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Ana Sayfaya Dön

जब थाली में खाना खत्म हो जाता है तो थाली गंदी लगने लगती हैं फिर उसको कोई नहीं देखता ... वैसे ही जब आपकी जरूरत खत्म हो जाती हैं तब आप लोगों को बेकार लगने लगते हो...💯🔥

56,480 görüntüleme • 1 yıl önce •via X (Twitter)

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😍 यह भविष्यवाणी करता हूँ, पचास साल में घूंघट वापस लौट आएगा। क्योंकि स्त्री-पुरुष इतनी अनाकर्षक हालत में जी न सकेंगे। वे आकर्षण फिर पैदा करना चाहेंगे। आने वाले पचास वर्षों में स्त्रियों के वस्त्र फिर बड़े होंगे, फिर उनका शरीर ढकेगा। बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि जब वह बच्चा था, तो विक्टोरियन युग समाप्त हो रहा था। और स्त्रियों के पैर का अंगूठा भी देखना मुश्किल था। घाघरा ऐसा होता था, जो जमीन छूता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि अगर किसी स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिख जाता था, तो चित्त में बिजली कौंध जाती थी। और उसने लिखा है कि अब कल्पना करने को भी कुछ नहीं बचा है। स्त्री पूरी दिखाई पड़ जाती है और चित्त में कोई बिजली नहीं कौंधती। नग्न स्त्री उतनी आकर्षक नहीं है, नग्न पुरुष उतना आकर्षक नहीं है। और स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा होशियार हैं, इसलिए कोई स्त्री नग्न पुरुष में कभी उत्सुकता नहीं लेती। गहरे से गहरे प्रेम के क्षण में स्त्रियां आंख बंद कर लेती हैं कि पुरुष दिखाई ही न पड़े। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैं, शायद इंसटिंक्टिवली वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं और राजों से परिचित हैं। कृष्ण कहते हैं, क्रोध से मोह पैदा होता है। क्योंकि क्रोध से बाधा पैदा होती है। जहां भी बाधा है, वहां आकर्षण खड़ा हो जाता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि जिन लोगों ने बाधाएं खड़ी की हैं, वे ही आकर्षण के लिए जिम्मेदार हैं। ईसाइयत ने पाप को इतना आकर्षक बना दिया, क्योंकि पाप के लिए इतनी बाधाएं खड़ी कीं। धर्मों ने सेक्स को बहुत आकर्षक बना दिया, क्योंकि उसके लिए बहुत बाधाएं खड़ी कीं। आमतौर से लोग समझते हैं कि फिल्में हैं, नग्न-चित्र हैं, नग्न-अश्लील तस्वीरें हैं--ये लोगों को कामुक बना रही हैं। कृष्ण यह नहीं कह सकते कि कामुक बना रही हैं। कृष्ण कहेंगे कि यह लोगों का तो सारा मोह खराब कर देंगी। क्योंकि लोगों के लिए अनाकर्षक हो जाएगी, जो चीज परिचित हो जाती है। जिसमें बाधा नहीं है, वह अनाकर्षक हो जाती है...🌹
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😍 यह भविष्यवाणी करता हूँ, पचास साल में घूंघट वापस लौट आएगा। क्योंकि स्त्री-पुरुष इतनी अनाकर्षक हालत में जी न सकेंगे। वे आकर्षण फिर पैदा करना चाहेंगे। आने वाले पचास वर्षों में स्त्रियों के वस्त्र फिर बड़े होंगे, फिर उनका शरीर ढकेगा। बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि जब वह बच्चा था, तो विक्टोरियन युग समाप्त हो रहा था। और स्त्रियों के पैर का अंगूठा भी देखना मुश्किल था। घाघरा ऐसा होता था, जो जमीन छूता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा है कि अगर किसी स्त्री के पैर का अंगूठा भी दिख जाता था, तो चित्त में बिजली कौंध जाती थी। और उसने लिखा है कि अब कल्पना करने को भी कुछ नहीं बचा है। स्त्री पूरी दिखाई पड़ जाती है और चित्त में कोई बिजली नहीं कौंधती। नग्न स्त्री उतनी आकर्षक नहीं है, नग्न पुरुष उतना आकर्षक नहीं है। और स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा होशियार हैं, इसलिए कोई स्त्री नग्न पुरुष में कभी उत्सुकता नहीं लेती। गहरे से गहरे प्रेम के क्षण में स्त्रियां आंख बंद कर लेती हैं कि पुरुष दिखाई ही न पड़े। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैं, शायद इंसटिंक्टिवली वे प्रकृति के ज्यादा करीब हैं और राजों से परिचित हैं। कृष्ण कहते हैं, क्रोध से मोह पैदा होता है। क्योंकि क्रोध से बाधा पैदा होती है। जहां भी बाधा है, वहां आकर्षण खड़ा हो जाता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि जिन लोगों ने बाधाएं खड़ी की हैं, वे ही आकर्षण के लिए जिम्मेदार हैं। ईसाइयत ने पाप को इतना आकर्षक बना दिया, क्योंकि पाप के लिए इतनी बाधाएं खड़ी कीं। धर्मों ने सेक्स को बहुत आकर्षक बना दिया, क्योंकि उसके लिए बहुत बाधाएं खड़ी कीं। आमतौर से लोग समझते हैं कि फिल्में हैं, नग्न-चित्र हैं, नग्न-अश्लील तस्वीरें हैं--ये लोगों को कामुक बना रही हैं। कृष्ण यह नहीं कह सकते कि कामुक बना रही हैं। कृष्ण कहेंगे कि यह लोगों का तो सारा मोह खराब कर देंगी। क्योंकि लोगों के लिए अनाकर्षक हो जाएगी, जो चीज परिचित हो जाती है। जिसमें बाधा नहीं है, वह अनाकर्षक हो जाती है...🌹

