Video yükleniyor...

Video Yüklenemedi

Ana Sayfaya Dön

नजारे भी देखे,इशारे भी देखे कई खूबसूरत सहारे भी देखे जो मैखाने जाकर,सुराही उठाऊ तो ये नशीली नजर किसलिए है बहलना न जाने,बदलना न जाने तमन्ना मचलके,सम्हलना न जाने वो बेकरारी,जो अब तक इधर थी वही बेकरारी,उधर किसलिए है ये माना मेरी जां,मुहब्बत सजा है मज़ा इसमे इतना मगर...

39,921 görüntüleme • 8 ay önce •via X (Twitter)

0 Yorum

Yorum bulunmuyor

Orijinal gönderinin yorumları burada görünecek

Benzer Videolar

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
0:17

Sensitive content

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 görüntüleme • 5 ay önce

ना कलमा आता, ना फातिहा सीधी... और खुद को मुसलमान कहती है?" नाम शायद Shabnam है — हां वही, जो दिन में मंदिरों के चक्कर लगाती है, कभी चढ़ावा चढ़ाती है, कभी खुद को सनातनी बताती है... और फिर कहती है "मैं भी मुसलमान हूं।" अब ज़रा इस ड्रामे पर ध्यान दीजिए — वीडियो में एक लड़का कहता है: "जो लोग मानते हैं कि तुम मुस्लिम नहीं हो, उन्हें आज तुम कलमा पढ़कर सुना दो।" तो मैडम कलमे की जगह सूरह फातिहा पढ़ने लगती हैं — और वो भी ऐसी पढ़ी कि जैसे पहली बार देख रही हों। न लफ़्ज़ ठीक, न तर्ज़ — सीधा मतलब: ना कलमा याद, ना कुरआन की सबसे पहली सूरह ही ढंग से आती है। और फिर दावा: "हम तो मुस्लिम ही पैदा हुए थे..." वाह! पैदा हुए थे शायद, मगर अब क्या हो — ये खुद नहीं जानतीं। अब तुम ही बताओ — ये मज़हब है या सोशल मीडिया की नौटंकी? वीडियो नीचे है — देखिए, और अपनी राय ज़रूर दीजिए

Mohd Ansar

67,433 görüntüleme • 1 yıl önce

क्या ही प्राणी है भई... क्या ही डरा लोगे इसे?? ईडी इंट्रोगेशन कर रही है, और मैं उधर लॉकअप देख रहा हूँ। सोच रहा हूँ, की मेरे परदादा 12 साल ऐसी ही सेल में बैठे थे... तो दस साल तो मेरा भी बनता है.. ●● अक्रॉस द पार्टीज, अक्रॉस द नेशन.. एक नेता बता दो, जो ऐसी बात बोल देने का भी गट्स रखता हो। एंड आई सीरियसली बिलीव, कि इस बंदे को पीएम शिएम बनने में कत्तई रुचि नही। ये तो सर से पाँव तक घोर एंटी एस्टेब्लिशमेंट है। तो मौका आएगा, तो टोपी किसी और के हाथ दे देगा। सत्ता की कुंजी हाथ मे रखेगा। वह सब कुछ, कान पकड़कर औरो से करवाएगा, जो सत्ता में रहने वाले को सत्ता की मजबूरियां करने नही देती। ●● राहुल,अपने जीवन मे राहुल होने का आनंद ले रहे है। गांधी होने का वजन हंसकर, हंसाकर उठा रहे हैं। जो मोहब्बत, जो लगाव, और जो पीस डालने वाली आशाओं का दबाव इस सरनेम के साथ जुड़ा होता है, ये उसके बोझ से चरमराता हुआ शख्स नही है। उसकी गुरुता से गर्वित है। न मौत का डर, न जेल का। न ठेके दिलाने हैं, न कमीशन में रुचि। लड़के में आज जवाहरलाल का वारिस, गांधी का अक्स दिखा है। ●● हां, उस म्यार पर पंहुचने में तो अभी वक्त है। उसके हिस्से का सँघर्ष बाकी है, लेकिन इंशाअल्लाह लम्बी उम्र भी बाकी है। राह यही पकड़ी रही, तो उनसे भी आगे जायेगा। वीडियो, पता नही कब, कहाँ का है। किसी ने आज लिंक भेजा, तो 20 बार देख चुका हूँ। आप भी देखिए।

