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भाई ये कोई आम सांप नहीं है ये रैटलस्नेक है पूंछ में लगा खड़खड़ाने वाला हिस्सा जब इतनी तेज़ आवाज़ करने लगे तो समझो सांप साफ-साफ चेतावनी दे रहा है मुझसे दूरी बनाए रखो कुदरत ने इसे बिना वजह ये आवाज़ नहीं दी पहले चेतावनी फिर खतरा। जानवरों की...

43,032 次观看 • 5 天前 •via X (Twitter)

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पत्नी ने अपमान किया मारने की धमकी..🚨 तो पति खुद को चप्पल मारने लगा...🥹 1.👉“जब पत्नी के शब्दों ने पति को इस हद तक तोड़ दिया कि वह खुद को ही मारने लगा…” 2.👉“रेलवे स्टेशन पर तमाशा नहीं,एक टूटे हुए इंसान की चीख है ये…” 3.👉“ये गुस्सा नहीं,अपमान से टूटा हुआ आत्मसम्मान है” 4.👉“मर्द रोता नहीं कहा जाता है,लेकिन आज ये मर्द खुद को सज़ा दे रहा है” 5.👉“जब रिश्ता बोझ बन जाए और इंसान खुद से हार जाए” 6.👉“बीच स्टेशन,भीड़ के सामने,एक पति पूरी तरह टूट चुका है” रेलवे स्टेशन पर पति-पत्नी का झगड़ा,लेकिन ये सिर्फ झगड़ा नहीं है,पति की आंखों में थकान,चेहरे पर बेबसी और शब्दों में टूटा हुआ आत्मसम्मान साफ दिख रहा है, पत्नी के अपमान से इतना आहत कि पति चप्पल उतारकर खुद को मारने लगता है और कहता है, “अब मुझसे नहीं होगा,मार लो मुझे…” ये वीडियो बताता है कि रिश्तों में लगातार तिरस्कार और मानसिक दबाव किसी इंसान को किस हद तक तोड़ सकता है,घरेलू हिंसा सिर्फ मार-पीट नहीं होती, मानसिक अपमान भी उतना ही खतरनाक होता है.. मर्द हो या औरत,सम्मान के बिना कोई भी रिश्ता जिंदा नहीं रह सकता,,

KUNDAN PATEL

127,925 次观看 • 7 个月前

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 次观看 • 6 个月前

"देखिए! ये क्या हो रहा है देश में? एक तरफ़ बांग्लादेश में हमारे हिंदू भाइयों-बहनों पर अत्याचार हो रहे हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं, महिलाओं के साथ ज़ुल्म हो रहा है... और दूसरी तरफ़ यहीं भारत में एक बहन रिद्धिमा शर्मा खुलकर बोल रही है, तो FIR? तो विवाद? अरे ये तो ग़लत है ना! रिद्धिमा ने क्या कहा? उसने कहा कि अगर वे हमारे एक-दो को छेड़ते हैं, तो हम चुप नहीं बैठेंगे! ये तो प्रतिरोध की बात है, ये तो अपनी बहनों की इज़्ज़त बचाने की बात है! मीडिया वाले इसे तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं, जैसे ये घृणा फैला रही हो... अरे भई, घृणा तो वो फैला रहे हैं जो बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार कर रहे हैं! SanataniRiddhi एक सनातनी बहन है, वो अपनी भावनाओं में बोल गई, लेकिन उसका इरादा साफ़ है हिंदू समाज को जागृत करना, अपनी बहनों की सुरक्षा की बात करना! क्या हम औरतों की इज़्ज़त के लिए आवाज़ नहीं उठा सकते? क्या अब बोलना भी अपराध हो गया? कांग्रेस वाले चिल्ला रहे हैं, लेकिन असली मुद्दा देखिए बांग्लादेश में क्या हो रहा है, उस पर कोई बोलता क्यों नहीं? मैं कहती हूँ – #ISupportRiddhima ! क्योंकि ये बहन डरने वाली नहीं है, ये सच बोल रही है! और जो मीडिया इसे घृणा फैलाना बता रहा है, वो पहले बांग्लादेश के हिंदुओं की सुन ले! ये आवाज़ दबने नहीं देंगे! जय श्री राम!"

कल्पना श्रीवास्तव 🇮🇳

23,632 次观看 • 8 个月前

ये जबरन नहीं तो और क्या है? बांग्लादेश में एक छोटे हिंदू बच्चे से ज़बरदस्ती कलमा बुलवाया जा रहा है… पीछे से आवाज़ आ रही है – "ला इलाहा..." और सामने पुलिस खड़ी है… मौलवी की आज्ञा पर सब कुछ हो रहा है। मासूम बच्चा, डर से कांपता हुआ… और उसके मुंह से निकाले जा रहे वो शब्द, जो उसके दिल के नहीं हैं। ये कौन सा मजहब है जहाँ बच्चा भी नहीं बख्शा जाता? क्या यही इंसानियत है? जहाँ एक बच्चे की आस्था को रौंद दिया जाए? जहाँ पुलिस खुद तमाशा देखती रहे? ये सिर्फ धर्म नहीं छीनने की कोशिश है… ये एक पीढ़ी को डराने की साजिश है। और अगर तुम आज भी चुप रहे, तो अगली बारी किसी और की नहीं… तुम्हारे घर की हो सकती है। #hindusunderattackinbangladesh #savebangladeshhindus

🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳

35,102 次观看 • 1 年前

क्लासरूम में दो-दो इम्तिहान दे रही है ये बहन एक तरफ ब्लैकबोर्ड पर सवाल दूसरी तरफ गोद में 7 महीने का भाई। मां चली गई। पिता मजबूर हैं। घर में कोई नहीं जो भाई को संभाल ले। तो ये बेटी क्या करे। पढ़ाई छोड़ दे क्या नहीं भाई को ही स्कूल ले आई। सोचो जरा जिस उम्र में हम टिफिन भूल जाते थे, ये अपनी कॉपी के साथ भाई का दूध भी याद रखती है। जिस उम्र में हमारा ध्यान सिर्फ खेल में होता था, इसका ध्यान हर 2 मिनट में भाई पर जाता है कहीं रो तो नहीं रहा। ये स्कूल बैग नहीं उठा रही ये जिम्मेदारियों का पहाड़ उठा रही है। ये छात्र नहीं ये हालात की मारी एक "छोटी मां" है। हम छोटी-छोटी बातों पर किस्मत को कोसते हैं। इस बच्ची को देखो आंख में आंसू नहीं, हिम्मत है। शिकायत नहीं, फर्ज है। इस बेटी को सलाम 🙏 मां के जाने के बाद घर नहीं टूटने दिया। खुद टूट गई, पर भाई को बिखरने नहीं दिया। अगर ये वीडियो देखकर आपकी आंख नम हो गई तो शेयर जरूर करना। क्योंकि दुनिया को ऐसी "बड़ी बहनों की कहानी पता चलनी चाहिए। बचपन छूट गया, पर बहन ने भाई का हाथ नहीं छोड़ा।❤️

Majid Khan

15,836 次观看 • 4 个月前