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इस पुलिस वाली शेरनी से पंगा लेना पड़ गया भारी💪😛न घर के रहे ,न ही घाट के 😛😛😛

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धोबी का कुत्ता अथवा धोबी का कुतका? कुछ बरसों से बार-बार अनेक लोगों द्वारा कहा जा रहा है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” कहावत ठीक नहीं है, और सच्ची कहावत है “धोबी का कुतका न घर का न घाट का”। कई लोकप्रिय हिन्दीभाषी अभिनेता और पत्रकार भी डटकर यह कह चुके हैं, जिससे अनेक लोग इस बात को मानने लगे हैं। सच यह है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” ही सच्ची कहावत है। हितोपदेश में एक धोबी के कुत्ते की कथा आती है और सम्भवतः यह कहावत वहीं से आई है। सोलहवीं/सत्रहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में “धोबी कै सो कूकर न घर को न घाट को” ऐसा प्रयोग किया है। सत्रहवीं शताब्दी में निपट निरंजन ने अपने काव्य में “धोबी का कुत्ता रहा, घर का न घाट का” ऐसा प्रयोग किया है। “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” के विविध रूपों के अनेक पुस्तकों और कोशों में प्रमाण हैं। इसके विपरीत “धोबी का कुतका न घर का न घाट का” ऐसी कहावत न किसी ऐताहिसिक साहित्यिक कृति में है और न किसी कोश में। ऐसी कहावत कभी थी ही नहीं, यह केवल सामाजिक संचार शोधशाला (Social Media Research Institute) और काहो विश्वविद्यालय (WhatsApp University) की उपज है।

Nityānanda Miśra (मिश्रोपाख्यो नित्यानन्दः)

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