तृप्त ...🖤

232,420 görüntüleme • 2 yıl önce

अगर तुमने बंदरों को संभोग करते देखा हो तो देखा होगा कि संभोग के बाद वे तुरंत एक—दूसरे से अलग हो जाते हैं। उनके चेहरों को देखो, उनमें प्रसन्नता जरा भी नहीं है, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा धक्के देती है, जब वह अतिशय होती है तो वे उसे बस फेंक देते हैं। साधारण काम—कृत्य ऐसा ही है। लेकिन नीतिवादी ठीक उलटी बात कहते आ रहे हैं। वे कहते हैं : भोग मत करो, सुख मत लो। वे कहते हैं. यह तो पशुओं जैसा कृत्य है। लेकिन यह बात गलत है। पशु कभी सुख नहीं लेते हैं, केवल मनुष्य सुख ले सकता है। और तुम जितना गहरा सुख लोगे उतनी ही श्रेष्ठु मनुष्यता का उदय होगा। और अगर तुम्हारा संभोग ध्यानपूर्ण हो जाए, समाधि पूर्ण हो जाए तो परम उपलब्ध हो जाए। लेकिन तंत्र की बात स्मरण रखो. यह घाटी— अनुभव है। यह शिखर—अनुभव नहीं है, घाटी— अनुभव है। पश्चिम में अब्राहम मैसलो ने शिखर—अनुभव की बहुत बात की है। तुम उत्तेजना के शिखर पर पहुंचकर नीचे गिरते हो। यही कारण है कि प्रत्येक संभोग के बाद तुम दीन—हीन अनुभव करते हो। और यह स्वाभाविक है, तुम शिखर से नीचे गिरते हो। लेकिन तांत्रिक संभोग के बाद तुम्हें यह गिरावट कभी अनुभव नहीं होगी। उसमें तुम और नीचे नहीं गिर सकते, क्योंकि तुम घाटी में ही हो। वरन तुम ऊपर उठते हुए अनुभव करोगे। तांत्रिक संभोग से लौटने पर तुम गिरते नहीं, ऊपर उठते हो। तुम ऊर्जा से आपूरित होकर ज्यादा शक्तिवान, ज्यादा जीवंत और तेजोमय हो जाते हो। और वह आनंद घंटों बना रह सकता है, दिनों बना रह सकता है। यह इस पर निर्भर है कि तुम कितनी गहराई से उसमें उतरे थे। तांत्रिक संभोग में उतरने पर देर— अबेर तुम्हें पता चलेगा कि स्खलन ऊर्जा का अपव्यय है, उसकी कोई जरूरत नहीं है। अगर बच्चा नहीं पैदा करना है तो स्खलन बिलकुल जरूरी नहीं है। और इस तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम पूरे दिन विश्राम अनुभव करोगे। एक तांत्रिक काम—अनुभव के बाद तुम कई दिनों तक विश्रांत, शात, अहिंसक, अक्रोधी और सुखी रह सकते हो। और इस तरह का व्यक्ति कभी दूसरों के लिए उपद्रव नहीं खडा करेगा, मुसीबत नहीं पैदा करेगा। हो सकेगा तो वह दूसरों को सुखी बनाने में सहयोग देगा, अन्यथा वह दूसरों को दुख तो कभी नहीं देगा। केवल तंत्र नए मनुष्य का निर्माण कर सकता है। और यह नया मनुष्य—समयातीत और निरहंकार को, अस्तित्व के साथ गहन अद्वैत को जानने वाला मनुष्य—अवश्य