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कभी-कभी अपार आनंद अपार दुःख में कैसे परिवर्तित हो जाता है🥲

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'मसान' का यह सीन जब देखा था पहली बार तो यह समझने में नाकाम रहा कि ब-मुश्किल से एक मिनट के इस दृश्य में वह कौन सी‌ बात थी! उस समय मैं, बारहवीं का विद्यार्थी था...समझने के लिए शायद थोड़ा कम उम्र थी लेकिन अब जब उस बात को आठ साल बीत चुके हैं तो धीरे-धीरे समझने लगा कि यह कितनी ठोस बात है— "हम पिताजी के साथ रहते हैं, पिताजी अकेले रहते हैं" यह फिल्म इसीलिए भी बहुत खूबसूरत है चूंकि यह जस की तस है...क्षणिक घटनाओं से भरी हुयी इंच-इंच के बिछड़ते अपार पीड़ाओं, कभी-कभी सुखद लौट आए प्रेम से। कभी कभी बहुतों के दुःख कहे से परे हो जाते हैं और ऐसा तब होता है जब कोई असल में अकेला हो जाता है। फिल्म : मसान (२०१५)

नीरज نیرج

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