच्छी लगे तो शेयर जरूर करें
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सभी स्त्री को समर्पित 🙏🙏 आखिरकार महिलाएं सेक्स क्यों चाहती हैं.. अक्सर से,क्स से जुड़ी बातें हम यानी महिलाएं खुलकर नहीं करती हैं। सामाज के हिसाब से ऐसी बाते करना एक महिला को शोभा नहीं देता है। से,क्स एक महिला और पुरुष दोनों की ही बेसिक बॉडी नीड होती है। हो सकता है कई लोगों को इसमें इंटरेस्ट जरा कम हो लेकिन जिन्हे से,क्स पसंद होता है वो एक टाइम पर इसके आदी भी हो जाते हैं। जब बात आती है महिलाओं में से,क्स की तो वो अपनी बातें खुल कर नहीं रख पाती हैं। बता दें, से,क्स महिलाओं को स्वस्थ रखने में काफी मदद कर सकता है। से,क्स के दौरान शरीर और मन दोनों को फायदा पहुंचता है। यह शरीर को एक्सरसाइज की तरह काम करने में मदद करता है जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बना रहता है। यह दिल की सेहत, शरीर की ऊर्जा को बढ़ाने में, नींद को बेहतर बनाने में, तनाव को कम करने में और सतही तौर पर आनंद के अनुभव करने में मदद करता है। इसके अलावा, से,क्स उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है जो संभोग की समस्याओं से पीड़ित हैं जैसे कि से,क्स ड्राइव में कमी या तनाव संबंधी मुद्दों से ग्रस्त हैं। इसलिए, महिलाओं के लिए से,क्स जरूरी होता है, ताकि उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। इसलिए, से,क्स के बारे में सोचने से पहले, यह जानना जरूरी होता है कि आपके शारीर और मन के लिए इससे क्या फायदा हो सकता है और आप इसे कैसे संभव तरीके से कर सकती हैं। यह पोस्ट जागरूकता के लिये है अच्छी लगे तो शेयर जरूर करें

तृप्त ...🖤

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सेक्स के लिए युवक-युवतियों में तरह-तरह के जुगाड़ कोई नई बात नहीं है..??? इतिहास गवाह है कि केवल जुगाड़ ही नहीं, बल्कि सत्ता, युद्ध और बड़े-बड़े संघर्षों की जड़ में भी यह आकर्षण रहा है..??? यह आकर्षण इतना प्रबल है कि ऋषि विश्वामित्र जैसे महान तपस्वियों की वर्षों की साधना को भी विचलित कर गया था। दरअसल, यह आकर्षण मानव जाति के अस्तित्व और निरंतरता के लिए आवश्यक है। सवाल यह नहीं कि यह आकर्षण क्यों है—सवाल यह है कि आज यह इतना बेचैन और बेकाबू क्यों दिखाई देता है? कहा जाता है, “प्यार में पड़ा व्यक्ति सबसे ज़्यादा झूठ बोलता है।” शायद इसलिए क्योंकि समाज ने प्रेम और सेक्स दोनों को स्वाभाविक मानने के बजाय उन्हें छुपाने की चीज़ बना दिया है। हमारे सामाजिक ढाँचे में आज भी सेक्स पर खुलकर बात करना अश्लील समझा जाता है, जबकि भोजन और पानी की तरह यह भी एक मानवीय आवश्यकता है। ऊपर से आज की जीवन-शैली, मोबाइल फोन पर पोर्न सामग्री की सहज उपलब्धता और पश्चिमी संस्कृति का आकर्षण—इन सबने मिलकर युवक-युवतियों के मन में इसे और अधिक केंद्र में ला खड़ा किया है। जब ज़रूरत को स्वीकार करने का स्वस्थ रास्ता बंद हो, तो लोग जुगाड़ ढूँढते हैं—यही मानव स्वभाव है। शायद यही कारण है कि आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, पार्कों, ऐतिहासिक स्थलों, मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे दृश्य आम होते जा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे शहरों के कई पार्क और पर्यटन स्थल