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पत्रकार: आप कहते है कि आपकी पार्टी गरीबो की पार्टी है लेकिन आपका लखनऊ में जो पार्टी दफ्तर है वह फाइव स्टार होटल जैसा लगता है। स्वर्गीय नेता जी: अब समाजवाद का मतलब ये तो नहीं कि गंदगी रखनी चाहिए अगर साफ सुथरा बना दिया है। तो क्या बुरा...

12,083 次观看 • 3 个月前 •via X (Twitter)

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अब एक फर्जी लीजेंड लटकन उर्फ चरसी सपा प्रमुख अखिलेश यादव जी को सलाह देगा कि क्या करना है क्या नहीं क्या अखिलेश यादव जी इसी चरसी की सलाह से पांच सांसद से 37 सांसद वाली पार्टी बनाए हैं? यह सवाल हम सभी के मन में जरूर आना चाहिए अखिलेश यादव जी की रणनीति और राजनीति समझ पर सवाल उठाना ही बेवकूफी है लेकिन यह फर्जी लीजेंड लटकन और चरसी जुमलेबाज पार्टी से मलाई चाट कर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव जी को समय-समय पर टारगेट करता रहता है। यह दिखावा ऐसा करता है कि यह समाजवादी पार्टी के समर्थन में है, सच्चाई यह है यह अंदर ही अंदर जुमलेबाज पार्टी से मलाई चाटता है अखिलेश यादव जी और समाजवादी पार्टी को समय-समय पर टारगेट करने के इसको पैसे मिलते हैं?, आप खुद ही सोचिए जो व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर कह चुका हो समाजवादी पार्टी कल खत्म होती है तो आज हो जाए मेरी फेवरेट पार्टी बीजेपी है क्या उसे पार्टी की चिंता होगी? सच्चाई यह है इसे सिर्फ अखिलेश जी को टारगेट करना है बस और कुछ नहीं समाजवादी पार्टी के लोगों को ऐसे चरसी लोगों से सावधान रहना चाहिए।

MANISH YADAV लालू

63,092 次观看 • 4 个月前

भजन लाल जी चुन मांगो...... #First_Grade_स्थगित_करो की मांग की बात करने वाले एक छात्र ने ये नारा लगाया.... ये व्यक्तिगत नारेबाजी गलत है.... हालांकि आंदोलन का नेतत्व करने वाले Manoj Meena ने ये नारा नहीं लगाया है.. देख लीजिए..... लेकिन जो लोग इस नारे पर जातिवादी रंग दे रहे है... वो भी गलत है.... मेरा तो मानना है जातिवाद से देश को नुकसान होता है....जातिवादी रंग छोटी सी बात पर नहीं देना चाहिए... #First_Grade_स्थगित_करो की माँग करने वाले छात्र हर समाज से है.... हालांकि एक बच्चे ने गलती इस ये नारा लगा दिया तो पूरा आंदोलन गलत नहीं है.... लोकतंत्र में सभी को विरोध करने का अधिकार है..... हालांकि छात्रों के मामले में कुछ गलती मुख्यमंत्री जी की भी है.... वो किसी भी आंदोलन करने वाले छात्रों के डिलीगेट से कभी मुलाक़ात नहीं करते है... लगता है किसी उनको गलत सुझाव दे रखा है.... विरोध करने वालों से मत मिलो...अगर आप एक से मिलोगे तो फिर ज्यादा लोग करेंगे... ऐसा कभी नहीं होता है... मुख्यमंत्री को सभी से मिलना चाहिए... मुख्यमंत्री जी आपके इस व्यवहार से आपकी छवि खराब हो रही है... लोग कहते है... मुख्यमंत्री जी घमंडी है..... मुझे एक आंदोलन करने वाले ने कहा मैंने कई बार समय मांगा मुझे मुख्यमंत्री जी के वहां समय नहीं मिला... उसने कहा घमंड तो रावण का भी नहीं चला तो इनका कैसे चलेगा! मैने कहा वो खुद ऐसे नहीं है..... मुझे लगता है भजन लाल जी को अपने व्यवहार और कार्यशैली में बदलाव लाना चाहिए... अभी उपयुक्त समय है... ये समय दुबारा नहीं आएगा..... सभी वर्गो की पीड़ा सुननी चाहिए.... सभी से मिलना चाहिए.... और अगर पॉसिबल हो तो मदद करनी चाहिए.... Bhajanlal Sharma CMO Rajasthan PMO India

Jitesh Jethanandani

44,341 次观看 • 1 年前

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 次观看 • 5 个月前