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बिलासपुर तरुण साहू नाम के शख़्स ने CG Housing And Infrastructure Development Board में रिसेल में एक EWS फ्लैट खरीदा युवक का कहना है कि एक साल से ज़्यादा हो गए उसे अब तक नामांतरण के दस्तावेज नहीं मिले, जब मांगने जाओ विभाग कहता है फाइल खोज रहे हैं।...

31,576 views • 5 months ago •via X (Twitter)

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"बादाम खाओ, फाइल ढूंढो.." छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक अजीब मामला सामने आया है। युवक ने करीब एक साल पहले फ्लैट खरीदा और उसकी विधिवत रजिस्ट्री करवाई। रजिस्ट्री के बाद नामांतरण के लिए उसने अपने सभी जरूरी दस्तावेजों की कॉपी अभिलाषा परिसर, तिफरा स्थित कार्यालय में पूनम बंजारे मैडम के पास जमा की। इसके बाद युवक जब भी नामांतरण की फाइल लेने हाउसिंग बोर्ड कार्यालय जाता है, तो पिछले एक साल से उसे यही जवाब मिल रहा है कि उसकी फाइल नहीं मिल रही, यानी "फाइल खो गई है" कहकर उसे लगातार टाला जा रहा है। लगातार चक्कर काटने से परेशान होकर युवक ने अनोखा तरीका अपनाया। वह 500 ग्राम बादाम लेकर कार्यालय पहुंचा और मैडम को देते हुए तंज कसा कि इसे खाने से उनकी याददाश्त तेज हो जाएगी और शायद उन्हें याद आ जाए कि उसकी फाइल कहां रखी है।

खुरपेंच बुंदेलखंड

121,036 views • 5 months ago

#MyModiStory अपनी हर बैठक में प्रधानमंत्री मोदी जी ऐसे सुझाव देते हैं जो न सिर्फ़ उपयोगी होते हैं, बल्कि उनकी समय से आगे की सोच को भी दर्शाता है। जब मैं सड़क परिवहन राज्य मंत्री था, तब मुझे उनके ऐसे ही पहलुओं को करीब से जानने का मौका मिला। मुझे याद है एक चर्चा राष्ट्रीय राजमार्गों पर हो रही थी और उस दौरान मोदी जी ने एक बहुत गहरी बात कही कि “सड़कें और राजमार्ग केवल आवाजाही का साधन नहीं हैं, ये तो समृद्धि की जीवनरेखा हैं।” उन्होंने इसे एक साधारण लेकिन बेहद प्रभावशाली उदाहरण से समझाया था कि “एक किसान खेत में फसल उगाता है। अगर पास में सड़क है तो वह समय पर अपनी उपज मंडी तक पहुँचा सकता है। लेकिन अगर सड़क दूर है, खासकर जल्द खराब होने वाली चीज़ों के मामले में, तो देर होने से पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।” मोदी जी ने आगे कहा कि “अगर सड़क किसान के गाँव तक पहुँचती है तो वह आसानी से सब्ज़ियाँ खेत से गाँव की सड़क तक ला सकता है और वहाँ से हाईवे पकड़कर ज़िले की मंडी तक पहुँच सकता है। लेकिन अगर गाँव से 5 किलोमीटर तक सड़क ही न हो, तो किसान को भारी परेशानी होगी। समय पर उपज बाज़ार में न पहुँचने से उसे सही दाम नहीं मिलेगा और उसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ेगा।” उनकी हर नीति में जनकल्याण की नीयत जो झलकती है, वही मोदी जी की सबसे बड़ी विशेषता है। Modi Story

Dr Mansukh Mandaviya

25,126 views • 1 year ago

धौलपुर में ये हैं कानून व्यवस्था के हाल... सप्ताह भर पहले गौरव पथ पर दो गाड़ियों में भरकर 15-16 लड़के आते हैं और एक युवक पर टूट पड़ते हैं। उसे बहुत बुरी तरह पीटा जाता है। अगर कोई बहुत बलिष्ठ हो, तब भी 15-16 लड़कों का अकेले मुकाबला तो नहीं किया जा सकता। ऊपर से उसे यह भी पता नहीं हो कि हमला करने वाले कौन हैं और हमला किया क्यों गया है? क्योंकि उस युवक की किसी से कोई दुश्मनी तक नहीं है। पुलिस में शिकायत होती है लेकिन एक सप्ताह बाद तक भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। क्या धौलपुर में बदमाशों के हौसले इस कदर बुलंद सिर्फ इसलिए हैं कि उन्हें पुलिस पर पूरा भरोसा है कि वह कोई कार्रवाई नहीं करेगी? ये हालात बदलने चाहिए। पुलिस का सिस्टम ऐसा मजबूत होता है कि वह चाहे तो 24 घंटे में सारे बदमाशों की परेड गौरव पथ पर ही निकाल सकती है। नहीं चाहे तो फिर कोई उपाय नहीं है। मैं यहां बैठकर उम्मीद कर रहा हूं कि 24 घंटे में बदमाशों की परेड का वीडियो धौलपुर पुलिस जारी करेगी। Dholpur Police Bharatpur Range Police Kailash Chandra Bishnoi IPS Rajasthan Police