इसके उदाहरण बन चुके हैं। यह आकर्षण इतना तीव्र है कि जितनी ताक़त से चुंबक लोहे को खींचता है, उससे कहीं अधिक बल से यह मनुष्य को अपनी ओर खींचता है। हँसी-मज़ाक में कहा जा सकता है—अगर यही एकाग्रता पढ़ाई में लग जाए, तो न जाने क्या-क्या कर लें! लेकिन सच यह भी है कि इसमें केवल युवक-युवतियों का दोष नहीं है। यह उम्र, हार्मोन और जवानी का स्वाभाविक उबाल है, जो इंसान से कई बार विवेक से परे फैसले करवा देता है। समस्या व्यक्ति से अधिक व्यवस्था और सामाजिक सोच की है। समाधान रोक-टोक या गाली-गलौज नहीं, बल्कि संवाद, समझ और सही दिशा देने में है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम चारित्रिक पतन की ओर न जाये। अगर नवयुवक/नवयुवतियों को समय से चरित्र निर्माण करने की शिक्षा और जीवन में संस्कारी होने की शिक्षा दी जाए तो सम्भवतः वो सेक्स को लेकर इतने उतावले नहीं होंगे और उसके महत्व(सही/गलत) को भी समझेंगे। यह विषय हँसी-मज़ाक का नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक मंथन का है। यह किसी भी प्रकार से शर्म का विषय नहीं होना चाहिए क्योंकि इसी के द्वारा एक नया जीव जन्म लेता है और सृष्टि का सृजन होता है। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?? अपने अनमोल विचार कमेंट्स में जरूर दीजियेगा।🙏
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सेक्स के लिए युवक-युवतियों में तरह-तरह के जुगाड़ कोई नई बात नहीं है..??? इतिहास गवाह है कि केवल जुगाड़ ही नहीं, बल्कि सत्ता, युद्ध और बड़े-बड़े संघर्षों की जड़ में भी यह आकर्षण रहा है..??? यह आकर्षण इतना प्रबल है कि ऋषि विश्वामित्र जैसे महान तपस्वियों की वर्षों की साधना को भी विचलित कर गया था। दरअसल, यह आकर्षण मानव जाति के अस्तित्व और निरंतरता के लिए आवश्यक है। सवाल यह नहीं कि यह आकर्षण क्यों है—सवाल यह है कि आज यह इतना बेचैन और बेकाबू क्यों दिखाई देता है? कहा जाता है, “प्यार में पड़ा व्यक्ति सबसे ज़्यादा झूठ बोलता है।” शायद इसलिए क्योंकि समाज ने प्रेम और सेक्स दोनों को स्वाभाविक मानने के बजाय उन्हें छुपाने की चीज़ बना दिया है। हमारे सामाजिक ढाँचे में आज भी सेक्स पर खुलकर बात करना अश्लील समझा जाता है, जबकि भोजन और पानी की तरह यह भी एक मानवीय आवश्यकता है। ऊपर से आज की जीवन-शैली, मोबाइल फोन पर पोर्न सामग्री की सहज उपलब्धता और पश्चिमी संस्कृति का आकर्षण—इन सबने मिलकर युवक-युवतियों के मन में इसे और अधिक केंद्र में ला खड़ा किया है। जब ज़रूरत को स्वीकार करने का स्वस्थ रास्ता बंद हो, तो लोग जुगाड़ ढूँढते हैं—यही मानव स्वभाव है। शायद यही कारण है कि आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, पार्कों, ऐतिहासिक स्थलों, मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे दृश्य आम होते जा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे शहरों के कई पार्क और पर्यटन स्थल इसके उदाहरण बन चुके हैं। यह आकर्षण इतना तीव्र है कि जितनी ताक़त से चुंबक लोहे को खींचता है, उससे कहीं अधिक बल से यह मनुष्य को अपनी ओर खींचता है। हँसी-मज़ाक में कहा जा सकता है—अगर यही एकाग्रता पढ़ाई में लग जाए, तो न जाने क्या-क्या कर लें! लेकिन सच यह भी है कि इसमें केवल युवक-युवतियों का दोष नहीं है। यह