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Ana Sayfaya Dön

नजारे भी देखे,इशारे भी देखे कई खूबसूरत सहारे भी देखे जो मैखाने जाकर,सुराही उठाऊ तो ये नशीली नजर किसलिए है बहलना न जाने,बदलना न जाने तमन्ना मचलके,सम्हलना न जाने वो बेकरारी,जो अब तक इधर थी वही बेकरारी,उधर किसलिए है ये माना मेरी जां,मुहब्बत सजा है मज़ा इसमे इतना मगर...

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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 görüntüleme • 7 ay önce

ना कलमा आता, ना फातिहा सीधी... और खुद को मुसलमान कहती है?" नाम शायद Shabnam है — हां वही, जो दिन में मंदिरों के चक्कर लगाती है, कभी चढ़ावा चढ़ाती है, कभी खुद को सनातनी बताती है... और फिर कहती है "मैं भी मुसलमान हूं।" अब ज़रा इस ड्रामे पर ध्यान दीजिए — वीडियो में एक लड़का कहता है: "जो लोग मानते हैं कि तुम मुस्लिम नहीं हो, उन्हें आज तुम कलमा पढ़कर सुना दो।" तो मैडम कलमे की जगह सूरह फातिहा पढ़ने लगती हैं — और वो भी ऐसी पढ़ी कि जैसे पहली बार देख रही हों। न लफ़्ज़ ठीक, न तर्ज़ — सीधा मतलब: ना कलमा याद, ना कुरआन की सबसे पहली सूरह ही ढंग से आती है। और फिर दावा: "हम तो मुस्लिम ही पैदा हुए थे..." वाह! पैदा हुए थे शायद, मगर अब क्या हो — ये खुद नहीं जानतीं। अब तुम ही बताओ — ये मज़हब है या सोशल मीडिया की नौटंकी? वीडियो नीचे है — देखिए, और अपनी राय ज़रूर दीजिए

Mohd Ansar

67,433 görüntüleme • 1 yıl önce

क्या ही प्राणी है भई... क्या ही डरा लोगे इसे?? ईडी इंट्रोगेशन कर रही है, और मैं उधर लॉकअप देख रहा हूँ। सोच रहा हूँ, की मेरे परदादा 12 साल ऐसी ही सेल में बैठे थे... तो दस साल तो मेरा भी बनता है.. ●● अक्रॉस द पार्टीज, अक्रॉस द नेशन.. एक नेता बता दो, जो ऐसी बात बोल देने का भी गट्स रखता हो। एंड आई सीरियसली बिलीव, कि इस बंदे को पीएम शिएम बनने में कत्तई रुचि नही। ये तो सर से पाँव तक घोर एंटी एस्टेब्लिशमेंट है। तो मौका आएगा, तो टोपी किसी और के हाथ दे देगा। सत्ता की कुंजी हाथ मे रखेगा। वह सब कुछ, कान पकड़कर औरो से करवाएगा, जो सत्ता में रहने वाले को सत्ता की मजबूरियां करने नही देती। ●● राहुल,अपने जीवन मे राहुल होने का आनंद ले रहे है। गांधी होने का वजन हंसकर, हंसाकर उठा रहे हैं। जो मोहब्बत, जो लगाव, और जो पीस डालने वाली आशाओं का दबाव इस सरनेम के साथ जुड़ा होता है, ये उसके बोझ से चरमराता हुआ शख्स नही है। उसकी गुरुता से गर्वित है। न मौत का डर, न जेल का। न ठेके दिलाने हैं, न कमीशन में रुचि। लड़के में आज जवाहरलाल का वारिस, गांधी का अक्स दिखा है। ●● हां, उस म्यार पर पंहुचने में तो अभी वक्त है। उसके हिस्से का सँघर्ष बाकी है, लेकिन इंशाअल्लाह लम्बी उम्र भी बाकी है। राह यही पकड़ी रही, तो उनसे भी आगे जायेगा। वीडियो, पता नही कब, कहाँ का है। किसी ने आज लिंक भेजा, तो 20 बार देख चुका हूँ। आप भी देखिए।

