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जिन्हें 5000 सालों तक पानी नहीं पीने दिया गया, वो ज़िंदा भी है, उनकी जनसंख्या भी ज़्यादा है. जिन्होंने शोषण किया, पर्याप्त पानी पिया, उनकी जनसंख्या घटती चली गई ? - सर्वेश पाण्डेय (सवर्ण आर्मी प्रमुख)
29 条评论

5000 साल में मुगलों का 1000 साल और अंग्रेजों का 200 साल भी जोड़ा है या...? कोई गटरछाप भीमटा जवाब देगा क्या...?

कितनी ज़हरीली सोच है

जब मुसलमानों ने तुम्हारा नरसंहार कर ही दिया था तो bosdk तुम आज exist कैसे करते हो ??

यें सब 5000 साल वाली काल्पनिक मनोरम कहानियाँ मात्र है,गरीब का शोषण आज भी हो रहा है

लेकिन हमारा भारत तो नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों (कुओं, तालाबों, बावड़ियों, नदियों आदि) का देश रहा है।

इस लिए तुम लोगो को कोई सीरियस नहीं लेता है पोंगो

ऐतिहासिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में दलितों को सार्वजनिक जलस्रोतों (कुओं, तालाबों और बावलियों) से पानी पीने से रोकने के पीछे मुख्य रूप से 'पवित्रता और प्रदूषण' (Purity and Pollution) की जातिवादी धारणा थी। सवर्ण जातियों (जैसे ब्राह्मण और ठाकुर/राजपूत) द्वारा यह रोक निम्नलिखित तरीकों से और कारणों से लगाई जाती थी। धार्मिक और सामाजिक ग्रंथ: प्राचीन और मध्यकालीन समय में कुछ स्मृतियों और रूढ़िवादी मान्यताओं (जैसे मनुस्मृति के नियम) के आधार पर यह प्रचारित किया गया कि अछूत या शूद्र वर्ग के छूने से पानी, कुएं और तालाब 'अशुद्ध' या 'अपवित्र' हो जाते हैं। सार्वजनिक संसाधनों का बहिष्कार: गांवों में जो कुएं या तालाब राजाओं, पंचायतों या पूरे समाज के नाम पर होते थे, उन पर सवर्ण जातियों का एकाधिकार था। दलितों को उन पर जाने की सख्त मनाही थी। शुद्धिकरण के अनुष्ठान: यदि कभी कोई दलित व्यक्ति गलती से या अनजाने में सवर्णों के कुएं या नल को छू लेता था, तो सवर्ण समाज के लोग उस जलस्रोत का गंगाजल और विशेष पूजा-पाठ से 'शुद्धिकरण' करते थे, जिससे दलितों के प्रति हीन भावना और अपमान को बढ़ावा मिलता था। हिंसा और सामाजिक बहिष्कार: नियमों का उल्लंघन करने पर दलितों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था, मारा-पीटा जाता था, या उन्हें गांव के सामाजिक व आर्थिक दायरे से बहिष्कृत (हुक्का-पानी बंद) कर दिया जाता था। अलग स्रोतों की बाध्यता: दलितों को गांवों से दूर अलग और अक्सर गंदे या सूखे रहने वाले जल स्रोतों का ही उपयोग करने के लिए विवश किया जाता था। ऐतिहासिक प्रतिरोध:इस अमानवीय भेदभाव के खिलाफ डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 20 मार्च 1927 को ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह किया और महाराष्ट्र के महाड़ में चवदार तालाब के पानी को छूकर दलितों के मानवाधिकार व समानता की नींव रखी। लेकिन दलित अपने खुद के कुएँ और तालाब भी तो खोद सकते थे? हाँ, यह विचार स्वाभाविक है कि वे अपने अलग कुएँ खोद लेते। लेकिन उस समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था इतनी कठोर थी कि दलितों के लिए स्वतंत्र रूप से कुएँ या तालाब खोदना लगभग असंभव था। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: आर्थिक विपन्नता (Economic Poverty)भूमि का मालिकाना हक नहीं: प्राचीन और मध्यकालीन भारत की व्यवस्था में दलितों को जमीन खरीदने या संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। ज़मीनें ठाकुरों, ज़मींदारों या सवर्णों के पास होती थीं। बिना ज़मीन के कुआँ कहाँ खोदा जाता? अत्यधिक गरीबी: कुआँ खोदने के लिए मज़दूरों, औजारों और संसाधनों की ज़रूरत होती है, जिसमें भारी खर्च आता था। दलितों को केवल बंधुआ मज़दूरी या बहुत कम मज़दूरी मिलती थी, जिससे वे सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम कर पाते थे। सामाजिक और धार्मिक पाबंदियाँ (Social and Religious Restrictions)वर्चस्व की चुनौती: अगर कोई दलित वर्ग का व्यक्ति या समूह कुआँ खोदने की कोशिश भी करता, तो सवर्ण समाज इसे अपने सामाजिक वर्चस्व (Dominance) और प्रतिष्ठा को चुनौती मानता था। सजा और हिंसा: सवर्णों द्वारा ऐसी कोशिशों को बलपूर्वक रोक दिया जाता था। कुएँ खोदने पर उनकी बस्तियों पर हमले, मारपीट या उन्हें गाँव से बेदखल करने जैसी सजाएँ दी जाती थीं। भौगोलिक और प्राकृतिक बाधाएँ (Geographical Obstacles) खराब भूमि का आवंटन: दलित बस्तियाँ (टोले) हमेशा गाँव के बाहर, निचली या बंजर ज़मीनों पर बसाई जाती थीं। इन जगहों पर अक्सर पानी का स्तर (Water Table) बहुत नीचे होता था या पानी खारा और पीने लायक नहीं होता था। अच्छे जल स्रोतों पर कब्ज़ा: गाँव की सबसे उपजाऊ और मीठे पानी वाली ज़मीनों पर सवर्णों का कब्ज़ा होता था, जहाँ पानी आसानी से मिल सकता था। 4. कानून और सत्ता का अभाव (Lack of Legal Support) राजा और पंचायत का सवर्ण पक्षीय होना: आधुनिक लोकतंत्र से पहले, न्याय व्यवस्था (गाँव के मुखिया, राजा या पंचायत) में सवर्णों का ही नियंत्रण था। यदि कोई विवाद होता, तो कानून और सत्ता दलितों के बजाय सवर्णों का साथ देती थी।इन कठोर पाबंदियों के कारण दलित समाज पूरी तरह से सवर्णों के कुओं पर या नदियों-झरनों के बचे हुए पानी पर निर्भर रहने के लिए मजबूर था।