Manish Singh

211,553 görüntüleme • 2 yıl önce

जिन गाँवों में पीडीए समाज के लोग अधिक हैं और उनमें भी मल्लाह जैसे समाज जिनके बीच PDA की नयी चेतना का प्रसार हो रहा है, वहाँ भाजपा सरकार पीडीए पाठशाला खुलने के डर से, अब सीधे ‘स्कूल बंदी’ नहीं करवा पा रही है तो सत्ता-सजातीय लोगों के द्वारा ‘टीचर’ न भेजकर झूठी हाज़िरी लगाने का दबाव प्रधानाध्यापकों पर बनवा रही है, ये भी स्कूल बंदी का ही एक और तरीक़ा है। ऐसे सत्ता पोषित उच्चाधिकारियों के दुर्व्यवहार से जो अंतहीन आक्रोश उपजता है वो अंतत: हिंसक भी हो उठता है। नाइंसाफ़ी या भ्रष्टाचार की अति की ही ये परिणति है। भाजपा ने शिक्षा का माहौल पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। पीडीए समाज के लोगों को शिक्षा से वंचित रखने की ये साज़िशें अब और नहीं चलनेवाली। भाजपा जाए तो स्कूल खिलखिलाए!

Akhilesh Yadav

283,860 görüntüleme • 11 ay önce

💥 "पति एक्सीडेंट में मौत से बचा… पर अपनी ही पत्नी ने गला दबाकर ख़त्म करने की कोशिश कर दी – वो भी तीन आशिकों के लिए!" इस देश में, भाई, मर्द की ज़िंदगी अब CCTV और किस्मत पर चलती है। 498A, DV Act, maintenance तो था ही… अब पति के गले पर भी खतरा—सीधा अपने ही घर से। पत्नी को “सक्षम, स्वतंत्र, सशक्त” बताने वाले गैंग इस वीडियो पर भी चुप रहेंगे… क्योंकि यहाँ आरोपी महिला है और पीड़ित मर्द। यही है असली gender bias — जो हर रोज़ किसी न किसी घर में मर्द की सांसें घोंट रहा है। 📌 ये मामला सिर्फ घरेलू हिंसा नहीं— ये है मर्डर अटेम्प्ट। और हमारे कानून? महिला → तुरंत पीड़िता पुरुष → तुरंत दोषी अब बताइए—कब तक? #MenToo #StopMisuse #MaleVictim #JusticeForHusbands #mensright

ShoneeKapoor

267,142 görüntüleme • 8 ay önce

#मेरठ #उत्तरप्रदेश वीडियो गंगानगर मेरठ के होटल सैफरॉन का है, जहां पुलिस की छापेमारी में ये सारी लड़कियां पकड़ी जाती हैं, सबके साथ स्कूली बैग है, मुमकिन है कि ये घर से स्कूल के बहाने सीधे होटल गईं हों, इसमें एक हिजाबी मोहतरमा भी हैं, सोचिए अगर इन्हें कोई कुछ बोल दे तो इनके मां बाप फौरन उसके खिलाफ पुलिस केस करने पहुंच जाते हैं, आजकल मां बाप खुद अपनी बच्चियों को इस रास्ते पर जाने केलिए खामोश इजाज़त देते हैं, क्यूंकि रोकटोक न करना, सही गलत की तालीम न देना किसी के बताने और फिर इनके कारनामें सुनने के बाद उसकी तहकीक न करना सीधा साहबजादी को क्लीनचिट देकर सामने वाले को ही बुरा बना देना ही खामोश हिमायत है, आज स्कूल कॉलेज के नाम पर निकलने वाली लड़कियां होटल के कमरों में जाकर एंजॉय कर रही हैं मां बाप को लगता है कि लाडली पढ़ लिखकर कामयाब होकर वापस आएगी, और इधर इनकी एक्स्ट्रा क्लास चालू रहती है, किसी भी शहर के किसी भी होटल में आप जाकर देख लें सारे कमरे फुल रहते हैं, और हर होटल में मुस्लिम लड़कियां ज़रूर मिलेंगी, क्या हम वाकई अपने घरों में बच्चियों पर ध्यान देते हैं ? अगर हां तो फिर ये किस घर की लड़कियां हैं ?

