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Ana Sayfaya Dön

आशीर्वाद आपका नही चाहिए आपके लँ $ का चाहिए। तू हमेशा खड़ा खड़ा आशीर्वाद देते रहना मुझे बिना खुश किये सो मत जाना

73,526 görüntüleme • 11 ay önce •via X (Twitter)

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Benzer Videolar

जीवन में विरोध कभी इतना स्तरहीन नहीं होना चाहिए कि संवैधानिक पद पर बैठे विपक्षी दल के नेता के प्रति सम्मानजनक भाषा का त्याग कर दिया जाए और संवाद का स्तर गिर जाए। राजनीति में विरोध यदि विचारों, विचारधारा, नीतियों, लोकतांत्रिक मूल्यों, सरकारी योजनाओं और अभियानों के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों पर तथ्य और तर्क के साथ किया जाए, तो वह मतदाताओं के लिए स्थायी प्रभाव छोड़ता है और सरकार में बदलाव की प्रेरणा बन सकता है। इसके विपरीत, स्तरहीन और हास्यास्पद विरोध केवल कुछ पल की सुर्खियाँ तो दिला सकता है, लेकिन वास्तविक बदलाव नहीं ला सकता। ​"जा भजनलाल घेवर लेके आ... अभी लाया हुकम घेवर। जा तू जयपुरी रजाईयां लेके आ... अभी हुकम लाया जयपुरी रजाईयां। जा तू अब धूप में खड़ा हो जा... हुकम मैं धूप में खड़ा हो गया मेरे आका। ऐसे लोग चाहिए... इन्हें सीएम थोड़े चाहिए चपरासी चाहिए... चपरासी मिल गया।"

Dinesh Bohra

26,273 görüntüleme • 4 ay önce

Breaking : ये हमारे रामराज्य के महाराज योगी Yogi Adityanath जी है जो गुंडों भ्रष्टाचारियों को कब्र से निकाल लाते है , सीधे यमराज से मिला देते है , बुलडोजर चला देते है लेकिन बस वो विपक्ष का या आजम खान जैसा होना चाहिए । मुझे कहना नहीं चाहिए लेकिन आज कहरही हूं कि आपको शर्म आनी चाहिए इसके लिए आप मुझे जेल भेज सकते है तो भेज दीजिए । लेकिन सोचिएगा जरूर क्या में गलत हूं ? आप बात दलित की कर रहे है देखिए किस तरह दलित की जमीन कब्जाने के लिए एक इंसान के (नौकर ) 👉फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाए गए , 👉एक ही इंसान के दो फर्जी पैन कार्ड बनवाएगए । 👉एक इंसान के दो अलग अलग बाप बना दिए गए 👉आपके ही शासन काल में फर्जी बैंक अकाउंट खुलवाए गए , 👉इस इंसान के फर्जी जाति पत्र और फर्जी पैन कार्ड दोनों का पता : 55 पुराना किला , कैंट रोड लखनऊ है जो सबके करीबी का है जिनका नाम विराज सागर दास है । नतीजा इन सबका सहारा लेकर अरबों की बेनामी जमीन का घोटाला कर दिया गया । मैंने आपके अधिकारियों पुलिस से DM से साक्ष्यों के साथ शिकायत की आपने / आपके अधिकारियों ने क्या किया आप जाने । क्या आपने जमीन वापस ली ? क्या आपने कोई FIR करवाई ? आपने क्या अपने अधिकारियों पर कोई कार्यवाही की ? आपने सिर्फ #BBDGROUP की श्रीमती अलका दास और उनके पुत्र से सिर्फ चंदा लिया और बीजेपी ज्वाइन करा कर उनको संरक्षण दिया । DGP UP DM Lucknow LUCKNOW POLICE Lucknow Development Authority