विकासमान होगा। एक नया आयाम खुल गया है। वह बहुत दूर नहीं है, वह दिन बहुत दूर नहीं है, जब काम या सेक्स विलीन हो जाएगा। जब काम अनजाने विदा हो जाता है, जब एक दिन अचानक तुम्हें पता चलता है कि काम बिलकुल विदा हो गया, उसकी कोई वासना न रही, तो ब्रह्मचर्य का जन्म होता है। लेकिन यह कठिन है। यह कठिन मालूम पड़ता है, क्योंकि तुम्हें बहुत गलत शिक्षा दी गई है। और तुम इससे भयभीत हो, क्योंकि तुम्हारा मन संस्कारित है। हम दो चीजों से बहुत डरते हैं, हम कामवासना और मृत्यु से बहुत डरते हैं। और वे दोनों ही बुनियादी हैं। धर्म का सच्चा साधक दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम को जानने के लिए काम का अनुभव लेगा। क्योंकि काम को जानना जीवन को जानना है। और वह मृत्यु को भी जानना चाहेगा। क्योंकि जब तक तुम मृत्यु को नहीं जानते हो तब तक तुम शाश्वत जीवन को भी नहीं जान सकते। अगर तुम काम में उसके मर्म तक प्रवेश कर सको तो तुम जीवन को जान लोगे। और वैसे ही अगर तुम स्वेच्छा से मृत्यु में उसके केंद्र तक प्रवेश कर जाओ तो तुम अमृत को उपलब्ध हो जाओगे। तब तुम अमर हो, क्योंकि मृत्यु तो केवल परिधि पर घटित होती है। काम और मृत्यु, दोनों एक सच्चे साधक के लिए बुनियादी हैं। लेकिन सामान्य मनुष्यता के लिए दोनों घबड़ाने वाले है। कोई उनकी चर्चा नहीं करता है। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों गहन रूप से एक—दूसरे से संबंधित हैं। वे इतने जुड़े हुए हैं कि तुम कामवासना में प्रवेश करो और तुरंत तुम एक प्रकार की मृत्यु में प्रवेश करने लगते हो। क्योंकि काम—अनुभव में तुम मरते हो, तुम्हारा अहंकार विलीन होता है। काम— अनुभव में समय विलीन हो जाता है, तुम्हारा व्यक्तित्व विदा हो जाता है। तब तुम ही मरने लगते हो। संभोग सूक्ष्म मृत्यु है। और अगर तुम्हें बोध हो जाए कि काम सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु तुम्हारे लिए बड़ी काम—समाधि का अनुभव बन जाएगी। कोई सुकरात मृत्यु में निर्भय प्रवेश करता है। बल्कि वह मृत्यु को जानने के लिए उत्साह से भरा है, उल्लास और उत्तेजना से भरा है। उसके हृदय में मृत्यु के लिए गहन स्वागत का भाव है। क्यों? क्योंकि अगर तुम संभोग की छोटी मृत्यु को जानते हो, अगर तुमने उससे प्राप्त होने वाला आनंद जाना है, तो तुम बड़ी मृत्यु को भी जानना चाहोगे। तुम उसके पीछे छिपे आनंद को भी भोगना चाहोगे। #तृप्त

तृप्त ...🖤

813,018 görüntüleme • 1 yıl önce