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अभी हाल ही कुछ दिनों पहले मैंने अपने पिता को खोया है, एक पुत्र द्वारा इस पीड़ा को सहन कर पाना अत्यंत दुःखद होता है। इस दौरान पूरा नागौर एवं मारवाड़ मेरे इस दुख की घड़ी में मेरे साथ खड़ा रहा लेकिन मेरा अपना परिवार सिवाय दाह संस्कार के...

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जानकारी मिली है की यूपी के जनपद अलीगढ़ के ग्राम इब्राहिमपुर भीमपुर गोंडा रोड़ वहाँ ग्राम समाज की ज़मीन पर एक समाज के पक्ष के द्वारा मंदिर वगेरह का काम शुरू किया गया और पहले से भी वहाँ अन्य धार्मिक स्थल बने हुए हैं जो ग्राम समाज की ज़मीन पर बिना पुलिस परमिशन के बने हुए हैं, तो डॉ बाबा साहब अम्बेडकर जी को मानने वाले लोगों के द्वारा भी गाँव में ही दूसरी जगह ग्राम समाज की ज़मीन पर बाबा साहब अम्बेडकर की प्रतिमा लगा दी गई, वो भी गाँव के वर्तमान प्रधान की रजामंदी से। तो गाँव के ही दूसरे पक्ष के लोगों के द्वारा विरोध किया गया और फिर पुलिस प्रशासन प्रतिमा को वहाँ से हटाने आ गया है तो मेरा ALIGARH POLICE DM ALIGARH Government of UP और तमाम अधिकारियों से कहना है कि प्रशासन बाबा साहब की प्रतिमा तो हटाने पहुँच गया और पूरा दवाब बना रहा है लेकिन जिन दूसरे पक्ष के लोगो के द्वारा ग्राम समाज की और जमीनों पर जो भी धार्मिक स्थल बनायें गयें हैं क्या प्रशासन उन्हें भी वहाँ से हटाएगा? जब डॉ अम्बेडकर के मानने वाले लोगो के द्वारा ग्राम समाज की ज़मीन पर बने धार्मिक स्थलों का विरोध नहीं किया गया तो आख़िर बाबा साहब का विरोध करने वालों के साथ पुलिस ढाल की तरह क्यों खड़ी हैं। क्या ग्राम समाज की ज़मीन पर केवल एक ही पक्ष का अधिकार हैं की वे धार्मिक स्थल बना सके क्या बाबा साहब के मानने वाले लोगो का ग्राम समाज की ज़मीन पर कोई अधिकार नहीं है। जबकि सबकी संख्या सामाजिक आधार पर गाँव में लगभग बराबर है। मेरा प्रशासन से निवेदन है की बाबा साहब की प्रतिमा हटाने से पहले अन्य धार्मिक स्थलों को भी हटाया जायें तो वरना ये पक्षपाती रवैया बिल्कुल बर्दाश्त योग्य नहीं है। प्रशासन का ये रवैया हमें मजबूर करेगा अलीगढ़ कूच करने पर।

Abhishek Kumar Jatav ( बहुजन शायर )

23,010 Aufrufe • vor 1 Jahr

जय केदार! केदारनाथ जाएँ, तो केवल गर्भगृह तक मत रुकिए। मंदिर के ठीक पीछे, मुश्किल से तीस-चालीस मीटर की दूरी पर एक स्थान है जिसे अधिकांश यात्री बिना जाने ही लौट आते हैं आदि शंकराचार्य जी की समाधि। वहाँ पहुँचते ही मन का कोलाहल थम-सा जाता है। सामने ध्यानमग्न मुद्रा में बैठी वह विशाल श्यामल प्रतिमा,बारह फुट ऊँची, लगभग पैंतीस टन की,जिसे कृष्णशिला से तराशा गया है; ऐसा पत्थर जो वर्षा, धूप, अग्नि, वायु और कठोरतम शीत,सबको सहकर भी अडिग रहता है। मानो शिल्प स्वयं कह रहा हो,जो सत्य को पा ले, उसे काल भी नहीं मिटा पाता। पीछे की दीवारों पर उकेरे मंत्र, आसपास शिलाओं में गढ़ी आकृतियाँ, और उस दीवार के ठीक पीछे वह घाट, जहाँ बहुत कम लोग पहुँचते हैं,जहाँ ऊपर सरोवर से उतरते जल को एक द्वीप-सा रचकर, व्यवस्थित रूप से दोनों ओर मोड़ दिया गया है। इन सबको निहारते हुए, और समाधि पर कुछ पल मौन बैठते हुए, एक ही विचार अनायास उठता है-"हम कितना कम जानते हैं"। और यहीं से एक प्यास जन्म लेती है- यह जानने की, कि आख़िर वे थे कौन। केरल के कालडी ग्राम में जन्मे, जिन्होंने मात्र बत्तीस वर्ष के छोटे-से जीवन में वह कर दिखाया जो सदियाँ मिलकर भी नहीं कर पातीं। उन्होंने अद्वैत वेदांत का प्रकाश फैलाया,यह दर्शन कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं। उन्होंने प्रस्थानत्रयी,उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता पर वे भाष्य रचे जो आज भी सनातन चिंतन की रीढ़ हैं।भज गोविन्दम्,सौंदर्य लहरी,विवेकचूड़ामणि जैसी अमर रचनाएँ दीं और निर्वाण षट्कम्, जिसकी एक ही पंक्ति समूचे अद्वैत का सार समेट लेती है: "चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।" "मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार... मैं तो चित् और आनंद का स्वरूप हूँ - मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ।" समाधि के उस मौन में बैठकर जब ये शब्द भीतर उतरते हैं, तब समझ आता है कि वे किस अनुभूति को पाकर इसी केदार-भूमि पर विलीन हुए। और सबसे अद्भुत- दक्षिण के सागर-तट से लेकर उत्तर के इसी हिमालय तक पैदल चलकर, उन्होंने चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए और बिखरे हुए भारत को एक आध्यात्मिक सूत्र में पिरो दिया। फिर इसी भूमि पर आकर उन्होंने समाधि ली। यह समाधि 2013 की प्रलय में नष्ट हो गई थी, और बाद में इसे पुनर्निर्मित किया गया। संतोष की बात यह है कि अब यहाँ शंकराचार्य कुटीर और शंकराचार्य संग्रहालय जैसे कार्य आकार ले रहे हैं - ताकि आने वाला हर श्रद्धालु केवल दर्शन कर के न लौटे, बल्कि यह भी जान सके कि जिस विभूति की समाधि पर वह खड़ा है, उसने इस राष्ट्र की चेतना को क्या दिया। इसलिए जब केदार जाएँ, तो थोड़ा समय इस समाधि के लिए भी बचा रखिए। हो सकता है, बाबा केदार के दर्शन आपको भक्ति दें - और शंकराचार्य जी की यह समाधि आपको यह जानने की भूख दे कि अपनी ही संस्कृति के विषय में कितना कुछ जानना अभी शेष है। हर हर महादेव!

