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♦️आज मौत आई थी … बस दस्तख़त नहीं हुए। पटरी पर ट्रेन नहीं, लापरवाही दौड़ रही थी। सिग्नल, निगरानी, ज़िम्मेदारी— तीनों छुट्टी पर थे, और ड्यूटी पर सिर्फ़ किस्मत थी। अगर हादसा हो जाता तो- > प्रेस नोट कहता— “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” > जांच बैठती— “कारणों का पता लगाया जा...

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कांग्रेस को किसी की भी बात पर भरोसा ही नहीं है। ये वो लोग हैं जिनको 2016 में भरोसा ही नहीं था, कह रहे थे सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत दो। 2019 एयर स्ट्राइक हुई तो एयरफोर्स पर इनको भरोसा नहीं था। जब कोविड वैक्सीन आई तो इनको भरोसा नहीं था, यहां तक कि जब कोविड का टीका लगने की बात आई तो कहने लगे कि सैंपल का स्टैटिस्टिकल डाटा दीजिए हमें उसपर भरोसा नहीं है। चुनाव आयोग पर इनको भरोसा नहीं था, मीडिया पर इनको भरोसा नहीं था। इनके नेता जो इनके द्वारा नामित होकर संसदीय मामलों की विदेश संबंधी समिति के अध्यक्ष हैं यदि वो विदेश संबंधी मामले में भारत का पक्ष रखने गए तो उसपर भरोसा नहीं है। अरे भाई तो भरोसा है किस पर? हकीकत में आपका खुद पर भरोसा खत्म हो गया है इसीलिए आपको किसी भी बयान को लेकर भरोसा दिलाना संभव ही नहीं है। क्योंकि सोते हुए व्यक्ति को तो जगाया जा सकता है, लेकिन जो व्यक्ति जागते हुए सोने का नाटक कर रहा हो, उसे कितना भी हिलाइए-डुलाइए, वो आंख नहीं खोलता। कहता है मुझे कुछ नहीं दिख रहा, मुझे सिर्फ अंधेरा दिख रहा है।

