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आजा केजू, आजा तिहाड़.....

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Sensitive content

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Rashmi

52,973 Aufrufe • vor 2 Tagen

इनका नाम आशा भोसले था। इनका जन्म 1933 में सांगली के एक छोटे से गाँव में हुआ था। जब वह 9 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। परिवार के पास पैसे नहीं थे। अपने भाई-बहनों का पेट भरने के लिए उन्होंने 10 साल की उम्र में ही गाना शुरू कर दिया। 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी कर ली। उनकी बहन लता ने उनसे बात करना बंद कर दिया। उनके परिवार ने उन्हें बेदखल कर दिया। वह शादी बहुत ज़्यादतियों भरी थी। 1960 में वह शादी टूट गई। वह दो बच्चों के साथ वापस लौटीं, और तीसरे बच्चे की माँ बनने वाली थीं। न पैसे थे, न कोई सहारा। और तीन बच्चों का पेट भरना था। उन्होंने फिर से गाना शुरू कर दिया। कोई उन्हें लेना नहीं चाहता था। 1950 के दशक में उन्हें सिर्फ़ वही गाने मिलते थे जिन्हें लता, गीता दत्त और शमशाद बेगम ठुकरा देती थीं। खलनायिकाओं के गाने। कैबरे नंबर। 'सी' ग्रेड फ़िल्मों के गाने। उन्होंने हर एक गाना गाया। क्योंकि उनके बच्चों को खाना खिलाना था। फिर आए ओ.पी. नैयर। फिर आए आर.डी. बर्मन। और फिर पूरी दुनिया बदल गई। दम मारो दम। पिया तू अब तो आजा। चुरा लिया है तुमने। उन्होंने सिर्फ़ इन गानों को गाया ही नहीं, बल्कि वह इन गानों में पूरी तरह ढल गईं। 1995 में, 62 साल की उम्र में, उन्होंने 'रंगीला रे' गाना गाया और उस पूरी पीढ़ी को चुप करा दिया जिसने उन्हें भुला दिया था। 2011 में, 'गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' ने उस बात पर मुहर लगा दी जो भारत पहले से जानता था: संगीत के इतिहास में सबसे ज़्यादा गाने रिकॉर्ड करने वाली कलाकार। 12,000 गाने। 20 भाषाएँ। 8 दशक। आज 92 साल की उम्र में मुंबई में उनका निधन हो गया। वह लड़की, जिसने खलनायिकाओं के गाने इसलिए गाए क्योंकि कोई और उन्हें काम नहीं देना चाहता था, एक पूरी पीढ़ी की आवाज़ बन गई। अब कभी कोई दूसरी आशा भोसले नहीं होगी। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे, आशा ताई।

Vatsala Singh

56,840 Aufrufe • vor 2 Monaten

इस लड़की का नाम गुलफिशा फ़ातिमा है जो कि 9 अप्रैल 2020 से UAPA के तहत तिहाड़ जेल में बंदी है, यानी साढ़े चार साल से जामिया की छात्रा इसलिए जेल की दीवारों में क़ैद है क्योंकि वो मज़हब से मुसलमान है औऱ जमानत नियम उन पर लागू नहीं किया जा सकता, गुलफिशा की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की जाती है तो हाई कोर्ट जाने के लिए कहा जाता है, याचिका हाई कोर्ट में दाख़िल की जाती है तो जमानत देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज़ कर दी जाती है, HC से खारिज़ होने के बाद याचिका SC में डाली जाती है तो फिर सुनवाई टाल दी जाती है, SC में सुनवाई के लिए तारीख़ पर तारीख़ मिलती है फिर कुछ माह या वर्ष बाद याचिका खारिज कर HC जाने के लिए कह दिया जाता है, पिछले साढ़े चार सालों से उनका परिवार उनका एडवोकेट हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट दौड़ रहे है ,परिवार टूट रहा है गुलफिशा के माता पिता अपनी बेटी के लिए तड़प रहे है बिलख रहे है और नींद ना आने पर नींद की दवाईयों को सहारा बना सो जाते है, हर रोज़ इसी उम्मीद में बूढ़ी आंखे खुलती है कि आगामी सुनवाई की तारीख़ पर जमानत मिल जायेगी और जल्द हमारी बेटी हमारे बीच होगी, बस इसी उम्मीद में उनके साल माह की तरह गुज़र रहे है और बूढ़ा शरीर उम्मीद जी रहा है! आरोपियों को बिना ट्रायल जेल में रखना न्यायपालिका के वज़ूद के बारे में दर्शाता है कि किस तरह अदालतों के अंदर की रीढ़ की हड्डियां टूट चुकी है औऱ झुक कर किसी को तो सलामी दे रही है, अब गिरफ्तारी ही सज़ा बन गया है, ट्रायल से पहले ही जेल में रख आरोपी को नही बल्कि पूरे परिवार को सज़ा दी जा रही है, और सज़ा भी ऐसी कि ना सुनवाई चल रही ना दलीलें अगर कुछ चल रहा है तो वो आदेश जो सत्ताधीशों द्वारा लिखे जाते है! #ReleaseGulfishaFatima #GulfishaFatima

Zakir Ali Tyagi

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