असितांग!!

14,897 Aufrufe • vor 21 Tagen

मध्यप्रदेश के रीवा जिले में युवक की हार्ट अटैक से अचानक मौत की घटना ने एक बार फिर से स्वास्थ्य सुरक्षा के मुद्दे को उजागर किया है। इसने कोविड-19 वैक्सीनेशन के संभावित दुष्प्रभावों पर गंभीर चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि हाल के वर्षों में हार्ट अटैक के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे स्वास्थ्य के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया जा रहा है। विशेषकर जब हम देखते हैं कि एक तानाशाह ने 2014 से 2024 तक अपने व्यक्तिगत हितों के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से चंदा लिया और हमारे जीवन को खतरे में डाल दिया। आज, लोग जिंदा लाशों की तरह जीने को मजबूर हैं, अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज करते हुए, जबकि धर्म के नाम पर उन्हें उस तानाशाह को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। असल में, धर्म को इस देश में कभी कोई वास्तविक खतरा नहीं था, फिर भी इसे राजनीतिक फायदे के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। मैंने पहली बार पीएम मोदी पर विश्वास करते हुए वैक्सीनेशन लगवाई, सोचकर कि यह मेरी और मेरे परिवार की सुरक्षा के लिए है। लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि मैंने अपने जीवन और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया। यह मेरे लिए एक जागरूकता का क्षण है। अब मेरा उद्देश्य है कि जब तक मैं जिंदा रहूं, इस यमराज रूपी राजा के खिलाफ एक मजबूत लड़ाई लड़ूं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी सकें। हमें मिलकर एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों, जहाँ राजनीति में स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए, और जहाँ हम अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकें। यह लड़ाई केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि हम सभी के भविष्य के लिए है।

Hansraj Meena

53,134 Aufrufe • vor 1 Jahr

पिछले दो दिन से मैं देख रहा हूँ कि मेरे बयान को घुमा-फिराकर लोगों के सामने पेश किया जा रहा है। और मेरे बयान में एक ऐसा भी अंग्रेजी का शब्द डाला जा रहा है, जो मैंने बोला ही नहीं, न ही मेरा दूर-दूर तक ऐसा कोई मतलब था। मेरी कोई भी मंशा किसी हमारे भाई को ठेस पहुँचाने की नहीं थी। सिख समाज के हमारे भाईयों को तो ठेस पहुँचाने की मैं सोच भी नहीं सकता। ना मेरी कभी कोई भावना ऐसी थी। लेकिन फिर भी सिख समाज हमारा अपना परिवार है। अगर किसी भाई की भावनाओं को ठेस लगी है तो मैं आपका भाई हूँ, मैं खेद प्रकट करता हूँ। मेरी मंशा, मेरा मकसद किसी का दिल दुखी करना नहीं था। सिख समाज हमारे देश का गौरवशाली समाज है और मुझे गर्व है ऐसे समाज पर, जिन्होंने हम सबके लिए जो कुर्बानियां दीं, उसको हम कभी भूल नहीं सकते। आज भी देश की सीमाओं की रक्षा हो, चाहे देश की आजादी की लड़ाई हो, सिख कौम ने देश के लिए जो कुर्बानियां दी हैं, उस पर हमें गौरव है और हमारा सिख समाज के साथ एक परिवार जैसा रिश्ता है। कभी भी ज़रूरत हुई तो छोटे-बड़े भाईयों की तरह आपस में हम हमेशा साथ खड़े रहे, ऐसा हमारा रिश्ता है। जब 1908 में पंजाब में 'पगड़ी संभाल जट्टा' आंदोलन था, तो शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी के चाचा सरदार अजीत सिंह जी के साथ मेरे खुद के परदादा चौधरी मातूराम जी को काले पानी की सजा हुई थी और तब से लेकर जब किसान आंदोलन हुआ, जब पंजाब से हमारे किसान भाई आए, तो सबसे पहले उनके साथ मैं स्वयं पहुँचा। हमेशा हर संघर्ष में हम साथ रहे हैं। और 84 में जो हुआ, सिख समाज के न्याय की उस लड़ाई में भी हम उनके साथ हैं। उनको न्याय मिलना चाहिए, कोई दोषी नहीं बचना चाहिए। वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

