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नरेंद्र मोदी देश के हेल्थ सिस्टम को लेकर गंभीर नहीं हैं
43,821 次观看 • 2 年前 •via X (Twitter)
8 条评论

कौन बालक बुद्धि आपके ट्वीट्स लिखता हैं? 🙄🙄 जब भारत यूपीए काल में पोलियो मुक्त हुआ, तब दुनिया के आख़री देशों में था 40 साल लगे पोलियो वैक्सीन भारत पहुंचने जब कारोना महामारी आ गई, भारत ने देसी वैक्सीन से दुनिया का सबसे बड़ा और फ़ास्टेस्ट टीकाकरण करवाया - वो भी भारतीय वैक्सीनेज़ के साथ ऊपर से, > 100 देशों को वैक्सीन भेजे 👍👍

पक्ष भी वही, विपक्ष भी वही... न्यायपालिका भी उनकी और न्याय करने वाले भी वही समाज बदला, राजनीती बदली लेकिन एक चीज जो है जो नहीं बदली है वो है इस देश में एक बड़ी आबादी SC-ST और OBC की इस देश में आजादी के 75 साल बाद भी प्रतिनिधित्व की हालत. पक्ष-विपक्ष, पत्रकार, एंकर, टीवी चैनल मालिक से लेकर अख़बार मालिक, न्यायपालिका से लेकर विधायिका तक एक क्षत्रप राज बस कुछ ही जातियों का है. पक्ष में नड्डा दिखेंगे तो विपक्ष में राहुल गाँधी से लेकर येचुरी साहब से होते हुए दीपांकर भट्टाचार्य तक सबके सब एक वर्ग-जाति से हैं. कोई दलित के लिए लड़ रहे हैं तो कोई संविधान के लिए तो कोई दलित-पिछड़े के हक के लिए लेकिन एक महत्वपूर्ण चीज गायब है वो है SC-ST व OBC जातियों की प्रतिनिधित्व. क्यूंकि सेना कोई भी हो सेनापति एक ही जाति के लोग होते हैं इस देश में जिसकी आबादी 3-4% है. शैक्षणिक संस्थान से लेकर फ़िल्मी, साहित्य से लेकर पत्रकारिता सब जगह एक ही लोग भरे हुए हैं. जातीय जनगणना से जो सबसे बड़ा डर है वो यही है कि भेद खुल जायेगा कि आजादी के इतने सालों बाद भी दलित-पिछड़े समाज के प्रतिनिधित्व पर डाका किसका है. देश में उच्च संस्थानों में जातिवाद इतने चरम पर है कि पिछले पांच सालों में 13 हजार से ज्यादा दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों ने आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों की पढ़ाई छोड़ दी. पढ़ाई छोड़ दी या छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, इसको देखने समझने की जरूरत है. कई हजार सीट SC-ST/OBC के खाली पड़े हुए हैं जिसे भरा नहीं जा रहा है जहाँ भरा जा रहा है वहां द्रोणाचार्य NFS से इस वर्ग के छात्रों का अंगूठा ही नहीं हाथ ही काट ले रहे हैं. हाल ये है कि सरकार के मंत्री सब को पत्र लिखना पड़ रहा है. थ्योरी में अच्छे नंबर लेने वालों को भी प्रैक्टिकल में फेल कर दिया जाता है. उच्च शिक्षा के संस्थानों में करीब 98 फीसदी प्रोफेसर और 90 फीसदी से ज्यादा सहायक प्रोफेसर तथाकथित उच्च वर्ग से संबंधित हैं. घरों और समाज की कड़ी ट्रेनिंग से गुजरे ये लोग, वास्तविक न्याय को कितना समझते होंगे ? आबादी का बहुत छोटा हिस्सा होते हुए भी इनका इतना भारी बहुमत भी इनके हौसलों को और बढ़ाता होगा. तभी तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले दलित, पिछड़े और आदिवासी भले ही अपनी वांछित संख्या से कम हों पर आत्महत्या करने वालों में इनकी संख्या करीब 56 फीसदी है. कांग्रेस-भाजपा या ऐसी कोई भी पार्टी है जो सवर्णों के हाथों में है वो बात तो करती है रिप्रजेंटेशन देने की लेकिन सबका हाल एक ही है. कुछ दलित-पिछड़ों को मौका भी देते हैं तो उनकी हालत दूम हिलाने से ज्यादा शक्ति की नहीं है. लोकतंत्र में आबादी और वोट मालिक होते हैं लेकिन सवाल है जिस समाज की आबादी 85-90 % हो जमूरा का बंदर बना हुआ है कारण है मानसिक गुलामी. आर्थिक गुलामी कोई बड़ी बात नहीं है सबसे बड़ी गुलामी आपको मानसिक रूप से बनाता है. हमारी सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि अध्यापकों के 11 हज़ार से ज्यादा पद खाली हैं. 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से सिर्फ 33 में एससी/एसटी श्रेणी में अध्यापकों के 1,097 पदों को भरा जाना था लेकिन सिर्फ 212 को ही भरा गया. 33 विश्वविद्यालयों में से 18 में तो इस श्रेणी से एक भी पद नहीं भरा गया. ऐसा होना और होते रहना, अपने हक़ को रोज रोज मरते देखने वाली आबादी के इस हिस्से की निराशा और हताशा धकेलेगा और इसके मुकाबले तथाकथित उच्च जातियों में घमंड और दबंग होने को भी तो उभारता है. जातीय भेदभाव और उत्पीड़न को हमने संस्थागत रूप देकर सामान्यकरण कर दिया है. एम्स के बारे में एक समिति के अध्ययन से पता चला कि दलित पिछड़े और आदिवासी छात्रों को बार-बार बेवजह फेल कर दिया जाता है. जबतक सक-ST और OBC समाज के लोग वोट की ताकत नहीं समझेंगे तब तक जमूरों के इशारों पर नाचना ही पड़ेगा. #RepresentationMatters

फार्मा का प्रोपगंडा लेकर तो कांग्रेस अपना मुँह न ही खोले तो अच्छा है ! जिस तरह से कोविड वैक्सीन को भारत में लाने की मुहीम चलाई थी ये जानते हुए की फ़ाइज़र के टेस्टिंग नतीजे सफल नहीं हैं, @INCIndia तो करोड़ों और की जान ले लेती ! बस कमीशन आता रहे, देशवासी जाएं भाड़ में !

बिलकुल सही कहा साहब

बहुत दिनों से एंटोनियो काकी गुप्त रोग इलाज के नाम अमरीका नहीं गई, बोले तो हेल्थ सिस्टम ठीक ही होगा

एक ऐसा जमाना हुआ करता था जब कांग्रेस सरकार में थे तब लोग इलाज नहीं करा पाते थे चुकी सरकार सहयोग नहीं करता था कितना मरीज दम तोड़ देते थे लेकिन आज भारत सरकार ने ₹500000 आर्थिक मदद इलाज के दौरान देता है इससे करोड़ों लोगों की जान बची है। कांग्रेस ने गरीब मरीजों को एक भी रुपया मदद नहीं करता था औ आज भारत सरकार को कहते हैं कि हेल्थ सिस्टम पर इनका ध्यान नहीं है इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है ? भगवान कांग्रेस को सद्बुद्धि दे।

अच्छा, पर में नही मानता.....

मोदी जी नहीं होते तो भारत ही नहीं दुनिया की आधी आबादी कम हो जाती
