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Ana Sayfaya Dön

Authentication के नाम पर संसद में विपक्ष की आवाज़ चुप कराई जा रही है। पहले भी authentication यानि सत्यापन की बात होती थी। लेकिन संसद में अपनी बात कहने के बाद। भाषण के दो दिन के भीतर स्पीकर या राज्यसभा अध्यक्ष को सबूत दिखाने होते थे। एडवांस में सूचना...

27,476 görüntüleme • 7 gün önce •via X (Twitter)

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बात किसी एक नेहा सिंह की नहीं है, सिर्फ किसी एक गलगोटिया यूनिवर्सिटी की नहीं है। बात झूठ के उस महिमामंडन की है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने एक कला में विकसित कर लिया है। अगर देश का लीडर झूठे दावे कर महानता के पायदान पर खड़ा है, और कोई उसे ग़लत नहीं कहता है, कोई जवाबदेही तय नहीं होती है, तो फिर झूठ बोल कर वाहवाही हासिल करना तो समाज में स्वीकार्य ही माना जाएगा! किसी ने पूछा था कि मोदी जब एक क्लास में गए थे तो दीवार पर पेंट से खिड़की बना दी थी ताकि क्लास सुंदर लगे! बीजेपी के विज्ञापन, जिसमें चीन के फ्लाइओवर और सड़कों को गुजराती दिखाया गया, उस पर आपत्ति हुई थी? कोविड की मौतें हो या कोई भी डेटा, सच छुपाना और ग़लत तथ्य परोसना अगर सरकार की सफलता मानी जाएगी, तो देश वही तो सीखेगा। आपत्ति सिर्फ़ गलगोटिया यूनिवर्सिटी या नेहा सिंह के झूठ पर नहीं होनी चाहिए। फ़िक्र उन स्टूडेंट्स की कीजिए, जो इस झूठ के माहौल में शिक्षा पाने का भ्रम पाले हुए हैं।

Gurdeep Singh Sappal

13,072 görüntüleme • 5 ay önce

गिरिजा जी ने पूछा अगर Rahul Gandhi बिना प्रकाशित हुई किताब के अंश पढ़ रहे हैं तो क्या ये सदन के नियमों के विरुद्ध है? नहीं है! सदन में कोई भी सांसद किसी भी अखबार, किताब, रिपोर्ट के आधार पर या फिर अपनी निजी जानकारी के आधार पर भी कोई भी बात कह सकता है। सांसद का ये अधिकार लोकसभा के नियमों द्वारा सुरक्षित है। सदन में कही बात पर कोई कोर्ट भी कार्यवाही नहीं कर सकती है। ये अधिकार हैं ही इसलिए कि सांसदों को सरकार की जवाबदेही तय करने की शक्ति मिले। जब तक जनरल नरवाणे ये मानते हैं कि जो अंश राहुल गांधी ने सदन में पढ़े हैं, वो उन्होंने ही लिखे हैं, तब तक उन्हें सदन में उठाने का राहुल जी को पूरा अधिकार है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जानकारी का सोर्स क्या था। यही संसदीय व्यवस्था है। Congress Mallikarjun Kharge

