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Kamlesh Singh / Tau ताऊ...सादर! सप्रेम!...समर्पित 🙏
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Quickbandi ग़ज़ल तोड़ के पुश्ते को नदिया की रवानी निकली नासमझ समझे थे वो सबसे सयानी निकली अबू ताहिर हो के ख़लील हो या यूसूफ़ हो गया जो वक्त तो हरकी मुसलमानी निकली कल तक दीदी के दीदों की खाते थे क़सम आज वो जून की आंखों से ज़बानी निकली जोड़ा फूल जो टूटा तो ये राज़ फ़ाश हुआ हमारे निशान से औरों की निशानी निकली बाग मितली से है आजिज़ काकुली बेकल जो चीज़ दहन से निगली है ग़रानी निकली किसको अपना कहें, दर्द भी बांटें किससे नई मुहब्बत में भी आदत वो पुरानी निकली एक खामोश कह के सबको करा देता था चुप उसकी चुप्पी से नई एक कहानी निकली कौन कहां से निकल जाए, किधर से निकले मामा दरवाज़े से तो खिड़की से मुमानी निकली वलायती दूर की कौड़ी रही वली साहब गुल-ए-महुआ के भरोसे पे जवानी निकली ये जो अप लाइन है डाउन भी वही है ताऊ शताब्दी आई और देखो राजधानी निकली

Aha!

🙏❤️🙏

@kkstau ताऊ आप सबसे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हो, कोई माने या न माने, मै तो आपको मानता हूं ❤️🙏🏻 आपसे कब मिलना होगा पता नहीं, लेकिन दिल्ली में कही मिलेंगे जरूर.

@kkstau Vah vah

@kkstau मिश्रा जी और ताऊ जी आज मैं इस गाने को कई बार सुना अब तो यह मेरा फेवरेट गाना हो गया (earbuds and this in metro)❤️ यह तंज और व्यंग्य के बीच में आपकी आवाज वाकई बहुत खूबसूरत है।

@mishraaditya715 @iamjpmishra Lo ek aur

@iamjpmishra देखिए आप सही नहीं कर रहे हैं आप टीएमसी में जो आग लगी उसमें पेट्रोल डालने का काम कर रहे हैं 😂😂🙏🏻❤️

@kkstau What lyrics! What rendition! मज़ा ही आ गया 💖

@kkstau 👏👏👏👏

@kkstau जबरजस्त

@kkstau Wah!
