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‘National Crush’ 𝐆𝐈𝐑𝐈𝐉𝐀 𝐎𝐀𝐊 ने 𝐏𝐎𝐃𝐂𝐀𝐒𝐓 में पीरियड्स से जुड़ी पुरानी मान्यताओं पर खुलकर बात की। ​बचपन में उन्होंने देखा था कि पीरियड्स के दौरान किचन में जाना, पूजा करना या किसी के करीब जाना मना था। जब उन्हें पहली बार पीरियड्स हुए, तो उन्होंने भी वही सब करना...

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प्रेमानंद महाराज महिलाओं के मासिक धर्म को इंद्र का पाप बता रहे हैं, वृत्तासुर के वध से निकला हुआ खून बता रहे हैं। दयालु हैं, उदार हैं, इसलिए महिलाओं पर पूरी पाबंदी का समर्थन नहीं करते, दूर से दर्शन की 'इजाज़त' दे रहे हैं। सबसे सरल संत ऐसे होते हैं जो किसी के ख़िलाफ़ कड़वा नहीं बोलते हैं फिर भी अपने बच्चों को इनसे भी दूर रखें, लड़कियों के कानों तक तो ज़ाहिल वाणी पहुंचने भी न दें। पीरियड्स एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, प्रजनन की तैयारी में तो सबसे जरूरी प्रक्रिया है। महिलाओं को पीरियड्स तब भी हो रहे थे जब किसी इंद्र या वृत्तासुर का जन्म तक नहीं हुआ होगा। पीरियड्स दुनियाभर की महिलाओं में होते हैं जिन्होंने किसी इंद्र या किसी वृत्तासुर का नाम भी नहीं सुना होगा। इसलिए स्कूलों में उन्हें इसके पीछे की बायलॉजी समझने दें, उल्टी सीधी कहानियों से बचकर रहने दें। सोचिए कोई लड़की ये बात सुनकर सच मान ले, पीरियड्स का खून देखकर उसे ब्रह्म हत्या का खून समझ ले या इंद्र का पाप समझ ले। घिन या प्रायश्चित की वजह से डिप्रेशन का शिकार हो जाए या आत्महत्या कर ले, तो कौन जिम्मेदार होगा?

Samar Raj

205,605 Aufrufe • vor 1 Jahr

जो महिलाएं अधिक संभोग करती हैं उनमें #पीरियड्स के बंद होने की संभावना कम होती है! हफ्ते में एक बार सेक्स करने वाली महिलाओं में पीरियड्स (मेनोपॉज) की संभावना महीने में एक बार संभोग करने वाली औरतों से 28 फीसदी कम होती है. एक शोध में यह जानकारी मिली है. शोधकर्ताओं ने कहा कि संभोग के भौतिक संकेत शरीर को संकेत दे सकते हैं कि गर्भवती होने की संभावना है. अध्ययन में कहा गया है कि जो महिलाएं मिड लाइफ (35 व इससे अधिक उम्र) में बार-बार संभोग नहीं करती है उनमें जल्द मेनोपॉज देखने को मिलती है. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन की अध्ययनकर्ता मेगन अर्नोट ने कहा, "अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि अगर कोई महिला यौन संबंध नहीं बना रही है और गर्भधारण का कोई मौका नहीं है, तो शरीर अंडोत्सर्ग (ओव्यूलेशन) बंद कर देता है क्योंकि यह व्यर्थ होगा." अध्ययन में कहा गया है कि अंडोत्सर्ग के दौरान महिला की प्रतिरक्षा क्षमता बिगड़ जाती है, जिससे शरीर में बीमारी होने की संभावना अधिक होती है. यह शोध 2,936 महिलाओं से एकत्र किए आंकड़ों पर आधारित है, जो कि 1996/1997 में एसडब्ल्यूएएन अध्ययन के तहत किया गया था. इस दौरान महिलाओं को कई सवालों के जवाब देने के लिए कहा गया था जिसमें यह भी शामिल था कि पिछले छह महीनों में उन्होंने अपने साथी के साथ संभोग किया है या नहीं. संभोग करने के अलावा उनसे पिछले छह महीनों के दौरान कामोत्तेजना से जुड़े अन्य प्रश्न भी किए गए, जिनमें मुख मैथुन, यौन स्पर्श और आत्म-उत्तेजना या हस्तमैथुन के बारे में भी विस्तृत जानकारी ली गई. यौन क्रियाओं में भाग लेने संबंधी सबसे अधिक उत्तर साप्ताहिक (64 फीसदी) देखने को मिले. दस साल की अनुवर्ती अवधि में देखा गया कि 2,936 महिलाओं में से 1,324 (45 फीसदी) ने 52 वर्ष की औसत उम्र में प्राकृतिक पीरियड्स का अनुभव किया. बता दें कि मेनोपॉज उस स्थिति को कहा जाता है जब महिलाओं में मासिक धर्म चक्र बंद हो जाता है. असल में इसे प्रजनन क्षमता का अंत माना जाता है. शोध की रिपोर्ट को जर्नल रॉयल सोसायटी ओपन साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है. इस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में इसके कारण का उल्लेख नहीं किया गया है!

