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दान दिये धन ना घटे कह गए दास कबीर
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भगवान हमे अपनी कमाई पर बरकत दें जिसे हम मिल बांट कर खा सकें।

कबीर के दोहे जीवन के बारे में एकदम सटीक बातें करते हैं उनके दोहे व्यावहारिक होते हैं इस दोहे में भी उन्होंने बहुत ही सुंदर बात कही है

सत्य और गहरी बात कही है कबीर दास जी ने। उनका यह संदेश है कि जब हम दान देते हैं, तो उसका असली मूल्य सिर्फ भौतिक रूप में नहीं होता। दान देने से न केवल दूसरों की मदद होती है, बल्कि आत्मा को भी शांति और संतोष मिलता है। कबीर दास जी ने यह भी बताया कि दान से हमारा धन कभी घटता नहीं, बल्कि वह और बढ़ता है—आध्यात्मिक रूप से और जीवन में भी। "दान दिये धन ना घटे" का अर्थ है कि दान से हमारी आंतरिक संपत्ति और पुण्य में वृद्धि होती है, जो कभी घटती नहीं।

सही कहा आपने दान देने से हमारा धन नहीं कम होता है।

संत कबीर का यह दोहा गहरी सीख देता है—दान देने से धन कभी कम नहीं होता, बल्कि उसका पुण्य बढ़ता है। यह परोपकार, उदारता और कर्मफल के सिद्धांत को दर्शाता है।

! कबीरदास जी के इस दोहे में दान की महत्ता और उसके प्रभाव को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया गया है। यह दोहा हमें दान की भावना को अपनाने और दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। धन्यवाद!

सही कहा कबीर दास जी ने। दान करने से धन नहीं घटता, बल्कि आत्मिक संतोष और पुण्य में वृद्धि होती है।

सच कहा है कबीर जी ने, दान देने से धन में कमी नहीं आती, बल्कि यह पुण्य और आशीर्वाद का कारण बनता है।

दान देने से कभी भी धन नहीं घटता है

सही कहा! सच्चा दान कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि पुण्य और समृद्धि बढ़ाता है।


