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“अतीत का बोझ मन से उतार दीजिए।” ✨💯

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शरीर को मल मल कर साफ करने से जब तक मन का मैल नहीं धोया जाता तब तकगंगा स्नान और गोमती स्नान कुछ भी फल नहीं देता ।आध्यात्मिक उन्नति के लिए मन की शुद्धता चाहिए । दो प्रकार की स्वच्छता है ।शरीर की स्वच्छता शरीर को मल मल कर धोने से आती है । मन की मैल (काम क्रोध मद लोभ मोह अहं कार )धोने से मन निर्मल बनता है ।इसीलिए संतो ने कहा है । मन न रँगाए ,रँगाए जोगी कपड़ा । तीरथ करने तीन चले मन चंचल ,चित चोर । मन की मैल छुड़ाया क्या ,लादे दस मन और ।। निर्मल मन जन सो मोंहि पावा ।मोंहि कपट छल छिद्र न भावा ।। सुन्दर काण्ड मे भगवान राम ने कहा है कि निर्मल मन वाला मुझे प्राप्त करता है ।मुझे कपट ,छल और दूसरों मे दोष देखना अच्छा नहीं लगता । कबीर कहते हैं —- माला फेरत जुग गया ,गया न मन का फेर । कर का मनका छाँड़ि के मन का मनका फेर ।। माला तो कर मे फिरै ,जीभ.फिरै मुख माँहि । मनवाँ तो चहुँ दिशि फिरै यह तो सुमिरन नाँहि ।। साधु भया तो क्या भया ,माला पहिरी चार । बाहर भेष बनाइया ,भीतर भरा भँगार ।।

Samajwadi Party Media Cell

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