Deepender Singh Hooda

92,342 Aufrufe • vor 9 Tagen

अनिल यादव जी, वैसे तो मैं इस तरह के पोस्ट को एंटरटेन नहीं करती, लेकिन आप बिना मेरी अनुमति के मेरी वीडियो का इस्तेमाल कर रहे है जो की एक क़ानूनन अपराध है और साथ ही आपने मेरी पत्रकारिता पर सवाल खड़े किये है तो मेरे अपने लिए नहीं पर मेरे दर्शको के लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है की आख़िर हुआ क्या था! जैसा की आप देख सकते है, अनिल जी ने वीडियो को बहुत बेहतरीन ढंग से एडिट किया है और बीच में जो घटना हुई उसे स्टार्ट में लगा दिया ताकि थंबनेल देखकर लोग इनके वीडियो को और व्यूज दे दे! अब जरा इस वीडियो को देखिए जहाँ मैं लाइव कर रही थी. यहाँ कई पत्रकार अगल-बगल लाइव कर रहे थे, जिस व्यक्ति से ये बात कर रहे थे उस वक्त वो और उसके बगल वाला व्यक्ति चुपचाप खड़े थे! जैसे ही मैंने बात करना शुरू किया इन्होंने पहली बार में टोक दिया तो मैं पीछे हट गई! उसके बाद जब मैं दुबारा आगे बढ़ी, तो वो चायवाला ख़ुद बोलना चाह रहा था और मेरी तरफ़ मुड़ा, मैंने मौक़ा दिया बोलने का। लेकिन आगे आप देख ही सकते है कैसे छीना झपटी करते हुए इन्होंने उसे खींच लिया! मैंने फिर बड़े इज़्ज़त से कहा आप कर लीजिए और आगे बढ़ गई! इन्होंने इसके ठीक आधे घंटे के भीतर ये वीडियो पोस्ट किया! जब इन्होंने देखा की कई घंटे बीतने के बाद भी मैंने इनके वीडियो को एंटरटेन नहीं किया, तो ये मेरी फोटो पर ज़बरदस्ती कमेंट करने लगे! मैंने फिर भी कोई तवज्जो नहीं दी।आखिर में इतना ही कहूँगी, एक दशक से ज़्यादा फील्ड पर काम कर रही हूँ! तमाम पुरुष सहयोगियों के साथ विपरीत परिस्थितियों में काम किया है लेकिन एक पुरुष पत्रकार की ओर से ऐसी हरकत इससे पहले कभी नही देखी! बेहद दुर्भाग्यपूर्ण!

Shivangi Thakur

101,026 Aufrufe • vor 9 Monaten

सुप्रिया Supriya Shrinate जी का वक्तव्य मेरे फेसबुक और इंस्टा के अकाउंट पर कई लोगों का एक्सेस है. इसमें से किसी व्यक्ति ने आज एक बेहद घृणित और आपत्तिजनक पोस्ट किया था. मुझे जैसे ही इसकी जानकारी हुई मैंने वह पोस्ट हटा दिया. जो भी मुझे जानते हैं, वह यह अच्छी तरह से जानते हैं कि मैं किसी भी महिला के लिए व्यक्तिगत भोंडी बात नहीं करती हूँ. मेरी जानकारी में आया है कि यह पोस्ट पहले एक पैरोडी अकाउंट (@Supriyaparody) पर चल रहा था. यहां से किसी ने यह पोस्ट उठाकर मेरे अकाउंट पर पोस्ट कर दिया. मैं ऐसा करने वाले की पहचान में लगी हूं. साथ ही मेरे नाम का दुरूपयोग कर बनाए गए पैरोडी अकाउंट को भी X में रिपोर्ट किया है.