Arvind Chotia

29,567 views • 1 year ago

अगर "The Kashmir Files" में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार दिखाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, तो "Satluj" में पंजाब के उस दौर की घटनाओं को दिखाना गलत कैसे हो गया? जब किसी फिल्म में ऐसे मामले दिखाए जाते हैं जिनकी जांच Central Bureau of Investigation ने की हो और जिनमें Supreme Court of India ने भी दोषियों की सज़ा बरकरार रखी हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर वही तथ्य पर्दे पर दिखाए जाएँ तो उनसे डर किसे है? इंसानी स्वभाव यही है कि जो सच हमारे पक्ष में हो उसे इतिहास कहा जाता है, और जो सच असहज करे उसे विवाद बना दिया जाता है। लेकिन सच को छिपाने से वह मिटता नहीं, बल्कि लोगों के मन में और बड़े सवाल छोड़ जाता है। अगर फिल्म में तथ्य गलत हैं तो उनका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। लेकिन अगर एक फिल्म को बिना खुली बहस के हटा दिया जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान सच जानने के अधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी का होता है। समझ नहीं आया कि सतलुज फिल्म चलने से किसको नुकसान होता और किसको फायदा होता? किसने हटवाई होगी यह फिल्म? #punjab95 #Satluj

जाट समाज

74,715 views • 2 months ago

पूरे फंस गए मंत्री जी.... आप सरकार के प्रतिनिधि हैं और बाड़मेर जिले के प्रभारी है तो सवाल जायज है बाड़मेर का जिला अस्पताल जो मेडिकल कॉलेज से संबंधित है इससे बड़ी दुर्गति क्या होगी कि इस अस्पताल में ना सोनोग्राफी की मशीन है और ना ही सीटी स्कैन की सुविधा पिछले 2 साल से पूरे जिले की जनता परेशान हो रही है प्रभावशाली नेता छोटे-छोटे काम के टेंडर लेकर के मोटी कमाई कर रहे हैं लेकिन गरीब जनता की सुनने वाला कोई नहीं है जब नेताओं से सवाल पूछा जाता है तो एक ही जवाब मिलता है फाइल प्रक्रिया में है जल्द ही काम हो जाएगा हाल ही में बाड़मेर में 100 करोड़ से ज्यादा डीएमएफटी का फंड रिलीज हुआ है लेकिन उसका एक भी पैसा जिला अस्पताल में नहीं लगा है इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। मंत्री जी अब तक तो सिर्फ मीडिया सवाल कर रही है कहीं ऐसा नहीं हो कि आप किसी कार्यक्रम में जाएं और आम पब्लिक आपसे इस प्रकार कड़े सवाल दागे और आपकी बोलती बंद होकर आप वहां से रवाना हो जाए यही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं है जब आप पब्लिक के सामने जाने से कतराएंगे।

Ashok Shera

16,394 views • 10 months ago

ऐसी घटना पहले नहीं देखी होगी, उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष पद से 26 अक्टूबर को रिटायर हुए जगमोहन राणा ने आज भी हरिद्वार ऑफिस पहुँचकर कामकाज किया।संवैधानिक संस्था को मज़ाक़ बना दिया। एक रिटायर व्यक्ति कैसे आयोग के ऑफिस में अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ सकता है ? आपराधिक मुक़दमा बनता है। कार्मिक विभाग का कहना है कि संविधान में आयोग में एक्सटेंशन की व्यवस्था का नियम नहीं है, कार्यवाहक अध्यक्ष के लिए फाइल राजभवन गई है ,,और जब पत्रकारों ने पूछा तो एक आयोग के अध्यक्ष रह चुके राणा का जवाब सुनिए, आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि सरकारी नौकरियों में प्रदेश के युवाओं की उम्र क्यों निकल रही है ? भर्ती समय से क्यों नहीं हो रही है ?