AmjadASR 🌍

97,017 görüntüleme • 1 yıl önce

ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ, रोज ए अब्र ए शब ए माहताब में कभी कभी शायरी पढ़ता हूँ। जावेद अख्तर फेवरिट है, बशीर बद्र भी, और राहत इन्दोरी भी। ●● गालिब भी पढ़ता हूँ। पहली बार गालिब से परिचय जगजीत सिंह के एलबम के मार्फ़त हुआ। तब आधा समझे, और बाकी आधा गलत सलत ही रटते हुए गुनगुनाते थे। फिर एक किताब ली। दीवान ए गालिब... उसमे कठिन शब्दो के अर्थ दिए होते थे। अबकी ज्यादा समझा। और अनसुने कलाम को भी पढा। लेकिन शब्द समझने के बाद भी कई बार भाव, सिर के ऊपर से निकल जाता। ●● फिर गूगल युग आया। न सिर्फ शब्दार्थ, बल्कि भावार्थ भी मिल जाते। ग़ालिब की खासियत यह है, हर सिचुएशन को एक्सप्लेन कर जाते हैं, अनिवर्चनीय को कह जाते हैं। और जादू यह, कि उस बोल का अर्थ दूसरी बहुत सी सिचुएशन में लागू होता है। याने अपने हालात के मुताबिक हर पाठक के लिए अर्थ कुछ अलग है। हर एक के दिल की किसी जुदा तंत्रिका को वह शेर छूता है। और जुबान वाह कहना भी भूल जाती है। ●● अच्छा लेखन वही, कि आदमी खो जाये। उसके भीतर कुछ घुड़मुड़ाये। उसके लिए, शब्द समझ मे आने चाहिए, भाव हृदय में उतरना चाहिए। ग़ालिब के दौर में अधिसंख्य लोग उर्दू समझते होंगे। अब नही। वो ट्रेडिशन्स नही, जिसमे ग़ालिब के भाव फिट हों। जैसे कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का। तब जिन्हें शिकायत होती थी, वे कागज के वस्त्र पहनकर जाते थे शिकवा करने। अब वो ट्रेडिशन नही रही। तो कैसे समझेंगे की ग़ालिब कह रहे है- यहां हर शख्स कुछ न शिकवा लिए घूम रहा है। ●● इसके मुकाबले आप बशीर बद्र को पढिये। सीधी, साफ, समझ मे आने वाली खूबसूरत रूमानी शायरी है। जावेद को पढिये। एक मोहरे का सफर, नया हुक्मनामा, जो कहते सब डरते है, तू वो बात लिख... सीधा, सिम्पल, सटाक से दिल को लगने वाला। मगर इन सबसे ऊपर हैं- राहत इंदौरी। द किंग ऑफ सिम्पलीसिटी। हिम्मत, गुरुर, जज्बे का शायर। बशीर और जावेद का कॉंटॅक्स पूरा पेज या नज्म पढ़ने पर जाहिर होता है। यहां राहत, दो लाइन में आग लगा जाते हैं। गुलाब,ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता, इंतिज़ाम क्या क्या है ●● बड़े शायर, बड़े लेखक, शब्दो से नही खेलते। भाव से खेलते हैं। ये भाव, अनुभव से आपबीती से आते हैं। आपबीती न हो, तो सिंपथि से आते हैं, एम्पाथि से आते है, करुणा से उपजते हैं। यह करुणा, इंसान के हृदय को उर्वर बनाती है, ख्याल उपजते हैं। गैर की पीड़ा को, उसके दिल के हालात को, उसकी निगाह को अपने भीतर पैवस्त करना-फिर जहां को देखना जो दिखे, उसे गहरे, आसान लफ्जों में लिख देना। महान शायर और लेखक तो वही हुए, जिन्होंने आसान लफ्जों में गहरी बात कही- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहोगे?? यहां साहस है, चुनौती है, एक मजबूर, मजलूम बेवा की इल्तजा है पंच परमेश्वर से सवाल है। ●● आपमे सिंपथि नही, एम्पाथि नही, तो भाव कालजयी कैसे हो?? जब आपकी बात भीतर प्रेम न जगाए, शीतल न करे। चुनौती न दे, सवाल न हो, जो विद्रोह का साहस न जगाए... घृणा जगाये। जातीय, धार्मिक, सामुदायिक नफरत से लबरेज हो। लेखक का, शायर का दिल बंजर है, ईर्ष्या से भरा है। इस ज्वालामुखी के क्रेटर से कौन से भाव उगलेंगे?? ●● जलाने वाला मैग्मा ही निकलेगा। सस्ता साहित्य, घटिया कविता, बकवासी तुकबन्दी। पाकिस्तान से पर चढ़ाई और हिंदुस्तान की वाहवाही.. छपवा लो दस किताबें, मगर कालजयी कृति कैसे बनेगी भईया? खोखले चिकने शब्दों से कितना खेलोगे। अगर खूब सारे भारी भरकम शब्दो का जमावड़ा ही कालजयी साहित्य होता.. तो भार्गव की डिक्शनरी शेक्सपियर के साहित्य से बड़ी मानी जाती। ●● आज शब्दजाल वाले किसी उभरते लेखक से बकझक हुई। सो लिख दिया। समझने वाले समझ गए। जो न समझे उनके लिए अर्ज करता हूँ- जमी पर घर बनाया, मगर जन्नत में रहते है हमारी खुश नसीबी है, कि हम भारत मे रहते है अब आप इसे घटिया शेर मानते है तो आपकी शायरी की समझ है। अगर बेहतरीन शेर मानते है, तो पॉलिटिक्स की समझ है। अगर आप इसे शेर नही, अनहद पॉपुलिस्ट बकैती मानते है, तो अब आपको मेरी भी समझ है। ❤️