Surendra Rajput ‏

87,215 Aufrufe • vor 2 Jahren

जोजरी के संकट पर एक पूर्ण दस्तावेज... शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने जोजरी नदी पर एक वीडियो जारी किया है। 7 मिनट 40 सेकंड का यह वीडियो सिर्फ एक वीडियो नहीं बल्कि एक नदी के मरने और इसके हजारों प्रभावितों पर एक पूरा दस्तावेज है। यह सिर्फ भारत में ही संभव हो सकता है कि हजारों लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। जोजरी नदी के विषय को पूर्व में मैंने भी अपने स्तर पर पुरजोर तरीके से उठाया था और सरकार की कलई खोलने का प्रयास किया था। मेरे आह्वान पर देश के बड़े मीडिया संस्थानों ने भी जोधपुर और बालोतरा जिले के इस ज्वलंत विषय को अपने-अपने प्लेटफार्म पर जगह दी थी। सरकार पहले इस समस्या को मानने तक से इनकार कर रही थी लेकिन बाद में इसकी गंभीरता को मानना भी पड़ा लेकिन अफसोस की बात है कि अभी तक कुछ भी हुआ नहीं और इस बार अच्छी बारिश के कारण यह समस्या और बड़ी हो गई। जोजरी के मुद्दे पर लगातार बात होनी चाहिए और सरकार को मजबूर कर देना चाहिए कि उसकी नाकामी के कारण लोगों को मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। Ravindra Singh Bhati

Arvind Chotia

22,314 Aufrufe • vor 1 Jahr

ये पहली बार नहीं है जब भाजपा के नेताओं ने बाबा साहेब का अपमान किया है। लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा संसद में बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जी का अपमान हमारा समाज बर्दाश्त नहीं करेगा। मैंने और मेरे समाज ने सदियों से ऐसे जातीय अपमान को झेला है। खुद बाबा साहेब को कांग्रेस और देश के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू जी ने कई बार अपमानित किया और कई मौकों पर उनको नीचा दिखाने का काम किया। यही नहीं नेहरू जी ने तो सुनियोजित तरीके से बाबा साहेब को चुनाव हराने का भी काम किया। लेकिन तब के कांग्रेसी नेताओं के हथकंडों से बाबा साहेब विचलित नहीं हुए और हमारे समाज को जो ताकत दी उसे एक राजनैतिक ताकत बना कर आदरणीय मान्यवर साहेब श्री कांशीराम जी और आदरणीय बहन कु. मायावती जी ने हमारे समाज को उसका हक दिलाने का काम किया। मुझे याद है कि 2006 में कांग्रेस की सरकार में NCERT की किताब में एक बेहद अपमानजनक कार्टून छापा गया था जिसमें नेहरू कोड़ा लेकर बाबासाहेब पर हमलावर हैं।बताइए कांग्रेस बच्चों को क्या पढाना चाहती थी। सबको याद है 2012 में भी संसद में ऐसा ही हंगामा हुआ था, तब कांग्रेस की सरकार थी और आज भाजपा की सरकार है। इसलिए ही मान्यवर साहब ने एक को सांपनाथ और दूसरे को नागनाथ कहा था, यही वजह है कि हमें इस देश को इन दो दलों की जागीर नहीं बनने देना है। हमारे समाज को सम्मान सिर्फ और सिर्फ आदरणीय बहन कु. मायावती जी के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ही दिला सकती है। जय भीम, जय भारत।

Akash Anand

52,239 Aufrufe • vor 1 Jahr

लोगों को आश्चर्य होगा कि छात्र जीवन में मेरा राजनीति से कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि 22 साल की उम्र में नगर पालिका अध्यक्ष बन गया। 30 साल की उम्र में विधायक बन गया। 33 साल में सांसद और फिर 40 साल में मुख्यमंत्री बन गया। लेकिन मैंने अपने जीवन में कभी विचारधारा से समझौता नहीं किया। राजनीतिक जीवन में मैंने कभी किसी के लिए कटुता नहीं पाली। कई बार मतभेद होते थे, लेकिन मनभेद किसी से नहीं हुआ। मैं जिनकी विचारधारा से सहमति नहीं होता, उनसे भी मेरे अच्छे रिश्ते हैं। मेरा सौभाग्य है कि मैं उस लोकसभा में भी रहा- जिसमें अटल जी, राजीव जी और चंद्रशेखर जी हुआ करते थे। इन लोगों से प्रभावित होकर ही मैंने अपना राजनीतिक सफर पूरा किया है। लोकतंत्र की बुनियाद है- चर्चा और सदन में सत्ता पक्ष की यह जिम्मेदारी होती है कि विपक्ष के साथ चर्चा के बाद कोई रास्ता निकाले। रास्ता निकलता है और निकलना चाहिए। आज इस देश में जिस प्रकार से सांप्रदायिक कटुता बढ़ती जा रही है, यह लोकतंत्र, संविधान, समाज और इस देश के लिए अच्छा नहीं है। : राज्यसभा में @digvijaya_28 जी का पूरा वक्तव्य-

Congress

25,928 Aufrufe • vor 5 Monaten

महान वीरांगना रानी दुर्गावती के 463वें बलिदान दिवस पर आज जबलपुर स्थित उनके समाधि स्थल पर पुष्पांजलि अर्पित की। जबलपुर में रानी दुर्गावती के नाम पर ₹500 करोड़ की लागत से एक चिड़ियाघर और वन्यप्राणी रेस्क्यू सेंटर बनाया जा रहा है। नई पीढ़ी को उनके गौरवशाली जीवन और योगदान से परिचित कराने के लिए मदन महल के समीप ₹100 करोड़ की लागत से एक नया संस्थान भी तैयार किया जा रहा है। साथ ही, 35वीं बटालियन मंडला का नाम रानी दुर्गावती के नाम पर रखा गया है एवं जबलपुर एयरपोर्ट का नाम भी उनके नाम पर रखा जाएगा। इस अवसर पर माननीय प्रदेश अध्यक्ष श्री Hemant Khandelwal जी, कैबिनेट मंत्री श्री Rakesh Singh जी, सांसद श्री आशीष दुबे जी सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण उपस्थित रहे।

