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Ana Sayfaya Dön

#WATCH झारखंड | बाबा बैद्यनाथ मंदिर के मुख्य शिखर पर मोर मुकुट बांधने की प्राचीन और अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। यह रस्म दूल्हे के रूप में भगवान शिव के बारात से पहले उनके विशेष श्रृंगार को दर्शाती है। #Mahashivratri2026

31,118 görüntüleme • 7 ay önce •via X (Twitter)

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Benzer Videolar

🚨 ट्रांसजेंडर समाज की एक बेहद पवित्र और रहस्यमयी परंपरा क्या आप जानते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय में एक बेहद खास और आस्था से जुड़ी परंपरा निभाई जाती है? एक ट्रांस महिला अपनी जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी के ठीक 41 दिन बाद अपनी आराध्य बहुचरा माता की विशेष पूजा करती है। समुद्र को दूध अर्पण पूजा के दौरान पवित्र दूध को समुद्र की लहरों में चढ़ाया जाता है। आईने में दर्शन मंदिर से वापस आने के बाद माता का चेहरा सीधे नहीं देखा जाता प्रसन्न रूप के दर्शन सबसे पहले माता का चेहरा आईने में देखा जाता है माना जाता है इससे माता के सबसे सौम्य और प्रसन्न रूप के दर्शन होते हैं। प माता का आशीर्वाद लेने के बाद ट्रांस महिला अपने जीवन के सबसे प्रिय 3 लोगों का चेहरा देखती है। सदियों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा इस समाज की गहरी श्रद्धा विश्वास और नए जन्म के उत्सव को दर्शाती है।

smile

426,128 görüntüleme • 2 ay önce

🕉️ जय श्री महाकाल 🕉️ उज्जैन की पावन धरती पर विराजमान श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, उज्जैन में भक्तों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने महाकाल के रूप में प्रकट होकर दुष्ट शक्तियों का संहार किया और यहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए। महाकालेश्वर की विशेषता है कि यह दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहाँ की प्रसिद्ध भस्म आरती भगवान महाकाल की अनूठी आराधना मानी जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से महाकाल के दर्शन और आराधना करने वाले भक्त को भय से मुक्ति और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उज्जैन के राजा एक ही हैं—बाबा महाकाल। 🙏 हर हर महादेव! जय श्री महाकाल! 🔱

Tej Pratap Yadav

41,252 görüntüleme • 1 ay önce

विष्णु की संतानें: दक्षिण भारत में जन्म-पूर्व जीवन-चक्र के संस्कार यह 'विष्णुबलि' है, एक ऐसी रस्म जिसे वैखानस ब्राह्मण पुजारी करते हैं। ये पुजारी दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में विष्णु मंदिरों में पीढ़ियों से सेवा करते आ रहे हैं। यह रस्म गर्भावस्था के आठवें महीने में होती है और सदियों से इस समुदाय का हिस्सा रही है। यह परंपरा के भीतर चल रही एक पुरानी बहस से जुड़ी है कि क्या कोई व्यक्ति सिर्फ़ जन्म से ही मंदिर की सेवा के लिए योग्य हो जाता है या किसी औपचारिक रस्म के ज़रिए। इस रस्म में आग जलाई जाती है और पुजारी पति का मार्गदर्शन करते हुए विष्णु के बारह रूपों को आहुति दिलवाते हैं; हर रूप को घी का भोग लगाया जाता है। फिर भगवान के प्रतीक—चक्र और शंख—को गर्म करके दूध की खीर में डुबोया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे दूसरी जगहों पर दीक्षा लेने वालों की बांह पर निशान (ब्रांडिंग) बनाया जाता है। पति अपने हाथ से वह निशान वाली खीर अपनी पत्नी को खिलाता है, जबकि कमरे में मंत्रोच्चार और संगीत गूंजता रहता है। यह पल पूरी रस्म का मुख्य हिस्सा है, क्योंकि माना जाता है कि इसके ज़रिए विष्णु गर्भ में प्रवेश करते हैं और जन्म से पहले ही होने वाले बच्चे को अपना मान लेते हैं। आज जिस तरह से यह रस्म निभाई जाती है, वह दो व्यावहारिक हैंडबुक—'सूत्रानुक्रमणिका' और 'पूर्वप्रयोग'—पर आधारित है, जिनका इस्तेमाल पुजारी विष्णुबलि को चरण-दर-चरण संपन्न करने के लिए करते हैं। इस रस्म का मूल ग्रंथ 'वैखानसस्मार्तसूत्र' है, जिसमें सबसे पहले बौधायन परंपरा (लगभग 600-300 ईसा पूर्व) में गर्भावस्था के आठवें महीने में होने वाली रस्म के तौर पर विष्णुबलि का वर्णन किया गया है। इसके अलावा, इसका गहरा अर्थ—खासकर यह विचार कि यह रस्म बच्चे को जन्म से पहले ही विष्णु भक्त के रूप में चिह्नित करती है—संस्कृत ग्रंथ 'दशविधहेतुनिरूपण' से आता है। इसे श्रीनिवास दीक्षित नामक विद्वान ने लिखा था और साथ ही इसकी व्याख्या 'तात्पर्यचिंतामणि' के रूप में की थी। यह रिकॉर्डिंग इस रस्म को असल में निभाते हुए दिखाती है, और यह एक दुर्लभ मौका है जब हम ऐसी चीज़ को असल ज़िंदगी में होते हुए देख सकते हैं जिसका वर्णन आमतौर पर केवल संस्कृत ग्रंथों में ही मिलता है।