Gurdeep Singh Sappal

26,835 görüntüleme • 5 ay önce

मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा जी तथा पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे जी की दिल्ली यात्रा को लेकर प्रश्न के उत्तर में : ये अंदरूनी पार्टी के मामले हैं जबसे धनखड़ साहब का एपिसोड हुआ है तब से गवर्नमेंट खुद डिफेंस में भी आ गई है । इस संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति धनखड़ साहब ने, धनखड़ साहब से शिकायत कांग्रेस की बहुत रही है विपक्ष की रही है, विपक्ष की भी रही है पार्टियों की, परंतु धनखड़ साहब को जिस रूप में मजबूर किया गया या वो खुद इस्तीफा दिया उन्होंने, इस्तीफा दिलवाया गया ये तमाम बातें रहस्य बनी हुई हैं तो संवैधानिक पदों पर जो बैठते हैं एक पार्लियामेंट के मेंबर भी इस्तीफा देता है या कोई ऐसी बात बोलना चाहता है, या वो पार्टी की ही पार्टी का है, किसी पार्टी की बात करता है वो भी स्पष्टीकरण देता हो उसके अंदर स्पष्टीकरण देता है और उपराष्ट्रपति जी का इस्तीफा हो गया देश के अंदर आज इतने दिन हो गए हैं अभी तक भी न तो वो कोई बोले न उन्होंने प्रेस से बात करी है न सरकार ने कोई बताया है कि हमारे उपराष्ट्रपति चुने हुए थे वो किन कारणों से इस्तीफा दिया , क्या सरकार नाराज़ थी नइत्तफाकी थी मंत्रियों के बीच में या प्राइम मिनिस्टर के बीच में या धनखड़ साहब के बीच में क्या किसी को नहीं मालूम और वो अभी मौन धारण किए हुए हैं तो ये घटना मामूली नहीं है , संवैधानिक पद पर आप किसी को अगर मजबूर कर देंगे, राष्ट्रपति को कल कर देंगे, जो सुनते हैं हम लोग मजबूर होकर इस्तीफा दिया या इस्तीफा दिलवाया गया जो भी है किसी को नहीं मालूम है सुनी सुनी बाते हैं तो संवैधानिक पद पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्राइम मिनिस्टर, लोकसभा स्पीकर, सीजेआई ये सभी लोग होते हैं बड़े बड़े पदों पर ये संवैधानिक पदों पर होते हैं उनके इस्तीफे ऐसे नहीं होते हैं उनके लिए स्पष्टीकरण देश को देना पड़ता है कि क्यों हम ने इस्तीफा दिया पूरे मुल्क को बताना पड़ता है क्या घनखड़ साहब को अवसर दिया गया क्या ?

Ashok Gehlot

50,315 görüntüleme • 1 yıl önce

जब कोई व्यक्ति लाखों छात्रों को कम फीस में शिक्षा देने की कोशिश करे, स्वास्थ्य सेवाएँ सस्ती बनाने की बात करे, और आम लोगों तक पहुँच बनाए .........तो उसकी हर गलती पर कानून का पालन ज़रूर हो, लेकिन उसे पहले से अपराधी की तरह पेश करना भी न्याय नहीं कहलाता....... फायर सेफ्टी के नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए, चाहे कोई कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो। लेकिन कानून का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए होना चाहिए, बदले की भावना या मीडिया ट्रायल के लिए नहीं..... अगर आरोप सही हैं तो जाँच हो, अगर आरोप गलत हैं तो सम्मान लौटाया जाए। लोकतंत्र में व्यक्ति की पहचान नहीं, उसके खिलाफ सबूत और कानून बोलने चाहिए.... "नाम देखकर न्याय होगा तो व्यवस्था पर सवाल उठेंगे, काम देखकर न्याय होगा तो व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा।" याद रहे कि किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत और जाँच एजेंसियों के तथ्यों के आधार पर ही निकलना चाहिए, न कि केवल सोशल मीडिया या जनभावनाओं के आधार पर........ Source...social media

