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योगी जी आपको मोदी जी की तरह मुंह छुपा कर नहीं भगाना चाहिए था।
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सवालों से भागने का आरोप योगी आदित्यनाथ पर लगाना वैसा ही है जैसे सूरज पर अंधेरे का आरोप लगाना। जो मुख्यमंत्री हर सप्ताह जनता के बीच बैठकर सीधे फरियाद सुनते हैं और विधानसभा में विपक्ष को करारा जवाब देते हैं, उनके 10 मिनट की संगठनात्मक घोषणा को “भागना” बताना सिर्फ राजनीतिक कुंठा है। Q&A तय नहीं था तो कैमरे के सामने हंगामा किस बात का? सवाल पूछने की आड़ में वायरल क्लिप की भूख को पत्रकारिता का नाम देना बंद कीजिए।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो लगभग हर सप्ताह जनता दर्शन में बिना किसी मध्यस्थ के सीधे आमजन और फरियादियों से आमने-सामने संवाद करते हैं और विधानसभा में विपक्ष के हर आरोप का जवाब देते हैं। जो नेता सदन और खुले मंचों पर तीखे सवालों का सामना करने के लिए जाना जाता हो, उस पर 10 मिनट की एक संगठनात्मक घोषणा से भागने का आरोप लगाना तर्कहीन और हास्यास्पद है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी प्रेस वार्ता के शुरू होने से पहले तय किया जाता है कि उसमें प्रश्न-उत्तर होगा या केवल ब्रीफिंग। जब आयोजकों द्वारा पहले ही केवल अभियान घोषणा तय थी, तब कार्यक्रम समाप्त होने पर आक्रामकता दिखाना पत्रकारिता की मर्यादा के बजाय सोशल मीडिया पर वायरल फुटेज और सनसनी हासिल करने की रणनीति अधिक प्रतीत होती है।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो लगभग हर सप्ताह जनता दर्शन में बिना किसी मध्यस्थ के सीधे आमजन और फरियादियों से आमने-सामने संवाद करते हैं और विधानसभा में विपक्ष के हर आरोप का जवाब देते हैं। जो नेता सदन और खुले मंचों पर तीखे सवालों का सामना करने के लिए जाना जाता हो, उस पर 10 मिनट की एक संगठनात्मक घोषणा से भागने का आरोप लगाना तर्कहीन और हास्यास्पद है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी प्रेस वार्ता के शुरू होने से पहले तय किया जाता है कि उसमें प्रश्न-उत्तर होगा या केवल ब्रीफिंग। जब आयोजकों द्वारा पहले ही केवल अभियान घोषणा तय थी, तब कार्यक्रम समाप्त होने पर आक्रामकता दिखाना पत्रकारिता की मर्यादा के बजाय सोशल मीडिया पर वायरल फुटेज और सनसनी हासिल करने की रणनीति अधिक प्रतीत होती है।

जब मुख्यमंत्री जी मंच की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगते हैं तब वायरल होने के किए सवाल पूछे जाते हैं. कुछ बात तो है योगी आदित्यनाथ में जो अखिलेश से लेकर उनके साधारण चमचे तक योगी आदित्यनाथ के नाम पर अपनी दुकान चलाना चाहते हैं

जो मुख्यमंत्री हर सप्ताह जनता दर्शन में बिना किसी मध्यस्थ के सीधे फरियादियों से संवाद करते हों और विधानसभा में विपक्ष के तीखे से तीखे सवालों का जवाब देते हों, उन पर 10 मिनट की संगठनात्मक घोषणा से “भागने” का आरोप हास्यास्पद है। प्रेस वार्ता भी पहले से तय प्रारूप के अनुसार होती है ब्रीफिंग है तो ब्रीफिंग, सवाल-जवाब है तो सवाल-जवाब। जब कार्यक्रम केवल अभियान की घोषणा के लिए निर्धारित था, तब उसके बाद कैमरे के सामने आक्रामकता दिखाकर वायरल फुटेज तलाशना पत्रकारिता नहीं, सनसनी की सियासत है।

2 रुपये में 2 कौड़ी के लोग ऐसे ही पीछे से सवाल करते हैं योगी जी भागते नहीं, भागते हैं

मैंने ऐसा कोई काम ही नहीं किया कि मैं मीडिया का जवाब दे सकूँ

सूप त सूप चलनी भी बोलले

इसे पत्रकारिता नहीं इसे बदतमीज़ी कहते हैं, जब तक प्रेस वार्ता चली तब ये सवाल नहीं पूछ सकी? जब मुख्यमंत्री उठकर जाने लगे तो सवाल पूछ लो

PM Abhijeet Dipke should resign.