Manish Singh

211,598 görüntüleme • 2 yıl önce

प्रिय मित्रों, कृपया एक पल रुककर इस दर्द को महसूस कीजिए… ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं है। ये एक इंसान की जिंदगी है, जो हर रोज़ अपनी ही देह के बोझ तले दब रहा है। एक तरफ युवा लड़का है, जिसके शरीर पर इतना बड़ा और भारी उभार लटका हुआ है कि वो न सामान्य तरीके से खड़ा रह पाता है, न सो पाता है, न किसी सपने को पूरा कर पाता है। दूसरी तरफ एक मासूम बच्चा है, जिसके चेहरे पर इतनी गहरी विकृति है कि लोग उसकी तरफ देखते तो हैं, पर समझ नहीं पाते कि अंदर कितना दर्द छिपा है। उसकी माँ की आँखों में सिर्फ एक सवाल है — “क्या मेरे बच्चे को भी सामान्य जिंदगी जीने का अधिकार है?” ये दोनों तस्वीरें हमें याद दिलाती हैं कि भगवान ने कुछ को बहुत ज्यादा दर्द देकर इस धरती पर भेजा है। लेकिन उन्होंने हम सबको भी एक ताकत दी है — मदद करने की ताकत। क्या हम इतने असहाय हैं कि सिर्फ देखकर आगे बढ़ जाएँ? क्या इनकी कहानी सिर्फ सोशल मीडिया पर लाइक और रिएक्शन तक सीमित रह जाएगी? नहीं। हमें इनके लिए आवाज़ उठानी है। हमें इस पोस्ट को इतना शेयर करना है कि ये उन लोगों तक पहुँचे, जिनके पास इलाज कराने की शक्ति है, जिनके पास संसाधन हैं, जिनके पास दिल है। सोनू सूद जी, आपने कितनों की जिंदगी बचाई है। कृपया इनकी तरफ भी एक नजर डालिए। अनंत अंबानी जी, आपकी मदद से कितने गरीब मरीज ठीक हुए हैं। ये भी उसी कतार में खड़े हैं। अमिताभ बच्चन जी, आपका एक शब्द करोड़ों दिलों तक पहुँचता है। कृपया इनके दर्द को भी आवाज़ दीजिए। सलमान खान जी, आपने हमेशा कमजोरों का साथ दिया है। ये भी आपके सहयोग के हकदार हैं। ये लोग सिर्फ इलाज नहीं मांग रहे। ये सम्मान मांग रहे हैं। ये बेहतर जिंदगी जीने का अधिकार मांग रहे हैं। एक सामान्य बच्चा की तरह खेलने का, एक युवा की तरह सपने देखने का अधिकार। अगर आपका दिल भी थोड़ा सा भी हिल गया है, तो कृपया इस पोस्ट को शेयर कीजिए। जितना हो सके आगे भेजिए। किसी एक दिग्गज तक पहुँचा दीजिए। शायद आपकी एक शेयर इनकी पूरी जिंदगी बदल दे। HelpThemLive #HumanityFirst #MedicalHelpNeeded #SonuSoodHelp #AnandAmbaniHelp #AmitabhBachchanHelp #SalmanKhanHelp #एक_मदद_एक_जिंदगी #दर्द_की_पुकार #कृपया_मदद_कीजिए

Kanchan Dwivedi

55,077 görüntüleme • 5 gün önce

जिन गाँवों में पीडीए समाज के लोग अधिक हैं और उनमें भी मल्लाह जैसे समाज जिनके बीच PDA की नयी चेतना का प्रसार हो रहा है, वहाँ भाजपा सरकार पीडीए पाठशाला खुलने के डर से, अब सीधे ‘स्कूल बंदी’ नहीं करवा पा रही है तो सत्ता-सजातीय लोगों के द्वारा ‘टीचर’ न भेजकर झूठी हाज़िरी लगाने का दबाव प्रधानाध्यापकों पर बनवा रही है, ये भी स्कूल बंदी का ही एक और तरीक़ा है। ऐसे सत्ता पोषित उच्चाधिकारियों के दुर्व्यवहार से जो अंतहीन आक्रोश उपजता है वो अंतत: हिंसक भी हो उठता है। नाइंसाफ़ी या भ्रष्टाचार की अति की ही ये परिणति है। भाजपा ने शिक्षा का माहौल पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। पीडीए समाज के लोगों को शिक्षा से वंचित रखने की ये साज़िशें अब और नहीं चलनेवाली। भाजपा जाए तो स्कूल खिलखिलाए!

Akhilesh Yadav

283,910 görüntüleme • 1 yıl önce

💥 "पति एक्सीडेंट में मौत से बचा… पर अपनी ही पत्नी ने गला दबाकर ख़त्म करने की कोशिश कर दी – वो भी तीन आशिकों के लिए!" इस देश में, भाई, मर्द की ज़िंदगी अब CCTV और किस्मत पर चलती है। 498A, DV Act, maintenance तो था ही… अब पति के गले पर भी खतरा—सीधा अपने ही घर से। पत्नी को “सक्षम, स्वतंत्र, सशक्त” बताने वाले गैंग इस वीडियो पर भी चुप रहेंगे… क्योंकि यहाँ आरोपी महिला है और पीड़ित मर्द। यही है असली gender bias — जो हर रोज़ किसी न किसी घर में मर्द की सांसें घोंट रहा है। 📌 ये मामला सिर्फ घरेलू हिंसा नहीं— ये है मर्डर अटेम्प्ट। और हमारे कानून? महिला → तुरंत पीड़िता पुरुष → तुरंत दोषी अब बताइए—कब तक? #MenToo #StopMisuse #MaleVictim #JusticeForHusbands #mensright