Manish Singh

29,823 görüntüleme • 1 yıl önce

भाई ये क्या लिख रहे हो? ये आपसी भ्रम है? ये चिरकुट खुल्लमखुल्ला लिख रहा है कि मैं टूलकिट का हिस्सा हूँ और मोदी को बदनाम करने के लिए पैसे लेता हूँ। जब मैंने इसे और अन्य व्यक्तियों को लीगल नोटिस भेजा है, तब ये डिलीट कर के बचना चाह रहा है। ये बहरा है क्या कि इसने सुना नहीं क्या कहा जा रहा है। इसको मैं इतना पेलूँगा कि ये जीवन भर याद रखेगा। आर्काइव कर लिया है मैंने और वीडियो रिकॉर्डिंग भी है मेरे पास। डिलीट करने से कुछ नहीं होगा। ट्विटर पर कौन सा कॉपीराइट लगता है? हर दिन जो ये लोग साले अजेंडा चलाते हैं न कि मोदी का पैसा लिया और हिमंता से पैसा लिया, अब ये कोर्ट में जवाब दें, मेरा लीगल खर्चा देंगे पूरा और माफी भी इसी प्लेटफॉर्म पर माँगेंगे कि उन्होंने झूठ बोला। यदि जानते हो कि पेड ट्वीट किया है तो प्रूफ दिखाओ, वरना माफी माँगो, लीगल खर्चा वापस करो। भाँड़ में गया इन जैसे नेशनलिस्टों का राष्ट्रवाद! पक गया हूँ इन सबसे मैं। बहुत दिन तक इग्नोर करता रहा। अब दस-पाँच लगा कर इनसे कोर्ट में ही निबटूँगा।

