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Sushant Sinha धोबी घाट पर सभी का स्वागत है

18,273 просмотров • 1 год назад •via X (Twitter)

Комментарии: 4

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Sushant Sinha1 год назад

जो बीजेपी कल तक पूरी आम आदमी पार्टी को करप्ट बताती रही उसने अचानक AAP छोड़कर आए उन कैलाश गहलोत को पार्टी ज्वाइन करा ली जो केजरीवाल के जेल से छूटकर आने पर उन्हें माला पहना रहे थे। अब करप्शन का मुद्दा कहां गया? इसका सीधा मतलब तो ये हुआ कि दिल्ली चुनाव में बीजेपी फिल्हाल केजरीवाल से पीछे चल रही है वरना कोई मतलब नहीं था कि जिस पूरी पार्टी को करप्ट बताया उसी के नेता को पार्टी ज्वाइन कराते। कैलाश गहलोत को कल रात शीशमहल नजर आया.. या रात में सपने में यमुना की गंदगी नजर आई? ऐसे छिछले तर्क देकर कितनी आसानी से रातोंरात कूदकर बीजेपी में आ गए भाई साहब। अगर इतनी ही पब्लिक की चिंता थी तो पहले इस्तीफा देते, चुनाव से दो महीने पहले आत्मा जागी? और इतनी ही जनसेवा की भावना थी तो निर्दलीय लड़ लेते.. आज की डेट में उनके किसी आरोप की कोई वैल्यू नहीं है। सोचिए बीजेपी के कार्यकर्ताओं पर क्या बीतेगी जब वो कैलाश गहलोत के लिए वोट मांगने निकलेंगे। ऊपर से बीजेपी की छवि पर अब ये और चस्पा हो जाएगा कि लोगों को करप्ट बताते हैं लेकिन उनके साथ कोई आ जाए तो फर्क नहीं पड़ता उन्हें। जबकि पार्टी महाराष्ट्र में अजीत पवार को साथ लाने का अंजाम भुगत चुकी है लेकिन फिर भी कैलाश गहलोत को साथ लाना बीजेपी को नुकसान देगा, केजरीवाल को नहीं। अब तो अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी पूरी मुखरता से पब्लिक से कह सकते हैं कि अगर करप्शन किया होता तो कैलाश गहलोत को बीजेपी थोड़े ना पार्टी में लेती। बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा सो अलग। बार बार अलग अलग राज्यों में चुनाव जीतने के नाम पर किसी को भी पार्टी में जगह दे देना बीजेपी का पैटर्न बन गया है और सब देखकर भी उसका वोटर उसको इसलिए वोट दे दे रहा क्योंकि फिल्हाल बीजेपी का कोई विकल्प नहीं दिख रहा उसे। जिस देिन दिख गया, यही सब कांड बीजेपी को भारी पड़ेंगे।

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Harsh Pal1 год назад

@SushantBSinha Sbse bdi corrupt bjp hai

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Alok Kumar1 год назад

@SushantBSinha 💜

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Aparna1 год назад

@SushantBSinha 👍👍

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धोबी का कुत्ता अथवा धोबी का कुतका? कुछ बरसों से बार-बार अनेक लोगों द्वारा कहा जा रहा है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” कहावत ठीक नहीं है, और सच्ची कहावत है “धोबी का कुतका न घर का न घाट का”। कई लोकप्रिय हिन्दीभाषी अभिनेता और पत्रकार भी डटकर यह कह चुके हैं, जिससे अनेक लोग इस बात को मानने लगे हैं। सच यह है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” ही सच्ची कहावत है। हितोपदेश में एक धोबी के कुत्ते की कथा आती है और सम्भवतः यह कहावत वहीं से आई है। सोलहवीं/सत्रहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में “धोबी कै सो कूकर न घर को न घाट को” ऐसा प्रयोग किया है। सत्रहवीं शताब्दी में निपट निरंजन ने अपने काव्य में “धोबी का कुत्ता रहा, घर का न घाट का” ऐसा प्रयोग किया है। “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” के विविध रूपों के अनेक पुस्तकों और कोशों में प्रमाण हैं। इसके विपरीत “धोबी का कुतका न घर का न घाट का” ऐसी कहावत न किसी ऐताहिसिक साहित्यिक कृति में है और न किसी कोश में। ऐसी कहावत कभी थी ही नहीं, यह केवल सामाजिक संचार शोधशाला (Social Media Research Institute) और काहो विश्वविद्यालय (WhatsApp University) की उपज है।

Nityānanda Miśra (मिश्रोपाख्यो नित्यानन्दः)

89,323 просмотров • 2 месяцев назад