Загрузка видео...

Не удалось загрузить видео

На главную

आशा जी का गाया ये गीत गाने की गुस्ताखी की है 🙏

25,884 просмотров • 3 месяцев назад •via X (Twitter)

Комментарии: 0

Нет доступных комментариев

Здесь появятся комментарии из оригинального поста

Похожие видео

ऐसा कम ही होता है कि एक स्त्री किरदार की मन की अभिव्यक्ति के लिए किसी पुरुष गायक की आवाज़ का इस्तेमाल किया जाए। रजनीगंधा (1974) फ़िल्म में ऐसा हुआ था। फ़िल्म के इस गाने में हीरोइन विद्या सिन्हा की दिल की उलझन को मुकेश जी ने ऐसी आवाज़ दी कि इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। दरअसल हुआ यूं था कि फ़िल्म के निर्देशक बासु भट्टाचार्य यह गाना लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे, पर उनकी फीस उन दिनों बहुत ज़्यादा थी। चूंकि फ़िल्म का बजट बहुत कम था और मुकेश जी की फीस भी लता दीदी की फीस से अपेक्षाकृत कम थी, उन्होंने मुकेश जी से इस गाने को गाने का आग्रह किया। शुरुआत में मुकेश जी को एक अभिनेत्री के लिए गाने का प्रस्ताव थोड़ा अजीब लगा, पर वे फिर इसके लिए राज़ी हो गए―और फिर जो हुआ, वह इतिहास बन गया। योगेश का लिखा और सलिल चौधुरी के संगीत से सजा यह गाना, मुकेश की आवाज़ पाकर अमर हो गया। इस गाने के लिए जब मुकेश जी को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो उन्होंने आभार स्वरूप बासु भट्टाचार्य की अगली फ़िल्म 'छोटी सी बात' (1976) का एक गीत ‘ये दिन क्या आए’ के लिए उनसे एक भी पैसा नहीं लिया। यह गीत भी बहुत लोकप्रिय हुआ। चलिए, अब मुकेश द्वारा गाया हुआ 'रजनीगंधा' फ़िल्म का वह सुंदर गाना सुनते हैं।

छोटी कविता

21,250 просмотров • 1 год назад

लोकगीतों की सुंदर कल्पनाएँ मन को मुग्ध करती हैं। छठ में कोसी भरने की परंपरा है। शिव जी और पार्वती जी दोनों कोसी भरने जा रहें हैं। छठ पूजा की तैयारी हो चुकी है। लेकिन भक्त बस यही मना रहा है कि पूजा के दौरान शंकर जी की धोती भीग रही है तो भीग जाए लेकिन पार्वती जी की सवा लाख की साड़ी नहीं भीगनी चाहिए। अब पता नहीं सवा लाख की साड़ी की कल्पना कहाँ से आई होगी.. ? किसनें देखा होगा पार्वती जी को सवा लाख की साड़ी खरीदते हुए। लेकिन वो लोकगीतों ही क्या जिसमें देवता आदमी के भाई, बहन, सखा न बन जाएं। कई बार ये भी लगता है लोकगीत देवता और मनुष्य के द्वैत को खत्म करने का एक मंत्र है। जिसे हम सैकड़ों सालों से गाए जा रहें हैं। इसलिए लोकगीत हमारी आत्मा की शाश्वत अभिव्यक्ति है। इनके साथ जब भी प्रयोग होता है तो खटकता तो है। बाकी प्रयोग आदमी एक बार बर्दाश्त भी कर लेता है। लेकिन छठ गीतों के साथ प्रयोग एकदम बर्दाश्त नही होता। छठ गीत का सारा सौंदर्य इसकी यही सादगी है। आयुषी और उनकी सहेलियों ने ये सुंदर गीत गाया है। युवा पीढ़ी को ये गीत गाते देख अच्छा लगता है। ❤️ #chhathpuja2024

Atul Kumar Rai

12,847 просмотров • 1 год назад