Ajit Singh Rathi

86,084 views • 2 years ago

सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी ही तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक टोल कर्मियों से यह कहता दिख रहा है कि टोल मत काटना भाई, 15 सैकंड से ज्यादा हो गए हैं। इस पर टोल कर्मी युवक से कहता सुनाई दे रहा ऐसा कोई रूल ही नहीं है. क्या हैं टोल पर फ्री एंट्री के नियम? यदि आपको किसी टोल प्लाजा पर 10 सैकंड से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है तो आप बिना टोल दिए जा सकते हैं. 100 मीटर का नियम :- अगर किसी टोल प्लाजा पर वाहनों की लाइन 100 मीटर से अधिक है तो आपको टोल टैक्स नहीं देना होगा. 60 किलोमीटर का नियम:- अगर आपने 60 किलोमीटर के अंदर किसी राजमार्ग या किसी एक्सप्रेसवे पर टैक्स दिया होता है तो आपको टोल नहीं देना होता. 20 किलोमीटर :- अगर आपका वाहन ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GPS) होता है तो कुछ राज्यमार्गों और एक्सप्रेसवे पर आपका 20 किलोमीटर तक का सफर फ्री हो सकता है। क्यों देना पड़ता है टोल टैक्स? अगर कोई वाहन चालक अपने तीन पहिया, चार पहिया और भारी व्यावसायिक वाहनों के साथ एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवेश करता है तो उसे एनएच और एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करने के लिए टोल देना होता है. सरकार टोल के पैसों से नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे का रखरखाव करती है और सड़कों का निर्माण कराती हैं.

Arvind Sharma

79,108 views • 1 year ago

जहां तक नेहरू जी की बात है तो आज माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी ने जो बात बोली है कि अक्टूबर 1937 को अगर मोहम्मद अली जिन्ना ने ऑब्जेक्शन लिखा और नेहरू ने 20 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस जी को पत्र लिखा और 26 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस ने वंदे मातरम को काट दिया अगर कोई इस बिंदु का तथ्यों पर खंडन कर सके तो करे। हकीकत यह है कि हम किसी का कद छोटा नहीं कर रहे, कद के सामने बना पर्दा हटा रहे हैं। अब जनता खुद देख सकती है कौन किसका कद क्या था। और एक बात और वंदे मातरम के विषय में माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो कहा, कट्टरपंथियों के आगे झुकने का अंजाम बहुत बुरा होता है। 1937 में वंदे मातरम कटा, 1947 में देश कट गया। और आज कांग्रेस के नेता गौरव गोगोई के मुँह से एक सच अनायास निकल गया जब उन्होंने कहा कि 24 जनवरी 1950 को मुस्लिम लीग ने वन्देमातरम के विरोध किया परन्तु कांग्रेस ने उसे नहीं माना। यानी अब यह बात साफ़ हो गई कि कांग्रेस जो कहती थी कि मुस्लिम लीग 1947 के बाद ख़त्म हो गयी और ये आज भारत की मुस्लिम लीग अलग है। अगर यह सच है तो फिर ये जनवरी 1950 को मुस्लिम लीग कहाँ से आ गई ? अब यह बात साफ़ हो गई है ये वही मुस्लिम लीग है जो आज़ादी से पहले थी बस ऊपर से एक नया लबादा ओढ़ लिया है और कांग्रेस उसके साथ INDI गठबंधन में गलबहियां करकर खड़ी है #VandeMataram150