ShoneeKapoor

267,157 görüntüleme • 10 ay önce

मैं OBC से आता हूं- मगर जो पार्टी आरक्षण हटाने की बात करेगी उसको ही वोट करेंगे अब आते हैं समीकरण और संख्या पर- साफ़ लिखूँगा जिसको समझ आये समझ लेना इस देश में हिन्दू सवर्ण- 32 से 35% है फिर आता है ओबीसी वो जातियां का समाज जिसमें जाट गुज्जर कुछ बनिया जाति जो कहीं सामन्य हैं कहीं ओबीसी जिस से सामन्य वर्ग का सामाजिक समरसता बहुत अच्छा है फिर है अतिपिछड़ी जातियां उनसे भी समान्य वर्ग सामजिक भाव बहुत अच्छा है और उन्हें आरक्षण का लाभ भी नहीं मिला फिर है दलित समाज जिनमे चंद जातियों को छोड़ कर किसी को कोई लाभ नहीं मिला ये नहीं कह रहा एक दिन मे सब साथ हो जाएंगे लेकिन हो जाएंगे ये पक्का है और सच कहूँ तो जातिगत आरक्षण कभी किसी जाति के लिए भी लाभदायक नहीं हो सकती ये बात भी लोगों को समझ आ जाएगी अब जिस सरकार में हिम्मत हो इतने बड़े वोट बैंक का विरोध करे तुम सामन्य का वर्ग का ही करो बस हमे वोट बैंक बन जाने दो हम भी देखते 35% सवर्णों के बिना किसकी सरकार बन जाती है

ब्राह्मण साहब 🚩🐯

11,019 görüntüleme • 1 ay önce

#मेरठ #उत्तरप्रदेश वीडियो गंगानगर मेरठ के होटल सैफरॉन का है, जहां पुलिस की छापेमारी में ये सारी लड़कियां पकड़ी जाती हैं, सबके साथ स्कूली बैग है, मुमकिन है कि ये घर से स्कूल के बहाने सीधे होटल गईं हों, इसमें एक हिजाबी मोहतरमा भी हैं, सोचिए अगर इन्हें कोई कुछ बोल दे तो इनके मां बाप फौरन उसके खिलाफ पुलिस केस करने पहुंच जाते हैं, आजकल मां बाप खुद अपनी बच्चियों को इस रास्ते पर जाने केलिए खामोश इजाज़त देते हैं, क्यूंकि रोकटोक न करना, सही गलत की तालीम न देना किसी के बताने और फिर इनके कारनामें सुनने के बाद उसकी तहकीक न करना सीधा साहबजादी को क्लीनचिट देकर सामने वाले को ही बुरा बना देना ही खामोश हिमायत है, आज स्कूल कॉलेज के नाम पर निकलने वाली लड़कियां होटल के कमरों में जाकर एंजॉय कर रही हैं मां बाप को लगता है कि लाडली पढ़ लिखकर कामयाब होकर वापस आएगी, और इधर इनकी एक्स्ट्रा क्लास चालू रहती है, किसी भी शहर के किसी भी होटल में आप जाकर देख लें सारे कमरे फुल रहते हैं, और हर होटल में मुस्लिम लड़कियां ज़रूर मिलेंगी, क्या हम वाकई अपने घरों में बच्चियों पर ध्यान देते हैं ? अगर हां तो फिर ये किस घर की लड़कियां हैं ?