उम्र, हार्मोन और जवानी का स्वाभाविक उबाल है, जो इंसान से कई बार विवेक से परे फैसले करवा देता है। समस्या व्यक्ति से अधिक व्यवस्था और सामाजिक सोच की है। समाधान रोक-टोक या गाली-गलौज नहीं, बल्कि संवाद, समझ और सही दिशा देने में है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि हम चारित्रिक पतन की ओर न जाये। अगर नवयुवक/नवयुवतियों को समय से चरित्र निर्माण करने की शिक्षा और जीवन में संस्कारी होने की शिक्षा दी जाए तो सम्भवतः वो सेक्स को लेकर इतने उतावले नहीं होंगे और उसके महत्व(सही/गलत) को भी समझेंगे। यह विषय हँसी-मज़ाक का नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक मंथन का है। यह किसी भी प्रकार से शर्म का विषय नहीं होना चाहिए क्योंकि इसी के द्वारा एक नया जीव जन्म लेता है और सृष्टि का सृजन होता है। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?? अपने अनमोल विचार कमेंट्स में जरूर दीजियेगा।🙏

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सम्भोग का प्राथमिक अनुभव शरीर से ज्यादा गहरा नहीं होता। लेकिन शरीर के अनुभव पर ही जो रुक जाते हैं, वे सेक्स के पूरे अनुभव को उपलब्ध नहीं होते। उन्हें, मैंने जो गहराइयों की बातें कही हैं, उसका उन्हें कोई भी पता नहीं चल सकता। और अधिक लोग शरीर के तल पर ही रुक गए हैं। इस संबंध में यह भी जान लेना जरूरी है कि जिन देशों में भी प्रेम के बिना विवाह होता है, उस देश में सेक्स शरीर के तल पर ही रुक जाता है, उससे गहरा नहीं जा सकता। विवाह दो शरीरों का हो सकता है, विवाह दो आत्माओं का नहीं। दो आत्माओं का प्रेम हो सकता है। तो अगर प्रेम से विवाह निकलता हो, तब तो विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है। और अगर विवाह दो पंडितों के और दो ज्योतिषियों के हिसाब-किताब से निकलता हो, और जाति के विचार से निकलता हो, और धन के विचार से निकलता हो, तो वैसा विवाह कभी भी शरीर से ज्यादा गहरा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे विवाह का एक फायदा है। शरीर मन की बजाय ज्यादा स्थिर चीज है। इसलिए शरीर जिन समाजों में विवाह का आधार है, उन समाजों में विवाह सुस्थिर होगा, जीवन भर चल जाएगा। शरीर अस्थिर चीज नहीं है। शरीर बहुत स्थिर चीज है। उसमें परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे आता है और पता भी नहीं चलता। शरीर जड़ता का तल है। इसलिए जिन समाजों ने यह समझा कि विवाह को स्थिर बनाना जरूरी है- एक ही विवाह पर्याप्त हो, बदलाहट की जरूरत न पड़े, उनको प्रेम अलग कर देना पड़ा। क्योंकि प्रेम होता है मन से और मन चंचल है। जो समाज प्रेम के आधार पर विवाह को निर्मित करेंगे, उन समाजों में तलाक अनिवार्य होगा। उन समाजों में विवाह परिवर्तित होगा; विवाह स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। क्योंकि प्रेम तरल है। मन चंचल है। शरीर स्थिर और जड़ है। आपके घर में एक पत्थर पड़ा हुआ है। सुबह पत्थर पड़ा था, सांझ भी पत्थर वहीं पड़ा रहेगा। सुबह एक फूल खिला था, सांझ तक मुर्झा जाएगा और गिर जाएगा। फूल जिंदा है, जन्मेगा, जीएगा, मरेगा। पत्थर मुर्दा है, वैसे का वैसा सुबह था, वैसा ही शाम पड़ा रहेगा। पत्थर बहुत स्थिर है। विवाह पत्थर की तरह है। शरीर के तल पर जो विवाह है, वह स्थिरता लाता