तृप्त ...🖤

17,973 Aufrufe • vor 6 Monaten

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने हनुमानगढ़ी मंदिर को लेकर दिए गए अपने हालिया बयान पर सफाई देते हुए माफी मांगी है। उन्होंने कहा, मुझे यह कहना चाहिए था कि नमाज सीढ़ियों पर नहीं, बल्कि हनुमानगढ़ी के 52 बीघा मंदिर परिसर क्षेत्र में पढ़ी गई थी। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अयोध्या के संतों के बयानों का समर्थन करते हुए कहा कि यदि उनके बयान से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो वह इसके लिए क्षमा चाहते हैं। इससे पहले, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इसी दावे को लेकर बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया था, तब उन्होंने हनुमानगढ़ी में कभी नमाज पढ़े जाने से इनकार किया था। उन्होंने कहा था कि हनुमानगढ़ी में कभी नमाज नहीं पढ़ी गई। उन्होंने उस दौरान यह भी कहा था कि जो लोग नमाज पढ़े जाने की बात कर रहे हैं, उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि हनुमानगढ़ी के निर्माण में एक मुस्लिम शासक का सहयोग रहा था और आज भी इसका उल्लेख मंदिर परिसर में लगे शिलालेख पर दर्ज है।

Millat Times

38,860 Aufrufe • vor 1 Monat

वीडियो वर्ष 2018 का है जब प्रशांत किशोर जी जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे शराबबंदी कानून पर उनका पक्ष सैद्धांतिक तौर पर तब भी यही था जो आज है! प्रशांत किशोर और दूसरे नेताओं में बुनियादी अंतर यह है कि प्रशांत जी किसी भी नीति या मुद्दे पर एक व्यापक नजरिये से बात करते हैं। राजनीति उनके लिए चुनाव की हार-जीत भर नहीं है। प्रशांत जी के संदर्भ में अक्सर सायास तौर पर यह भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है कि क्या उन्होंने तब इसका विरोध किया था? दरअसल ज्यादातर इस तरह के प्रश्नों के मूल में एक मंशा होती है , प्रशांत जी की विश्वसनीयता पर हमला करना। चूँकि अब इस सूचनाओं के अम्बार में एक आम व्यक्ति कैसे खोजेगा कि उन्होंने अभी से 9 वर्ष पूर्व क्या बोला था। लेकिन जो लोग प्रशांत जी को पिछले वर्षों में सुन और समझ रहे होंगे उन्हें इस बात का इल्म होगा कि कभी भी प्रशांत जी कभी भी अति ( extreme) में जाकर बात नहीं करते हैं बल्कि एक व्यापक दृष्टिकोण से ही अपनी बातों को रखते आयें हैं।