Dr Mohan Yadav

31,070 Aufrufe • vor 2 Monaten

माननीय विधायक महोदय कुलदीप धनकड़ जी आप राजनीति के लिए अपने संस्कार भी भूल गए। मेरे दिवंगत पिताजी के लिए इतने हल्के शब्दों का उपयोग, क्या पार्टी आपको यही संस्कार सिखाती है। मैंने तो जनभावनाओं को उठाया था। इसमें मैंने क्या ग़लत बोल दिया, मैंने तो उसमे आपके परिजनों का नाम नहीं लिया था क्योंकि मेरे परिवार और पार्टी ने मुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए। क्या लोकतंत्र में ग़लत बात का विरोध करना ग़लत है ? मैंने तो ये कहा था की ये गोदामों की ज़मीन पावटा की जनता की संपति है इसको नहीं बेचना चाहिए। क्योंकि पावटा क़स्बे में वैसे ही सरकारी भवनों के लिए जगह नहीं है तो आने वाले समय में इस भूमि में अनेक सरकारी कार्यालय बन सकते है। क्या ये माँग करना जायज़ नहीं है। मैंने कब कहा की ये मेरे बाप की ज़मीन है। मैंने तो जनता की संपति बताया था, हाँ आपको एक बात बताना चाहता हूँ की जो शब्द आपने मेरे दिवंगत पिताजी के लिए बोले है वो मुझे भी बोलने आते है लेकिन मेरे संस्कार मुझे ऐसे हल्के शब्दों के लिए अनुमति नहीं देते। जनता ने मुझे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है इसलिए मेरा धर्म बनता है की अगर सत्तापक्ष कोई ग़लत निर्णय करे तो मैं उसका विरोध करूँ। और हाँ आपने बोला है की मैंने काम नहीं किए है क्या ऐसे, तो मैंने तो मेरे कार्यकाल में एक भी सार्वजनिक संपति नहीं बेची। और हाँ आप जनता को सार्वजनिक रूप से ये बताए की आप और आपकी सरकार इस ज़मीन को क्यो बेचना चाहती है। जनता को ये पूछने का अधिकार है। आप पावटा में सर्वदलीय सभा बुलाओ और जनता से राय करो की ये ज़मीन बेचनी चाहिए या नहीं। आप और आपकी सरकार जनता से बड़े नहीं हो। लोकतंत्र में जनता ही मालिक है। सरकार जनता की मालिक नहीं है बल्कि जनता सरकार की मालिक है।सत्ता का इतना अहंकार ठीक नहीं है विधायक महोदय, सत्ताये तो आती जाती रहती है लेकिन अपने परिवार के संस्कार मत भूलो, आप जिंदगी भर इस पद पर नहीं रहोगे।