Dr. Sudhanshu Trivedi

28,235 次观看 • 1 年前

निश्चित ही सभी चीजें बदलती हैं। बदलनी ही चाहिए। बदलना ही जीवन का क्रम है। और बदलना शुभ भी है। बदलती हैं, इसलिए तो जीवन नया रहता है, ताजा रहता है, प्रफुल्लित रहता है। इस देश में नहीं बदलतीं, यही हमारी अड़चन है। इस देश में सब सड़ गया है, सब गंदा हो गया है। इस देश में आज तो है ही नहीं, बस कल ही कल है। रामराज्य हो चुका, स्वर्णऱ्युग हो चुका, सतयुग हो चुका सब हो चुका! अब हम यहां क्या रह रहे हैं? कोई यह पूछता ही नहीं कि तुम क्या कर रहे हो? जब सब हो ही चुका तो अब तुम भी हो चुको! अब तुम क्यों नाहक कष्ट उठा रहे हो! अब कुछ होने को तो बचा नहीं। अब तो कलियुग ही कलियुग है, दुर्दिन ही दुर्दिन हैं, अब तो दुख ही दुख है। अब सार क्या है जीने में? दो हिप्पी केलिफोर्निया के रास्ते से गुजर रहे थे। महा हिप्पी! मील भर तक चलते रहे चुपचाप। अपनी-अपनी धुन में मस्त। आखिर एक ने दूसरे से कहा कि अब बरदाश्त के बाहर है। क्या तूने अपने पतलून में पाखाना किया है? इतनी भयंकर बदबू आ रही है! और मील भर से मैं देख रहा हूं, कि अगर यह बदबू कहीं और से आ रही होती तो छूट गई होती पीछे, मगर यह साथ ही चल रही है। दूसरे ने कहा कि नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मगर पहला भी ऐसा मानने वाला न था। उसने कहा कि उतार पतलून। सो उसके मित्र ने पतलून उतारी। पतलून उतारते ही वह दूसरा चिल्लाया कि देख मैं क्या कहता था और तू कहता है कि नहीं-नहीं। तूने पाखाना किया है! यह क्या रहा? दूसरे ने कहा, मैंने समझा भाई तुम पूछ रहे हो, आज की। आज नहीं किया। ऐसी इस देश की दशा है। यहां आज तो कुछ है ही नहीं--कुछ भी नहीं! सब कल हो चुका। बस उसको ढोते रहे मुर्दा लाशों को। सड़ गई हैं, बास उठ रही है। मगर बड़ी प्यारी हैं। अपनों की है। और सदियों से पूजी गई हैं। सम्मान-सत्कार होता रहा है। सो सजाए रहो, संवारे रहो। बाप-दादे भी यही करते रहे, तुम भी यही करते रहो। हम कुछ भी बदलना नहीं चाहते। महावीर ने कहा था अपने मुनियों को कि नंगे पैर चलना। कहने का कारण था, क्योंकि उस समय जूते बनते थे वे सिर्फ चमड़े के बनते थे। और चमड़ा तो हिंसा होगी, पशु मारे जाएंगे। तो ठीक था अपने जूतों के लिए पशुओं को क्या मारना! फिर दूसरे कोई कोलतार के और सीमेंट के रास्ते तो थे नहीं। खुली मिट्टी थी, मिट्टी के ही रास्ते थे। मिट्टी पर चलने में कोई अस्वास्थ्य नहीं है। मिट्टी पर चलने में तो स्वास्थ्य है। हम भी तो मिट्टी के बने हैं। मिट्टी मिट्टी से मिलती है तो जीवन पाती है। तो अगर तुम कभी नंगे पैर थोड़ी देर मिट्टी पर रोज चलो तो लाभपूर्ण है, स्वास्थ्यप्रद है। हर्जा नहीं है जरा भी। मगर अभी जैन मुनि अभी भी चले जा रहे हैं कोलतार की सड़क पर, सीमेंट रोड पर! सोचता ही नहीं कि महावीर को क्या बेचारों को पता कि सड़कें ऐसी भी होंगी। कोलतार की जलती हुई सड़क, गर्मी के दिन, पैर में फफोले पड़े जा रहे हैं, मगर वह चला जा रहा है। और अब तो जूते कपड़े के भी बनते हैं, कैनवास के भी बनते हैं, रबर के भी बनते हैं, अब कोई चमड़े पर ही रुके हैं हम? अब तो जूते में कोई हिंसा नहीं है। अगर महावीर वापस लौट आएं तो मैं तुमसे पक्का कहता हूं, और कुछ पहनें कि न पहनें, जूते जरूर पहनेंगे। मैं तुम से पक्का कहता हूं, महावीर अगर दोबारा हों तो जूते जरूर पहनेंगे। टाई और हैट की तो मैं नहीं कह सकता। वैसे अच्छा रहेगा चटाई का हैट, धूप-धाप में बचाव भी करेगा और चटाई में कोई हिंसा भी नहीं है। जापानी ढंग का चटाई का हैट सुंदर रहेगा। समय बदलेगा तो सभी मूल्य बदलेंगे। और वही जाति जीवित होती है जो समय के साथ बदल जाती है। वही व्यक्ति जीवित होते हैं जो समय के साथ बदल जाते हैं। यह देश मुर्दा है, कब्रिस्तान है। एक मरघट है बड़ा मरघट, जिस पर महात्मा धूनी रमाए बैठे हैं। बस धूनी रमाने का काम और कुछ काम बचा नहीं है। सब काम पहले हो चुका। अब तो निष्काम भाव से मरघट पर बैठो, धूनी रमाओ, राम-राम जपो। कुछ बचा नहीं जैसे हमारे हाथ में करने को। सारी पृथ्वी कितने महत कार्यों में संलग्न है! शायद इतने महत कार्य कभी नहीं हुए थे जितने महत कार्य आज हो रहे हैं; क्योंकि इतना विज्ञान न था, इतनी टेक्नॉलॉजी न थी, इतने हमारे हाथ में साधन न थे, इतनी समझ न थी। आज सब साधन हैं, सब समझ है। आज हम इस पृथ्वी को स्वर्ग बना सकते हैं। मगर ये पुराने मूल्य और पुरानी धारणाएं हमें नरक से बांधे हुए हैं। 22 मार्च 1980, श्री रजनीश आश्रम पूना "प्रितम छवि नैनन बसी-प्रवचन-12"

