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प्रेम के बदले प्रेम देना संभव ना हो तो सम्मान देकर विदा कर दें.. तिरस्कार खोखले लोग करते हैं...!!

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तुम लौटाने को तो लौटा ही सकते थे अंजुलि भर प्रेम पर तुमने लौटाई अथाह पीड़ा ... तुम्हारे दिए को क्यों मैं नियति का किया फैसला समझूँ जबकि फैसलें को बदलने की पूरी ताकत रखते थे तुम... किसने दी तुम्हें ये मंत्रणा की अथाह प्रेम के बदले लौटाई जाती है अथाह पीड़ा समूचे ह्रदय के बदले लौटाए जातें हैं खंडित अंश और आलिंगन के बदले लौटाए जातें हैं ह्रदय पर प्रहार किसने सिखाया की प्रेम प्राप्ति के स्रोत को लबरेज कर दो घृणा से .. कोमल ह्रदय में बो दो विरह के शूल वस्ल से पहले ही सबसे निर्मल मन को कुचल दो निर्ममता से सबसे निश्छल व्यक्ति को छल लो क्रूरता से मैंने तो प्रेम सौंपा था ना हथेलियों में तुम्हारी ? फिर मेरी हथेलियों की लकीरों में क्यों भर गई रूदन ? क्यों आंखे लाल है मेरी , एक लहू सा रिसता है इनसे क्यों साँसे इतनी ठहर कर आती हैं क्यों जड़ हो जाती हूँ मैं तुम्हें सोच भर लेने से प्रेम तो सुख देता है ना ? फिर भयाकुल क्यों हूँ मैं तुम्हें खो देने से । क्यों तुम्हारे किए को नियति का नाम दे दूं क्यों अपराध से तुम्हें मुक्ति ? क्यों दोषी कहने से डरती हूँ तुम्हें ? महज इसलिए कि प्रेम करती हूँ तुमसे ( माफ करना , प्रेम किया “ था ” तुमसे ) क्या प्रेम करने की पहली शर्त दोष ना देना है ? या दोष देना प्रेम को निरर्थक कर देता है खैर क्यों उलझू मैं इनमें तुम्हारे दिए हर दुख के लिए क्यों शुक्रगुजार रहूं मैं गलत को गलत सही को सही कहना क्यों ना सीख लूँ मैं सीख लूँ तुमसे ज़माने भर की चालाकियां भर दूं फिजाओं में फरेब ओढ़ लूं अफसुर्दगी की चादर सिरे से नकार दूँ तुम्हारे होने का वजूद ठुकरा दूँ तुमसे मोहब्बत के प्रस्ताव और आश्वस्त होकर घुल जाऊं दीमकों की तरह अपनी किताबों में , अपनी ज़िंदगी में

तृप्त ...🖤

15,293 Aufrufe • vor 1 Jahr