Kashish

12,411 görüntüleme • 1 ay önce

धीरे-धीरे सबका नंबर लगने लगा है. जब सेनाओं के लिए ‘अग्निपथ स्कीम’ आई थी, तो आवाज़ भी आई थी कि हमने तो ऐसी कोई स्कीम मांगी नहीं थी, हमसे किसी ने इस पर चर्चा ही नहीं की थी. और जनरल एमएम नरावने की बातें भी याद आती हैं, लेकिन उस समय कोई सेनाओं के पक्ष में नहीं बोल पाया था. सेनाओं की पुकार अनसुनी कर दी गयी और इस वर्ष अग्निवीरों के 4 वर्ष पूरे हो रहे हैं. अब CAPF के इस बिल के समय आप चमत्कारों की कामना ज़रूर कर सकते हैं, कि ये पास नहीं होगा, लेकिन BJP सरकार इस बिल को कल एकतरफ़ा पास करा देगी. मैं तो समझ ही नहीं पाती कि क्या किसी देश की सरकार समाज में कर दिये ध्रुवीकरण के बाद अब अपनी सेनाओं में भी दो खेमे खड़े कर रही है, CAPF में भी दो खेमे खड़े कर रही है!! क्या यह सरकार भारतीयों द्वारा, भारतीयों के हित में चलाई जा रही है, या इसमें कोई विदेशी प्रभाव शामिल हो गया है ? यह सवाल उठता है कि क्या यह सरकार अमेरिका या किसी बाहरी एजेंसी के प्रभाव में चल रही है !! बहुत संदेह होता है कि क्या कोई भारतीय नेतृत्व स्वयं अपने ही देश की सेनाओं को कमजोर करने का काम कर सकता है ? #CAPFBill_काला_कानून

Wg Cdr Anuma Acharya (Retd)

33,330 görüntüleme • 4 ay önce

आईपीएस अधिकारी के साथ धक्का मुक्की होने संबंधी खबर अखबार में आने संबंधी प्रश्न पर : वो मैंने भी सुना है काफी दिन से सुन रहा हूं कोई घटना हुई है वो तो अब क्या घटना हुई है मुझे, आप को जानकारी है तो बता दीजिए, क्या हुआ है ? कोई मारपीट कर रहे हैं,थप्पड़ लगा दी, कोई मारपीट हो गई ये अफवाहें चल रही हैं ऐसी अफवाहें सीएमओ के बारे में सीएमआर के बारे में चलना मैं समझता हूं मैंने कभी सुना नहीं और मुझे इस पर यकीन भी नहीं होता है व्यक्तिगत मुझे यकीन नहीं होता है पर अगर इतनी चर्चा चल पड़ी है तो या तो सच्चाई बताए सरकार या फिर सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए पब्लिक को। लोगों में इकबाल खत्म हो जाता है कि अगर सीएमआर के अंदर सीएम की मौजूदगी के अंदर अगर ऐसी कोई ऐसी घटनाएं होती हैं और सीएमओ में या सीएमआर में पता ही नहीं क्या हुई की नहीं हुई ये पता ही नहीं तो वो उचित नहीं है तो उनको स्पष्टीकरण देना चाहिए पब्लिक को। ये बात उचित नहीं है कि जहां नंबर वन ऑथोरिटी हमारी है प्रदेश की है मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ा पद है वहां पर अगर ये घटना होती है तो स्पष्टीकरण आना चाहिए।

Ashok Gehlot

14,674 görüntüleme • 1 yıl önce

"संसद जनता का मंदिर या सत्ता की जागीर?" दुर्भाग्य की बात है कि देश की संसद, जो जनता की आवाज़ का मंच है, अब कुछ लोगों के लिए एक निजी जागीर बनकर रह गई है। जिस तरह राहुल गांधी के भाषण और 'राइट टू रिप्लाई' से ठीक पहले अचानक संसद स्थगित कर दी गई, और स्पीकर महोदय सदन छोड़कर चले गए, ये कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक पूर्व-नियोजित राजनीतिक भागीदारी थी। क्या स्पीकर को सदन चलाना नहीं आता? क्या प्रधानमंत्री को विपक्ष के सवालों का जवाब देने की हिम्मत नहीं? या फिर डर ये था कि राहुल गांधी एक बार फिर सत्ता के खोखलेपन को उजागर कर देंगे? असल में डर "ऑपरेशन सिंदूर" का है। जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को उन्होंने व्यापार की धमकी देकर रोका, तो ये सीधा संदेश था कि भारत की विदेश नीति आज आत्मसम्मान से नहीं, सरेंडर से चल रही है। मोदी सरकार जानती है कि राहुल गांधी जैसे नेता इस मुद्दे को सदन में उठाएंगे, अमेरिका के सामने जो झुकाव हुआ, उसका जवाब क्या है? लेकिन जब जवाब न हो, तब भागने की परंपरा शुरू होती है। और यही हुआ, सदन स्थगित कर दिया गया। संसद को चुप करा दिया गया। ये संसदीय परंपरा की अवहेलना नहीं, लोकतंत्र की हत्या है। एक सवाल हम सबको पूछना चाहिए, जो सरकार संसद से भागती है, वो देश के लिए क्या लड़ेगी?

