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“मुसलमानों के घर पर बुलडोज़र चल रहा है ख़ुश हो जाइए… …कौन ख़ुश हो जाएगा? मैं क्या शैतान थोड़े ही हूँ जो ख़ुश हो जाऊँगा! …जहाँ करुणा नहीं दया नहीं वहाँ धर्म कैसे होगा?”

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आजतक का सवाल था कि क्या नरेंद्र मोदी अमरीका -इसराइल -ईरान के बीच बैलेंस बनने में सफल हुए हैं। जवाब है नहीं। दरअसल मोदी शायद ट्रम्प- नेतन्याहू के झाँसे में आ गए थे कि ईरान तो दो-चार दिन हार ही जाएगा। सो वो ईरान को छोड़ अमरीका के पाले में चले गए। लेकिन ईरान तो अब तक नहीं हारा। और नुक़सान भारत का होने लगा। अब ईरान के राष्ट्रपति को मोदी ईरानी भाषा में ट्वीट कर रहे हैं, लेकिन वहाँ से कोई जवाब तक नहीं मिल रहा। पहले ट्रम्प द्वारा हर बार ज़लील करने के बावजूद ट्रम्प को ही ख़ुश करने में लगे थे। अब बदली परिस्थिति में ईरान को ख़ुश करना शुरू किया है। लेकिन न ट्रम्प ख़ुश हुए, न ही ईरान। ऐन इसे संतुलन बनाना कहते हो, तो कहते रहिए।

Gurdeep Singh Sappal

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