Jan Suraaj Overseas

18,758 Aufrufe • vor 1 Jahr

मैं राहुल गांधी के बुलावे पर दिल्ली आई क्यूँकि जब से मेरे खिलाफ हेट शुरू हुआ तब से राहुल गांधी संपर्क में थे। जिन लोगों के खिलाफ हमने एफआईआर कराई है उसकी कॉपी भी मुझे आजतक नहीं मिली है। जिन लड़को के लिए मैं खड़ी हुई थी वो आज भी मेरे साथ खड़े हैं। राहुल गांधी से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने पहले हम सबकी स्टोरी जानी और अपने बारे में एक शब्द नहीं बोले। ये बहुत अच्छी बात है कि राहुल गांधी ने पहले हमारे बारे में सब जाना की हम लोग क्या चाहते हैं। ये एक दम फ़ैमिली मीटिंग जैसा था जैसे हम लोग चाय पर चर्चा करते हैं। उन्होंने सबका पॉइंट ऑफ़ व्यू जाना। सरकार को भी हमसे ये जानना चाहिए था राहुल गांधी जी ने एक बार भी कांग्रेस का नाम तक नहीं लिया उन्होंने एक बार भी इन सबके बीच राजनीति करने की कोशिश ही नहीं की जैसे हम घर में अपने पापा को सबकुछ बताते हैं ऐसे ही वो भी मुझसे सब पूछते रहे , हम सबने एक बार भी अनकम्फर्टेबल महसूस नहीं किया।

I.N.D.I.A गठबन्धन

131,845 Aufrufe • vor 2 Tagen

गिरिजा जी ने पूछा अगर Rahul Gandhi बिना प्रकाशित हुई किताब के अंश पढ़ रहे हैं तो क्या ये सदन के नियमों के विरुद्ध है? नहीं है! सदन में कोई भी सांसद किसी भी अखबार, किताब, रिपोर्ट के आधार पर या फिर अपनी निजी जानकारी के आधार पर भी कोई भी बात कह सकता है। सांसद का ये अधिकार लोकसभा के नियमों द्वारा सुरक्षित है। सदन में कही बात पर कोई कोर्ट भी कार्यवाही नहीं कर सकती है। ये अधिकार हैं ही इसलिए कि सांसदों को सरकार की जवाबदेही तय करने की शक्ति मिले। जब तक जनरल नरवाणे ये मानते हैं कि जो अंश राहुल गांधी ने सदन में पढ़े हैं, वो उन्होंने ही लिखे हैं, तब तक उन्हें सदन में उठाने का राहुल जी को पूरा अधिकार है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जानकारी का सोर्स क्या था। यही संसदीय व्यवस्था है। Congress Mallikarjun Kharge

Gurdeep Singh Sappal

26,835 Aufrufe • vor 6 Monaten

“मां-बहन की गालियां असल में मुसलमानों ने सभी भाषाओं में शुरू की थीं! मुसलमान अपनी माताओं, बहनों और बेटियों से भी शादी कर लेते हैं; यही उनकी संस्कृति है!” उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 20 जून को एक हिंदुवादी साधु ने दावा किया कि हिंदू संस्कृति में कभी भी माताओं और बहनों के नाम पर गालियां देने का चलन नहीं था और कहा कि "कठमुल्ला मुसलमानों" ने इसे शुरू किया! उन्होंने "लव जिहाद" और "लैंड जिहाद" जैसी मुस्लिम-विरोधी साज़िश की थ्योरी को बढ़ावा दिया और हिन्दू महिलाओं से "लव जिहाद" और "लैंड जिहाद" के झांसे में न आने की अपील भी की! साथ ही उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब तक उन्हें पाकिस्तान के कब्ज़े वाला कश्मीर नहीं मिल जाता, वे चैन से नहीं बैठेंगे!

Muslim Spaces

13,469 Aufrufe • vor 1 Monat

यह कहना कि Mamata Banerjee बंगाल में Narendra Modi को हरा सकती हैं—सिर्फ़ एक राजनीतिक दावा नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ी हक़ीक़त का इशारा है। ममता बनर्जी की राजनीति भाषणों से ज़्यादा संघर्ष की कहानी है। उन्होंने बंगाल की गलियों, खेतों और मज़दूर बस्तियों में रहकर राजनीति की है, इसलिए जनता उन्हें दूर से नहीं, अपने बीच से उठी नेता मानती है। बंगाल में पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान बहुत मायने रखते हैं। ममता बनर्जी ने हमेशा “बंगाल की अस्मिता” को केंद्र में रखा है—चाहे वह भाषा का सवाल हो, महिलाओं की सुरक्षा हो, या गरीबों के लिए सीधे ज़मीनी योजनाएँ। यही वजह है कि लोग उन्हें केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपनी आवाज़ समझते हैं।