तुम रो लो , और खुलकर रो लो लेकिन आरक्षण था , आरक्षण है और आरक्षण रहेगा ।

पानी पीने का अभिप्राय यह नहीं कि PDA समाज को पानी नहीं मिला। यहां बात बराबरी और उच नीच कि है। तुमने अपने नल से पीने नहीं दिया,अपने घर से पीने नहीं दिया अपने बराबर में बैठ के पीने नहीं दिया। क्युकी तुम उन्हें अछूत समझते हो और गांव में आज भी उनके लिए अलग बर्तन का इस्तेमाल करते हो।

अब मुगलों के पास सुताओगे तो जनसंख्या तो कम होगी ही

निम्न जातियों को सार्वजनिक जल स्रोतों तक पहुंच से प्रतिबंधित किया गया था। उनकी जनसंख्या बढ़ी क्योंकि उनकी आजीविका मैन्युअल श्रम पर निर्भर थी; जितने अधिक लोग काम करते, उतनी ही अधिक आय होती। उन्हें कोई संसाधन विरासत में नहीं मिलता था और अक्सर उन्होंने उच्च जातियों के लिए कमाई करने के लिए कृषि के खेतों में श्रम किया।

इतिहास गवाह है की तलवार के सामने सबसे ज्यादा सलवार इन लोगो ने ही उतरी जबकि अछूत तो सब के लिए अछूत थे। इसलिए इनकी संख्या आज सभी जातियों से काम है।

Puchne wala Baraham bolne wala brahman sunne wala Brahman hasne wala brahman Bat sach hai

युद्ध मे कुछ सैनिक बच गए तो युद्ध हुआ नहीं यही मतलब हुआ न तेरा?

Population of GBR was 6-7 Million whnt the established colonial rule over India (160-180 Million) to is hisab se britishers Idia par kabza kar hi nahi sakte the qunki India ki population jyada thi

इनके गांव में बुध्दि नीचे 😁🤣🤣🤣 इसलिए मूत पेशाब खाते पीते हैं

बहुजनों का श्राप लग गया।

मुंह से बोल रहा हैं l इनका तो कुछ और काम जिक्र हैं l

Bochdika के पास कोई भी मुद्दा नहीं है बस पानी पानी करते रहते हैं सारे दिन। अरे हमने तो पानी ही तो नहीं पिया आपके जैसे थोड़ी है जो पानी पीने के लिए सोना पड़ जाय

ऐसे लोग आरक्षण पर चर्चा करेगें, इनकी हरकतें प्राइवेट में भी आरक्षण लागू करवा देंगी 😃

एक बार एक दलित सर्वेश जी के घर के सामने से जा रहा था अचानक उसे प्यास लगी उसने पानी माँगा पर सर्वेश जी ने पानी देने के बजाय अपने मंत्रोच्चारण से गंगा की धार मोड़ दिया उस दलित की ओर ताकि भविष्य में उसे कभी पानी नहीं माँगना पड़े

Now they are boss of INDIA , INDIAN CONSTITUTION , AND DEMOCRACY.

Sardar Vallabhbhai Patel — Opposed religion-based political reservation, arguing that independent India should move beyond communal divisions.

तथ्य और अम्बेडकरवादियों का आपस में 36 का आंकड़ा है उनको समझ नहीं आने वाला 😂

Gober buddhi

वह लोग ठीक वैसे ही जिंदा है जैसे कि भगवान परशुराम ने इस धरती को 21 बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद भी आज देश में कई क्षत्रिय है ।

#EndReservation #UGCRollBack

I think ye paani nhi peene dene vali baat ni bolni chahiye,its like moking them. They were actually deprived of water wells. And Swarnas used to control wells. The same logic Britishers can slap on us. Crux shd be reservation is not the solution now its the “basis of Inequality”

गाड़ी