है, समाज के हित में है। लेकिन एक-एक व्यक्ति के अहित में है। क्योंकि वह स्थिरता शरीर के तल पर लाई गई है और प्रेम से बचा गया है। इसलिए शरीर के तल से ज्यादा पति और पत्नी का संभोग और सेक्स नहीं पहुंच पाता गहरे में। एक यांत्रिक, एक मैकेनिकल रूटीन हो जाती है। एक यंत्र की भांति जीवन हो जाता है सेक्स का। उस अनुभव को रिपीट करते रहते हैं और जड़ होते चले जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा गहराई कभी भी नहीं मिलती। जहां प्रेम के बिना विवाह होता है उस विवाह में और वेश्या के पास जाने में बुनियादी भेद नहीं है, थोड़ा सा भेद है। बुनियादी नहीं है वह। वेश्या को आप एक दिन के लिए खरीदते हैं और पत्नी को आप पूरे जीवन के लिए खरीदते हैं। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जहां प्रेम नहीं है, वहां खरीदना ही है, चाहे एक दिन के लिए खरीदो, चाहे पूरी जिंदगी के लिए खरीदो। हालांकि साथ रहने से रोज-रोज एक तरह का संबंध पैदा हो जाता है एसोसिएशन से। लोग उसी को प्रेम समझ लेते हैं। वह प्रेम नहीं है। प्रेम और ही बात है। शरीर के तल पर विवाह है इसलिए शरीर के तल से गहरा संबंध कभी भी नहीं उत्पन्न हो पाता। यह एक तल है। दूसरा तल है सेक्स का--मन का तल, साइकोलाजिकल । वात्स्यायन से लेकर पंडित कोक तक जिन लोगों ने भी इस तरह के शास्त्र लिखे हैं सेक्स के बाबत, वे शरीर के तल से गहरे नहीं जाते। दूसरा तल है मानसिक। जो लोग प्रेम करते हैं और फिर विवाह में बंधते हैं, उनका सेक्स शरीर के तल से थोड़ा गहरा जाता है। वह मन तक जाता है। उसकी गहराई साइकोलाजिकल है। लेकिन वह भी रोज-रोज पुनरुक्त होने से थोड़े दिनों में शरीर के तल पर आ जाता है और यांत्रिक हो जाता है। पश्चिम ने जो व्यवस्था विकसित की है दो सौ वर्षों में प्रेम- विवाह की, वह मानसिक तल तक सेक्स को ले जाती है। और इसीलिए पश्चिम में समाज अस्तव्यस्त हो गया है; क्योंकि मन का कोई भरोसा नहीं है। वह आज कहता है कुछ, कल कुछ कहने लगता है। सुबह कुछ कहता है, सांझ कुछ कहने लगता है। घड़ी भर पहले कुछ कहता है, घड़ी भर बाद कुछ कहने लगता है। शायद आपने सुना होगा कि बायरन ने जब शादी की, तो कहते हैं कि तब तक वह कोई साठ-सत्तर स्त्रियों से संबंधित रह चुका था। एक स्त्री ने उसे मजबूर ही कर दिया विवाह के लिए। तो उसने विवाह किया। और जब वह चर्च से उतर रहा था विवाह करके अपनी पत्नी का हाथ हाथ में लेकर घंटियां बज रही हैं चर्च की; मोमबत्तियां अभी जो जलाई गई हैं, जल रही हैं; अभी जो मित्र स्वागत करने आए थे, वे विदा हो रहे हैं; और वह अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर 1/2
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सम्भोग का प्राथमिक अनुभव शरीर से ज्यादा गहरा नहीं होता। लेकिन शरीर के अनुभव पर ही जो रुक जाते हैं, वे सेक्स के पूरे अनुभव को उपलब्ध नहीं होते। उन्हें, मैंने जो गहराइयों की बातें कही हैं, उसका उन्हें कोई भी पता नहीं चल सकता। और अधिक लोग शरीर के तल पर ही रुक गए हैं। इस संबंध में यह भी जान लेना जरूरी है कि जिन देशों में भी प्रेम के बिना विवाह होता है, उस देश में सेक्स शरीर के तल पर ही रुक जाता है, उससे गहरा नहीं जा सकता। विवाह दो शरीरों का हो सकता है, विवाह दो आत्माओं का नहीं। दो आत्माओं का प्रेम