正在加载视频...
视频加载失败
कौन हिंदू यहां तो जाति जरूरी है
11 条评论

हिन्दुओं को समझ नहीं आ रही है ये बात

take the journey

सही कहा हम अपने आप को हिन्दू बना ही नही पा रहे हम जातियों में बटे हुए हैं

Rt

सही बात है जात पात मै नहीं आना चाहिए लेकिन कुछ नेता अपनी राजनीति को चमका ने के लिए जात पात की राजनीति करते है।

Right 👍💯

मुल्लों का पूर्ण बहिष्कार करो, वरना मरने को तैयार रहो।

Very true bro 👍🙏🏻

कोई हिंदू है ही नहीं

आपने इससे बड़ा गांdu आदमी देखा है?

हिंदू कौन?” यह सवाल जितना सरल लगता है, उतना ही गहराई से हमारे समाज को झकझोरता है। जब मंदिर पर हमला होता है, जब तीर्थयात्री मारे जाते हैं, जब किसी साधु की लाठी छीनकर उसे सरेआम पीटा जाता है — तब हम सब “हिंदू” हो जाते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव पास आता है, जैसे ही किसी जाति विशेष को आरक्षण या पद मिलता है, या किसी पार्टी का झंडा लहराया जाता है — हम ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, जाटव, राजपूत, ओबीसी, दलित, बनिया बन जाते हैं। हम एक मंदिर के बाहर आरती में एक साथ खड़े तो होते हैं, लेकिन मन में गिनती करते हैं — ये कौन जात का है? कौन किस पार्टी का समर्थक है? हमने हिंदू पहचान को संघर्ष की प्रतिक्रिया बना दिया है, एकता की पहल नहीं। हम तब हिंदू बनते हैं जब हमला होता है, जब कोई सिर कलम करता है, जब कोई भगवा झंडा जलाता है — पर जब बात सहयोग, सेवा या संगठन की आती है तो हम जातीय अहंकार में डूब जाते हैं। धर्म का मतलब केवल कर्मकांड नहीं है — वह चेतना है, वह संस्कृति है, वह एक साथ जीने का संकल्प है। लेकिन हमने उसे सिर्फ पूजा-पाठ और त्योहारों तक सीमित कर दिया है। राजनीति ने हिंदुओं को वोटबैंक में बदल दिया, और जातियों ने उन्हें टुकड़ों में बाँट दिया। आज हिंदू होना गर्व की बात नहीं, बल्कि विवाद का विषय बना दिया गया है — और सबसे दुखद यह है कि यह काम किसी बाहरी ने नहीं, हमने खुद किया है।