Vatsala Singh

14,104 görüntüleme • 13 gün önce

जानिए 12 ज्योतिर्लिंग और उनकी विशेषता : हिंदू धर्म में 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। ये12 ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के पवित्रतम स्थलों में से एक हैं। यहाँ प्रत्येक ज्योतिर्लिंग का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है: 1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (गुजरात): - स्थान: सौराष्ट्र, गुजरात - महत्व: इसे पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यहाँ भगवान शिव को चंद्रदेव ने तपस्या करके प्रसन्न किया था। शिव पुराण के अनुसार जब चंद्रमा को प्रजापति दक्ष ने क्षय रोग का श्राप दिया था तब इसी स्थान पर शिव जी की पूजा और तप करके चंद्रमा ने श्राप से मुक्ति पाई थी. ऐसी मान्यता है कि स्वयं चंद्र देव ने इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी. यहां पर देवताओं द्वारा बनवाया गया एक पवित्र कुंड भी है, जिसे सोमकुण्ड या पापनाशक-तीर्थ कहते हैं। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है, हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है। 2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (आंध्र प्रदेश): - स्थान: श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश - महत्व: यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती निवास करते हैं। इसे दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है। आंध्रप्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है, इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते है, कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं। 3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (मध्य प्रदेश): - स्थान: उज्जैन, मध्य प्रदेश - महत्व: यह ज्योतिर्लिंग महाकाल के नाम से प्रसिद्ध है, जो काल के अधिपति हैं और मृत्यु के देवता माने जाते हैं। ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है जहां रोजाना होने वाली भस्म आरती विश्व भर में प्रसिद्ध है. यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है।महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है, उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं। 4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (मध्य प्रदेश): - स्थान: मंधाता द्वीप, नर्मदा नदी, मध्य प्रदेश - महत्व: यह ओंकार पर्वत पर स्थित है, जहां शिवजी ओंकार रूप में प्रतिष्ठित हैं। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है, जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है, ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है, यह ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। 5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग (उत्तराखंड): - स्थान: केदारनाथ, उत्तराखंड - महत्व: यह हिमालय में स्थित है और चार धाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण स्थल है। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में अलखनंदा और मंदाकिनी नदियों के तट पर केदार नाम की चोटी पर स्थित है. यहां से पूर्वी दिशा में श्री बद्री विशाल का बद्रीनाथधाम मंदिर है. मान्‍यता है कि भगवान केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा अधूरी और निष्‍फल है. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में स्थित है, बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है, केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है। 6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र): - स्थान: पुणे, महाराष्ट्र - महत्व: यह सह्याद्री पर्वत श्रेणी में स्थित है और इसे भीमा नदी के स्रोत के पास माना जाता है। महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते है। 7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (उत्तर प्रदेश): - स्थान: वाराणसी, उत्तर प्रदेश - महत्व: यह ज्योतिर्लिंग वाराणसी में स्थित है, जो भगवान शिव की नगरी मानी जाती है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर जिसे धर्म नगरी काशी के नाम से जाना जाता है वहां पर गंगा नदी के तट पर स्थित है बाबा विश्‍वनाथ का मंदिर जिसे विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. ऐसी मान्‍यता है कि कैलाश छोड़कर भगवान शिव ने यहीं अपना स्थाई निवास बनाया था. काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है, इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा, इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे। 8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र): - स्थान: नासिक, महाराष्ट्र - महत्व: यह गोदावरी नदी के तट पर स्थित है और यहाँ भगवान शिव त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले) रूप में पूजे जाते हैं। गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है, इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है, भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है, कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। 9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (झारखंड/महाराष्ट्र): - स्थान: देवघर, झारखंड / परली, महाराष्ट्र - महत्व: इसे रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, क्योंकि रावण ने यहां भगवान शिव की पूजा की थी। श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है, भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। 10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (गुजरात): - स्थान: द्वारका, गुजरात - महत्व: यह सागर तट पर स्थित है और नागों के देवता के रूप में भगवान शिव की पूजा होती है। गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है, धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है, भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। 11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (तमिलनाडु): - स्थान: रामेश्वरम, तमिलनाडु - महत्व: यह स्थान भगवान राम के द्वारा शिवलिंग स्थापित करने के कारण पवित्र माना जाता है। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है, इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है। 12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (महाराष्ट्र): - स्थान: औरंगाबाद, महाराष्ट्र - महत्व: यह एलोरा गुफाओं के पास स्थित है और इसे 'धुश्मेश्वर' के नाम से भी जाना जाता है। घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है, इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है, दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैl ये 12 ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से हैं और भक्तों के लिए अत्यंत पूजनीय हैं। हर ज्योतिर्लिंग का अपना ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक महत्व है, और ये स्थल भक्तों को भगवान शिव के दिव्य रूप का अनुभव कराते हैं। हर हर महादेव 🙏

