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अखिलेश जी ने आज दैनिक भास्कर को तोड़ दिया 😂😂
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@poonam647608 ये सपा सुप्रीमो तुष्टिकरण राजनीति करते करते उत्तर प्रदेश से बाहर हो गया,अब ये उत्तर प्रदेश में नहीं आने वाले है क्यों कि उत्तर प्रदेश को विकास के साथ कानून का भी राज चाहिए, ये तो वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में देश हित से समझौता कर लेता है।

*बीजेपी क्यों बसपा से डरकर सपा का प्रचार कर रही है? गोदी मीडिया की ‘बीजेपी बनाम सपा’ रणनीति का खुलासा** उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों (2027) में बीजेपी अपनी पुरानी चाल चला रही है। अपनी गोदी मीडिया के जरिए पूरे चुनाव को बीजेपी बनाम सपा का द्वंद्व बनाने की कोशिश कर रही है। अखबारों से लेकर टीवी चैनलों, सोशल मीडिया और यूट्यूब तक एक ही नैरेटिव दोहराया जा रहा है — “या तो योगी-मोदी, या फिर अखिलेश-माफिया राज”। लेकिन यह रणनीति बिना वजह नहीं है। यह बीजेपी की मजबूरी और डर का नतीजा है। असली खतरा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है, और बीजेपी ठीक यही समझती है। *पहला कारण: ध्रुवीकरण की राजनीति* बीजेपी जानती है कि जब चुनाव बीजेपी बनाम सपा बन जाता है तो ध्रुवीकरण आसान हो जाता है। सपा को “यादव-मुस्लिम” पार्टी के रूप में पेश करके हिंदू वोट को एकजुट किया जा सकता है। लेकिन बसपा के साथ मुकाबला होने पर यह फॉर्मूला फेल हो जाता है। बसपा की बहुजन विचारधारा जाति और धर्म के ऊपर सामाजिक न्याय की बात करती है। वह दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्णों के एक बड़े हिस्से को भी अपनी तरफ खींच सकती है। इसलिए बीजेपी सपा को मुख्य विपक्षी के रूप में स्थापित करके चुनाव को सांप्रदायिक रंग देना चाहती है। *दूसरा कारण: सपा का डर दिखाकर वोट बटोरना* यूपी के लाखों लोग 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों की सपा की गुंडागर्दी, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक लापरवाही को अभी भी याद करते हैं। बीजेपी ठीक इसी डर को हवा दे रही है। गोदी मीडिया में बार-बार पुरानी खबरें, पुराने वीडियो और “सपा राज में माफिया राज” वाला नैरेटिव चलाया जा रहा है। उद्देश्य साफ है — जो लोग बीजेपी से नाराज हैं, वे सपा के डर के कारण फिर बीजेपी को ही वोट दे दें। “कम-से-कम बुराई” का फॉर्मूला। अगर असली मुकाबला बसपा से हो तो यह डर का कार्ड खेला ही नहीं जा सकता, क्योंकि बसपा का शासनकाल (2007) विकास, कानून-व्यवस्था और दलित उत्थान के लिए याद किया जाता है। *तीसरा कारण: पश्चिमी यूपी में सपा की कमजोरी* पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों पर निर्भर है क्योंकि उसके पास पश्चिमी यूपी में अपना मजबूत अहीर (यादव) वोट बैंक नगण्य है। इसलिए बीजेपी को डर है कि अगर मुस्लिम वोट बसपा की तरफ चला गया बीजेपी पश्चिमी यूपी में साफ हो जाएगी और उसके लिए बहुमत लाना असम्भव हो जाएगा और बीजेपी को यही डर सता रहा है। बसपा पश्चिमी यूपी में अपनी जड़ें मजबूत रखे हुए है। मायावती ने हाल ही में पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग दोहराई है, जो इस क्षेत्र की बहुजन आबादी को सीधा संदेश देता है। *चौथा और सबसे बड़ा कारण: नाराज बीजेपी वोटर बसपा की तरफ जा सकता है।* अगर चुनाव बीजेपी बनाम बसपा का हो गया तो बीजेपी का नाराज वोटर (जो महंगाई, बेरोजगारी, किसान मुद्दों या परिवारवाद से तंग आ चुका है) बसपा की तरफ शिफ्ट हो सकता है। बसपा न तो सपा जितनी विवादित है और न ही उसका चेहरा “परिवारवाद” या “गुंडागर्दी” का है। अगर इसमें मुस्लिम वोट भी बसपा के साथ जुड़ गया — जो सामाजिक न्याय की राजनीति में स्वाभाविक गठजोड़ है — तो बीजेपी पूरी तरह साफ हो सकती है। यही वजह है कि बीजेपी बसपा को “अप्रासंगिक” बताने की कोशिश करती है, जबकि अंदर से उसे बसपा सबसे बड़ा खतरा नजर आता है।बसपा ही असली विकल्प क्यों?बहुजन समाज पार्टी आज भी उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जो डॉ. आंबेडकर और कांशी राम की विरासत पर टिकी है — “सबको सम्मान, सबको अधिकार”। सपा और बीजेपी दोनों ही अपनी-अपनी जातीय-समुदाय आधारित राजनीति में फंसी हुई हैं। एक ध्रुवीकरण पर खेलती है, दूसरी पुरानी छवि पर। बसपा बहुजन एकता की बात करती है। दलित-मुस्लिम-पिछड़े गठजोड़ बसपा के साथ सबसे स्वाभाविक और मजबूत है।बीजेपी की गोदी मीडिया जितना भी “बीजेपी vs सपा” का राग अलापे, हकीकत यही है कि बीजेपी बसपा से डरती है। इसलिए वह सपा को आगे बढ़ाकर अपनी चुनावी रणनीति को जमीन पर उत्तर रही है। अब देखना यह है कि बसपा कैसे बीजेपी की इस चुनावी रणनीति का सामान करती है जो कि बसपा के लिए आसान नहीं होने वाला है क्योंकि बीजेपी सभी संसाधनों से मजबूत है उसके पास अपनी मीडिया,अरबों रुपए और मजबूत सोशल मीडिया टीम है। चुनाव से ठीक पहले वह अरबों रुपए इन्फ्लूएंसर को बाट देंगी जो बीजेपी vs सपा का माहौल बनाएंगे।गोदी मीडिया फर्जी सर्वे के माध्यम से लोगों के दिमाग योगी या अखिलेश का नरेटिव बैठाएगी। लेकिन बसपा के पास इनका मुकाबला करने के लिए अपनी कोई सोशल मीडिया सेल तक नहीं है वह केवल जनता के विवेक सहारे पर है जो कि आसानी से प्रचार तंत्र के बहकावे में आ जाती है।

लो कलो बात कल तक दैनिक भास्कर का पिडवाडा चाटते नही थक रहे थे की यह गोदी मीडिया नही

इनका काम ही तोड़ना है, कभी जातियों के नाम पर, कभी तुष्टिकरण के नाम पर, कभी जोड़ने का काम नही किया है।