जीवन यात्रा

14,067 次观看 • 6 个月前

अमावस की रात 29 जनवरी की रात मैं संगम नोज पर था. वहां इतना भयावह दृश्य था कि कभी नहीं भूल सकता. असंख्य लोगों की भीड़ थी. और लगातार चली आ रही थी. घाट भरे हुए थे. जो लोग पहले आ गए थे वो वहीं बिछा के सो गए थे. कुछ लोग नागाओं का स्नान देखने के लिए घाट पर डेरा डाले हुए थे. प्रशासन लगातार लोगों से स्नान कर घाट छोड़ने के लिए कह रहा था. लेकिन घाट भरे हुए थे. इधर सारी भीड़ संगम की ही ओर चली आ रही थी. कहीं किसी दूसरे घाट की ओर कोई डायवर्जन नहीं. हर चीज की एक सीमा होती है. संगम घाट की भी है. कितने ही लोग आ पाएंगे. अंतत: वही हुआ जिसका डर था. पीछे कुछ औरतें गिरीं. उन्हें उठाने की कोशिश की. चार-पांच लोग मेरे हाथ पर चढ़ गए. मैं भी गिर गया. मेरी किस्मत अच्छी थी कि मेरे ऊपर कोई नहीं गिरा. हल्की चोट आई, पूरा शरीर पसीने से भीग गया था. मेरे सामने कई महिलाओं को चोट लगी. लगा अब यहां से वापस नहीं लौट पाऊंगा. मेरे साथ के सारे लोग कहीं नहीं दिख रहे थे. वहां से निकलने के बाद भी बहुत समय तक कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. आकर परेड ग्राउंड में बैठा. 2.45 से तीन बजे के आसपास अचानक सायरन की आवाज गूंजने लगी. एक के बाद एक लगातार एम्बुलेंस आ-जा रही थी. वीडियो भी शेयर किया था मैंने इसका. समझ गया अनहोनी हो गई है. चार दिन बीत चुके हैं लेकिन अभी भी वही सब सारा दृश्य घूम रहा है. ये वीडियो 29 की सुबह संगम से लौटने के बाद बनाया था. पोस्ट करने की हिम्मत नहीं थी. लेकिन साथियों का कहना है जो देखा है वो बताओ. देखिए #MahakumbhStampede

Gaurav Shyama Pandey

65,795 次观看 • 1 年前

जैसलमेर में बस जलने से 20 लोगों के जिंदा जलने की घटना पर मीडिया के प्रश्न को लेकर मेरा रिएक्शन : बहुत बुरा हादसा हुआ है, ये हादसे अभी और हुए थे दूदू के पास में भी और एक तो, हादसे का क्या करें, 20 लोग मारे गए, वेंटीलेटर पर हैं लोग, 70% बर्न है तो ये बहुत ही दुखद घटना है और मेरे ख्याल से तो ये तो जांच का विषय भी है बस में आग लगी क्यों, ये जांच का विषय भी हो सकता है, कई बार नई बस खरीदते हैं, मैने सुना कोई दस दिन पहले ही बस खरीदी थी सुना है मैंने, तो पता नहीं कोई टेक्निकली गलत तो नहीं है, ऐसे वक्त में कोई लापरवाही नहीं करनी चाहिए, बकायदा कंपनी में कंप्लेंट करनी चाहिए कि भई रवाना हुई थी बस , एक्सीडेंट भी नहीं हुआ और ये हादसा हुआ क्यों, कोई टेक्निकली फाल्ट हो गई, आग लग गई, मैनें सुना आग लगते ही जो दरवाजे थे वो लॉक हो गए जो सुनते हैं असलियत क्या है नहीं मालूम हम लोगों को पर इसको सरकार को चाहिए कि इसकी बाकायदा कंपनी से बात करके इसकी जांच भी करवाएं मेरा मानना है। बाकी तो हम ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि मृत आत्माओं को शांति प्रदान करें, जो अभी तकलीफ में हैं अस्पताल में वो जल्दी स्वस्थ हों यही हमारी कामना है, परिवारजनों के लिए भी यही कह सकते हैं कि बहुत बड़ा हादसा हुआ है बहुत दुखद है अब उसको आपको कैसे सहन करना है वो भगवान आपको शक्ति दे।