हो सकता है। तो अगर प्रेम से विवाह निकलता हो, तब तो विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है। और अगर विवाह दो पंडितों के और दो ज्योतिषियों के हिसाब-किताब से निकलता हो, और जाति के विचार से निकलता हो, और धन के विचार से निकलता हो, तो वैसा विवाह कभी भी शरीर से ज्यादा गहरा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे विवाह का एक फायदा है। शरीर मन की बजाय ज्यादा स्थिर चीज है। इसलिए शरीर जिन समाजों में विवाह का आधार है, उन समाजों में विवाह सुस्थिर होगा, जीवन भर चल जाएगा। शरीर अस्थिर चीज नहीं है। शरीर बहुत स्थिर चीज है। उसमें परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे आता है और पता भी नहीं चलता। शरीर जड़ता का तल है। इसलिए जिन समाजों ने यह समझा कि विवाह को स्थिर बनाना जरूरी है- एक ही विवाह पर्याप्त हो, बदलाहट की जरूरत न पड़े, उनको प्रेम अलग कर देना पड़ा। क्योंकि प्रेम होता है मन से और मन चंचल है। जो समाज प्रेम के आधार पर विवाह को निर्मित करेंगे, उन समाजों में तलाक अनिवार्य होगा। उन समाजों में विवाह परिवर्तित होगा; विवाह स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। क्योंकि प्रेम तरल है। मन चंचल है। शरीर स्थिर और जड़ है। आपके घर में एक पत्थर पड़ा हुआ है। सुबह पत्थर पड़ा था, सांझ भी पत्थर वहीं पड़ा रहेगा। सुबह एक फूल खिला था, सांझ तक मुर्झा जाएगा और गिर जाएगा। फूल जिंदा है, जन्मेगा, जीएगा, मरेगा। पत्थर मुर्दा है, वैसे का वैसा सुबह था, वैसा ही शाम पड़ा रहेगा। पत्थर बहुत स्थिर है। विवाह पत्थर की तरह है। शरीर के तल पर जो विवाह है, वह स्थिरता लाता है, समाज के हित में है। लेकिन एक-एक व्यक्ति के अहित में है। क्योंकि वह स्थिरता शरीर के तल पर लाई गई है और प्रेम से बचा गया है। इसलिए शरीर के तल से ज्यादा पति और पत्नी का संभोग और सेक्स नहीं पहुंच पाता गहरे में। एक यांत्रिक, एक मैकेनिकल रूटीन हो जाती है। एक यंत्र की भांति जीवन हो जाता है सेक्स का। उस अनुभव को रिपीट करते रहते हैं और जड़ होते चले जाते हैं। लेकिन उससे ज्यादा गहराई कभी भी नहीं मिलती। जहां प्रेम के बिना विवाह होता है उस विवाह में और वेश्या के पास जाने में बुनियादी भेद नहीं है, थोड़ा सा भेद है। बुनियादी नहीं है वह। वेश्या को आप एक दिन के लिए खरीदते हैं और पत्नी को आप पूरे जीवन के लिए खरीदते हैं। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जहां प्रेम नहीं है, वहां खरीदना ही है, चाहे एक दिन के लिए खरीदो, चाहे पूरी जिंदगी के लिए खरीदो। हालांकि साथ रहने से रोज-रोज एक तरह का संबंध पैदा हो जाता है एसोसिएशन से। लोग उसी को प्रेम समझ लेते हैं। वह प्रेम नहीं है। प्रेम और ही बात है। शरीर के तल पर विवाह है इसलिए शरीर के तल से गहरा संबंध कभी भी नहीं उत्पन्न हो पाता। यह एक तल है। दूसरा तल है सेक्स का--मन का तल, साइकोलाजिकल । वात्स्यायन से लेकर पंडित कोक तक जिन लोगों ने भी इस तरह के शास्त्र लिखे हैं सेक्स के बाबत, वे शरीर के तल से गहरे नहीं जाते। दूसरा तल है मानसिक। जो लोग प्रेम करते हैं और फिर विवाह में बंधते हैं, उनका सेक्स शरीर के तल से थोड़ा गहरा जाता है। वह मन तक जाता है। उसकी गहराई साइकोलाजिकल है। लेकिन वह भी रोज-रोज पुनरुक्त होने से थोड़े