Indraj Gurjar

19,673 Aufrufe • vor 11 Monaten

दोबारा होने जा रहे नीट (NEET) एग्जाम तथा टेलीग्राम ऐप पर प्रतिबंध को लेकर मीडिया के प्रश्न का जवाब: "देखिए, सरकार ने सिर्फ टेलीग्राम को ही क्यों रोका? इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ऐसे और भी कई प्लेटफॉर्म्स और चैनल्स हैं। अगर सरकार को कोई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करनी ही थी, तो वह किसी एक ऐप को टारगेट करने की बजाय सभी के लिए समान रूप से (कॉमन) लागू होनी चाहिए थी। पर असल मुद्दा कुछ और है। अभी हाल ही में आपके ही मीडिया जगत के एक साथी मुझसे मिलने आए थे; जब हमारे बीच चर्चा हो रही थी, तब मैंने इस बात को बकायदा रेखांकित किया था कि देश में पेपर लीक का जो सिलसिला चल रहा है, वह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपर लीक राजस्थान में भी हुए, गुजरात में हुए, उत्तर प्रदेश में हुए और देश के अनेकों राज्यों में हुए हैं। मैंने तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भारत सरकार को समय रहते चेताया था कि पूरे देश के भीतर एक बहुत बड़ी अपराधी गैंग (Inter-State Gang) सक्रिय हो चुकी है, जो हर जगह युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हुए पेपर आउट करवा रही है। लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहाँ की बात करने की बजाय, जानबूझकर पूरा ध्यान केवल और केवल राजस्थान पर केंद्रित कर दिया। ये लोग ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि धरातल पर तो ये कोई काम कर नहीं रहे हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भयंकर भ्रष्टाचार व्याप्त है। सुशासन (गवर्नेंस) नाम की कोई चीज़ बची नहीं है, चाहे पानी हो, बिजली हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या सड़कें, हर क्षेत्र बदहाल है। आज स्थिति यह है कि सरकार के किसी भी विभाग में पेमेंट नहीं हो पा रहे हैं; सारे सरकारी महकमे और ठेकेदार रो रहे हैं। बुजुर्गों और जरूरतमंदों को छह-छह महीने तक पेंशन नहीं मिल रही है, छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं मिल पा रही है। आज राजस्थान ऐसे बदतर दौर से गुजर रहा है। ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन लोगों ने केवल एक ही मुद्दा पकड़ रखा है। मैं तो कहता हूँ कि आपको किसने रोका है? जिसने भी गलती की है, जिसने भी अपराध किया है, आप उसे ढूंढिए और सख्त से सख्त सजा दीजिए। लेकिन आपके पास दूरदर्शिता नहीं है, इसलिए आप केवल पाँच साल तक इसी राजनीतिक द्वेष और आरोप-प्रत्यारोप में अपना समय बर्बाद कर देंगे। इसके साथ ही, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने राजस्थान की जनता के साथ एक बड़ी वादाखिलाफी की है। जब प्रदेश में चुनाव चल रहे थे, तब मैंने सार्वजनिक रूप से शंका जताई थी कि यदि राज्य में भाजपा की सरकार बनी, तो हमारी तमाम शानदार जनकल्याणकारी योजनाएं बंद कर दी जाएंगी। मेरी इस बात पर खुद प्रधानमंत्री जी ने मंच से प्रदेशवासियों को भरोसा दिलाते हुए वादा किया था कि 'अशोक गहलोत जो कह रहे हैं, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हमारी सरकार आने पर आपकी कोई भी जनहित की स्कीम बंद नहीं होगी।' लेकिन सरकार में आते ही इन्होंने हमारी तमाम कल्याणकारी योजनाएं बंद कर दीं। आज जब हम प्रधानमंत्री जी को उनका वह वादा याद दिलाते हैं, जब हम उनसे कन्हैयालाल हत्याकांड के वास्तविक न्याय को लेकर सवाल करते हैं, या जब हम ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट (ERCP) की कड़वी सच्चाई और हमारी बंद की गई योजनाओं को लेकर जवाब मांगते हैं, तो न तो माननीय मोदी जी के पास इसका कोई जवाब होता है और न ही गृह मंत्री अमित शाह जी कुछ बोलते हैं। अब ऐसे में क्या किया जाए? सच तो यह है कि ये लोग देश और प्रदेश की सत्ता को जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से अपने अहंकार और घमंड के बल पर चला रहे हैं। यही आज की सबसे बड़ी हकीकत है।"

Ashok Gehlot

11,992 Aufrufe • vor 2 Monaten

4 फ़रवरी 2026 को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान दिए गए अपने भाषण के दौरान अपनी तरफ से आरंभ में ही इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि राष्ट्रपति का अभिभाषण, राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को उठाने का एक बेहतरीन अवसर था, पर वे बातें अभिभाषण में प्रलिखित नहीं होती, इसी भाव के साथ मैंने सामाजिक न्याय से लेकर संसदीय तंत्र पर पर तथ्यों पर मैं अपने बातें रखी थी। लेकिन राज्यसभा की वेबसाइट पर अपलोड किए गए भाषण को शब्दशः पाठ की समीक्षा करने पर मैंने पाया कि मेरे भाषण का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी उचित औचित्य के या तो expunge दिया है या बिना किसी उचित justification से हटाया गया है। मैंने जो समीक्षा की है, उसमें पाया है कि मेरे भाषण के अन recorded portions वे हैं, जिसमें मैंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल में संसदीय कामकाज पर तथ्यों के साथ टिप्पणियां की है और प्रधानमंत्री जी की चंद नीतियों की आलोचना की है, जो कि नेता प्रतिपक्ष होने के कारण मेरा यह दायित्व भी है, क्योंकि मुझे लगता है कि वे नीतियां भारतीय जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। मेरा संसदीय जीवन पांच दशक से अधिक अधिक का है। लंबे समय तक विधायक और सांसद के रूप में मैंने काम किया है और हमेशा मैंने सदन की गरिमा, नियम, परंपराओं और पीठासीन अधिकारी के कर्तव्य की जानकारी के साथ हमेशा भाषा की मर्यादा के प्रति सजग और सचेत रहा हूँ। कहाँ किन बातों को निकाला जा सकता है, इसमें पूरी तरह मैं वाकिफ हूं और कुछ जानता हूँ। इसीलिए मैं आपसे विनती करना चाहता हूँ कि मेरी टिप्पणियां हटाई गई है, उनमें कुछ भी असंसदीय या defamatory words नहीं है और न ही इसमें नियम 261 का कहीं उल्लंघन भी मैंने नहीं किया है। मेरी कही गई बातें स्पष्ट रूप से चर्चा के अधीन विषय से संबंधित थी। वे पूरी तरह से धन्यवाद प्रस्ताव के दायरे में आते थे और इसलिए मुझे लगता है कि मेरे भाषण का इतना बड़ा हिस्सा काटना, हटाना ये democracy के खिलाफ है और Freedom of Speech के खिलाफ है। संविधान के अनुच्छेद 105 (1) के तहत सांसदों को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र के अधिकार को लेकर भी चिंता प्रकट करता है। इसीलिए मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि हटाए गए अंशों पर पुनर्विचार करते हुए बहाल किया जाए। आप मुझे न्याय नहीं मिला तो मैं आप जनता के बीच अन recorded version को साझा करने को बाध्य होगा। उस वक्त मुझे आप यह नहीं कहना, आपने Rules of Procedures का उल्लंघन किया है।