Sakshi

29,668 görüntüleme • 1 ay önce

जय जानकी 🙏 यह वीडियो देखकर मैं भीतर से बहुत डिस्टर्ब हो गई हूं। मैं जब भी यात्रा पर जाती हूं तो मेरे बैग में कुछ मैथिली पाग और मिथिला पेंटिंग का शॉल होता है। किसी विशिष्ट जन से मिलती हूं उनका स्वागत अभिनंदन मैथिली पाग से करते हुए यह कहती हूं कि यह मिथिला का मान और हमारी बड़की दीदी जगत जननी मां सीता का आशीर्वाद है। यह वीडियो अभी देखा अत्यंत स्तब्ध और आहत हूं। मिथिला के पाग का अपमान सहन करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। यह माननीय महिला नेत्री बाहर की है इन्हें मैथिली संस्कृति के प्रति ज्ञान शून्य हैं। मैं किसी के लिए हर्टिंग लैंग्वेज प्रयोग करने से बचती हूं, मेरे संस्कार इसकी अनुमति नहीं देते। लेकिन मैं माननीय नेत्री से कहना चाहूंगी कि जब कभी भी आमना सामना हुआ तो मिथिलावासियों ने जो पाग पहना कर आपका सम्मान किया था और उस पाग का आपने अपमान किया है इसका बदला लेते हुए आपके सर पर मैं अपने पैरों की जुती रखूंगी। आप यही डिजर्व करती हैं। सबसे ज्यादा तकलीफ की बात यह है कि इस डायलॉग पर वहां उपस्थित जिन मैथिल या मिथिलानी ने ताली बजाई है उनका स्वागत भी उनके सर पर जूता रखकर करना चाहिए। सिया के आशीर्वाद और मिथिला के मान का अपमान करने वालों को सीता का श्राप जरूर लगेगा। जय मिथिला 🙏 जय जानकी 🙏 नोट - मिथिला के सक्रिय संगठनों और संस्थाओं से मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस महिला के खिलाफ मिथिला संस्कृति के डिफेमेशन के लिए कानूनी फॉर्मेट में भी कार्यवाही की दिशा में कदम उठाए।

Priya Mallick

42,075 görüntüleme • 10 ay önce

सामाजिक न्याय के महानायक आदरणीय श्री Lalu Prasad Yadav जी एवं माननीय नेता प्रतिपक्ष बिहार के भविष्य तथा बेरोज़गारों एवं मज़लूमों के सबसे बड़े हितैषी श्री Tejashwi Yadav जी द्वारा बिहार विधानसभा आम चुनाव 2025 हेतु मुझे पुनः मधेपुरा सदर विधानसभा क्षेत्र से #उम्मीदवार बनाकर जो विश्वास और स्नेह प्रकट किया गया है, उसके लिए मैं हृदय से आभारी हूँ। यह अवसर केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि महान मधेपुरा वासियों की सेवा के संकल्प को और मजबूत करने का अवसर है। मैंने हमेशा शिक्षा, सामाजिक न्याय, युवाओं और किसानों सहित सभी तबकों के सशक्तिकरण के लिए काम किया है और आगे भी यही मेरा संकल्प रहेगा। नामांकन सह आशीर्वाद यात्रा में महान मधेपुरा वासियों से मिले अपार प्रेम, स्नेह,सम्मान व आशीर्वाद को नमन ।🙏 आपका विश्वास - मेरी ताकत है !! 🙏 जय भीम, जय राजद! जय सामाजिक न्याय!! जय महागठबंधन!!!🙏 — प्रो० चन्द्रशेखर विधायक, मधेपुरा सदर विधानसभा सह पूर्व शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार । #Bihar #RJD #TejashwiYadav #madhepura #LaluYadav

Prof. Chandra Shekhar

18,728 görüntüleme • 10 ay önce

अच्छा तो सुधांशु त्रिवेदी जिंदा थे। UGC act पर 15 दिन से अधिक बवाल हुआ. लोगों ने विरोध किया तब तक ये सामने नहीं आ पाए। कल जब सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को स्टे कर दिया तब इन्हें बोलने का मौका मिला है। अब बता रहे हैं कि न्यायलय ने स्थगन लगा दिया है इसलिए टिप्पणी करना उचित नहीं है। मुझे लगा सुधांशु जी बताएंगे कि महामानव ने ऋग्वेद के तीसरे अध्याय के 5वें श्लोक में लिख दिया है कि सवर्णों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए, उनके बच्चों को फर्जी अपराधों में फंसाया जाना चाहिए जिससे कि भीम राष्ट्र स्थापित किया जा सके। इन चेहरों को याद कर लीजिए, यह वहीं हैं जो समय आने पर आपके साथ खड़े नहीं हुए। समय आने पर इन्हें जवाब जरूर दीजिएगा।

