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ये लोग ग्राउंड पर जाकर भी ख़ुद से चार शब्द नहीं बोल पाते हैं। इन्हें वहां भी लिखा हुआ पढ़ना होता है। भले टेलीप्रॉम्प्टर न सही, मोबाइल ही सही। पांडे सही ही कहता है- इन्हें लिख के न दो, तो बोल ना पाएं।

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देखिये जन्मदिन पर भी वहशीपन की पराकाष्ठा का स्तर.. खुशी मनाने का ये कैसा तरीका है...? यदि काफिर का सर तन से जुदा करने का दाव न लगे तो खिलौने का ही सही... ठीक से खड़ा नहीं हुआ जा रहा.... हाथ कांप रहे हैं... कब्र में जाने की उम्र में भी इंसानी खिलौने के सर को धड़ से अलग कर अपना जन्मदिन मनाते इस कट्टर इस्लामिक दोगले जावेद अख्तर को ही देखिए...! ये असुर प्रजाति है ही ऐसी, "सर तन और सर धड़ से जुदा" करना हर मोमीन का सबसे बड़ा ख्वाब होता है, जिसे किसी न किसी तरह पूरा करने में वो जिंदगी भर लगा रहता है... जिनको मुगालता है वो ये जान लें कि... क्या ये पढ़े लिखा नहीं है...? क्या ये संपन्न वर्ग से नहीं है...? क्या बुद्धिजीवी समझे जाने वाले ऐसे लोगों की गिनती देश के एलीट वर्ग में नही होती...? फिर भी इन लोगों को आत्मीय खुशी कैसे कर्मों से मिलती है...? काफ़िर(हिंदू) न सही..., आत्म संतुष्टि के लिए खिलौने का गला रेतकर ही सही, बस धड से जुदा करके ही इन्हें पूर्ण सुख और तृप्ति मिलती है... और इस वहशीपने पर खिलखिलातीं इन सुपर्णखाओं को देखिए...
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देखिये जन्मदिन पर भी वहशीपन की पराकाष्ठा का स्तर.. खुशी मनाने का ये कैसा तरीका है...? यदि काफिर का सर तन से जुदा करने का दाव न लगे तो खिलौने का ही सही... ठीक से खड़ा नहीं हुआ जा रहा.... हाथ कांप रहे हैं... कब्र में जाने की उम्र में भी इंसानी खिलौने के सर को धड़ से अलग कर अपना जन्मदिन मनाते इस कट्टर इस्लामिक दोगले जावेद अख्तर को ही देखिए...! ये असुर प्रजाति है ही ऐसी, "सर तन और सर धड़ से जुदा" करना हर मोमीन का सबसे बड़ा ख्वाब होता है, जिसे किसी न किसी तरह पूरा करने में वो जिंदगी भर लगा रहता है... जिनको मुगालता है वो ये जान लें कि... क्या ये पढ़े लिखा नहीं है...? क्या ये संपन्न वर्ग से नहीं है...? क्या बुद्धिजीवी समझे जाने वाले ऐसे लोगों की गिनती देश के एलीट वर्ग में नही होती...? फिर भी इन लोगों को आत्मीय खुशी कैसे कर्मों से मिलती है...? काफ़िर(हिंदू) न सही..., आत्म संतुष्टि के लिए खिलौने का गला रेतकर ही सही, बस धड से जुदा करके ही इन्हें पूर्ण सुख और तृप्ति मिलती है... और इस वहशीपने पर खिलखिलातीं इन सुपर्णखाओं को देखिए...

Yogi Devnath 🇮🇳

145,895 次观看 • 1 年前

नरेंद्र मोदी न तो नैसर्गिक नेता हैं और न ही प्रधानमंत्री पद के काबिल... सही मायने में औद्योगिक घरानों द्वारा प्रायोजित एक मुखौटा भर हैं। नरेंद्र मोदी की छवि गढ़ी गई है कॉर्पोरेट मीडिया के द्वारा; विदेश नीति से लेकर आर्थिक नीतियों पर सर्वाधिक असफल नेता हैं देश में। जनता का निर्णय भी हमेशा सही नहीं होता, अधिकांश लोग भी उतनी ही बड़ी गलती कर सकते हैं जितनी कि कुछ लोग। यही नरेंद्र मोदी को समझने में हमारे समाज ने गलती की है। प्रोपोगैंडा नहीं, यह उस झूठ की स्थापना है जिसका दूर से जलता दिखने वाला "दीया" सही मायने में एक छोटा बल्ब है, जिसकी बिजली सप्लाई का स्विच कॉर्पोरेट घरानों के पास है।

𝙈𝙪𝙧𝙩𝙞 𝙉𝙖𝙞𝙣

16,895 次观看 • 1 个月前