Mallikarjun Kharge

16,503 Aufrufe • vor 6 Monaten

अशोक की पीड़ा को सुना जाना चाहिए... ट्विटर पर आंसू बहाते, पौंछते अशोक मेघवाल के वीडियो ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने अशोक से वादा किया कि हम जरूर मिलेंगे। जैसे भी हो सकेगा, आवाज उठाएंगे। जहां तक पहुंचा सकते हैं, वहां तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे। जितना हो सके। मुझे अशोक की पीड़ा सही लगी। उसके साथ अन्याय हुआ है लेकिन संभवतः एससी-एसटी एक्ट का जिस तरह दुरुपयोग होता है, संभवतः उसका केस भी उसी तरह देखा गया। अशोक के अनुसार पाली जिले में रहने वाले उसके परिवार की जमीन पर 2021 में दबंगों ने कब्जा कर लिया। प्रतिरोध करने पर उसकी मां का सिर फोड़ दिया गया और उसकी गर्भवती बहन के साथ मारपीट की गई। अशोक ने उस वक्त अखबारों में छपी हुई खबरें भी दिखाई। पुलिस के कुछ अफसरों ने उसकी बहुत अच्छी मदद की तो कुछ ने नहीं की। इससे पहले अशोक ने शिक्षक बनने का सपना देखा था लेकिन इस घटना के बाद उसने वकालत की पढ़ाई को चुना। मैं एक बार पहले भी अशोक से मिला था। तब वह काफी कॉन्फिडेंट दिखा था लेकिन आज टूटा हुआ सा था। अशोक की पीड़ा को सुना जाना चाहिए और उसे और उसके परिवार को न्याय भी मिलना चाहिए। अशोक दलित वर्ग की मुखर आवाज है लेकिन इस चक्कर में वह ग़लत तरीके से लोगों को टारगेट करता रहा। अनेक लोगों से बेमतलब में पंगे लिए। कई लोगों पर व्यर्थ की अशोभनीय व्यक्तिगत और जातीय टिप्पणियां भी की, महिलाओं पर भी, और चलती हवा में बहकर उसने मनु स्मृति जलाने के वीडियो भी पोस्ट किए जिसका मैं बिल्कुल भी समर्थन नहीं करता। लेकिन इस सबके बावजूद पीड़ा के इस मौके पर उसे अकेला छोड़ना भी अन्याय से कम नहीं होगा। मैंने तय किया कि मैं अपना धर्म निभाऊंगा। मैंने उसे किसी पर भी अनर्गल टिप्पणियां नहीं करने का सुझाव भी दिया। अशोक से बहुत सारे लोगों को शिकायतें हैं। मुझे भी है, लेकिन नफ़रत को नफरत से कभी नहीं जीता जा सकता। नफरत को सिर्फ प्रेम से ही जीता जा सकता है। तो, अशोक का पक्ष उसी के शब्दों में सुनिए और अपने विवेक से फैसला कीजिए। जय हिन्द Ashok Meghwal

Arvind Chotia

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आज की टीवी डिबेट ने एक बार फिर उस कड़वे सच को उजागर कर दिया, जिसे हम लंबे समय से महसूस कर रहे हैं, “जनता की आवाज़” के नाम पर मंच सजाया जाता है, लेकिन असल में वह एक सुनियोजित, प्रायोजित और पक्षपातपूर्ण तमाशा बन चुका है। जहाँ सत्ता पक्ष के समर्थकों को “आम जनता” बनाकर बैठाया जाता है, और विपक्ष को घेरने के लिए सवालों की एकतरफा बौछार की जाती है। एंकर, जिनका दायित्व निष्पक्षता और सत्य होता है, खुलेआम तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, और जब सच्चाई तस्वीरों में सामने आ जाती है, तब भी उसे नकारने का दुस्साहस किया जाता है। यह सिर्फ एक डिबेट नहीं थी, यह लोकतंत्र के मूल्यों के साथ किया गया एक सुनियोजित खिलवाड़ था। जिस मीडिया को कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, आज वही स्तंभ सत्ता के संरक्षण में खड़ा होकर एक पार्टी विशेष का प्रचार-प्रसार करने का माध्यम बनता जा रहा है। सवाल सत्ता से होने चाहिए थे, लेकिन कटघरे में विपक्ष को खड़ा किया गया, यही आज के मीडिया का दुर्भाग्यपूर्ण सच है। हमारे प्रवक्ताओं को बार-बार दबाने, रोकने और उनकी आवाज़ को कुचलने का प्रयास किया जाता है, लेकिन यह भूल जाते हैं कि सच को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। आज अजय उपाध्याय जी ने जिस साहस और आत्मसम्मान के साथ इस प्रायोजित मंच का बहिष्कार किया, वह किसी एक व्यक्ति का निर्णय नहीं, बल्कि उस हर आवाज़ का प्रतिनिधित्व है, जो झुकने से इनकार करती है। यह समय कठिन है, लेकिन इतिहास गवाह है, जब-जब सच को दबाने की कोशिश हुई है, तब-तब वह और अधिक ताकत के साथ उभरा है। हमें कितना भी डराने, दबाने या बदनाम करने का प्रयास किया जाए, हम न डरेंगे, न झुकेंगे। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं है, यह लड़ाई सत्य और असत्य के बीच है, लोकतंत्र और प्रोपेगेंडा के बीच है, और हम उस पक्ष में खड़े हैं जहाँ सच अभी भी जिंदा है। हम सब अजय उपाध्याय जी के साथ हैं, और हर उस आवाज़ के साथ हैं जो इस अंधेरे में भी सच की मशाल जलाए हुए है।