Bawaal

12,164 Aufrufe • vor 8 Monaten

जब कांग्रेस-RJD के मंच से मोदी की मां को गाली दी गई थी तब कांग्रेस ने कहा था कि गाली किसने दी क्या पता. हमारा उस व्यक्ति से क्या लेना-देना. तो एक benefit of doubt दिया जा सकता था. लेकिन अब तो कांग्रेस ने officially ये video जारी किया है. अब ये तो साफ है कि कांग्रेस ने पहले की बात पर मुहर लगा दी है. कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी की मां का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया है. एक स्वर्गीय महिला का इस्तेमाल मोदी पर हमला करने के लिए किया है. Officially किया है. AI-generated video बना कर किया है. ये हरकत शर्मनाक है क्योंकि ये ऐसी महिला के बारे में है, जिनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं था, जिन्होंने कभी किसी के बारे में कभी एक लफ्ज़ नहीं कहा, जो महिला अपने आप को defend करने के लिए अब इस दुनिया में नहीं हैं. ये video बिहार की राजनीति के गिरते हुए स्तर का प्रतीक है और तेजस्वी यादव के हाव-भाव को देख कर लगा कि उन्हें भी कांग्रेस ये हरकत पसंद नहीं आई. #MyTake #AajKiBaat #modimother #BiharElections2025

Rajat Sharma

105,946 Aufrufe • vor 11 Monaten

शिवहर्ष वूमेन पीजी कॉलेज, बस्ती की प्राचार्या सुनीता तिवारी को सुनिए, जिन पर दलित छात्राओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें पानी पीने से मना किया जाता है। इस कॉलेज के बराबर में अनुसूचित जाति की छात्राओं का एक हॉस्टल है, जिसे समाज कल्याण विभाग चलाता है। जिसका कॉलेज से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन उसकी एंट्री कॉलेज के अंदर से है। अनुसूचित जाति के उस हॉस्टल में पुरुषों का आना-जाना था। इसे देखकर प्राचार्या महोदया ने वहाँ एक गार्ड को खड़ा किया और समाज कल्याण विभाग को भी लिखा कि आप अपने हॉस्टल की ज़िम्मेदारी खुद संभालें, उसकी बाउंड्री कराएँ और उसकी अलग एंट्री करें, लेकिन उन्होंने कोई संज्ञान नहीं लिया। कल को अगर इस हॉस्टल में किसी लड़की के साथ कुछ हो जाता, तब महिला प्राचार्या को फँसा दिया जाता। लेकिन लड़कियों को तो लौंडो को हॉस्टल में एंट्री देनी थी, इसलिए उन्होंने DM से SC ST एक्ट में कार्रवाई करने की शिकायत दे दी।