Alok Sharma

20,293 görüntüleme • 1 yıl önce

शिव विधायक और लोकसभा चुनाव में ताल ठोकने वाले रविंद्र सिंह भाटी प्रवासियों को पीले चावल देने के बाद जब दिल्ली के बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों के स्टूडियो में जाकर इंटरव्यू दे रहे थे तब इंटरव्यू से एक बात तो समझ में आ गई की इस चुनाव में भाटी मोदी हो या विपक्ष का कोई नेता, किसी पर भी कोई टीका टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। उसके बावजूद भी लोग बहुत पसंद कर रहें है। भाटी सिर्फ और सिर्फ बाड़मेर-जैसलमेर और बालोतरा जिलों से जुड़े मुद्दे और समस्याओं की बात कर रहे हैं। बीते 10-15 सालों में जितने भी देश में यूथ लीडर आए वह इसीलिए पॉपुलर हुए या तो किसी ने मोदी का विरोध किया या फिर किसी ने राहुल गांधी का विरोध किया। किसी का विरोध कर सुर्खियां बटोरने की फितरत से अलग रविन्द्र सिंह भाटी अपनी लकीर को बड़ा करने में लगे हैं।उनकी यही सबसे खास बात लोगों को जबरदस्त तरीके से पसंद भी आ रही है, इसीलिए तो जन आशीर्वाद यात्रा में हर जगह भाटी के समर्थन में जमकर भीड़ उमड़ आ रही है। मोदी की सभा के बाद सब की निगाहें इस बात पर थी कि भाटी पचपदरा विधानसभा में प्रचार में कितनी भीड़ आती है आप जो स्क्रीन पर वीडियो देख रहे हैं यह बालोतरा शहर का वीडियो है कार्यालय का उद्घाटन करने पहुंचे थे लेकिन भाटी की एक झलक पाने और उन्हें सुनने के लिए लंबी चौड़ी भीड़ आ गई। अब तक कांग्रेस और बीजेपी की जितनी भी सभाए बालोतरा में हुई है उसमें से कहीं पर भी इस तरीके की भीड़ देखने को नहीं मिली है।अब आप खुद अनुमान लगा लीजिए की दिल्ली और जयपुर की पूरी सरकार और विपक्ष को क्यों बाड़मेर जैसलमेर की लोकसभा क्षेत्र में पूरा फोकस करना पड़ रहा है... वजह साफ है,तस्वीर साफ है।

Dinesh Bohra

138,733 görüntüleme • 2 yıl önce

संसद में विपक्ष का रवैया नकारात्मक रहा है। जब से सत्र शुरू हुआ है, उनका पूरा ध्यान सदन की कार्यवाही को चलने देने के बजाय उसमें बाधा डालने और उसे रोकने पर रहा है। मैंने देखा है कि विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है, अपनी आदत है कि वे लगातार अपने मुद्दे बदलते रहते हैं। सरकार की ओर से मैं एक बात साफ करना चाहता हूं कि पीएम मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार हर मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तैयार है और यह सिर्फ मौजूदा सत्र तक ही सीमित नहीं है। पिछले सभी सत्रों में भी सरकार हमेशा हर मामले पर चर्चा के लिए तैयार रही है, और जब भी चर्चा हुई है, विपक्ष को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है और मुंहतोड़ जवाब मिला है, क्योंकि उनके पास कोई असली मुद्दा नहीं होता। आज भी जिस चर्चा की उन्होंने मांग की थी, उस पर जितेंद्र सिंह जी चर्चा शुरू करने वाले हैं। फिर भी, उनकी (विपक्ष की) आदत है कि वे लगातार अपने मुद्दे बदलते रहते हैं। मैं विपक्ष के इस व्यवहार की तीव्र भर्त्सना और निंदा करता हूं। - श्री Jagat Prakash Nadda, राज्यसभा में

