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Tao_taweechai

83,669 просмотров • 17 дней назад •via X (Twitter)

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अंकित अवस्थी ने ज्यादा सही तरीके से, ज्यादा बेहतरीन धोया है। कितने दुख की बात है कि 12 साल पत्रकारिता करने के बाद मैं इनसे सहमत होने को मजबूर हूं। जब मैं छात्र था तो तंगी की हालत में भी तीन अखबार मंगाता था और जब पढ़ाई खत्म हुई, नौकरी ढूंढनी शुरू की, उस समय में 6 अखबार मंगाता था। आज मैं दावे से कह सकता हूं कि अगर किसी अखबार में पढ़ने लायक कुछ मिल जाए तो समझिए कि वह अपवाद है। और चैनलों के तो कहने ही क्या? जिस दिन न्यूज़ चैनल देखना पड़ जाए, समझिए जिंदगी का सबसे खराब दिन है। कोचिंग पढ़ाने वाले शिक्षकों को कोसने से पहले पत्रकारों को जरा अपनी गिरेबान में झांकना चाहिए।

Krishna Kant

78,397 просмотров • 4 месяцев назад