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यही इंसान की खूबी है तभी तो समाज का हीरो है Lawrence Bishnoi

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देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आरक्षण लागू नहीं है। जब समाज के हर वर्ग के छात्र मिलकर एक साथ कंट्रीब्यूट नहीं करेंगे तो ना research grow कर सकती है ,ना देश। गलगोटिया हो या एमिटी, हर प्राइवेट यूनिवर्सिटी का हाल कमोबेश यही है! आश्चर्यजनक तो ये है की चोरी पकड़े जाने के बाद अभी भी “Excellence” की बात कर रहे हैं! वर्तमान में ज़रूरत है पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी को बढ़ावा देने की और Research and development को बजट का बड़ा हिस्सा देने की ताकि देश तेज़ी से आगे बढ़े, पर जब सरकार ही साइंटिफिक टेम्परामेंट के विरुद्ध काम करती है तो उम्मीद करना बेईमानी लगता है! समस्या की जड़ पर बात करना होगा, तभी सुधार की संभावना है।

Priyanka Bharti

38,298 Aufrufe • vor 7 Monaten

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 Aufrufe • vor 6 Monaten