Ajeet Bharti

131,012 görüntüleme • 4 ay önce

"सर... ये स्कूल बंद न हो तो अच्छा है..." ये आवाज़ सिर्फ एक मासूम बच्ची की नहीं है, बल्कि ये उस वंचित रह गये भारत के भविष्य की आवाज़ है, जो पढ़ना चाहती है, बढ़ना चाहती है, मगर रास्ते बंद किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में हज़ारों सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं. क्या यही "डबल इंजन विकास" है? जहाँ गरीब के बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ाई से बाहर हो जा रहे हैं, क्योंकि उसका स्कूल अब मौजूद नहीं? गाँवों में प्राइवेट स्कूल दूर हैं, बेतहाशा महंगे हैं, और गरीबों के बस से बाहर. ये बच्ची जानती है कि पढ़ाई ही उसका भविष्य है, मगर सरकार उसकी क़लम और किताबें छीन रही है. ये कोई योजनागत सुधार नहीं, ये शिक्षा का निजीकरण है, मासूम सपनों की हत्या है. ये सवाल सिर्फ सरकार से नहीं है, ये सवाल हम सब से भी है. क्या हम चुप रहेंगे जबकि लाखों गरीब बच्चों का भविष्य अंधेरे में धकेला जा रहा है? अब वक़्त है बोलने का. अब वक़्त है पूछने का, क्यों बंद किए जा रहे हैं सरकारी स्कूल? क्यों छीनी जा रही है एक गरीब की आखिरी उम्मीद? अगर आप चाहते हैं कि हर बच्चा पढ़े, तो इस आवाज़ को फैलाइए. इस बच्ची की गुहार को आखिरी न बनने दीजिए. शिक्षा पर खर्च कटौती नहीं, निवेश होनी चाहिए. वरना दंगाइयों और पाखंडियों की दुकान सज जाएगी, आपके बच्चे उनकी साज़िश के शिकार हो जाएँगे. आपके बच्चों को कोई बचा सकता है तो वह है शिक्षा, क़लम और किताब. #बचाओ_सरकारी_स्कूल #सरकार_से_सवाल #शिक्षा_का_अधिकार #UPGovt #YogiAdityanath #RightToEducation

