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आदरणीय पवन खेड़ा जी मैं जानता हूं कि आपकी नाराजगी तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से है। देखिए न किस तरह खुल्लम खुल्ला रेवंत रेड्डी जी कह रहे हैं कि Congress= मुसलमान। भला ऐसा भी कोई कहता है ! मैने आपके मुख्यमंत्री का बयान "..." में लगाया है और...

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यह वीडियो देखने के बाद मेरे एक जानने वाले का मैसेज आया है उन्होंने कहा कि "भैया अब आपको रिपोर्टिंग छोड़ देनी चाहिए" इस वीडियो में जो लोग दिखाई दे रहे हैं सबको मैं जानता हूं और सब मुझे जानते हैं सवाल इन रिपोर्टर्स पर नहीं है बल्कि व्यवस्था पर है क्या इन रिपोर्टर्स के संस्थान अगर इन पर दबाव बनाने की बजाय इनके विवेक से काम करने देंगे तो क्या ये ऐसे करेंगे? आज मीडिया के हालात क्या हो गए हैं ये सोचने की बात है मैं इस बात का शुक्र मना रहा हूं कि अच्छा हुआ मैं इस मौके पर नहीं था वरना क्या पता मुझे भी इस सर्कस का हिस्सा मजबूरन बन जाना पड़ता? लेकिन ऐसी परिस्थितियां कुछ-कुछ समय पर हर रिपोर्टर के सामने आती हैं सोच कर देखिए कि यह किस तरह का दबाव है जिसमें इतने सीरियस मुद्दे पर भी कॉमेडी हो गई संसद की सुरक्षा में चूक जैसे गंभीर मुद्दे पर रिपोर्टिंग हो रही है, लेकिन जिस तरह रिपोर्टिंग हो रही है उसको देखकर कपिल शर्मा का कॉमेडी शो भी फेल है यह सब देखकर कभी-कभी मन में आता है कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं?

Sharad Sharma

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विथ ड्यू रिस्पेक्ट!! सॉरी, राजदीप जी! एक पत्रकार को इस तरह का व्यवहार शोभा नहीं देता। मैं यह बोलने का अधिकार रखता हूं। क्योंकि मैं भी उसी पेशे से हूं जिस पेशे का आप प्रतिनिधित्व करते हैं। जब विदेश की धरती पर सार्वजनिक रूप से आपको बेइज्जत किया गया तो हमें बुरा लगा, क्योंकि हम भी उसी पेशे से हैं। बिहार चुनाव प्रचार के दौरान एक नेता ने जब आपको जलील किया तो हमें बुरा लगा क्योंकि हम भी उसी पत्रकारिता के पेशे से हैं। लेकिन आज लग रहा है कि हमें बुरा नहीं लगना चाहिए था। हम उसी पेशे से तो हैं लेकिन जो आपके साथ हुआ, आप उसी के लायक हैं! आपकी इस पत्रकारिता पर मैं लानत भेजता हूं!!

Prabhakar Kumar Mishra

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"मैं तो ऐसे देखता हूॅं कि राम सीता को रावण के पास से ले तो आए लेकिन घर नहीं ले गए, बाजार में छोड़ आए।"--सोनम वांगचुक एनडीटीवी की एंकर से बातचीत में आदरणीय सत्याग्रही के ये विचार हैं। आश्चर्य है कि इस दुरात्मा,कुपढ़ और सत्यानाशी के लिए लोग भावुक हो रहे हैं। बड़े राष्ट्रवादियों की छाती में दूध उतर आया है। सोनम वांगचुक अपने इस बयान मात्र से मेरे लिए ऐसा व्यक्ति हो चुका है, जिसका कोई मूल्य नहीं। आश्चर्य है कि लोग इस आदमी के लिए गंभीर हो रहे हैं और देश की शिक्षा नीति का संभावित उद्धारक मानने लगे हैं। यह तो विकट अशिक्षित और मूर्ख है। दुष्टात्मा तो है ही। जंतर-मंतर पर चल रहे इस नाटक पर सरकार का स्टैंड सही है। वह घोर हिन्दू द्रोहियों का मंच है। कुणाल कामरा जैसे विदूषक कितने मनबढ़ हो चुके हैं,यह भी अनुभव किया जा सकता है।

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सामान्य वर्ग BJP को 80% वोट करता है! भीम आर्मी के ये गुंडे जिस तरह से खुलेआम-सरेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं, एक वरिष्ठ अधिवक्ता को लाखों जूते भेजने की बात कर रहे हैं वो बहर शर्मनाक है। देश अगर संविधान से चलता है तो संविधान के किस अनुच्छेद में लिखा है कि आप सरेआम किसी को जूता मारने की बात करें और आप पर FIR ना हो? आपकी गिरफ्तारी ना हो? बिल्कुल इसी तरह का रिएक्शन अगर समान्य वर्ग के किसी व्यक्ति की तरफ़ से हो जाए तो उस पर तत्काल SC/ST एक्ट दर्ज हो जाएगा। मैं इस राजनीति को बहुत सलीके से समझ रहा हूं। ये राजनीति बेहद घटिया और शर्मनाक है। मुझे सब पता है ये चीजें कैसे और कहाँ से ऑपरेट हो रही हैं। इस पर रोक नहीं लगी तो सबसे ज्यादा नुकसान BJP को ही होगा। मेरा का सच्चाई बताना है। मैं बता दिया। बाक़ी BJP जाने।

Shubham Shukla

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सनी देओल जैसे एक्टर ऐसे दहाड़कर, ललकारकर बोलते हैं 'मैं जाट हूं' तो इस कौम के तमाम नौजवानों को लगता है बाकी इंसानों से अलग और कुछ खास हूं। सड़क पर गाड़ी छू जाए तो बोलेंगे-यहीं गाड़ दूंगा, जाट हूं। कॉलेज में बहस हो जाए तो बोलेंगे-बीच से फाड़ दूंगा, जाट हूं। लड़कियां ना कह दें तो बोलेंगे-ज्यादा नखरे मत दिखा, मै छोरा जाट हूं। और बढ़ते बढ़ते ये जातीय वर्चस्व का नशा यहां तक पहुंच जाता है कि भगाना कांड हो जाता है, दलित लड़कियों का सामूहिक बलात्कार हो जाता है। मिर्चपुर कांड हो जाता है, दलितों का कुत्ता जाटों पर भौंक कैसे दिया! इसलिए उनकी पूरी बस्ती को जला दिया जाता है। जाति का गुरूर इतना हावी हो जाता है कि घटनाओं को ग़लत मानकर भी परिवारों का समर्थन पंचायत को चला जाता है और पंचायत के निर्णय पीड़ितों के ख़िलाफ़। इसलिए जातीय दंभ से बाहर निकलिए और जब तक जरूरत ना पड़े या कोई पूछे ना तब तक ये बोलने का कोई औचित्य नहीं है-मैं जाट हूं। सिनेमा वालों के चक्कर में मत पड़ें-कहीं कैसा भी मुनाफा देखेगा, लपक लेंगे पैसे पर। नहीं बोलेंगे कि उसूलों से समझौता नहीं-मैं जाट हूं।

Samar Raj

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