दौड़ा दौड़ा भागा भागा सा दौड़ा दौड़ा भागा भागा सा गाना याद आ गया बेलचटटा को भागते देखकर

जो नेता हर सप्ताह जनता और सदन में सवालों का सामना करता हो, उस पर 10 मिनट की तय घोषणा से भागने का आरोप हास्यास्पद है। जब कार्यक्रम पहले से ब्रीफिंग के लिए तय था, तो उसे विवाद बनाना पत्रकारिता नहीं, सिर्फ सनसनी की कोशिश है।

Nawtanki Pappu media

योगी जी जनता दर्शन में सीधे फरियादियों से मिलते हैं और सदन में विपक्ष को जवाब देते हैं। ऐसे मुख्यमंत्री पर सवालों से भागने का आरोप सिर्फ सनसनी फैलाने की कोशिश है।

मोदी जी कि तरह प्रेस वार्ता करनी ही नहीं चाहिए थी

Shameon BJP Ministers and government #shameon

Bhagne ki aadat h inki

Haathi apni chal chalta rahta hai aur kutte - kuttiyan bhonkte rahte hai wahi haal hai tum jaise bikaau logo ka ...

सपा पालित पत्तलकार और सपा के कारनामे में अंतर है

Akhir ab yogi ji ko bhagna pad raha hai meeting me.

हजारों यूट्यूबर माइक और यह देखिए बोलकर पूरे देश में उत्पात मचाए रहते हैं। ब्राह्मण शिरोमणि पंडित अभिषेक उपाध्याय रोज सरकार गिरवाते हैं। यहां तक कि पत्रकारिता के नाम पर गाली गलौज और खुलेआम बेशर्मी से झूठ बोला जाता है। फिर भी प्रेस की आजादी नहीं है। अब आजादी का मतलब क्या चाहिए?

तो औरत पर घुमाके कंटाप मारना भी तो सही नहीं है

Vanaspati ka h ye khela

Thakur to gyooo

Superb

जब मुख्यमंत्री जी मंच की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगते हैं तब वायरल होने के किए सवाल पूछे जाते हैं. कुछ बात तो है योगी आदित्यनाथ में जो अखिलेश से लेकर उनके साधारण कार्यकर्ता तक योगी आदित्यनाथ के नाम पर अपनी दुकान चलाना चाहते हैं गाइज.

योगी आदित्यनाथ ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो हर हफ्ते जनता दर्शन में बिना किसी बिचौलिए के सीधे लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं। विधानसभा में भी विपक्ष के हर सवाल और आरोप का जवाब देते हैं। जो नेता सदन और खुले मंच पर तीखे सवालों का सामना करता है, उस पर सिर्फ 10 मिनट की संगठनात्मक घोषणा के बाद सवालों से भागने का आरोप लगाना हास्यास्पद है। किसी प्रेस कार्यक्रम में पहले से तय होता है कि सवाल-जवाब होंगे या सिर्फ ब्रीफिंग। जब पहले ही साफ था कि कार्यक्रम सिर्फ अभियान की घोषणा के लिए है, तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद हंगामा खड़ा करना पत्रकारिता कम और वायरल वीडियो बनाने की कोशिश ज्यादा लगती है। सवाल पूछना पत्रकारिता है, लेकिन हर कार्यक्रम को अपनी मर्जी से प्रेस कॉन्फ्रेंस समझ लेना पत्रकारिता नहीं है।

कुर्सी से सबसे पहले उठे।😁😁
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