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“फ़ितूर होता है हर उम्र में जुदा जुदा, खिलौने, माशूका, रुतबा औऱ ख़ुदा।”

21,503 次观看 • 3 个月前 •via X (Twitter)

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देखिये जन्मदिन पर भी वहशीपन की पराकाष्ठा का स्तर.. खुशी मनाने का ये कैसा तरीका है...? यदि काफिर का सर तन से जुदा करने का दाव न लगे तो खिलौने का ही सही... ठीक से खड़ा नहीं हुआ जा रहा.... हाथ कांप रहे हैं... कब्र में जाने की उम्र में भी इंसानी खिलौने के सर को धड़ से अलग कर अपना जन्मदिन मनाते इस कट्टर इस्लामिक दोगले जावेद अख्तर को ही देखिए...! ये असुर प्रजाति है ही ऐसी, "सर तन और सर धड़ से जुदा" करना हर मोमीन का सबसे बड़ा ख्वाब होता है, जिसे किसी न किसी तरह पूरा करने में वो जिंदगी भर लगा रहता है... जिनको मुगालता है वो ये जान लें कि... क्या ये पढ़े लिखा नहीं है...? क्या ये संपन्न वर्ग से नहीं है...? क्या बुद्धिजीवी समझे जाने वाले ऐसे लोगों की गिनती देश के एलीट वर्ग में नही होती...? फिर भी इन लोगों को आत्मीय खुशी कैसे कर्मों से मिलती है...? काफ़िर(हिंदू) न सही..., आत्म संतुष्टि के लिए खिलौने का गला रेतकर ही सही, बस धड से जुदा करके ही इन्हें पूर्ण सुख और तृप्ति मिलती है... और इस वहशीपने पर खिलखिलातीं इन सुपर्णखाओं को देखिए...
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देखिये जन्मदिन पर भी वहशीपन की पराकाष्ठा का स्तर.. खुशी मनाने का ये कैसा तरीका है...? यदि काफिर का सर तन से जुदा करने का दाव न लगे तो खिलौने का ही सही... ठीक से खड़ा नहीं हुआ जा रहा.... हाथ कांप रहे हैं... कब्र में जाने की उम्र में भी इंसानी खिलौने के सर को धड़ से अलग कर अपना जन्मदिन मनाते इस कट्टर इस्लामिक दोगले जावेद अख्तर को ही देखिए...! ये असुर प्रजाति है ही ऐसी, "सर तन और सर धड़ से जुदा" करना हर मोमीन का सबसे बड़ा ख्वाब होता है, जिसे किसी न किसी तरह पूरा करने में वो जिंदगी भर लगा रहता है... जिनको मुगालता है वो ये जान लें कि... क्या ये पढ़े लिखा नहीं है...? क्या ये संपन्न वर्ग से नहीं है...? क्या बुद्धिजीवी समझे जाने वाले ऐसे लोगों की गिनती देश के एलीट वर्ग में नही होती...? फिर भी इन लोगों को आत्मीय खुशी कैसे कर्मों से मिलती है...? काफ़िर(हिंदू) न सही..., आत्म संतुष्टि के लिए खिलौने का गला रेतकर ही सही, बस धड से जुदा करके ही इन्हें पूर्ण सुख और तृप्ति मिलती है... और इस वहशीपने पर खिलखिलातीं इन सुपर्णखाओं को देखिए...

Yogi Devnath 🇮🇳

145,895 次观看 • 1 年前

विराट कोहली क्यों अध्यातमिक बन रहे हैं ? इसको bahut सुंदर तरीके से समझाया है डॉ विकास Divyakirti जी ने !! "फितूर होता है हर उम्र में जुदा जुदा .. खिलौने,माशूका ,रुतबा और फिर .. खुदा.!" पूरा संवाद ! "जिंदगी में फेजिस आते हैं। शुरू में आप सुखों के पीछे भागते हैं, अंधेरों के भागते हैं, कि मुझे ये खाना है, ये पीना है, सेक्स चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए। ये सब चीज़ें बहुत एट्रेक्ट करती हैं कुछ समय के लिए, लेकिन जब आप इससे बाहर निकलते हैं, आपको गिल्ट नहीं तो कम से कम यह लगता है कि इतना क्यों पागल हो गए थे इसके पीछे। धीरे धीरे आप नैतिक जीवन की ओर बढ़ते हैं। फिर नैतिक जीवन से भी ऊब होने लगते हैं, फिर आप स्पिरिच्वल लाइफ की ओर बढ़ते हैं।" तो आपके खिलोने की उमर चली गई है, माशूका आप कह रहे हैं कि एक बार ब्रेक अप हो गया है। एक बार नहीं, जाधा बार हो गया है। मुल्टिपल ब्रेक अप्स हो गया है। रुत्बा आपके पास है ही, तो बस ता खुदा ही है। सिरे सी बात है कि अब आपके मन में वही चीज आएगी। प्रेम के बाद होता है एस्ट्रीम, इज्जत , रुत्बा, जो आपको बहुत जल्दी मिल गया, कई लोगों को ता उम्र नहीं मिल पाता है, किसी को लेट मिलता है। जब इज्जत भी मिल गई, प्रेम भी मिल गया, सेफ़्टी भी है, पेट भरा हुआ है, तो जो नीट पैदा होती है, उसको सेल्फ एक्शुलाइजेशन बोलते हैं, जिसको गीता की भाषा में कहें स्वधर्म, कि मैं किस चीज के लिए पैदा हूँ."

Khari Baat

36,803 次观看 • 1 年前