Dr. Sudhanshu Trivedi

17,474 views • 9 months ago

मंदिर के सामने मुस्लिम युवक बेचता है फूल, कुछ लोग उसे हटाने की कोशिश कर रहे, समाजसेवी मनीष चौधरी आए समर्थन में… खबर उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से है। मुजफ्फरनगर शहर में शिव चौक पर समीर नामी एक शख्स फूल बेचता है। उनके बेचे हुए बेचे फूल मंदिर में विराजमान देवी-देवताओं की मूर्तियों पर चढाए जाते हैं। समीर का कहना है कि कई रोज़ से कुछ युवक आकर उसे उसकी दुकान हटाने के लिए कह रहे हैं, उसे उसके मुसलमान होने की वजह से परेशान कर रहे हैं। समीर अपने परिवार तीसरी पीढी का युवक है, जो इसी जगह पर अपने पुश्तैनी दुकान को सँभाल रहा है। वह हर सुबह अपनी साइकिल पर फूल रखकर लाता है, और उन्हें बेचता है। लेकिन अब उसके साथ बदतमीज़ी की जा रही है, विडंबना यह है कि यह बदतमीज़ी उसके धर्म की वजह से की जा रही है। समीर ने मुजफ्फरनगर के समाजसेवी मनीष चौधरी से मिलकर बताया कि उनके दादा और पिता बीते 40 वर्षों से शिव चौक पर साइकिल के सहारे फूल और माला बेचते आ रहे हैं। समीर का कहना है कि अब जब उनके पिता बुजुर्ग हो गए हैं, तो वह खुद यह काम संभाल रहे हैं। लेकिन कुछ समय से कुछ लोग उन्हें दुकान लगाने से रोक रहे हैं और वहां से हट जाने के लिए दबाव बना रहे हैं। समीर ने बताया कि उनकी दुकान पक्की नहीं है, वो केवल एक साइकिल पर बैठकर फूल बेचते हैं। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि उन्हें धर्म और नाम पूछकर वहां से हटने के लिए कहा जा रहा है। समीर का कहना है कि यह रोज़गार उनका पारिवारिक पेशा है, जिससे उनका गुजारा होता है। मनीष चौधरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “हम सिर्फ यह चाहते हैं कि समीर और उनके जैसे अन्य लोग, जो वर्षों से मेहनत से रोज़गार कर रहे हैं, उन्हें बिना किसी भेदभाव के काम करने दिया जाए। रोज़गार सबका अधिकार है, और किसी का नाम या धर्म पूछकर उसे काम से हटाना न संविधान की भावना के अनुरूप है, न ही इंसानियत के।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि समीर या उनके पिता के साथ जबरदस्ती की गई तो वे अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर शिव चौक पर शांतिपूर्ण धरना देंगे। इसके अलावा उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि पीड़ित की बात सुनी जाए और सुरक्षा दी जाए। रिपोर्ट : Wasim Akram Tyagi

Ashraf Hussain

16,367 views • 1 year ago

12 साल में एक बार आने वाला आस्था का महापर्व है महाकुंभ. हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति से परिपूर्ण आध्यात्म का महासंगम है कुंभ इसीलिए जो प्रयागराज में श्रद्धालुओं के साथ हो रहा है वो देखकर मन व्यथित है, दुखी है. कहाँ कहाँ से श्रद्धालु पैसा जोड़कर कुंभ में स्नान करने इस पर्व का हिस्सा बनने आए हैं दो व्यक्तियों के चेहरा चमकाने की सनक का ख़ामियाज़ा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है. विज्ञापन की चकाचौंध तो ऐसी थी कि श्रद्धालुओं को लगा की व्यवस्था बहुत चकाचक है. कहा गया था की लोगों के ठहरने, उनके आवागमन का उचित प्रबंध किया गया है लेकिन जो भयावह तस्वीरें और वीडियो अब सामने आ रहे हैं उसको देखकर तो यही लगता है कि सरकार और प्रशासन नाम की कोई चीज़ ही नहीं है उत्तर प्रदेश में. और रेल मंत्रालय पर तो ताला ही पड़ गया है एक नहीं ऐसे हज़ारों वाक़ये सामने आए हैं जहाँ पर मीलों लंबे जाम में फँसे लोग पंद्रह बीस घंटे बसों में और गाड़ियों में बैठने को मजबूर हैं. ना उनके पास कुछ खाने को है ना पीने का पानी है. वो धूप से और भूख से बदहाल हैं रेल मंत्री को रील बनाने से फुर्सत नहीं है इसीलिए रेल मंत्रालय का यह हाल है कि प्रयागराज आने जाने के लिए ढंग की ट्रेन तक नहीं चल पा रहीं हैं ट्रेनों की ये हालत देख कर घबराहट हो रही है. आज सुबह ही एक वीडियो देखा, एक के ऊपर एक लदे हुए लोग सिर्फ़ इस आशा में कि शायद वो घर पहुँच जाएँगे. एक और वीडियो में AC कोच की खिड़की पर लगा शीशा ही टूट गया. एक बार को सोचिए अगर आप वहाँ होते तो आप और आपके परिवार पर क्या बीतती? सरकार तो जैसे लुप्त हो गई है, पुलिस प्रशासन लापता है. लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है. लोगों को अव्यवस्था से और कुप्रबंधन से जूझने के लिए मजबूर कर दिया गया है उत्तर प्रदेश में विश्व का सबसे वृहद लोगों का महासंगम होने का दावा ब्रांडिंग के लिए तो खूब किया गया लेकिन व्यवस्था के नाम पर ढेले भर का काम नहीं हुआ. जो लोग ड्रोन से चीज़ों का पता लगा लेने की देंगे हांकते थे वो आज भी मृत लोगों की सूची और संख्या जारी नहीं कर पाये एक आम श्रद्धालु की अपनी सरकार से आख़िर क्या अपेक्षा हो सकती है - यही कि आने जाने की उचित व्यवस्था हो, ठहरने का इंतज़ाम हो और सड़कों पर ट्रैफिक संचालन का प्रबंध हो - पर शायद यह आशा करना भी बेमानी है