Alok Sharma

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पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे पूर्व सांसद 61 वर्षीय मानवेंद्र सिंह जसोल द्वारा दूसरी शादी करने की खबरें सामने आने के बाद परिवार ने उनसे नाता तोड़ लिया है। परिवार (मां शीतल कंवर, भाई भूपेंद्र सिंह, और पुत्र हमीर सिंह) ने इस रिश्ते को व्यक्तिगत फैसला बताते हुए अस्वीकार कर दिया है और उनके इस दूसरे विवाह को मान्यता देने से मना किया है। हालही में मानवेन्द्र सिंह जसोल के पुत्र का विवाह समारोह था। उस विवाह में भी वे अपनी दूसरी पत्नी को लेकर पहुंचे थे। लेकिन परिवार ने विरोध किया और जैसे - तैसे बात टल गई। होली के दिन इस कहानी में ऐसा कुछ घटा कि अब जसोल परिवार को खुद आगे आकर मानवेन्द्र सिंह जसोल से अलगाव का रास्ता अख्तियार करना पडा। मानवेन्द्र सिंह जसोल होली के दिन शराब के नशे में उसी लड़की को जोधपुर स्थित अपने घर लेकर पहुंचे थे। बच्चों को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने विरोध किया और स्वर्गीय जसवंत सिंह जसोल की पत्नी को फोन करके बुलाया। जब परिवार इकट्ठा हुआ तो मानवेन्द्र सिंह जसोल की अपनी मां और भाई से हॉट टॉक हो गई। लेकिन परिवार ने उस लड़की को घर से बाहर निकाल दिया। इस पूरे घटनाक्रम पर वह लडकी जोधपुर के महामंदिर थाना में स्वर्गीय जसवंत सिंह जसोल की 90 वर्षीय पत्नी, मानवेन्द्र सिंह जसोल के भाई और पुत्र हमीर सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए पहुंचती है। लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट लेने से मना कर दिया। इस बात की शिकायत मानवेन्द्र सिंह जसोल मुख्य सचिव वी श्रीनिवास से करते हैं। वी श्रीनिवास जोधपुर कमिश्नर से जानकारी लेते हैं तो कमिश्नर ने सब बात मुख्य सचिव को बता दी। उसके बाद वी श्रीनिवास जसवंत सिंह जसोल की पत्नी से बात करते हैं और वापस मानवेन्द्र सिंह जसोल को बोलते हैं कि जब तक जसवंत सिंह जसोल की पत्नी कुछ नहीं कहेंगी तब तक इस मामले में वे कोई एक्शन नहीं लेंगे और यह मामला पुलिसिया कार्यवाही से बचा रहता है। अगले दिन स्वर्गीय जसोल साहब की पत्नी भाजपा की लीडरशिप को फोन करके क्लियर करती हैं कि वे मानवेन्द्र सिंह जसोल से अलगाव का रास्ता अख्तियार कर रही हैं क्योंकि उन्होंने मालानी सहित जसोल परिवार की परंपराओं को तारतार किया है। संभव है प्रदेश और देश के बड़े नेताओं को उन्होंने फोन किया हो। इस कहानी में एक बात यह भी है कि मानवेन्द्र सिंह जसोल स्वर्गीय चित्रा सिंह की मौत के बाद क्लेम में मिले कोई दो - ढाई करोड़ रुपए उस लड़की पर खर्च कर चुके हैं जिसे उनका परिवार स्वीकार नहीं कर रहा है। अब इतना सबकुछ हुआ तो जसोल परिवार ने स्वर्गीय जसवंत सिंह जसोल की पत्नी के नेतृत्व में आखिर यह फ़ैसला लेकर अपना पक्ष साफ कर दिया है। स्वर्गीय जसोल साहब की 90 वर्षीय पत्नी का पक्ष यह है कि उनके जिंदा रहते जसोल परिवार में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जो सामाजिक मर्यादाओं और मालानी की परंपराओं के खिलाफ है। प्रतिष्ठित परिवारों में पहले भी ऐसे मामले आए हैं लेकिन यहां एक 90 वर्षीय विधवा क्षत्राणी ने परंपराओं को महफूज रखने के लिए जो हिम्मत दिखाई है वह वंदनीय है। अब समाज तय करे कि वह मानवेन्द्र सिंह जसोल के साथ है या फिर उस क्षत्राणी के साथ है जो उम्र के इस पड़ाव में अपने पति, परिवार और समाज की परंपराओं को बचाने के लिए लड़ रही है। मैं स्वर्गीय जसोल साहब की पत्नी को प्रणाम करता हूं!

Jeetu Besla

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