Ashok Gehlot

73,530 次观看 • 10 个月前

हम ये सोचकर कुछ भी खरीदकर खाते पीते हैं कि सरकार ने इसकी जांच की होगी, तभी तो बाज़ार में बिक रहा है… लेकिन आज अगर वही सरकार कह रही है कि नियमों का उल्लंघन हुआ, भ्रामक दावे किए गए, तो डर लगता है। क्योंकि सवाल सिर्फ Sting, Campa या किसी एक कंपनी का नहीं है… सवाल हमारे हर कदम पर तोड़े जा रहे भरोसे का है| अगर नियम टूट रहे थे तो इन्हें बाज़ार में आने किसने दिया? और अगर सब कुछ सही था तो आज नोटिस क्यों? क्या जनता की सेहत की कीमत सिर्फ एक “नोटिस” है? आज नोटिस… कल जुर्माना… पर अगर किसी परिवार ने अपनी सेहत खो दी, किसी बच्चे को नुकसान हो गया… उसकी भरपाई कौन करेगा? हम टैक्स इसलिए नहीं देते कि बाद में पता चले जो चीज़ें हम रोज़ खरीद रहे थे, उन पर पहले से सवाल थे। जनता मुनाफ़े का और आपके experiment का ज़रिया नहीं है। करोड़ों लोगों की सेहत से खिलवाड़ हर रोज हो रहा है कार्रवाई काम चलाऊ तभी लोग हर रोज आम आदमी का भरोसा बेचने की हिम्मत कर दे रहे है | क्या खाओ क्या नहीं? क्या पेट्रोल डलवाओ या नहीं? मंदिर में दान दो या नहीं? सब भगवान ही भरोसे है ||

Abhinay Maths

41,347 次观看 • 1 个月前

सवाल सिर्फ एक का नहीं है… ये सिलसिला बढ़ता जा रहा है... बिहार के किशनगंज (ठाकुरगंज) के रहने वाले "मौलाना तौसीफ रज़ा मजहरी साहब" की ट्रेन में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है और रेलवे इसको महज एक हादसा बताता है। और यह एक पहली घटना नहीं है... हाल ही में एक और मौलाना के साथ भी ट्रेन में इसी तरह की बदसलूकी और मारपीट की घटना सामने आई थी... फर्क बस इतना था कि वो ज़िंदा बच गए… लेकिन उनके साथ जो हुआ, वो भी कम डरावना नहीं था। दोनों घटनाएं एक ही बात की तरफ इशारा करती हैं... ट्रेन में सफर अब सुरक्षित नहीं रह गया??? अगर आप ट्रेन में (मुस्लिम) सफ़र करते है तो अपने सुरक्षा का इंतजाम करके चलिए नहीं तो समाज में बहुत से ब्रेन डेड जॉम्बी घूम रहे है,उन 🐷 का अंदर का शैतान दाढ़ी टोपी वालों को देखते ही बाहर आ जाता है तो ऐसे 🐷 से बचने के लिए खासा इंतजाम करके चले ताकि वक्त आने पर आप अपनी आत्मरक्षा कर सके। ये सिर्फ दो लोगों की कहानी नहीं, ये पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है। आज आवाज़ उठाओगे तो कल हालात बदल सकते हैं, वरना ये खामोशी ही सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी क्योंकि खामोशी कुफ्र है और जो खामोशी से आंख नहीं मिला पाता है वो कही का नहीं रह जाता है। तो बोलना सीखिए और अपने आप को पहचानिए।

𝓛𝓭𝓾𝓽𝓿 𝓴𝓷𝓲𝓰𝓱𝓽 𝓬𝓸𝓶𝓶𝓮𝓷𝓽𝓸𝓻𝔂

78,599 次观看 • 3 个月前