Supriya Shrinate

87,464 views • 1 year ago

काजल के लिए इसे पढ़िए। और अगर कुछ कर सकते हैं, तो उस परिवार की मदद कीजिए। सॉल्ट इतना बड़ा प्लेटफ़ॉर्म नहीं है कि अकेले काजल को न्याय दिला सके। इसमें समाज के हर ज़िम्मेदार नागरिक की भागीदारी ज़रूरी है। अगर आप काजल की आवाज़ नहीं बन सकते, तो कम से कम समाज की बात करना छोड़ दीजिए। मैं X (पूर्व में ट्विटर) पर देख रहा हूँ पूरी कहानी सामने है, फिर भी न कोई बड़ा मीडिया संस्थान आवाज़ उठा रहा है, न कोई बुद्धिजीवी, न कोई प्रभावशाली शख्स। सब खामोश हैं। मीडिया अगर चाहे, तो अब भी गाड़ियाँ भेज सकती है, जाए उस परिवार तक, पूछे कुछ सवाल, क्योंकि ये चुनाव का वक्त है और इसी वक्त दबाव बन सकता है। दबाव बनेगा तो शायद, शायद काजल के केस में कुछ आगे बढ़े। ज़रा सोचिए, उस परिवार पर क्या बीतती होगी। जब उनकी 14 साल की बेटी के क़ातिल उसी गली से सीना तानकर निकलते हों क्योंकि वो ऊँची जाति से हैं। और दूसरी ओर, पीड़ित परिवार डर के साए में घुट रहा हो, न्याय की उम्मीद में भटक रहा हो। काजल - 14 साल की बच्ची। 12 फरवरी 2025, पूर्णिया का महिखंड गाँव, दमदाहा ब्लॉक, रूपौली विधानसभा में उसे तड़पा तड़पा कर मौत के घाट उतार दिया गया। परिवार कहता है उसके साथ दुष्कर्म हुआ था। डॉक्टर कहते हैं पोस्टमॉर्टम में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई। और अब वही परिवार पूछ रहा है अगर दुष्कर्म नहीं हुआ, तो फिर हत्या क्यों हुई? जिसने की, वो आज़ाद क्यों घूम रहा है? उसे जेल क्यों नहीं हुई? कौन बचा रहा है उसे? परिवार का आरोप है कि बिहार सरकार की मंत्री लेसी सिंह और विधायक शंकर सिंह के दबाव में आरोपियों को छोड़ दिया गया, क्योंकि आरोपी तथाकथित ऊँची जातियों से हैं एक ब्राह्मण, दूसरा राजपूत। अब सवाल बहुत सीधा है क्या लेसी सिंह और शंकर सिंह जवाब देंगे कि एक पीड़ित परिवार उनके नाम क्यों ले रहा है? क्या इस केस में उनकी कोई संलिप्तता है? अगर नहीं है, तो फिर वो आगे आकर इस परिवार के साथ क्यों नहीं खड़े हो रहे हैं? क्यों नहीं माँगते न्याय अपनी ही विधानसभा की बेटी के लिए? ये वक्त सिर्फ एक पत्रकार का नहीं, पूरे समाज का इम्तिहान है। मीडिया से भी आग्रह है जाएं वहाँ, देखें, सवाल करें। काजल के लिए बोलिए। उसके परिवार के साथ खड़े होइए। क्योंकि न्याय सिर्फ अदालतों में नहीं मिलता, वो समाज की सामूहिक आवाज़ से आता है। #JusticeForKajal @saltbylutyens