कुंभकरण

37,488 görüntüleme • 6 ay önce

प्रिय अधिवक्तागण, लखनऊ में वकीलों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था किये बिना उनके चैंबर तोड़ना और विद्वान अधिवक्ताओं के ऊपर लाठीचार्ज करना घोर आपत्तिजनक और घोर निंदनीय है। अधिवक्ता ही जब अन्याय का शिकार होंगे तो आम नागरिक को न्याय कैसे मिलेगा? भाजपा में शामिल हो रहे भ्रष्टाचारियों को छोड़कर सब कुछ अवैध ही है क्या? अब उप्र के वकील मिलकर भाजपाइयों और उनके अन-रजिस्टर्ड संगी-साथियों के घर, दुकानों, कार्यालयों व प्रतिष्ठानों के नक्शे निकलवाकर उनके वैध-अवैध होने का प्रमाण ढूँढेंगे और अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण के लिए याचिका दाख़िल करेंगे। जिन अधिवक्ताओं ने आज़ादी की लड़ाई में दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताक़त को हराकर भगा दिया था, वो उस औपनिवेशिक ताक़त के मुख़बिरों से क्या डरेंगे। अधिवक्ताओं की एकता और एकजुटता इन भ्रष्ट भाजपाइयों को भी हराएगी और हमेशा के लिए हटाएगी। हम अपील करते हैं कि लाठीचार्ज में घायल हुए वकीलों का निशुल्क उपचार कराया जाए एवं उनके काम की क्षति के लिए मुआवज़ा भी दिया जाए। अधिवक्ता कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा! आपका अखिलेश

Akhilesh Yadav

65,305 görüntüleme • 3 ay önce

ऐसे हो रही है देवभूमि उत्तराखंड में डेमोग्राफिक परिवर्तन 😱😡 उधम सिंह नगर के सुल्तानपुर पट्टी में स्थित एक प्राइवेट स्कूल में सुबह प्रार्थना के दौरान छोटे बच्चों और छात्रों को कलमा पढ़ाया जा रहा वीडियो वायरल क्या आपके हिसाब से इस ममाले में आरोपियों को सख्त सजा होनी चाहिए? स्कूल में 110 हिंदू और 80 मुस्लिम बच्चे है उत्तराखंड के उधम सिंह नगर में स्थित आदर्श जनता मोंटेसरी स्कूल के प्रधानाचार्य गिरीश चंद्र सैनी पिछले एक साल से सभी विद्यार्थियों को सुबह की नमाज़ में इस्लामी कलमा पढ़ने के लिए बाध्य कर रहे थे। हिंदू संगठनों ने हिंदू बच्चों पर जबरन धार्मिक अनुष्ठान का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। शिक्षा विभाग द्वारा नोटिस जारी किया गया और मुझे लगता है कि इस प्रधानाचार्य को हमेशा के लिए बर्खास्त करना चाहिए क्योंकि ये दोबारा भी ऐसा कर सकता है । #uttarakhand #udhamSinghNagar

Pyara Uttarakhand प्यारा उत्तराखंड

11,941 görüntüleme • 8 ay önce

आपसे जो प्यार दुलार आशीर्वाद और अपनापन मिला है, यही मेरी असली पूंजी है। इसके लिए तो सौ सौ ऐसे टिकट कुर्बान! कल दिन भर बड़ी मुश्किल से अपने लोगों को हमने संभाला है। सब लोग सिर्फ भावुक ही नहीं, आक्रोश में भी हैं। शाम को हमारे क्षेत्र में अपने लोगों ने आतिशबाजी वाली दिवाली तक नहीं मनाया। यह पूरा घटनाक्रम जिस तरह हुआ है, उस कारण हर किसी की आंखों में आंसू है। आपके आंसू मुझे विचलित कर देते हैं। इसलिए आप मजबूत बने रहिए। हम भी बिल्कुल ठीक हैं। मुझे जानने वालों को बहुत अच्छे से पता है कि मेरे लिए राजनीति की परिभाषा क्या है। विधायक सांसद और पद कुर्सी जैसी माया के पीछे हम अपने जीवन में कभी नहीं भागे हैं। लोग तो ये सब पाने के लिए झूठ फरेब और बेइमानी जैसे घटियापने का सहारा लेने से भी नहीं बचते। लेकिन किसी मंजिल पर पहुंचने भर को हम सफलता नहीं मानते। असल सफलता है कि कठिन से कठिन घड़ी में भी अपने विचार व्यवहार और सिद्धांतों से समझौता न किया जाए। विपरीत हालात में भी हम अपने मन वचन और आचरण के बीच सामंजस्य बनाकर रख पाएं। #Supaul #Anupam