AmjadASR 🌍

97,017 görüntüleme • 1 yıl önce

ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ, रोज ए अब्र ए शब ए माहताब में कभी कभी शायरी पढ़ता हूँ। जावेद अख्तर फेवरिट है, बशीर बद्र भी, और राहत इन्दोरी भी। ●● गालिब भी पढ़ता हूँ। पहली बार गालिब से परिचय जगजीत सिंह के एलबम के मार्फ़त हुआ। तब आधा समझे, और बाकी आधा गलत सलत ही रटते हुए गुनगुनाते थे। फिर एक किताब ली। दीवान ए गालिब... उसमे कठिन शब्दो के अर्थ दिए होते थे। अबकी ज्यादा समझा। और अनसुने कलाम को भी पढा। लेकिन शब्द समझने के बाद भी कई बार भाव, सिर के ऊपर से निकल जाता। ●● फिर गूगल युग आया। न सिर्फ शब्दार्थ, बल्कि भावार्थ भी मिल जाते। ग़ालिब की खासियत यह है, हर सिचुएशन को एक्सप्लेन कर जाते हैं, अनिवर्चनीय को कह जाते हैं। और जादू यह, कि उस बोल का अर्थ दूसरी बहुत सी सिचुएशन में लागू होता है। याने अपने हालात के मुताबिक हर पाठक के लिए अर्थ कुछ अलग है। हर एक के दिल की किसी जुदा तंत्रिका को वह शेर छूता है। और जुबान वाह कहना भी भूल जाती है। ●● अच्छा लेखन वही, कि आदमी खो जाये। उसके भीतर कुछ घुड़मुड़ाये। उसके लिए, शब्द समझ मे आने चाहिए, भाव हृदय में उतरना चाहिए। ग़ालिब के दौर में अधिसंख्य लोग उर्दू समझते होंगे। अब नही। वो ट्रेडिशन्स नही, जिसमे ग़ालिब के भाव फिट हों। जैसे कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का। तब जिन्हें शिकायत होती थी, वे कागज के वस्त्र पहनकर जाते थे शिकवा करने। अब वो ट्रेडिशन नही रही। तो कैसे समझेंगे की ग़ालिब कह रहे है- यहां हर शख्स कुछ न शिकवा लिए घूम रहा है। ●● इसके मुकाबले आप बशीर बद्र को पढिये। सीधी, साफ, समझ मे आने वाली खूबसूरत रूमानी शायरी है। जावेद को पढिये। एक मोहरे का सफर, नया हुक्मनामा, जो कहते सब डरते है, तू वो बात लिख... सीधा, सिम्पल, सटाक से दिल को लगने वाला। मगर इन सबसे ऊपर हैं- राहत इंदौरी। द किंग ऑफ सिम्पलीसिटी। हिम्मत, गुरुर, जज्बे का शायर। बशीर और जावेद का कॉंटॅक्स पूरा पेज या नज्म पढ़ने पर जाहिर होता है। यहां राहत, दो लाइन में आग लगा जाते हैं। गुलाब,ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता, इंतिज़ाम क्या क्या है ●● बड़े शायर, बड़े लेखक, शब्दो से नही खेलते। भाव से खेलते हैं। ये भाव, अनुभव से आपबीती से आते हैं। आपबीती न हो, तो सिंपथि से आते हैं, एम्पाथि से आते है, करुणा से उपजते हैं। यह करुणा, इंसान के हृदय को उर्वर बनाती है, ख्याल उपजते हैं। गैर की पीड़ा को, उसके दिल के हालात को, उसकी निगाह को अपने भीतर पैवस्त करना-फिर जहां को देखना जो दिखे, उसे गहरे, आसान लफ्जों में लिख देना। महान शायर और लेखक तो वही हुए, जिन्होंने आसान लफ्जों में गहरी बात कही- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहोगे?? यहां साहस है, चुनौती है, एक मजबूर, मजलूम बेवा की इल्तजा है पंच परमेश्वर से सवाल है। ●● आपमे सिंपथि नही, एम्पाथि नही, तो भाव कालजयी कैसे हो?? जब आपकी बात भीतर प्रेम न जगाए, शीतल न करे। चुनौती न दे, सवाल न हो, जो विद्रोह का साहस न जगाए... घृणा जगाये। जातीय, धार्मिक, सामुदायिक नफरत से लबरेज हो। लेखक का, शायर का दिल बंजर है, ईर्ष्या से भरा है। इस ज्वालामुखी के क्रेटर से कौन से भाव उगलेंगे?? ●● जलाने वाला मैग्मा ही निकलेगा। सस्ता साहित्य, घटिया कविता, बकवासी तुकबन्दी। पाकिस्तान से पर चढ़ाई और हिंदुस्तान की वाहवाही.. छपवा लो दस किताबें, मगर कालजयी कृति कैसे बनेगी भईया? खोखले चिकने शब्दों से कितना खेलोगे। अगर खूब सारे भारी भरकम शब्दो का जमावड़ा ही कालजयी साहित्य होता.. तो भार्गव की डिक्शनरी शेक्सपियर के साहित्य से बड़ी मानी जाती। ●● आज शब्दजाल वाले किसी उभरते लेखक से बकझक हुई। सो लिख दिया। समझने वाले समझ गए। जो न समझे उनके लिए अर्ज करता हूँ- जमी पर घर बनाया, मगर जन्नत में रहते है हमारी खुश नसीबी है, कि हम भारत मे रहते है अब आप इसे घटिया शेर मानते है तो आपकी शायरी की समझ है। अगर बेहतरीन शेर मानते है, तो पॉलिटिक्स की समझ है। अगर आप इसे शेर नही, अनहद पॉपुलिस्ट बकैती मानते है, तो अब आपको मेरी भी समझ है। ❤️

Manish Singh

29,882 görüntüleme • 1 yıl önce