Anil Sharda

19,980 views • 11 months ago

बिहार चुनाव के लिए महागठबंधन के मैनिफेस्टो तथा श्री राहुल गाँधी जी द्वारा जातिगत जनगणना के लिए किए प्रयासों पर मीडिया से बातचीत : तेजस्वी जी, दोनों मिल के कर रहे हैं, कल भी शायद जाएंगे वो कल भी है, इस प्रकार से अभियान शुरू हो चुका है, वैसे जब हम ने तेजस्वी का नाम घोषित किया था, तमाम राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर के जो महागठबंधन में हैं और तब से ही एक प्रकार से अभियान शुरू हो गया था उस दिन से, और तेजस्वी जी भी बराबर दौरे कर रहे हैं, हमारी पार्टी के जो नेता लोग हैं तमाम लगे हुए हैं, ऑब्जर्वर भी अच्छा काम कर रहे हैं और दूसरा जो है राहुल गांधी जी की जो यात्रा शुरू हुई थी 16 दिन की उसके बाद में जो टेंपो बना, एक नैरेटिव क्रिएट हो गया कि भई इस प्रकार का 20 साल हो गए उनको सरकार में बीस साल हो गए और नीतीश कुमार जी ने कई पार्टियां बदलते गए, एलायंस करते गए, बनते बिगड़ते गए, उससे उनकी छवि भी अच्छी नहीं रही खराब, कहां तो वो प्रधानमंत्री के उम्मीदवार थे और कहां आज उनको बीजेपी वाले भी नहीं पूछ रहे हैं पूरी तरह से, बीजेपी चाहे वो अमित शाह जी हो चाहे कोई नेता हो कई तरह की बातें करते हैं कि हम तो चुनाव के बाद में देखेंगे कौन मुख्यमंत्री बनेगा,तो कहां तो पीएम बन रहे थे और कहां मुख्यमंत्री बनेंगे कि नहीं बनेंगे ये स्थिति बन गई, ठीक है न, उन स्थितियों में चुनाव हो रहा है, एक बात है कि इस बार धनबल का बहुत बड़ा खजाना इक्कठा हो गया है, लूट लिया है इन लोगों ने, इलेक्टोरल बांड के माध्यम से भी, वैसे भी, कोई कमी नहीं है पैसे की, वो प्रयोग देखा हम ने इनका महाराष्ट्र के अंदर, कोई कल्पना नहीं कर सकता जो पैसा बंटा वहां पर और चुनाव कैसे जीत गए एकतरफा ये पूरे देश को आश्चर्य हुआ, हार जीत की अलग बात है, पार्लियामेंट में हम लोग जीते थे और तीन चार महीने बाद में जो वहां पर सफाया हुआ सब पार्टियों का ये तो पूरे देश के लोगों को विश्वास नहीं हुआ, पूरे देश के लोगों को, हरियाणा के अंदर माइक्रो मैनेजमेंट कर लिया हम लोगों ने , चलो भई मान लेते हैं कुछ किया होगा,बराबरी पर आ गए लगभग प्वाइंटों में फर्क था पर महाराष्ट्र की तो हार जीत एक अजीबा है, मतलब एक प्रकार से रहस्य बना हुआ है तो ये जो राहुल जी का अभियान शुरू पहले ही हो गया टाइमली और मैं समझता हूं कि बिहार लोग पॉलिटिकली बहुत समझदार होते हैं, शुरू से ही मान्यता पूरे देश के लोगों की है कि बिहार में पॉलिटिकल सोच होती है अलग उनकी, उम्मीद करते हैं कि वहां बैकवर्ड भी हैं EBC वाले भी हैं, EBC का घोषणा पत्र एक प्रकार से राहुल जी ने वहां पर जारी करवाया है और जो कुछ जातिगत जनगणना की बात पहले बिहार ने करी थी, राहुल गांधी जी ने दबाव दिया सरकार पर पूरे देश के अंदर लागू होनी चाहिए, मना करते गए बीजेपी वाले पर आखिर में उनको मानना पड़ा, कैबिनेट का निर्णय हुआ दिल्ली के अंदर हम जातिगत जनगणना कराएंगे,ये राहुल जी की बहुत बड़ी विजय है। ये भी बिहारवासियों को मालूम है कि राहुल गांधी के कारण से पूरे मुल्क में जातिगत जनगणना अब प्रॉपर होगी, क्योंकि उनकी जातिगत जनगणना हुई थी बिहार की,उसको तो चैलेंज कर दिया सुप्रीम कोर्ट के अंदर, निर्णय हाईकोर्ट के सुप्रीम कोर्ट के आते गए वो लागू नहीं कर पा रहे थे और सरकार डबल इंजन की है तब भी ये सब चलता रहा, अब तो राहुल जी के दबाव से जो मोदी जी की गवर्नमेंट ने जो फैसला किया कि हम करवाएंगे बहुत बड़ी विजय उनकी है, सब जातियां उम्मीद कर रही थीं कि एक बार 1931 में हुई थी ये, 31 के बाद में कभी नहीं हुई, अब कम से कम एक आ गया मामला, मालूम पड़ेगा भई कौन जाति के कितने लोग हैं, तो जो स्कीमें बनेगी भारत सरकार की विभागों की या राज्यों की, तो एक साइंटिफिक वे से बन पाएगी तो एक अच्छा फैसला हो गया। ये तमाम बातें आपको मैं इसलिए बोल रहा हूं कि बिहार के चुनाव में एजेंडा के अंदर नैरेटिव के लिए ये काम आ रही हैं, लोगों में ये डिस्कशन होता है गांव गांव में और कस्बों के अंदर शहरों के अंदर। मैनिफेस्टो आया परसों, 28 को,कल ही , मैनिफेस्टो भी जो है पच्चीस लाख का बीमा उन्होंने कर दिया जो अपने यहां पर था, सबसे पॉपुलर स्कीम राजस्थान की ये रही है कि हर घर में इलाज फ्री हो गया, दवाइयां फ्री