𝙼𝚛 𝚃𝚢𝚊𝚐𝚒

14,245 Aufrufe • vor 6 Monaten

जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा क्यों दिया? मुझे लगता है कि वो सरकार के लिए embarrassment बनते जा रहे थे. परेशानियां पैदा करने लगे थे. इसीलिए उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया. मैं आपको अंदर की बात बताता हूं कि टकराव कैसे शुरू हुआ. कहां तक गया, ये समझाता हूं. पहली बात, जगदीप धनखड़ जब से राज्यसभा के Chairman बने उन्होंने ये impression दिया कि वो सरकार के शीर्ष नेताओं के बहुत करीब हैं. जो भी करते हैं, वो उन्हीं के कहने पर करते हैं. आपको याद होगा, संसद के परिसर में Vice-President के झुके-झुके व्यवहार की mimicry की गई थी, जिसका video राहुल गांधी ने बनाया था. उसकी वजह ये थी कि Chairman के तौर पर धनखड़ साहब विरोधी दलों के नेताओं से लगातार टकराते थे. विरोधी दलों के नेता convince हो गए थे कि धनखड़ साहब सरकार के इशारे पर उन्हें बोलने नहीं देते. बार-बार उनका अपमान करते हैं. इस कारण सरकार और विरोधी दलों के बीच टकराव बढ़ता गया. दूसरी बात, कुछ महीने पहले धनखड़ साहब ने Judiciary पर direct attack किया. Supreme Court पर हमला किया. Parliament की supremacy की बात की. Judges को भी ये लगा कि Vice-President साहब ये काम सरकार के इशारे पर कर रहे हैं. वो सरकार के करीब हैं. Judiciary और सरकार के बीच टकराव जैसी स्थिति पैदा हो गई. तीसरी बात, इन मामलों पर जब उन्हें समझाने की कोशिश की गई तो वो नाराज़ हो गए. उन्होंने याद दिलाना शुरू किया कि कैसे Vice-President होते हुए भी उन्होंने जगह-जगह सरकार को defend किया. अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी. ये सरकार से उनके direct टकराव की शुरुआत थी. बात बढ़ती गई. चौथी बात, उन्होंने जगह-जगह सरकार की top leadership की शिकायत करनी शुरू कर दी. RSS से लेकर मंत्रियों तक. विपक्षी दलों से लेकर media के senior लोगों तक. उनकी शिकायत थी कि सरकार में उनसे कोई बात नहीं करता. उन्हें घुटन हो रही है और कोई उनकी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाए वरना मुझे कुछ करना पड़ेगा. ये एक तरह की धमकी थी, सरकार से सीधा टकराव था. Final phase में धनखड़ साहब ने तेवर दिखाने शुरू किए. कांग्रेस के नेताओं से मिले. Arvind Kejriwal को time दिया. इन सबको बहुत कुछ कहा. यशवंत वर्मा के impeachment का case अपने हाथ में लेने की कोशिश की. जब सरकार को लगा कि अब वो राज्यसभा में भी embarrassment create कर सकते हैं, खुले टकराव की situation पैदा हो सकती है, तब उन्हें एक phone गया. ये convey किया गया कि अब ये खेल ज़्यादा नहीं चलेगा और ये भी बता दिया गया कि अगर धनखड़ साहब ने अपना रवैया नहीं बदला तो उनका impeachment भी हो सकता है. धनखड़ साहब को इस बात की उम्मीद नहीं थी. उन्होंने top leadership का assessment करने में गलती कर दी, दांव उल्टा पड़ गया. इसीलिए उन्होंने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा. #JagdeepDhankar #vicepresident #MyTake #AajKiBaat

Rajat Sharma

295,550 Aufrufe • vor 1 Jahr

फूलन देवी का जीवन एक साधारण लड़की से लेकर प्रतिरोध की प्रतीक बनने तक का सफर था, जिसे भारतीय समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी जातिवादी व्यवस्था ने कठोर संघर्षों में ढकेल दिया। बाल विवाह जैसी कुप्रथा से जूझते हुए, समाज में महिलाओं की स्थिति को चुनौती देते हुए, उन्होंने अपनी नियति को खुद गढ़ने की ठानी। अगर वे किसी तथाकथित उच्च जाति से होतीं, तो शायद उन्हें सम्मान की मूर्तियों, साहित्यिक कृतियों और भव्य फिल्मों के जरिए महिमामंडित किया जाता। परंतु, वे बहुजन समाज से थीं, उस समाज से, जिसे सदा से हाशिये पर रखा गया, शोषित किया गया। उनके संघर्ष को अपराध के रूप में देखा गया, उनकी कहानी को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया, क्योंकि उन्होंने अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिकार किया था। इतिहास में पहली बार किसी यूरोपीय लेखक ने उन पर किताब लिखी, जिससे उनकी कथा विश्व पटल पर पहुंची। पर क्या भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत ने उन्हें उनकी वास्तविकता में स्वीकार किया? अगर फूलन देवी सवर्ण जाति से होतीं, तो उनके संघर्षों को क्रांतिकारी बताते हुए उनके जीवन पर गौरवगाथाएं लिखी जातीं, उनकी प्रतिमा बड़े चौराहों पर स्थापित होती, और उनके नाम पर सड़कें और संस्थान बनते। परंतु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि वे उस समाज से आई थीं, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा हो जाए तो उसे अपराधी कहा जाता है। फूलन देवी ने अन्याय का प्रतिकार किया, इसलिए उन्हें दमन का शिकार बनाया गया। उनका नाम सुनते ही उन लोगों के सीने पर सांप लोटने लगता है, जिन्होंने सदियों से अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखा है और जिनके लिए किसी बहुजन महिला का प्रतिरोध करना असहनीय है। फूलन देवी केवल एक नाम नहीं हैं, वे इतिहास के उन पन्नों में दर्ज एक विद्रोह हैं, जिसे मिटाने की हर संभव कोशिश की गई, लेकिन जो आज भी शोषित समाज के लिए एक प्रतीक बनकर जीवित हैं।