Dr. Laxman Yadav

22,564 görüntüleme • 1 yıl önce

प्रेमिकाओं का कोई नाम नहीं होता उनका कोई चेहरा भी नहीं होता प्रेमिकाओं का नाम ज़ोर से नहीं पुकारा जाता सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है प्रेमिकाएं एकांत की साथी होती हैं जहां फुसफुसाया जाता है उनका नाम चेहरे को कहा जाता है चाँद पिता के द्वारा थोपे ज़िम्मेदारियों से टूटा नौकरी न होने से परेशान जीवन से उबा हुआ पुरुष प्रेमिका की बाँहो में पनाह पाता है दुखों का अस्थि कलश प्रेम की गंगा में बहा आने को आतुर प्रेमी यकायक शिशु बन जाता है प्रेमिका इस शिशु को मन में धारण करती है छिपा लेती है अपने आँचल में प्रेम का ये सबसे पवित्र क्षण होता है लेकिन ये पवित्र क्षण केवल एकांत में संभव है मौज में प्रेमी प्रेमिका को फूल और खुशबू पुकारता है कहता है तुम तो तीस में भी तेईस की लगती हो तेईस में मिलती तो हम साथ फिल्म देखने चलते... अब तो कोई न कोई टकरा जाएगा थिएटर में यूँ सबके सामने तमाशा बनाना ठीक नहीं प्रेमिका अनसुना करती है प्रेम को तमाशा पुकारना पूछती है- चाय तो पियोगे न खूब अदरक डाल के बनाती है चाय देर तक खौलाती है चाय नहीं मन फिर कसैलापन दूर करने एक चम्मच चीनी ज़्यादा डाल देती है प्रेमी को उसके हाथ की बनी चाय खूब पसंद है प्रेमिका सुख की सबसे आखिरी हिस्सेदार होती है और दुख की पहली प्रमोशन मिलने पर पुरुष सबसे पहले पत्नी को फोन करता है चैक बाउंस हो जाने पर प्रेमिका को प्रेमिका पूछती है कितने पैसों की ज़रूरत है कहो तो कुछ इंतज़ाम करूँ प्रेमी दिल बड़ा कर इनकार करता नहीं, मैं तो बस बता रहा तुमसे पैसे कैसे ले सकता हूँ प्रेमिका को जाने क्यूं ख़याल आता पैसे प्रेम से अधिक क़ीमती है वो कहना चाहती है सुनो, प्रेम दे दिया फिर पैसे क्या चीज़ है लेकिन कहते-कहते रुक जाती ये फिल्मी डायलॉग सा सुनाई देता कभी अचानक मॉल में प्रेमी के टकरा जाने पर वो देखती है उसकी अनदेखा करने की कोशिश लेकिन पहचान लेती है प्रेमी की पत्नी वो जानती है उसे सहकर्मी या पुरानी दोस्त के रूप में पूछती है- कितने दिन बाद मिली आप कैसी हैं, क्या कर रही हैं आजकल प्रेमिका बिल्कुल नज़रअंदाज़ करती है प्रेमी को उसकी पत्नी का हाथ पकड़ करती है कुछ बातें फिर जल्दी का बहाना बना निकल जाती है बाहर अगले दिन प्रेमी बताता है पत्नी पूछ रही थी आजकल उसके रंग ढंग बड़े बदले से है छेड़ में कहता है मेरे प्रेम ने तुम्हें रंगीन बना दिया प्रेमिका नहीं बताती कल लौटते में उसने फिर रुलाई पर काबू किया बस निकाल लाती है प्रेमी के फेवरेट कलर की टीशर्ट जो कल खरीदी थी मॉल से निकलते-निकलते प्रेमी कहता है सुनो घर जा रहा हूँ अब मैसेज मत करना फोन बच्चों के हाथ में होता है अक्सर जाते हुए प्रेमी का माथा चूमने को उद्दत प्रेमिका पीछे खींच लेती है कदम कार में बैठते ही प्रेमी भेजता है कोई कोमल संदेश फिर कोई जवाब न पाकर सोचता है अजीब होती हैं ये प्रेमिकाएं भी सच..कितनी अजीब होती हैं प्रेमिकाएं...💕 #तृप्त ✍🏻

तृप्त ...🖤

48,070 görüntüleme • 1 yıl önce

पूरा अवश्य पढ़ें सहमत हैं तो RT करें 🙏 आप सभी को याद होगा इसी तरीके की वीडियो बनाती थी एक विदेशी महिला जो भारत में भी काफी वायरल हुई थी दो तीन महिले पहले अब उसकी कॉपी भारतीय महिला भी करने लगी हैं ये वही महिला हैं जिन्हें लव जिहाद से जागरूक करते 2 ना जाने कितने हिंदू युवाओं की जान चली गई और कितनी लड़कियों की जान चली गई लेकिन इनके दिमाग में नहीं आया लेकिन सलवार उतार कर कैसे वीडियो बनानी है बहुत जल्दी सीख गईं निर्वस्त्र कैसे होना है, कैसे फॉलोवर्स बढ़ेंगे,कैसे व्यू आएंगे वो बहुत जल्दी सीख गईं ये इंस्टाग्राम की बीमारी जल्दी बंद नहीं हुई तो भारतीय संस्कृति को नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता 😕🙏

नम्रता सिंह🇮🇳

332,767 görüntüleme • 1 yıl önce