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अरावली पर्वतमाला….!!! सुप्रीम कोर्ट की नई नियमावली पर शानदार व्यंग्य…!!

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अरावली पर्वतमाला में खनन को लेकर नए नियमों पर इन दिनों विवाद तेज है। दावा किया जा रहा है कि इन बदलावों से अरावली को भारी नुकसान होगा। लेकिन सच्चाई क्या है? करीब 200 करोड़ वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला तांबा, जिंक, ग्रेनाइट, लेड और कॉपर जैसे खनिजों से समृद्ध है। यह पर्वतमाला चार राज्यों में फैली है, जहां अब तक खनन को लेकर अलग-अलग नियम लागू थे। नतीजा—पारदर्शिता की कमी और व्यापक भ्रम। इसी असमानता को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी का गठन किया, ताकि सभी राज्यों के लिए एक समान खनन नीति बनाई जा सके। इस साल कमेटी ने अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपीं, जिन्हें नवंबर में मंजूरी दे दी गई। सबसे अहम बात — सुप्रीम कोर्ट के ये आदेश अरावली को बचाने के लिए हैं, न कि उसे नुकसान पहुंचाने के लिए। कमेटी की दो प्रमुख सिफारिशें: 1️⃣ सिर्फ 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा ➡️ यानी ऐसी पहाड़ियों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा 2️⃣ अगर 100 मीटर ऊंची दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से कम है ➡️ तो उस पूरे क्षेत्र को अरावली पर्वत श्रृंखला माना जाएगा और वहां भी खनन की अनुमति नहीं होगी सरकार के अनुसार, इन नियमों से अरावली का लगभग 90% क्षेत्र संरक्षित रहेगा। केवल 0.19% हिस्से में ही खनन होगा—जो करीब 278 वर्ग किलोमीटर है। तो सवाल ये नहीं कि अरावली को नुकसान होगा या नहीं, सवाल ये है कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर क्यों पेश किया जा रहा है? देखिए, ये विस्तृत रिपोर्ट...⬇️

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आज NSUI राजस्थान द्वारा आयोजित “अरावली बचाओ पदयात्रा” में सम्मिलित होकर इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर अपनी आवाज़ बुलंद की। भाजपा सरकार ने पहाड़ों की ऊँचाई के आधार पर अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा में बदलाव किया है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस नई परिभाषा को स्वीकार किए जाने से करोड़ों वर्षों पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। आज NSUI राजस्थान अध्यक्ष VINOD JAKHAR जी ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और युवाओं को इस आंदोलन से जोड़ा। सरकार से मांग करते हैं कि इस परिभाषा की दोबारा समीक्षा की जाये और अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। NSUI NSUI Rajasthan Congress

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