BJP

40,175 görüntüleme • 6 gün önce

हर सत्र में विपक्ष के सांसदों को सस्पेंड किया जा रहा है, इसमें कोई नई बात नहीं रह गई है। राहुल गांधी जी एक पब्लिक सोर्स से Quote कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ही संजय बारू जी को Quote किया है। सत्ता पक्ष के लोग खुद कभी मैग्जीन तो कभी किताब से संसद में Quote करते रहे हैं। संसद लोकतंत्र का मंदिर है, देश के हर नागरिक की इस पर आस्था है। इसलिए हमें इसके अंदर जरूरी मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए। संसद में हमेशा ही चीन, पाकिस्तान और विदेश नीति से जुड़े जरूरी मामलों पर चर्चा होती रही है। यही हमारी परंपरा रही है। विपक्ष हो या सरकार- सभी ने खुलकर अपना पक्ष रखा है। असलियत में मोदी सरकार डर गई है कि उनकी सच्चाई देश के सामने आ जाएगी, इसलिए वो किताब को पब्लिश भी नहीं होने दे रहे हैं। नरवणे जी की किताब में लिखा है कि Crisis के समय जब चीन की सेना हमारे बॉर्डर पर थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और टॉप लीडरशिप का क्या रिएक्शन रहा। वहीं, दूसरी तरफ Epstein फाइल सामने आ रही हैं, जिससे मोदी सरकार के तार जुड़ रहे हैं। आखिर सरकार ने एक Convicted sex trafficker को क्यों कॉन्टैक्ट किया था? अब तो ये सारे Authenticated Documents हैं। अब अगर सदन में इन चीजों पर चर्चा नहीं होगी तो किस पर होगी? : कांग्रेस महासचिव व सांसद श्रीमती Priyanka Gandhi Vadra जी

Congress

20,152 görüntüleme • 6 ay önce

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' अस्थाई रूप से स्थगित हुआ है। मैंने तो पहले कभी नहीं सुना कि सीजफायर कभी अस्थाई रूप से हुआ हो। अगर अस्थाई है तो फिर पता नहीं पाकिस्तान कब बदल जाएगा। क्या 'ऑपरेशन सिंदूर' अमेरिका के दबाव में स्थगित किया गया? ये बातें साफ होनी चाहिए। पूरा विपक्ष आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई में सरकार के साथ है, फिर PM मोदी सर्वदलीय बैठक में क्यों शामिल नहीं हो रहे हैं। दो ऑल पार्टी मीटिंग हो चुकी हैं, लेकिन वे किसी में शामिल नहीं हुए। सरकार को इस मामले पर संसद का एक सत्र भी बुलाना चाहिए, ताकि इस मुद्दे पर चर्चा हो, बातें रिकॉर्ड में रहे और पूरे देश को जानकारी हो कि सरकार की क्या नीति है? राहुल गांधी जी ने देश को कई बार चेताया। चाहे फिर वो कोरोना काल हो या फिर चीन से दोस्ती की बात हो। अज़रबैजान और तुर्की खुलकर पाकिस्तान के साथ आए, लेकिन पहगलाम में हुए अन्याय के बाद भी हमारे साथ कोई देश खुलकर खड़ा नहीं हुआ। सरकार को इसका जवाब देना होगा। ये सरकार नैतिक अधिकार और साहस दोनों खो चुकी है। हमारे पास पाकिस्तान के आतंकवाद को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करने का एक मौका था। अगर सीजफायर करना ही था तो प्रधानमंत्री स्तर पर या विदेश मंत्री स्तर पर बात होनी चाहिए थी, जिसमें साफ कहा जाता कि पाकिस्तान की सरकार अपनी धरती पर आतंकवादियों के अड्डे नहीं पनपने देगी। : पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot जी

Congress

36,221 görüntüleme • 1 yıl önce