Hansraj Meena

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वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे के आंसू झूठे नहीं है। हम सब भीतर से इतने ही भरे हुए हैं,इतने ही मर्माहत हैं। यकीनन इसका जिम्मेदार पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ हैं। चंद्रचूड़ ने देश के साथ अच्छा नहीं किया। बतौर चीफ जस्टिस उनके फैसलों ने देश को हमेशा हमेशा के लिए सांप्रदायिक दंगों की भट्टी पर चढ़ा दिया। जिस ईश्वरीय शक्ति के दम पर उन्होंने तमाम जरूरी मुद्दों पर फैसले सुनाए वह उनकी हिन्दू आइडेंटिटी से मेल खाने वाले निकले। सम्भल की दोषी यूपी पुलिस बाद में हैं पहले चंद्रचूड़ हैं। यह दीगर है कि हम सब कभी नहीं जान पाएंगे कि पूजा स्थल अधिनियम को लेकर जो कुछ उन्होंने किया वह किसके दबाव में था। उन्हें ईश्वर ने कहा था या गुरुओं के गुरु ने? ईमानदारी से अपनी बात कहने के लिए शुक्रिया दुष्यंत जी।

Awesh Tiwari

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पहली बात तो ये समझने की है कि राहुल गांधी आज कल वोट चोरी की बातें क्यों कर रहे हैं. असल में इसका Election Commission से कोई मतलब नहीं है. ये सवाल तो राहुल गांधी के political survival से जुड़ा है. राहुल गांधी अपनी पार्टी को ये जताना चाहते हैं कि कांग्रेस की बार-बार हार के लिए वो कतई ज़िम्मेदार नहीं हैं. कांग्रेस को तो वोट चोरी ने हराया. वो जानते हैं कि जिस दिन पार्टी को ये लगेगा कि राहुल गांधी चुनाव नहीं जिता सकते तो पार्टी के नेता उस leader की तलाश में जुट जाएंगे जो उन्हें चुनाव जिता सकता है. चुनाव हराने वाले को कोई leader नहीं मानता. इसीलिए पहली बार 2014 में राहुल ने हार के लिए अपनी पार्टी की कमज़ोरियों को ज़िम्मेदार ठहराया था. अगली बार हार के बाद उन्होंने कहा कि मोदी ED, CBI और Income Tax की मदद से चुनाव जीतते हैं. इसके बाद राहुल गांधी ने अपनी हार के लिए EVM को दोषी बताया था. अब वो चुनाव आयोग को blame कर रहे हैं. Problem ये है कि लोकसभा में मोदी की 240 सीटों से कांग्रेस को जो उम्मीद बंधी थी उसे महाराष्ट्र और हरियाणा की हार ने तोड़ दिया. अब अगर बिहार भी हार गए तो फिर leadership पर सवाल उठेंगे. इसीलिए इस वक्त उनका ये कहना ज़रूरी है कि वो नहीं हारते उन्हें तो कोई हरवा देता है. कभी अपनी पार्टी तो कभी EVM तो कभी Election Commission. लेकिन लोग पूछ रहे हैं 'तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता काफिला क्यों लुटा? मुझे रहज़नों से गिला नहीं, तिरी रहबरी का सवाल है' #MyTake #AajKiBaat #VoteChori #RahulGandhi

Rajat Sharma

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