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ASHWAMEDHA YAAGAM.

26,956 views • 7 months ago •via X (Twitter)

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2 सितंबर को नई दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन कमीशन ऑफिस ने पवन खेड़ा जी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इतना ही नहीं- चुनाव आयोग ने पवन खेड़ा जी, उनकी पत्नी की निजी जानकारी साझा कर दी और जो नोटिस दी गई, उसकी भाषा भी दोषी ठहराने और मानहानि वाली है। यानी गलती खुद चुनाव आयोग की है और आरोप पवन खेड़ा पर लगाए जा रहे हैं। • 2017 में पवन खेड़ा जी जब जंगपुरा शिफ्ट हुए तो उन्होंने नए पते पर नाम ट्रांसफर करने के लिए फॉर्म भरा, जिसके बाद चुनाव आयोग ने उनका नाम नए पते पर शिफ्ट कर दिया। • पवन खेड़ा जी के पास अपने नाम को शिफ्ट कराने की प्रक्रिया की रसीद भी है, जिस पर 18 अगस्त 2017 की तारीख लिखी है। • अब अचानक से आठ साल बाद दो जगह वोटर होने की वो कहानी सामने आई है- जिसमें नाम शिफ्ट करने का काम खुद चुनाव आयोग ने किया है। इस सबके बाद चुनाव आयोग कारण बताओ नोटिस जारी कर पवन खेड़ा जी, उनकी पत्नी का नाम और छवि को बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। : AICC- लॉ, ह्यूमन राइट्स व RTI विभाग के चेयरमैन Abhishek Singhvi जी 📍 दिल्ली

Congress

68,821 views • 1 year ago

नेपाल बाढ़: एक चेतावनी एक तारीख़ नोट कर लीजिए: 2050। उस साल हिमालय की नदियों के साथ कुछ ऐसा होगा जो पिछले 10,000 सालों में नहीं हुआ और उसके बाद जो होगा, वो आपके बच्चों की पूरी ज़िंदगी तय करेगा। वैज्ञानिक इसे कहते हैं पीक वॉटर। समझिए। गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र - इन नदियों में पानी दो जगह से आता है। एक, मॉनसून की बारिश। दो, हिमालय की बर्फ़ का पिघलना। बारिश मौसमी है। दो-चार महीने, पर बर्फ़ साल भर पिघलती है। यही वह चुपचाप बहती धारा है जो गर्मियों में भी नदी को ज़िंदा रखती है। इसीलिए गंगा सदानीरा है, हमेशा जल देने वाली। अब खेल समझिए। गर्मी बढ़ रही है तो ग्लेशियर तेज़ पिघल रहे हैं। तेज़ पिघलेंगे तो नदियों में पानी बढ़ेगा और यही हो रहा है। अभी नदियाँ उफान पर हैं। बाढ़ें बढ़ रही हैं। पर ग्लेशियर कोई अनंत भंडार नहीं है। एक दिन वो इतना सिकुड़ जाएगा कि तेज़ पिघलने पर भी उससे कम पानी निकलेगा। वही मोड़ है पीक वॉटर। उसके पहले हर साल पानी बढ़ता है। उसके बाद हर साल घटता है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र के लिए वो मोड़ आएगा 2050 के आसपास, 25 साल दूर। यानी आज जो बाढ़ें दिख रही हैं, वह समृद्धि का नहीं, अंतिम उफान का संकेत है। दिया बुझने से पहले सबसे तेज़ जलता है और 2050 के बाद का दृश्य - बारिश तब भी होगी, बल्कि और उग्र होगी, पर वह 4 महीने की है। बाकी 8 महीने जो बर्फ़ संभालती थी, वो बर्फ़ घट चुकी होगी तो नई सच्चाई होगी: जुलाई में प्रलय, मार्च में प्रयास, बाढ़ और सूखा एक ही साल में, एक ही नदी में। सोचिए उस खेती का क्या होगा जो हजार साल से नदी की समय पाबंदी पर खड़ी है। उन शहरों का, उन उद्योगों का, उन 2 अरब लोगों का, जिनका जीवन इसी भरोसे पर टिका है कि नदी कल भी वैसी बहेगी जैसी आज बही। अब गहरा प्रश्न। हमें 25 साल पहले बताया जा रहा है। तारीख़ तक बताई जा रही है। फिर भी हम नहीं रुक रहे। क्यों? क्योंकि भोग का स्वभाव ही यही है। वह भविष्य को देखने नहीं देता। जिसे अभी एक और चीज़ चाहिए, वो 2050 की क्या सोचेगा? मन कहता है, अभी तो पानी खूब है। और यही मूर्छा है। जेब से पूँजी जा रही हो और आदमी नक़दी देखकर खुश हो। इससे बड़ा अंधापन क्या होगा? नदी पलटने में 25 साल बचे हैं। मन पलटने में कितने लगेंगे? यह आप तय करेंगे।

Acharya Prashant

36,894 views • 1 month ago