Anupam | अनुपम

44,908 görüntüleme • 10 ay önce

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 görüntüleme • 5 ay önce

मैं कक्षा 8 में बैठा था... कम ही बच्चे थे तो ऐसे ही चर्चा शुरू हो गई। मैं और मेरे 2 छात्र... 🔰 एक दलित 🔰 दूसरा 'भूमिहीन OBC' दोनों एक बार गाँव के एक जमींदार के घर किसी कार्यक्रम में गए। एक ने अपने हाथ से पानी पी लिया... ज़ब दलित बच्चे का नंबर आया तो जमींदार ने बोला कि तू रुक... मैं पानी पिला देता हूँ तुझे। फिर वह दलित बच्चा बिना पानी पिए ही अपने घर लौट गया। वे बच्चे अभी वामपंथ का नाम भी नहीं सुने होंगे। यह कहा जा सकता है कि वामपंथ ने चीजें बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत की होंगी... लेकिन ये चीजें समाज में बहुत पहले से विद्यमान रही हैं। एक सवर्ण एक्टिविस्ट ने दलित उत्पीड़न को फर्जी बताया है। मुझे भी इस बयान का समर्थन करना चाहिए...? 🤔 अगर मैं भूमिहीन न होता तो शायद कर पाता। मेरी जाति का इकलौता घर है... हमारा। हम भी कुआँ से पानी लेकर आए... लेकिन कुआँ हमारा नहीं था। कुआँ खोदने के लिए मानव श्रम के साथ ही जमीनों पर नियंत्रण चाहिए। जो 100% ऐतिहासिक तौर पर गाँव में बाहुल्यता रखने वाली जमींदार जाति का ही होता है। दलित, ब्राह्मण, बनिया, कुम्हार, नाई, सुथार आदि भूमिहीन जातियाँ जमीन की नियंत्रणकर्ता नहीं हुआ करती थीं... 🙏 आज भी कई जमींदार बंधु स्वयं को गाँव का मालिक व अन्य को शरणार्थी समझते हैं। राजस्थान के गाँवों में सर्वे करवा लें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सारी सरकारी जमीन पर उन्हीं का नियंत्रण है, जिसकी बाहुल्यता है। दूसरी बात... दलितों की केकट्स से तुलना आपत्तिजनक है। घर में तो सभी पानी पी भी ले रहे थे। लेकिन सार्वजनिक स्थान पर सभी जातियों के लोग एक ही जगह से पानी नहीं लेते थे। आज भी बहुत सी ऐसी घटनाएं देखने को मिल जाती हैं। मेरे पिता एक प्रसंग बताते हैं... एक महिला सफाईकर्मी ( सरकार द्वारा नियुक्त नहीं, अपितु जाति आधारित परम्परागत ) गाँव में आती थीं तो गाँव के ज्यादातर लोग उन्हें पानी पिलाने से मना कर देते थे... मेरे पिता पानी पिलाया करते थे। जातिगत आरक्षण की विसंगति पर सवाल उठना जायज है। मैं भी उठाता हूँ। बात होनी ही चाहिए कि कई सक्षम, समर्थ, सम्पन्न व ताकतवर जमींदार समूह स्वयं को 'पिछड़ा' बतलाकर असल पिछड़ों के हिस्से की सीट ले रहे हैं। लेकिन... अजीत भारती द्वारा प्रयुक्त अप्रोच सोल्यूशन ओरिएण्टेड नहीं है। ब्राह्मण सहित अन्य सवर्ण जातियों को इन तर्क से दूरी बनानी चाहिए... क्योंकि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं। दलितों को आरक्षण 1950 में मिला। किसी सवर्ण ने कभी विरोध नहीं किया। जातिगत आरक्षण का विरोध 1990 में शुरू हुआ। ज़ब दलितों पर होने वाले अत्याचारों में लिप्त जमींदार समूहों को भी दलितों के समान जातिगत आरक्षण का लाभ दिया जाने लगा। हमें भी 1990 के षड्यंत्र पर ही फोकस रखना है। 🙏

Mohit Bharat

21,189 görüntüleme • 1 ay önce