Jitendra Sharma

141,035 görüntüleme • 2 yıl önce

सोमवार को उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दौरान आस्था का अनूठा दृश्य देखने को मिला, जब गुजरात के जामनगर निवासी भक्त प्रदीप गुप्ता ने 2 किलो 350 ग्राम वजनी चांदी का मुकुट बाबा महाकाल को अर्पित किया। मुकुट पर उकेरा गया चांद भगवान शिव के चंद्रशेखर स्वरूप का प्रतीक है। पुजारियों ने विधि-विधान से आरती के समय बाबा को यह मुकुट धारण कराया, जिससे गर्भगृह की भव्यता और बढ़ गई। प्रदीप गुप्ता ने बताया कि पिछली यात्रा में मांगी गई मन्नत महाकाल की कृपा से मात्र तीन महीनों में पूरी हो गई—उनका विंड पावर प्रोजेक्ट तय समय से पहले पूरा हुआ। मनोकामना पूर्ण होने पर उन्होंने इसे कृतज्ञता स्वरूप अर्पित किया। धार्मिक मान्यता है कि भस्म आरती में शामिल होने वाले भक्तों की इच्छाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं और उन्हें महाकाल का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। #Mahakaleshwar #BabaMahakal #Ujjain #MadhyaPradesh #Mukut #ZeeNews

Zee News

26,737 görüntüleme • 8 ay önce

पवित्र सावन मास में देवाधिदेव महादेव की आराधना और जलाभिषेक का विशेष महत्व है। ऊधम सिंह नगर के सीमांत क्षेत्र में स्थित पौराणिक श्री वनखंडी महादेव मंदिर भगवान शिव की असीम आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन एवं जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि सावन के पावन महीने में सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ वनखंडी महादेव की पूजा-अर्चना एवं जलाभिषेक करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। आप भी ऊधम सिंह नगर आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

Pushkar Singh Dhami

45,089 görüntüleme • 1 ay önce