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चहरे ये मुखौटे हैं, मुखौटे ही तो चहरे हैं | अन्दर का राम जला दिया, कैसे उल्टे पड़े दशहरे हैं | अपनी ही आवाज़ सुन ना पाएं, पूर्ण रूप से बहरे हैं | मन की नदी उफान पा ना सकी, पर हम दिखते कितने गहरे हैं| ये मुखौटे कोई... show more
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