दिनों में शरीर के तल पर आ जाता है और यांत्रिक हो जाता है। पश्चिम ने जो व्यवस्था विकसित की है दो सौ वर्षों में प्रेम- विवाह की, वह मानसिक तल तक सेक्स को ले जाती है। और इसीलिए पश्चिम में समाज अस्तव्यस्त हो गया है; क्योंकि मन का कोई भरोसा नहीं है। वह आज कहता है कुछ, कल कुछ कहने लगता है। सुबह कुछ कहता है, सांझ कुछ कहने लगता है। घड़ी भर पहले कुछ कहता है, घड़ी भर बाद कुछ कहने लगता है। शायद आपने सुना होगा कि बायरन ने जब शादी की, तो कहते हैं कि तब तक वह कोई साठ-सत्तर स्त्रियों से संबंधित रह चुका था। एक स्त्री ने उसे मजबूर ही कर दिया विवाह के लिए। तो उसने विवाह किया। और जब वह चर्च से उतर रहा था विवाह करके अपनी पत्नी का हाथ हाथ में लेकर घंटियां बज रही हैं चर्च की; मोमबत्तियां अभी जो जलाई गई हैं, जल रही हैं; अभी जो मित्र स्वागत करने आए थे, वे विदा हो रहे हैं; और वह अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर 1/2

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yaduvanshi32's profile picture

स्त्री ने कभी यह घोषणा ही नहीं की कि मेरे पास भी आत्मा है । वह चुपचाप पुरूष के पीछे चल पड़ती है । युधिष्ठिर जैसा अद्भुत आदमी द्रौपदी को जुए में दाँव पर लगा देता है ! फिर भी कोई यह नहीं कहता कि हम कभी युधिष्ठिर को धर्मराज नहीं कहेंगे । नहीं, कोई यह नहीं कहता ! बल्कि कोई कहेगा तो हम कहेंगे कि अधार्मिक आदमी है । नास्तिक आदमी है, इसक़ी बात मत सुनो ! स्‍त्री को जुए पर, दाँव पर लगाया जा सकता है, क्योंकि भारत में स्‍त्री सम्पदा है, सम्पत्ति है । हम हमेशा से कहते रहें हैं, स्‍त्री सम्पत्ति है और इसीलिए तो पति को स्वामी कहते हैं । स्वामी का मतलब आप समझते हैं, क्या होता है ? अगर हिन्दुस्तान की स्‍त्री में थोड़ी भी अक्ल होती तो एक—एक शब्द से उसे ‘#स्वामी’ निकाल बाहर कर देना चाहिए । कोई पुरुष कोई स्‍त्री का स्वामी नहीं हो सकता । स्वामी का क्या मतलब होता है ? स्‍त्री दस्तखत कर देती है अपनी चिट्ठी में ‘ #आपकी_दासी ’ और पति देव बहुत प्रसन्न हो कर पढ़ते हैं । बड़े आनन्दित होते हैं कि बड़ी प्रेम की बात लिखी है । लेकिन इसका पता है कि स्वामी और दास में कभी प्रेम नहीं हो सकता । प्रेम की सम्भावना समान तल पर हो सकती है । स्वामी और दास में क्या प्रेम हो सकता है ? इसलिए हिन्दुस्तान में प्रेम की सम्भावना ही समाप्त हो गयी । हिन्दुस्तान में स्‍त्री—पुरुष साथ रह रहे हैं और साथ रहने को प्रेम समझ रहे हैं ! वह प्रेम नहीं है । हिन्दुस्तान में प्रेम का सरासर धोखा है । साथ रहना भर प्रेम नहीं है । किसी तरह कलह कर के 24 घण्टे गुजार देना, प्रेम नहीं है । ज़िन्दगी गुजार देनी प्रेम नहीं है । प्रेम की पुलक और है । प्रेम की प्रार्थना और है । प्रेम की सुगन्ध और है । प्रेम का सँगीत और है । लेकिन वह कहीं भी नहीं ! असल में गुलाम और दास में, मालिक में और स्वामी में, कोई प्रेम नहीं हो सकता । लेकिन हमारे खयाल में नहीं है यह बात कि पूरब की स्‍त्री नेहु विशेष कर भारत की स्‍त्री ने अपनी आत्मा का अधिकार ही स्वीकार नहीं किया है । आत्मा की आवाज भी नहीं दी है । उसने हिम्मत भी नहीं जुटायी कि वह कह सके कि ‘#मैं_भी_हूँ !

तृप्त ...🖤

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