टेस्ट फ्री और ऑपरेशन फ्री ये बहुत बड़ा निर्णय किया बिहार के मैनिफेस्टो में महागठबंधन ने किया है, तो मैं समझता हूं कि एक मैसेज गया है, फिर जो और भी जो बिजली को लेकर पानी को लेके नौकरी को लेके, जो वादे किए गए मैनिफेस्टो में एक 35 साल का नौजवान जो है जिस प्रकार राहुल गांधी जी के साथ में दौरे किए वहां पर और अब जो है राहुल जी के दौरे के बाद में उसने जिस प्रकार से मैनिफेस्टो में अपनी भागीदारी निभाई भी है, राहुल गांधी की जो भावना थी पब्लिक क्या सोचती है उसके अकॉर्डिंग टू आप ये मैनिफेस्टो बनाओ, पब्लिक को पूछ के बनाओ, वो स्थिति बन चुकी है उसी में ये मैनिफेस्टो वहां पर बना है और उसका बड़ा इंपैक्ट रहेगा, तमाम स्कीमों का और तेजस्वी जी का मैंने कल सुना मैनिफेस्टो के बारे में भी डिस्कशन में देखा मैंने कि उनको पूरी, दो बार डिप्टी सीएम रहे हैं ,पूरी नॉलेज है उनको स्टेट की तमाम आंकड़े उनके सामने हैं साथ में हैं और वो मैं समझता हूं कि मजबूती के साथ में ये चुनाव जो है दंगल क्योंकि किसी ने ठीक कहा है कि ये तो चुनाव होता है लोकतंत्र के अंदर और ये युद्ध होता है तो चुनाव में लोकतंत्र में नॉन वॉयलेंस होता है, डेमोक्रेसी है कोई जीतो कोई हारो, और जो दंगल होता है संघर्ष होता है वहां क्या होता है वॉयलेंस होती है। युद्ध किधर लड़ रहे हैं, क्योंकि इनका विश्वास है ही नहीं डेमोक्रेसी के अंदर। युद्ध की तरह येन केन प्रकारेण साम दाम दंड भेद उसके माध्यम से चुनाव कहीं जीते हैं, ये उनकी थ्योरी है पूरे देश के अंदर, धर्म के नाम पर और कर दिया, हिंदू धर्म हिंदू धर्म, क्या बाकी लोग हिंदू धर्म के लोग नहीं हैं क्या ? आंकड़े बताते हैं कि कोई एक, ये जो इनकी पर्सेंटेज आ रही है वोटों की, चालीस से नीचे आ रही है, सौ वोट पड़ते हैं पोलिंग,उसका एक बार इकतीस परसेंट आ गया, एक बार छत्तीस परसेंट आ गया एक बार सैंतीस परसेंट आ गया, ऐसे ही तो आ रहे हैं, इसका मतलब सत्तर परसेंट लगभग तो लोग खिलाफ वोट दे रहे हैं इनके, पर किस बात का घमंड कर रहे हैं ये लोग ? ये चाहिए डेमोक्रेसी, संविधान की जो मूल भावना है उसके अनुसार चलें और जो हालात बन गए हैं देश में अहम् घमंड के कारण से, लोग बहुत चिंतित हैं, लोग जेलों में जा रहे हैं बिचारे , आलोचना करना तो देशद्रोही हो गया है यहां पर देश के अंदर, जबकि डेमोक्रेसी का तो मुख्य भाग है नॉन वॉयलेंस और सबको साथ में लेकर चलने वाली बात है, आलोचना को सुनने का माद्दा होना चाहिए, वो इनमें नहीं है। ये तमाम बातें जो हैं ये बिहार चुनाव में नैरेटिव बनेगा हमारा ये मैं कह सकता हूं। महागठबंधन को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में : मैंने कहा न आपको कि इस बार चुनाव जीतना हमारे लिए बहुत जरूरी नहीं है, देश के लिए जरूरी है और ये चुनाव खाली बिहार का नहीं हो रहा है एक प्रकार से देश में मैसेज देने का चुनाव है कि हरियाणा के अंदर क्या हुआ, दिल्ली के क्या हुआ और महाराष्ट्र में क्या हुआ और इनको घमंड आ गया तो घमंड अगर रहता है, अहम् घमंड रहता है तो डेमोक्रेसी के अंदर वो उचित नहीं है, मैं मानता हूं अब इनको बीस साल के बाद में बदलाव चाहिए बिहार को, बदलाव होना चाहिए और पूरी ताकत लगाएगी महागठबंधन, तमाम हमारे महागठबंधन के पार्टनर हैं सब एकजुट हैं, लगे हुए हैं और हम लोग कामयाब हो जाएंगे। फसल खराबे का मुआवजा न मिलने के मुद्दे पर प्रश्न का उत्तर : क्या करें इनका, मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिए, बार बार याद दिला रहे हैं इन लोगों को हम लोग, 22- 23 का मुआवजा नहीं मिला है भरतपुर के लोग भी आते हैं, जोधपुर डिविजन के लोग आते हैं कि वहां भी 23 का मुआवजा नहीं मिल रहा है किसानों को,आज 25 चल रहा है तो आप कल्पना कीजिए कि, अब फिर बरसात हो गई है तो नुकसान क्यों हो रहा है इनको, अर्जेंटली गिरदावरी करा के, आउट ऑफ वे बात करके, आउट ऑफ बॉक्स बात करके इनको चाहिए कि मुआवजे का प्रबंधन करें और मुआवजा फसलों का दें, किसान अगली फसल कैसे बोएगा ? उनके पास तो इतने ही साधन होते हैं, क्योंकि जो मोदी जी ने कहा था डबल इनकम कर देंगे वो तो अब नाम ले नहीं रहे हैं, न डबल इनकम हुई है, डबल इनकम हुई नहीं है तो ये बेचारे परेशान हैं लोग, उनको चाहिए कि ये किस प्रकार से टाइमली मुआवजा दें ये मेरी मांग है।

Ashok Gehlot

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दिल्ली से आए सामंतवादी पत्रकारों की हालत देखिए — जनता के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं, “कब तक लालू के जंगलराज की बात करेंगे? भूल जाइए ना, तेजस्वी को एक मौका दीजिए!” अरे भइया, अगर इतना ही प्रेम है तो पत्रकारिता छोड़िए और सीधे राजद जॉइन कर लीजिए। लेकिन बिहार की जनता अब भोली नहीं रही — सजग है, सयानी है। दो टूक जवाब देती है — 👉 “जब तक ज़िंदा हैं, तब तक जंगलराज को याद कराते रहेंगे।” और वहीं, विकास पर भी ज्ञान देती है — बताती है कि लालू परिवार ने जो गड्ढा बिहार को 15 साल में दिया, एनडीए ने उसे 20 साल में भरने की कोशिश की है। लालू के समर्थक चाहते हैं कि न तो उनके ‘जंगलराज’ की याद दिलाई जाए, और न उनके पापों का हिसाब लिया जाए — ताकि लालू का बेटा फिर से गद्दी पर बैठ सके और बिहार को एक बार फिर अंधकार में धकेल दे।

Amit Malviya

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एक लड़का पिछले चार दिनों से केनरा बैंक के लगातार चक्कर लगा रहा है। भीषण गर्मी में वह अपने जरूरी काम के लिए हर दिन बैंक पहुंचता है, लेकिन हर बार उसे यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि स्टाफ नहीं हैं, लगातार चार दिन तक परेशान होने के बाद जब वह फिर से बैंक पहुंचा तो वह काफी निराश हो चुका था, इसी दौरान उसने अपनी स्थिति को लेकर एक वीडियो बनाने की कोशिश की, लेकिन बैंक में मौजूद पुलिस कर्मी के द्वारा उसे वीडियो बनाने से रोक दिया, अगर स्टाफ की कमी है तो बैंक में व्यवस्था और स्टाफ बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि लोगों को बार-बार इस तरह परेशान न होना पड़े। पहले काम आसानी से हो जाता था, लेकिन अब बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी काम नहीं हो पा रहा है और ग्राहकों के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जा रहा है।

ʀᴜᴅʜʀᴀ ʏᴀᴅᴀᴠ🇮🇳

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